Finding this tool useful? Bookmark us (cmd+D) for easy and fast access!

Get Another Transcript

Transcript [EN]: Citizenship and Governance || important Quetion with Answer #semester7 #politicalscience #exam #du

Author:Roma Jaiswal

Summary

This video presents unit-wise important questions and answers on Citizenship and Governance for BA Political Science students, focusing on core concepts, key acts, and contemporary governance models in India. It defines citizenship from legal, political, and social angles, explains the differences between birth-based and lineage-based (jus soli vs jus sanguinis) citizenship, and outlines the major amendments to the Indian Citizenship Act of 1955 (1986, 2003, 2015, 2019). It then covers governance, the relationship between democracy and governance, and how Good Governance and e-governance operate, including their principles (transparency, accountability, participation) and examples like Aadhaar, Digital India, RTI, and citizen charters. The video also explains citizen charters, RTI, Lokpal/Lokayukt, social audit, and civil society, with case studies and challenges, and closes with Delhi’s participatory governance model as a historical example of citizen-government collaboration.

Share:
सो हेलो एवरीवन वेलकम टू आवर YouTube चैनल गाइस। सो गाइस जितने भी स्टूडेंट हैं बीए प्रोग्राम के बीए ऑनर्स के यानी जो भी स्टूडेंट सेमेस्टर सेवंथ में है और जिस भी स्टूडेंट के पास सेमेस्टर सेवंथ में सिटीजनशिप एंड गवर्नमेंट्स ये सब्जेक्ट है तो उनके लिए वीडियो होने वाली है। तो आज हम इस वीडियो में करने जा रहे हैं सिटीजनशिप एंड गवर्नमेंट्स का इंपॉर्टेंट क्वेश्चन विद आंसर वो भी यूनिट वाइज़। तो अभी तक आपने अगर कुछ भी नहीं पढ़ा आप यह पढ़ के जाओगे सिर्फ तो भी मैं 100% कहती हूं कि आप बहुत अच्छे स्कोर जिसे कहते हैं ना 90% से ऊपर अगर आप लिखोगे जो मैंने इस पीडीएफ में बताया है तब आपको मिलेगा पक्का। ठीक है? तो चलिए हम वीडियो को स्टार्ट करते हैं। सो वीडियो जो है ये हिंदी मीडियम में होने वाली है। बट ये पीडीएफ आपको हिंदी मीडियम एंड इंग्लिश मीडियम दोनों में आपको tlegram से मिल जाएगी। डिस्क्रिप्शन में आपको मेरा tlegram का लिंक मिलेगा। वहां पे आप जॉइ हो सकते हो। ओनली ₹50 में आपको यह पीडीएफ हिंदी मीडियम एंड इंग्लिश मीडियम किसी में भी आप इसको ले सकते हो बाय tlegram चलिए वीडियो को स्टार्ट करते हैं। सो वीडियो को स्टार्ट करने से पहले अगर आप मेरे चैनल पे नए आए हो, फर्स्ट टाइम आए हो तो प्लीज मेरे चैनल को सब्सक्राइब करिए, मुझे सपोर्ट करिए एंड मेरे चैनल को सब्सक्राइब करिए, शेयर करिए जिससे बेल आइकॉन को ऑन करिए जिससे सारी नोटिफिकेशन, सारी वीडियो टाइम टू टाइम आपके पास पहुंचेगी। डिस्क्रिप्शन में आपको मेरे Telegram का लिंक मिलेगा। वहां पे आप जॉइन हो सकते हो और बिल्कुल ₹ में आपको यह पीडीएफ आपको हिंदी मीडियम एंड इंग्लिश मीडियम में सेम पीडीएफ आपकोेंट क्वेश्चन की मिल जाती है। साथ ही साथ आप मुझे मेरे Instagram पे फॉलो कर सकते हो। मेरी आईडी है इट्स चौधरी 7065। चलिए स्टार्ट करते हैं आज हमारी वीडियो। हम यूनिट वाइज स्टार्ट करेंगे। तो हमारा यूनिट नंबर फर्स्ट सिटीजनशिप एंड गवर्नमेंट्स का नागरिकता यानी सिटीजनशिप। तो इससे हमारा पहला क्वेश्चन क्या बनता है? हमारा पहला क्वेश्चन बनता है कि नागरिकता क्या है? ठीक है? पहला क्वेश्चन तो ये बनेगा कि नागरिकता क्या है? और नागरिकता में जस सोली एंड जस्ट जो आपका सेंगुनिस की व्याख्या कीजिए और उदाहरण दीजिए। तो क्या है ये दोनों चीज़? ठीक है? ये आपको बताना है। तो परिचय से स्टार्ट करते हैं। मैंने आपको यूनिट्स भी पढ़ाया है आपको सिटीजनशिप एंड गवर्नमेंट्स का। उसमें भी मैंने आपको ये चीजें बता रखी हैं। ठीक है ना? तो सबसे पहले आप सारी वीडियोस जो मैंने यूनिट्स करवाई है उसको कवर कीजिए। देन आप ये देखिए। आपका कुछ भी नहीं छूटने वाला। ठीक है? भरोसा रखिए। चलिए स्टार्ट करते हैं। तो इंट्रोडक्शन से स्टार्ट करते हैं। तो नागरिकता क्या है? नागरिकता एक व्यक्ति की किसी देश के प्रति कानूनी और राजनीतिक पहचान होती है। मतलब जिस देश का वो व्यक्ति होता है उस देश की कानूनी तौर पे वो उस देश का व्यक्ति है। उस राजनीतिक पहचान देती है उस सिटीजनशिप। क्योंकि जिसके पास सिटीजनशिप होती है वही नागरिक वोट दे सकता है उस देश में। तो ये ना केवल व्यक्ति के देश के भीतर अधिकार और कर्तव्य से जोड़ती है। मतलब क्या है? जो नागरिक होगा वो उस देश के जितने भी अधिकार होंगे वो उसको प्राप्त होंगे और कर्तव्य उसको भी उसको पालन करना पड़ेगा। साथ ही साथ क्या है कि देश को नागरिक के माध्यम से सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से मजबूत बनाती है। जो कोई भी देश होता है वो नागरिक से ही तो चलती है। तो नागरिक के माध्यम से व्यक्ति राजनीतिक अधिकार पाता है। जैसे कि मतदान देने का अधिकार, चुनाव लड़ने का अधिकार, समाज में शामिल होने का अधिकार। ये सब आपको कब मिलेगा? जब आप एक नागरिकता आपके पास होगी। सिटीजनशिप आपके पास होगी। ठीक है? नागरिकता की अवधारणा जो है वो समाज और शासन के मूल में निहित है। यानी समाज और शासन इन दोनों से जुड़ा होता है। एक लोकतांत्रिक देश में नागरिक ना केवल कानूनी पहचान का माध्यम है बल्कि ये समानता, सामाजिक न्याय और राजनीतिक भागीदारी का आधार भी है। तो जो भी लोकतांत्रिक देश में व्यक्ति जिसके पास नागरिकता होती है वो उस देश में समानता जो उस देश के जितने व्यक्ति को जो चीज़ मिल रही है उस वो उस सामाजिक न्याय और राजनीतिक में उस देश की भागीदारी वो ले सकता है। ठीक है? तो नागरिकता आप समझ गए? तो नागरिकता का अर्थ क्या होता है और महत्व क्या होता है? नागरिकता का शब्द जो है यानी नागरिकता का शब्ताब्दी अर्थ बोलूं तो किसी राज्य या राष्ट्र का सदस्य होना क्या कहलाता है? नागरिकता कहलाता है। इसे कई दृष्टिकोण से हम पढ़ सकते हैं, जान सकते हैं। जैसे कि कानूनी दृष्टिकोण से नागरिकता क्या होती है? नागरिकता वह कानूनी स्थिति होती है जिसमें किसी व्यक्ति को उस देश के संविधान द्वारा अधिकार, सुरक्षा और कर्तव्य प्रदान किए जाते हैं। मींस जिस व्यक्ति के पास नागरिकता है जिस देश की तो उस देश के जो संविधान है वो उसको क्या देती है? वो उसको जो भी संविधान में अधिकार है वो अधिकार देती है, सुरक्षा देती है और कर्तव्य जो भी उस देश के प्रति उसको करने हैं वो करने का अधिकार देती है। राजनीतिक दृष्टिकोण से क्या होता है? नागरिकता। तो नागरिक किसी भी व्यक्ति को उस देश की राजनीतिक प्रक्रिया में भाग लेने का अधिकार देती है। उदाहरण वोट देने का अधिकार, चुनाव लड़ने का अधिकार, राजनीतिक दलों में अगर आपको भाग लेना है तो सबसे पहले आपको जिस देश में आप हो उस देश की नागरिकता आपके पास होनी चाहिए। तीसरा चीज क्या है? सामाजिक दृष्टिकोण से अगर नागरिकता देखिए तो नागरिकता वह व्यक्ति को समाज में समान अधिकार और जिम्मेदारियां देती हैं। मींस अगर आप एक नागरिकता आपके पास भारत की है तो आप भारत के समान अधिकार प्राप्त करोगे। भारत में के प्रति आप मतलब जो अदर लोगों की जिम्मेदारी है वो आपकी जिम्मेदारी भी होगी। की सामाजिक जिम्मेदारी, सामाजिक न्याय और समान अवसर आपको सुनिश्चित कराती है। आपकी समाज नागरिकता। नागरिकता का महत्व क्या होता है कि नागरिकता जो है वो राजनीतिक अधिकार हमें दिलाती है। यानी नागरिक चुनाव में भाग ले सकते हैं। है ना? जैसे कि जिसके पास नागरिकता होती है जो भारत का नागरिक है वो क्या करेगा? भारत में चुनाव लड़ सकेगा। है ना? चुनाव में वोट दे सकेगा। सामाजिक सुरक्षा भी उसको प्राप्त होगी। जैसे कि जिसके पास नागरिकता है वो सरकारी शिक्षा ले सकता है। सरकारी हॉस्पिटल में मतलब अपना इलाज करा सकता है। सरकारी जो नौकरियां होती है यूपीएससी, एसएससी उसमें भाग ले सकता है। ये सिर्फ सुविधाएं किसको दी जाती है? जो भारत का नागरिक होता है जिसके पास नागरिकता होती है। ठीक है? आर्थिक अधिकार भी नागरिकता से प्राप्त होते हैं। जैसे कि संपत्ति का अधिकार, करा धन में भागीदारी। तो ये सब एक नागरिक को ही मिलते हैं। सांस्कृतिक अधिकार भी मिलते हैं। जैसे कि भाषा, सांस्कृतिक और धर्म की स्वतंत्रता। तो ये सब क्या होते हैं? नागरिकता का महत्व होते हैं। नागरिकता प्राप्त करने के कौन-कौन से तरीके होते हैं? तो नागरिकता प्राप्त करने के जैसे मैंने क्वेश्चन में बताया था जसोली यानी जन्म स्थान नागरिकता होती है। तो जन्म स्थान नागरिकता क्या होती है? जस सोली का अर्थ होता है यानी जन्म के आधार पर नागरिकता। मींस जिस देश में आप जन्म लिए हो उस देश के आप नागरिक कहलाओगे और उस देश की नागरिकता आपको प्राप्त होगी। यानी इसका मतलब है जिस देश में व्यक्ति जन्म लेता है वे अपने आप उस देश का नागरिक बन जाता है। तो ये वाला सिद्धांत जो है वो जन्म के आधारित वाला नागरिकता कहलाता है। इसकी क्या विशेषता होती है? कि जन्म स्थान मुख्य आधार होता है। मींस मैं भारत में पैदा हुई हूं तो मैं भारत की नागरिक हूं। आप पाकिस्तान में पैदा हुए हैं तो आप पाकिस्तान की नागरिक हो। कोई अमेरिका में पैदा हुआ है तो वो अमेरिका का नागरिक है। ठीक है? तो माता-पिता की नागरिकता मान्य नहीं रखती है। चाहे माता-पिता मेरे पाकिस्तानी हो चाहे अमेरिकन हो। बस क्या ध्यान रखा जाता है कि जो बच्चा है यानी मैं हूं मैं कहां जन्म ली हूं। जहां मैं जन्म ली हूं चाहे मेरे पापा मम्मी कहीं के भी हो पर मैं अगर भारत में जन्म ली तो मैं भारत की नागरिक हूं। ये कौन सा सिद्धांत कहता है? ये जस्ट सोली सिद्धांत कहता है। पर एक दूसरा भी सिद्धांत है नागरिकता का। ये भारत में नहीं अपनाया जाता है। बट मैं बता रही हूं एग्जांपल के लिए। ठीक है? उदाहरण के तौर पे संयुक्त राष्ट्र अमेरिका। यदि कोई बच्चा अमेरिका जन्म में जन्म लेता है तो अमेरिका का नागरिक हो जाएगा ऑटोमेटिकली। कनाडा और ब्राजील में जन्म स्थान आधारित नागरिकता दी जाती है। अब कनाडा और ब्राजील में जन्म स्थान नागरिकता दी जाती है। मतलब अभी आप और मैं यहां पे बैठे भारत में। मान लो हम लोग चले गए कनाडा या ब्राजील। वहां पे मान लो कोई बच्चा पैदा हुआ। तो वो बच्चा क्या हो जाएगा? उसको वहां की नागरिकता मिल जाएगी कनाडा और ब्राजील की। वो लेना चाहेगा तो। ठीक है? तो भारत में परिस्थिति क्या है? पर भारत में 1955 में नागरिक अधिनियम जन्म के आधार पर नागरिकता प्रदान करता था। लेकिन इसमें कुछ संशोधन किए गए हैं। भारत में भी ये चीज है कि आप भारत में पैदा लेते हो तो आपको भारत की नागरिकता दी जाएगी। पर इसमें कुछ संशोधन भी हुए हैं। तो उसको जानते हैं। तो उदाहरण 1 जनवरी 1950 से 1 जुलाई 1987 तक भारत में जन्म लेने वाले सभी बच्चों को नागरिकता दी गई। ठीक है? इससे पहले जो जन्म लिया या इसके बाद जो जन्म लिया उसको नहीं मतलब इसके बीच वाले को तो 1 जुलाई 1987 से केवल तभी नागरिक अगर जन्म के समय कम से कम माता-पिता भारतीय नागरिक हो तो ही उसको नागरिकता दी जाती थी। मतलब अब क्या है उसके माता-पिता भी नागरिक होने चाहिए। अब दूसरा क्या है? दूसरा है वंशु गुणत। यानी पिता की नागरिकता के आधार पर नागरिकता देना। यानी परिभाषा क्या है इसकी? इसका अर्थ है कि रक्त या वंश के आधार पर नागरिकता को तय करना कि उसके माता-पिता किस देश के किस देश के नागरिक है उसके आधार पर उस बच्चे को नागरिकता देना यानी व्यक्ति की नागरिकता उसके माता-पिता की नागरिकता के आधार पर तय होती है। मुख्य विशेषता इसकी क्या होती है? जन्म स्थान इसमें मान्य नहीं होता। माता-पिता मान्य होते हैं। माता-पिता की नागरिकता के आधार पर ही बच्चे को नागरिकता दी जाती है कि किस देश का बच्चा होगा वो। उदाहरण जर्मनी, जापान और इटली में यही परंपरा अपनाई जाती है। यदि माता-पिता उस देश के नागरिक हैं तो बच्चा अपने आप उस देश का नागरिक बन जाता है। मींस जर्मनी का जापान का या इटली का माता या पिता हो तो फिर क्या है उसको नागरिकता मिल जाती है। अगर वो जन्म लेता है तो नहीं मिलती। मतलब माता-पिता होने चाहिए। तो भारत में पर 1995 में नागरिक अधिनियम के अनुसार जन्म के समय यदि माता-पिता भारतीय नागरिक हो तो बच्चा भारतीय नागरिक ऑटोमेटिक हो जाएगा। यह प्रल प्रधान भारत में भी अपनाया है। तो जस सोली और जो जस सेंगुनिस जो है उसकी तुलना करें तो क्या फर्क है? तो जन्म के आधार पर जो नागरिकता है वो उसका आधार जन्म स्थल से है। जिस जन्म स्थल पे पैदा लेंगे वहां की नागरिकता मिलेगी। वंशगुणत नागरिकता में माता-पिता की नागरिकता से बच्चों को नागरिकता मिलेगी। जन्म स्थान वाली नागरिकता के आधार पे महत्वपूर्ण क्या है? जन्म स्थान महत्वपूर्ण है। और वंशागुणत में क्या महत्वपूर्ण है? उस महत्व यह रखता है कि मातृहीन कहां की है? यानी माता और पिता कहां के हैं? वहीं जन्म स्थान वाली नागरिकता में कानूनी सिद्धांत जो है वो भूमि आधारित होती है कि कहां से बच्चा पैदा हुआ है। वंशागुणत में रक्त और वंश देखा जाता है। तो जो जन्म स्थान नागरिकता है वो अमेरिका में, कनाडा में और ब्राजील में ये वाली नागरिकता दी जाती है। वंशागुणत वाली नागरिक नागरिकता जो है वो जर्मनी, जापान और भारत में दी जाती है। ठीक है? वंशागुणत के अनुसार जन्म आधारित नागरिकता का क्या लाभ है? इसमें क्या होती है? प्रवासी बच्चे भी नागरिक बन सकते हैं। यानी जैसे कि हम ही मान लो अमेरिका में पैदा हो जाते तो हम चाहते तो हम नागरिकता ले सकते थे अमेरिका की। तो ये फायदा होता है। और वंशा नागरिकता में क्या फायदा होता है कि राष्ट्रीय पहचान और वंश की सुरक्षा होती है। क्योंकि वंश के आधार पे अगर नागरिक बनाया जाए तो मुझे लगता है ये बेटर रहता है। ठीक है? तो जो जन्म के स्थान पे नागरिकता है उसकी चुनौती क्या होती है कि प्रवासन और प्रवासी बच्चे के लिए विवाद हो जाता है। बहुत ज्यादा डिबेट का मुद्दा हो जाता है ये। वही वंशत नागरिकता की भी चुनौती क्या होती है कि विदेश में जन्म लेने वाले बच्चे को जटिल प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। जिस जिसके माता-पिता अगर यहां के ना हो वो यहां का हो मतलब दादा से कनेक्ट करके ना देखा जाता है मम्मी पापा से देखा जाता है तो इससे भी नागरिकता का खंडन होता है। ठीक है? तो नागरिकता अधिनियम और उसके कुछ सुधार जान लेते हैं जो भारत में हुए थे। तो भारत नागरिकता अधिनियम आया था 1955 में। नागरिकता प्राप्त करने के भारत में तरीके कौन-कौन से हैं? जन्म है। जन्म के आधार पे नागरिकता दी जाती है। वंश के आधार पे नागरिकता दी जाती है और पंजीकरण के आधार पे भी दी जाती है कि पंजीकरण आपको कराना पड़ता है। डॉक्यूमेंटेशन कराना पड़ता है। प्राकृतिककरण से भी मिलती है और भूभाग का विलय से भी मिलती है। भारत में इन सभी तरीकों से नागरिकता दी जाती है। महत्वपूर्ण संशोधन कब हुए थे? 1986 में। पाकिस्तान, बांग्लादेश शरणार्थी के लिए नियम बनाए गए थे। क्योंकि पाकिस्तान जब बांग्लादेश विभाजन हुआ था तो पाकिस्तान और बांग्लादेश विभाजन हुआ था तो बहुत सारे प्रवासी जो है वो भारत आ गए थे पाकिस्तान और बांग्लादेश से। तो इन लोगों को भारत की नागरिकता दिलानी थी। मतलब भारत का व्यक्ति बनाना था। तो इसके लिए इनको कुछ-कुछ नियम बनाए गए कि आप किस तरीके से भारत की नागरिकता प्राप्त कर सकते हो। वहीं 2003 में हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन और पारसी शरणार्थियां भी भारत में आए थे जो कि अलग देश के थे। मान लो पाकिस्तान में जिनके साथ अत्याचार हो रहा है। जिनके साथ चीन में अत्याचार जहां पे भी मतलब हिंदू, सिख, बौद्ध जैन ये तो हमारे देश के ही थे लोग मतलब मूर्त हमारे देश के हैं पर किसी और देश में अगर जन्म ले लिए और वहां उनके साथ अत्याचार हो रहा है तो हिंदू तो हर जगह रहते हैं। सिख तो हर देश में रहते हैं। तो उनको अगर भारत में रहना है और भारत का व्यक्ति बनना है तो उनके लिए भी कुछ नियम कानून बनाए गए थे। 2015 और 2019 में अल्पसंख्यक शरणार्थी के लिए भी नागरिकता प्रदान करने का विवाद के लिए संशोधन किया गया था। तो नागरिकता अधिनियम का क्या महत्व है? इसका महत्व है कि सामाजिक और राजनीतिक समावेश किया जाता है। यानी मिलाया जाता है लोगों को राजनीतिक रूप से और सामाजिक रूप से। भारत में बहुलतावादी और धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र बनाए रखने में यह कायम है। वैश्विक नागरिकता मानकों के अनुसार भारत का समयोजन कराया जाता है। मतलब नागरिकों को मिलाया जाता है। नागरिकता के महत्व क्या है? उसका विश्लेषण क्या है? तो नागरिकता हमें राजनीतिक स्थिरता दिलाती है और लोकतंत्र को मजबूत करती है। नागरिक की पहचान लोकतंत्र का आधार होता है। क्योंकि लोकतंत्र में नागरिक द्वारा चुना जाता है। हमारा रिप्रेजेंटेटिव। अब जो नागरिक चुन रहा है वो किस देश का नागरिक है? तो वह महत्वपूर्ण रखता है यह चीज। चुनावी प्रक्रिया में भागीदारी सुनिश्चित करने में भी नागरिकता महत्व मतलब महत्वपूर्ण रोल अदा करती है। अगर आपके पास नागरिकता नहीं है तो आप चुनाव नहीं लड़ सकते हो। सामाजिक समावेश और न्याय नागरिक से अल्पसंख्यक और कमजोर वर्गों को संरक्षण मिलता है। सामाजिक और आर्थिक सुरक्षित भी होती है। व राष्ट्रीय सुरक्षा और नियंत्रण भी होता है नागरिकता से। नागरिकता जो है वह कानून देश की सीमा के प्रवासी पर नियंत्रण रखता है। इससे पता लगता है कौन हमारे देश का है कौन हमारे देश का नहीं है। इससे आतंकवाद और अवैध प्रवास रोकने का भी प्रयास किया जाता है। वैश्व दृष्टिकोण से अगर देखें तो जो जन्म आधारित नागरिकता है और जो वंशानगुणत जो नागरिकता है उन दोनों का संतुलन भारत में देखने को मिलता है। वैश्विक प्रवासन और आर्थिक अवसरों के दृष्टिकोण से भी नागरिकता बहुत ज्यादा इंपॉर्टेंट होती है। तो भारत में नागरिकता की वर्तमान चुनौती क्या है? भारत में अवैध प्रवास हो रहे हैं। जैसे कि रोहिंग्या, बांग्लादेशिया तो अवैध प्रवास और सीमांत विवाद होता है। जैसे भारत में बांग्लादेशी पहचान का विवाद हमेशा बना रहता है। धार्मिक और जाति आधार पर बहस होते हैं। नागरिक संशोधन अधिनियम सीएए में मुस्लिम को नहीं शामिल किया गया था। तो इसलिए बहुत ज्यादा दिल्ली में पूरे भारत में दंगे हुए थे। आधार और दस्तावेज आधारित पहचान की बात होती है। जन्म प्रमाण पत्र, राशन कार्ड, वोटर आईडी कार्ड ये सब नकलीन नकली बना के क्या है? प्रवासी घुस जाते हैं और नागरिकता को इससे खतरा होता है। वैश्विक प्रवासन और समानता का प्रश्न इससे उठता है। जस सोली यानी जन्म आधारित नागरिकता और वंश आधारित नागरिकता के संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो जाता है और भारत में यही दोनों चीजों को अपना रखा है। तो ये भारत के लिए एक चुनौती है। निष्कर्ष में क्या लिखोगे कि नागरिक एक व्यक्ति व्यक्ति की कानूनी राजनीतिक और सामाजिक पहचान होती है। यह व्यक्ति को देश की राजनीतिक प्रक्रिया में भाग लेने के लिए, राजनीतिक सुरक्षा के लिए, सामाजिक सुरक्षा के लिए, आर्थिक अवसर देती है। तो जन्म आधारित नागरिकता चाहे वंशागुणत नागरिकता जो है ये दोनों ही सिद्धांत नागरिक के सिद्धांत है जिसका उपयोग करके देश की आबादी को, देश का प्रवासन को और देश की राजनीतिक दृष्टिकोण के अनुसार हम इसको यूज़ करते हैं। भारत ने इन दोनों सिद्धांत को संतुलित रूप से उपयोग किया है। तो हमारा क्वेश्चन नंबर सेकंड है कि भारतीय नागरिकता अधिनियम जो है यानी सिटीजनशिप एक्ट और इसके मुख्य संशोधन को स्पष्ट कीजिए। तो भारतीय जो नागरिक अधिनियम एक्ट क्या है और इसमें कौन-कौन से संशोधन किए गए हैं? ये आपको बताना है। ठीक है? तो इंट्रोडक्शन से स्टार्ट करते हैं। तो नागरिकता जो क्या होती है? किसी भी व्यक्ति की कानूनी और राजनीतिक पहचान होती है। सिंपल सी भाषा। यह व्यक्ति और राज्य के बीच संबंध को स्थापित करती है। भारत में नागरिक का जो विधान है वह भारतीय संविधान और नागरिक अधिनियम 1995 द्वारा नियंत्रित किया जाता है। मींस भारत में किसी को भी नागरिकता कैसे दी जाती है? भारतीय संविधान के अनुसार दी जाती है और नागरिकता अधिनियम 1955 के तहत दी जाती है। नागरिकता अधिनियम किसी व्यक्ति को यह तय करने का अधिकार देता है कि किस प्रकार वह भारतीय नागरिक बन सकता है। ठीक है? तो क्या सिखाता है नागरिकता अधिनियम? यह हमें बताता है कि आपको अगर भारत का नागरिक बनना है तो आपको कौन-कौन से प्रोसेस से गुजरना होगा। चाहे वह जन्म के आधार पे हो, चाहे वो वंश के आधार पे हो, चाहे वो पंजीकरण के आधार पे हो, चाहे वो प्राकृतिकरण के आधार पे हो। इन सभी आधार पर आपको भारत में नागरिकता दी जा सकती है। बट इसका कुछ प्रोसेस है जो कि नागरिकता अधिनियम 1955 में लिखा गया है। तो भारत जैसे बहु सांस्कृतिक बहुधार्मिक और बहुभाषी लोकतंत्र में नागरिकता अधिनियम का महत्व बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। यह राजनीतिक, सामाजिक और कानूनी अधिकार को सुनिश्चित करता है। क्योंकि जिसके पास नागरिकता होगी वही सामाजिक अधिकार पाएगा। वही राजनीतिक में वोट देना, चाहे चुनाव लड़ना और कानूनी जितने भी अधिकार हैं भारत के चाहे नौकरी वगैरह कुछ भी हो तो उसमें भी वो अगर भारत का नागरिकता उसके पास होगी तभी वो उस ले सकता है। तो बहुत ज्यादा इंपॉर्टेंट हो जाती है नागरिकता हमारे लिए। ठीक है? तो भारतीय नागरिकता अधिनियम 1955 का ऐतिहासिक परिपेक्ष क्या था? उसको हम जानते हैं। तो भारतीय संविधान के प्रारंभिक दिनों में आवश्यक था कि देश के नागरिक अधिनियम को स्पष्ट रूप से लोगों को बताया जाए कि नागरिकता आपकी क्या होती है और नागरिकता अगर आपको प्राप्त करना है तो कैसे प्राप्त करना है। तो भारतीय संविधान के प्रावधान अनुच्छेद पांच से 11 अगर आप पढ़ोगे आर्टिकल 5 से 11 उसमें नागरिकता से संबंधित बात की गई है। ठीक है? तो संविधान के प्रारंभिक प्रावधान के अनुसार 26 जनवरी 1950 को भारत के नागरिक कौन होंगे और यह तय कैसे किया जाएगा इसको लिखा गया है 5 से 11 आर्टिकल में इस समय भारत में जन्म स्थान और वंश दोनों का आधार पे नागरिकता दी जाती थी। ठीक है? तो भारतीय नागरिकता अधिनियम 1955 का लक्ष्य क्या था? लक्ष्य था कि नागरिक के नियमों को स्पष्ट रूप से कानूनी रूप देना। इसमें कुछ प्रावधान किए गए थे कि जन्म के आधार पर नागरिकता देना। यानी भारत में जन्मे व्यक्ति को भारत का नागरिक होना। वंश के आधार पे माता-पिता अगर भारतीय हैं तो बच्चा भी भारतीय होगा। पंजीकरण द्वारा यानी विश्व विदेशी नागरिक या प्रवासी अगर है तो वह पंजीकरण की प्रोसेस से गुजर के भारत की नागरिकता ले सकते हैं। प्राकृतिकरण द्वारा विदेशियों के लिए जो भारत में निवास करते हैं और शर्तें पूरी करते हैं उस फिर इस शर्तों को पूरी करके वो भारत का नागरिक बन सकते हैं। भूभाग का विलय करके किसी एक नए भूभाग को भारत में अगर शामिल कर दिया जाए तो भी वो लोग सब भारत के नागरिक बन जाते हैं। जैसे कि सिक्किम को करा गया था भारत में शामिल। तो नागरिक प्राप्त करने के क्या-क्या तरीके होते हैं नागरिकता प्राप्त करने के भारत में? तो पहले तो जन्म स्थान के द्वारा भी आप नागरिकता प्राप्त कर सकते हो। कैसे? तो 26 जनवरी 1950 से 1 जुलाई 1987 तक भारत में अगर आपने जन्म लिया है तो आप भारत के नागरिक हो। 1 जुलाई 1987 से 3 दिसंबर 2004 तक जन्म के समय कम से कम एक माता-पिता भारतीय नागरिक होना आवश्यक था। तभी आपको भारत की नागरिकता दी जाएगी। 3 दिसंबर 2004 से वर्तमान तक जन्म के समय माता-पिता से किसी एक भारतीय को नागरिक होना पड़ेगा। तब जाके उसको भारत की नागरिकता दी जाएगी। तो ऐसे जन्म के आधार पे नागरिकता दी जाती है भारत में। वंश के आधार पे कैसे नागरिकता दी जाती है भारत में? जन्म स्थान से स्वतंत्र माता या पिता भारतीय नागरिक हो मतलब उनका वंश कहीं ना कहीं भारत से जुड़ा हो तो आपको भारत की नागरिकता दी जाएगी। 10 दिसंबर 1992 से पहले पिता या माता कोई भी भारत का नागरिक अगर एक होगा तो उस व्यक्ति को भी भारत का नागरिकता मिल जाएगी। 10 दिसंबर 1992 के बाद पिता भारतीय नागरिक होना आवश्यक माना गया है। ठीक है? अगर पिता है तभी आपको मिलेगा। पंजीकरण से कैसे मिलता है नागरिकता? तो भारत में जन्म या लंबे समय तक निवास करने वाले व्यक्ति को भारत का नागरिकता मिल जाती है। आई थिंक 10 या 20 साल तक जो भारत में रह रहा है। फिर उसको एक प्रोसेस से गुजरना पड़ता है। फिर उसको नागरिकता दी जाती है। कुछ शर्तें होती है कि आपको अच्छा चरित्र रखना पड़ेगा। भारत में स्थानीय निवास में प्रमाण करना पड़ेगा और आपको क्या है मिलजुल के और कर्तव्यों का पालन करना पड़ेगा। व प्राकृतिकरण से भी आपको मिलती है नागरिकता। मैंने भारत में लंबी अवधि तक निवास करने वाले विदेशी नागरिक जो हैं वो भारत के नागरिक ही बन जाते हैं। उसमें कुछ शर्तें होती हैं कि आपको किसी एक स्थान का निवास लेना पड़ेगा। आपको अच्छा चरित्र रखना पड़ेगा और जो भी कानून प्रक्रिया है उसको पालन करना पड़ेगा। भूभाग का विलय करके भी नागरिकता दी जाती है। यदि कोई नया क्षेत्र भारत में शामिल होता है और वहां वाले रहने वाले लोग नागरिक बन जाते हैं। उदाहरण गोवा जो था, दमनद्यू था, लद्दाख था। ये सब क्या है? पहले भारत के नहीं थे। पर इसको भारत में विलय किया गया। तो सम्मिलय किया गया। तो यहां के सारे जो नागरिक थे वो सब भारतीय ऑटोमेटिक ही हो गए। तो भारतीय नागरिकता अधिनियम के प्रमुख संशोधन कौन-कौन से थे? तो पहला संशोधन था 1986 का संशोधन। इसमें क्या हुआ था? प्रवासियों के लिए कानून को सख्त किया गया कि अब नागरिकता लेना कठिन होगा। भारत में जन्म लेने वाले बच्चों को नागरिकता केवल तभी मिलेगी यदि कम से कम माता-पिता उसके कम से कम भारतीय हो तभी आपको नागरिकता दी जाएगी। उद्देश्य था कि अवैध जो प्रवास हो रहे हैं भारत में उसको रोका जाए। 2003 में भी नागरिकता में संशोधन किया गया था कि हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई शरणार्थी को नागरिकता प्रदान की जाए। ये लोग विदेश में रहने वाले लोग थे। ठीक है? हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन तो पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आए हुए शरणार्थी थे जो भारत के नागरिक बनना चाहते थे क्योंकि वहां पे उनके साथ उत्पीड़न हो रहा था या वो वहां रहना नहीं चाह रहे थे। उसका उद्देश्य था कि धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और सामाजिक समावेश करना। मींस ये लोग अल्पसंख्यक थे। भारत में तो ये लोग है मतलब हिंदू मेजॉरिटी है बट विदेश अगर पाकिस्तान की बात करें या किसी और देश की बात करें वहां पे तो वहां पे तो कम अल्पसंख्यक ही होंगे ना हिंदू हमारे भारत में बड़े बहुसंख्यक होंगे किसी और देश में तो कम हिंदू होंगे तो अल्पसंख्यक हो गए वहां के हिसाब से तो उनकी रक्षा करने के लिए भारत ने सोचा कि है तो हमारे ही धर्म के लोग है तो हमारे ही मुल्क के लोग जैसे इनका वंश है तो इनकी रक्षा की जाए 2015 में भी संशोधन किया गया नागरिकता में नागरिकता प्रक्रिया को और आस आसान बनाने के लिए क्या रखा गया। अल्पसंख्यक शरणार्थी को छ साल की अवधि में नागरिकता प्रदान करने का अवसर मिला कि छ साल अगर आप भारत में रह रहे हो तो आपको नागरिकता दे दी जाएगी। यह संशोधन मुख्य रूप से पाकिस्तान अफगानिस्तान बांग्लादेश से आए अल्पसंख्यकों के लिए था। फिर 2019 में फिर संशोधन आता है सीएए है ना सिटीजन जो अमेंडमेंट एक्ट है जिसके लिए बहुत दंगे हुए थे हमारे दिल्ली में तो है ना धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए विशेष नागरिकता प्रावधान दिए गए थे जिसमें विवाद था मुस्लिम प्रवासियों को शामिल नहीं किया गया था इसमें इसलिए मुस्लिम लोग इसका बहुत ज्यादा विरोध कर रहे थे सामाजिक और राजनीतिक बहस इस पर बहुत ज्यादा हुई थी भारत में नागरिक की संवैधानिक और लोकतांत्रिक अवधारणा पर प्रश्न उठाया गया था इस कानून के तहत तो नागरिकता अधिनियम का क्या महत्व था कि राजनी जो नागरिकता अधिनियम है वह हमें क्या दिलाती है? राजनीतिक स्थिरता दिलाती है और लोकतंत्र को मजबूत करती है। यानी नागरिकता कानून के माध्यम से लोकतंत्र में नागरिकों का अधिकार और कर्तव्य को सुनिश्चित करा जाता है। चुनाव प्रक्रिया और मतदान आप तभी दे सकते हो जब आप किसी देश के नागरिक होंगे। यानी नागरिकता होगी। सामाजिक समावेश में भी नागरिकता इंपॉर्टेंट होती है। अल्पसंख्यक, शरणार्थी, कमजोर वर्गों को नागरिक अधिकार दिया जाता है। जिससे वह सामान्य अवसर पा सकते हैं नौकरी में, रोजगार में और समाज में। तो राष्ट्रीय सुरक्षा में भी महत्व होता है नागरिकता। अवैध प्रवासी और सीमा सुरक्षा को नियंत्रित करने में नागरिकता देख के आप पहचान सकते हो। नागरिकता दस्तावेज होती है और हमारी पहचान होती है। वैश्विक दृष्टिकोण से देखें तो प्रवासी और शरणार्थी के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों के रूप में नीति बनाई जाती है। भारत में बहुसंस्कृतिक पहचान को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है नागरिकता हमारी। नागरिकता अधिनियम क्या है? और इसका विवाद क्या है? सीएए 2019 विवाद की बात करें तो मुस्लिम प्रवासी को इसमें शामिल नहीं किया गया था। तो नागरिक और धर्म का संबंध संवैधानिक सवाल पर उठ गया था कि नागरिक को धर्म के रूप से देखा जा रहा है। इसलिए इसमें मुस्लिम को शामिल नहीं किया। तो कई राज्यों में विरोध प्रदर्शन और कानूनी चुनौती हुई थी। तो अवैध प्रवाह जैसे भारत बांग्लादेश सीमा पर नागरिकता पहचान खोजी गई और नेशनल रजिस्ट्रेशन ऑफ सिटीजन एनआरसी के माध्यम से पहचाना गया कि कौन भारतीय है कौन नहीं है। तो जाति और धर्म पे बहुत ज्यादा बहसें हुई। समाज में नागरिक अधिकार की समानता पर प्रश्न उठा। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण में यह विवाद बहुत ज्यादा बढ़ा। तो निष्कर्ष में क्या लिखोगे कि भारतीय नागरिकता अधिनियम जो था 1955 का इसके संशोधन भारत में नागरिक का आधार बने। यह कानून ना केवल नागरिक को कानूनी अधिकार दिलाता था और ना ही मतलब कानूनी अधिकार भी दिलाता था और राजनीतिक अधिकार भी दिलाता था। मींस वोट देने का और भाग लेने का चुनाव में बल्कि साथ-साथ ये लोगों को सुरक्षा दिलाता है, समानता दिलाता है और राष्ट्रीय सुरक्षा को भी सुनिश्चित करता है। तो जन्म आधारित नागरिकता हो चाहे वंशागुनत नागरिकता हो। ये दोनों नागरिकता क्या करती है? संतुलित और समावेश करती है भारत में। समय-समय पर संशोधन ने देश की बदलती सामाजिक और राजनीतिक प्रति स्थितियों के अनुसार किए गए हैं। हा मतलब बदले गए हैं। नागरिकता अधिकार को कैसे प्राप्त किया जाए। हालांकि नागरिकता अधिनियम के संशोधन और लागू नियम विवाद और बहस में भी रहे हैं। फिर भी लोकतंत्र में नागरिक अधिकार और राज्य की सुरक्षा के बीच संतुलन हमेशा बना रहा है। भारत में नागरिक अधिनियम का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि समानता न्याय और लोकतंत्र के सिद्धांत कैसे लागू होंगे इसमें। आई होप आपको ये क्वेश्चन भी समझ आया हो। चलते हैं अब हमारे नेक्स्ट क्वेश्चन पे। हमारा नेक्स्ट क्वेश्चन बनेगा नेक्स्ट यूनिट से। यूनिट नंबर सेकंड से। तो हमारा यूनिट नंबर सेकंड है शासन यानी गवर्नमेंस। तो हमारा यूनिट नंबर सेकंड का हमारा क्वेश्चन बनता है क्वेश्चन नंबर थ्री कि शासन क्या है? यानी गवर्नेंस क्या है? और भारत में लोकतंत्र और शासन के बीच संबंध क्या है? इसको बताना है आपको। ठीक है? तो इंट्रोडक्शन से स्टार्ट करते हैं। तो शासन शासन एक आधुनिक राजनीतिक विज्ञान और प्रशासनिक व्यवस्था का आवश्यक सिद्धांत है। मतलब राजनीतिक विज्ञान भी है शासन और प्रशासनिक व्यवस्था भी है। इन दोनों का मेल ही शासन कहलाता है। शासन केवल सरकार द्वारा चलाया गया चीज ही नहीं है बल्कि यह एक व्यापक अवधारणा है। जिसमें राज्य होता है। शासन में राज्य आता है। शासन में नागरिक आते हैं। शासन में समाज आता है। शासन में गैर सरकारी संगठन आते हैं। शासन में न्यायपालिका को पढ़ा जाता है। शासन में मीडिया को पढ़ा जाता है। शासन में बाजार को पढ़ा जाता है। अर्थव्यवस्था को पढ़ा जाता है। शासन में नागरिक के सभी इन सभी चीजों को शामिल किया जाता है। तो शासन का उद्देश्य सुनिश्चित करना है कि समाज में संशोधन का न्यायपूर्ण वितरण हो, पारदर्शी हो, निर्णय प्रक्रिया अच्छी हो और उत्तरदाई पूर्ण हो। यानी अकाउंटेबिलिटी हो और जनता की सक्रिय भागीदारी हो। भारत जैसे विशाल देश में, विविधतापूर्ण वाले देश में और लोकतंत्र वाले देश में शासन जो है उसका महत्व और भी ज्यादा बढ़ जाता है। क्यों? क्योंकि लोकतंत्र नागरिक को अधिकार देता है। जबकि शासन उन्हें लागू और संरक्षित करने का अधिकार देता है। तो इस प्रकार लोकतंत्र और शासन जो है वो एक दूसरे के पूरक होते हैं। तो इन दोनों को पढ़ना हमें जरूरी होता है। चलिए जानते हैं कि शासन की अवधारणा क्या है? तो शासन की अवधारणा शासन यानी गवर्नमेंट्स यह शब्द लैटिन शब्द गुबरनेर से निकला है जिसका अर्थ है मार्गदर्शन करना दिशा देना या कह सकते हो नियंत्रित करना तो प्रारंभिक काल में शासन का अर्थ केवल राज्य द्वारा नियंत्रित शक्ति ही नहीं थी बल्कि यह एक 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में इसका अर्थ बदलने लगा था। शासन से हटके इसका मतलब अलग-अलग चीजें बन गई थी। विभिन्न संस्थानों के द्वारा दी गई अगर हम परिभाषा बताएं कि शासन क्या है? तो विश्व बैंक कहता है कि शासन वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से शक्ति का उपयोग राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए किया जाता है। तो ये डेफिनेशन आपको लिखनी है एग्जाम में। एंड यूएनडीपी के अनुसार यूएनडीपी ने 1997 में यह बताया था कि शासन क्या है? शासन वह प्रक्रिया है इनके अनुसार। और वह तंत्र है जिसके माध्यम से नागरिक और समूह अपने हितों की अभिव्यक्ति करते हैं यानी अपने हितों को बताते हैं, व्यक्त करते हैं और कानूनी अधिकारों का उपयोग करते हैं और शासनिक मुद्दों का समाधान करते हैं मिलके उसी को शासन कहते हैं। वही टाटा समिति रिपोर्ट 2001 के अनुसार शासन क्या है? वह कहते हैं कि शासन वह तंत्र है जिसके माध्यम से सार्वजनिक संस्थाएं जो है वह संसाधनों का प्रबंधन करती है। मतलब जो सरकारी कंपनी है वो जितने भी भारत के संसाधन है उसको कंट्रोल करती है और सेवा प्रदान करती है। लोगों को पारदर्शी होती है, निष्पक्ष होती है और इनको जवाबदेही होना पड़ता है जनता के प्रति। आई होप आपको डेफिनेशन पता लग गई हो शासन की। तो शासन और सरकार में क्या अंतर होता है? अब आप सोचोगे शासन मींस सरकार होता है। सरकार अलग चीज होती है। शासन अलग चीज होता है। मतलब होती दोनों एक ही चीज है। मतलब शासन करती है। मतलब दोनों ही रूल करती है। पर दोनों सरकार एक पार्टी हो जाती है। बताती हूं अभी मैं आपको। सरकार क्या होती है? सरकार एक संस्था होती है। पर शासन कोई संस्था नहीं है। शासन एक प्रक्रिया होती है। सरकार आपकी शक्ति का शक्ति प्रयोग आधारित होती है। पर शासन आपका सहभागिता और सहयोग आधारित होती है। मतलब सरकार आपको शक्ति दिखाती है। कानून बनाती है। पर शासन क्या करती है? इसमें जनता और सरकार दोनों आती है। सरकार कानून और नियमों को लागू नियम लागू कराती है। वहीं शासन जो है वह निर्णय लेने की खुली सहभागिता प्रदान करती है। सरकार की सीमित भूमिका होती है। पर शासन जो है वह बहु हितकारक आधारित होते हैं क्योंकि इसमें बहुत सारे लोग नागरिक, समाज, सहसारिक संगठन सब आते हैं। शासन के मुख्य्य घटक कौन से होते हैं? उसको हम जानते हैं। तो शासन के मुख्य घटक हैं पारदर्शिता। शासन में सबसे पहले ट्रांसपेरेंसी होनी चाहिए। यानी निर्णय प्रक्रिया और सरकारी कार्यवाही जो है वो नागरिक के लिए स्पष्ट हो। नागरिक उसे जान पाए, समझ पाए। मतलब नागरिक के लिए बिल्कुल पारदर्शिता होनी चाहिए कि वो देख पाए। दूसरा शासन हमेशा जवाबदेही होना चाहिए। अकाउंटेबिलिटी होनी चाहिए। यानी सरकारी अधिकारी कोई भी हो या कोई भी संस्था हो वह अपने निर्णय के प्रति उत्तरदाई हो। मान लो आरटीआई जो एक्ट है वो इसी के प्रति तो आया है कि आप भारत सरकार या जितने भी भारत की संस्थाएं हैं उससे आप क्वेश्चन कर सकते हो कि आपने ये पैसा कहां लगाया और उनको ये जवाब देना पड़ेगा। तीसरा क्या होता है? शासन का मतलब भागीदारी भी होता है। यानी नागरिक हो चाहे समुदाय हो चाहे कोई संगठन हो उसके नीति निर्माण में पूरी तरह से भागीदारी होनी चाहिए। मतलब कोई कानून बन रहा है तो उसमें नागरिक समुदाय संगठन इन सभी की हितों को और बातों को रखना पड़ेगा। शासन की जो चौथा घटक है वह है न्याय और विधि का शासन। यानी जो शासन है वह रूल और लॉ से चलता है। यानी सभी नागरिकों को सम्मान करना होता है रूल्स और रेगुलेशंस का। क्षमता और प्रभावशीलता भी घटक है। तो संसाधन का उचित और विकास मुख उपयोग हो। एफिशिएंसी हो और इफेक्टिवनेस हो। शासन में समानता भी जरूरी है। समाज के सभी वर्गों को समान अवसर और सेवाएं दिया जाता है। शासन में सहमति उन्मुख नीति शासन में होता है। यानी विविध मतों को समझते हुए निर्णय लिया जाए। ऐसा नहीं किसी एक को सुन के निर्णय लिया जाए। सत्यता और दीर्घकालिता होती है शासन में। यानी नीति पर्यावरण के अनुकूल होती है। अर्थव्यवस्था और समाज के हित में टिकाऊ भी होती है। अब जानते हैं भारत में शासन का ढांचा कैसा है? तो भारत में शासन के तीन प्रकार देखे जाते हैं। केंद्र सरकार द्वारा शासन किया जाता है, राज्य सरकार द्वारा किया जाता है और स्थानीय स्वशासन इकाई द्वारा किया जाता है जिसमें पंचायत राज और नगरपालिका आ जाती है। तो भारतीय संविधान शासन को लोकतांत्रिक सिद्धांत जैसे न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व के आधार पर बनाई गई है भारत की शासन व्यवस्था। भारत में शासन के अगर उपकरण की बात करूं तो संवैधानिक संरचना तो भारत में शासन के उपकरण जो है वो वो है संवैधानिक संरचना। संवैधानिक संरचना का उदाहरण है संविधान और संविधान के मौलिक अधिकार। दूसरा उपकरण है प्रशासनिक तंत्र जिसमें आते हैं आई आईएएस, आईपीएस, आईएफएस। तीसरा उपकरण है भारत के शासन में न्यायिक व्यवस्था भारत की जिसमें उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय आते हैं। भारत के उपकरण में चौथा जो उपकरण है वो है नागरिक निगरानी साधन जिसमें आरटीआई आ जाता है। सोशल ऑडिट आ जाता है और लोकपाल आ जाता है जो सरकार और केंद्र सरकार राज्य सरकार की निगरानी रखती है। पांचवा उपकरण आता है शासन का डिजिटल शासन जिसमें डिजिटल इंडिया ई गवर्नमेंट शासन को शामिल किया जाता है। तो लोकतंत्र और शासन का संबंध को की अगर बात करें तो लोकतंत्र शासन की आत्मा है और शासन लोकतंत्र का आधार है। तो लोकतंत्र नागरिक को स्वतंत्रता देता है। मतदान देने का अधिकार देता है और चुनाव में खड़े होने का यानी प्रतिनिधित्व का अधिकार देता है। जबकि शासन जो है वो इन मूल्यों को प्रैक्टिकली तौर पे लागू करता है। तो कैसे लोकतंत्र जो है वो शासन को मजबूत करता है। उसकी बात करें तो लोकतंत्र का सिद्धांत होता है नागरिक की भागीदारी। तो शासन का प्रभाव इस पर क्या पड़ता है कि नीतियों में जनहित को जोड़ा जाता है। जो भी शासन वाले कार्य होते हैं। लोकतांत्रिक सिद्धांत में जवाबदेही सरकार होती है और शासन का प्रभाव इस पे ये पड़ता है कि प्रशासन में पारदर्शिता होती है। मींस सरकार कोई भी कार्य करती है तो वो जनता से छुपा के नहीं करती है। लोकतंत्र सिद्धांत का अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होती है। इसमें जिसका शासन पे प्रभाव होता है कि निगरानी और आलोचना की क्षमता रखना। किस में? सन मीडिया जो है वह आलोचना कर सकती है सरकार की। लोकतांत्रिक सिद्धांत में न्यायपालिका का अधिकार होता है और शासन का प्रभाव होता है कि कानून आधारित शासन बनाना। तो कैसे शासन लोकतंत्र को सुरक्षित रखता है उसकी बात करें तो शासन का सिद्धांत लोकतंत्र का प्रभाव को अगर बात करें तो शासन के सिद्धांत में सुशासन ई गवर्नमेंस भ्रष्टाचार नियंत्रण और नीति पारदर्शिता आती है। वहीं लोकतंत्र का प्रभाव इस पे ये पड़ता है। सुशासन का प्रभाव पड़ता है कि नागरिक में विश्वास बढ़ता है। ई- गवर्नमेंस का फायदा होता है कि सेवा आसान हो जाती है। भ्रष्टाचार नियंत्रण से फायदा होता है कि लोकतांत्रिक संस्था विश्वसनीयता बढ़ती है। और नीति पारदर्शिता का असर पड़ता है कि राजनीतिक नैतिकता मजबूत होती है। तो भारत में लोकतंत्र और शासन के मॉडल संवैधानिक और लोकतंत्र होते हैं। भागीदारी लोकतंत्र होता है और ई लोकतंत्र होता है। तो भारत में लोकतंत्र और शासन की प्रमुख उपलब्धियां की बात करूं तो भारत में आरटीआई एक्ट 2005 डिजिटल इंडिया जो योजना है जन आधार मोबाइल जो है ग्रामीण विकास योजना और नागरिक चार्टर और सेवा गारंटी ये जितनी भी योजना है ये भारत के शासन और ई शासन का परिणाम है। भारत में शासन से संबंधित चुनौती क्या-क्या आती है? भ्रष्टाचार हो सकता है शासन में। ब्यूरोक्रेसी की धीमी प्रक्रिया हो सकती है। डिजिटल का विभाजन हो सकता है। कहीं लोग ज्यादा पढ़े लिखे हो, कहीं कम पढ़े लिखे हो किसी राज्य में तो उस वो ई गवर्नमेंस का फायदा नहीं उठा पाएंगे। राजनीतिक हस्तक्षेप हो या सामाजिक आर्थिक असमानता हो। जैसे गरीब लोगों के पास फोन ही नहीं होगा, इलेक्ट्रॉनिक नहीं होगी, डाटा नहीं होंगे तो फिर वो कैसे ही ई- गवर्नमेंस का फायदा उठाएगी? तो सुधार के सुझाव क्या है? तो प्रशासनिक सुधार किया जाए, पारदर्शिता, डिजिटल गवर्नमेंस बनाई जाए, नागरिक परीक्षण दी जाए। नागरिकों को फोन चलाना ये सब चलाना सिखाया जाए जिससे वो ई गवर्नेंस का फायदा उठा सके जागरूक करा जाए स्वतंत्रता निगरानी संस्थाएं बनाई जाए और नीति निरंतरता और स्थिरता को सुनिश्चित किया जाए। निष्कर्ष में क्या लिखेंगे कि शासन और लोकतंत्र केवल प्रशासनिक व्यवस्था नहीं है बल्कि समाज में निर्माण के दो स्तंभ है तो लोकतंत्र नागरिक को अधिकार देता है जबकि शासन यह सुनिश्चित करता है कि वे अधिकार सुरक्षित रख रहे और नीति का लाभ समान रूप से सभी तक पहुंचा सके। तो भारत जैसे विशाल और बहुभाषी देश में सुशासन ही लोकतंत्र को सार्थक बना सकती है, प्रभावी बना सकती है और जनहितकारी बना सकती है। तो पारदर्शिता हुई, जवाबदेही, डिजिटल नवाचार और नागरिक सहभागिता से भविष्य में लोकतंत्र और शासन दोनों ही अच्छे किए जा सकते हैं। आई होप आपको यह क्वेश्चन अच्छी तरह से समझ आया हो। तो, हम चलते हैं हमारे नेक्स्ट क्वेश्चन पर। तो हमारा क्वेश्चन नंबर फोर्थ है कि सुशासन यानी गुड गवर्नेंस और ए गवर्नेंस की अवधारणा को समझाइए। इसके महत्व क्या है और इसकी चुनौती क्या है? यह बतानी है। सुशासन क्या होता है? ए गवर्नमेंस क्या होता है यह बताना है और इन दोनों का महत्व क्या है और इन दोनों के सामने क्या-क्या चुनौतियां आती है वो बताना है। तो इंट्रोडक्शन से स्टार्ट करते हैं। तो भारत जैसे विकासशील देश और जनसंख्या वाले देश में प्रशासन करना, नीति निर्माण करना और अपने सेवाओं को लोगों तक पहुंचाने का प्रभावी, पारदर्शी और लोकतंत्र होना इसका अत्यंत आवश्यक हो जाता है। तो इसी को ध्यान में रखते हुए एक हमारे सामने एक अवधारणा आती है जिसको हम सुशासन कहते हैं या ई गवर्नमेंस दोनों चीज होती है और दोनों अलग-अलग चीज है बट अच्छी चीज है शासन चलाने के लिए जहां सुशासन द्वारा क्या किया जाता है प्रशासन को नैतिकता पारदर्शिता जवाबदेही और प्रभावी नागरिक केंद्रित बनाने की सोच आधारित की जाती है। वहीं यह गवर्नमेंट्स हमें इलेक्ट्रॉनिक गवर्नमेंट द्वारा सरकार की जितनी भी सेवा होती है उसको जनता तक टेक्नोलॉजी द्वारा और जल्दी और आसान तरीके से पहुंचाने का काम करती है। आज के डिजिटल युग में यह दोनों अवधारणा हमारे लिए बहुत ज्यादा इंपॉर्टेंट हो जाती है। इसलिए हम इससे रीड की हड्डी भी कह सकते हैं। तो भारत में इलेक्ट्रॉनिक शासन का उद्देश्य केवल प्रशासन का डिजिटलीकरण करना ही नहीं है बल्कि प्रशासन में पारदर्शिता लाना भी है। क्योंकि जब कोई चीज इंटरनेट से होती है तो उसका डाटा हमेशा सिक्योर रहता है। प्रभावशीलता बढ़ती है इससे। सरकार की उत्तरदायित्वता बढ़ती है। सहभागिता बढ़ती है और नागरिक सशक्त होते हैं इससे। तो जानते हैं हम कि सुशासन क्या होता है? क्या है इसकी अवधारणा? सुशासन का अर्थ क्या है? सुशासन यानी गुड गवर्नेंस। यह एक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से सरकार संसाधनों का प्रबंधन करती है। नीति का निर्माण करती है और सार्वजनिक हित को कार्य में लाती है, संचालन करती है, नागरिक को सेवा देती है और अपने शासन में पारदर्शिता को बनाती है। यानी जनता के प्रति वो एकदम खुली होती है, निष्पक्ष होती है और जवाबदेह होती है कि जनता अगर कोई क्वेश्चन कर रही है उसका आंसर दे और प्रभावी ढंग से यह सुविधा प्रदान करती है। सुशासन का मूल्य उद्देश्य यह होता है कि यह यह सुनिश्चित करता है कि शासन प्रणाली नागरिक के हित में हो, अधिकार हो, समानता हो, भागीदारी हो और न्याय संगत के सिद्धांत पे यह आधारित हो। संयुक्त राष्ट्र संगठन ने सुशासन को न्यायपूर्ण बनाया है, जवाबदेह बनाया है, सहभागी वाला बनाया है, प्रभावी बनाया है और मानव अधिकार को इसमें संरक्षित करने वाला बनाया है। ठीक है? तो सुशासन के कौन से सिद्धांत होते हैं? सुशासन में पहली चीज आपको देखने को मिलती है पारदर्शिता। यानी सरकारी निर्णय हो, चाहे सरकारी नियम हो, चाहे सरकार की कोई भी प्रक्रिया हो वो स्पष्ट रूप से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हो। यानी को जो भी वो निर्णय नियम बना रही है वो जनता को पता हो यानी पारदर्शिता हो। उत्तरदायित्व। दूसरी इसकी सिद्धांत होती है। मींस सरकार हो चाहे प्रशासन का कोई भी अधिकारी हो। वह अपने कार्य के लिए जनता और संस्थान के प्रति जिम्मेदार हो यानी उत्तरदायित्व हो, जिम्मेदारी हो उसकी और जिम्मेदारी से काम करें। और यह उसकी जिम्मेदारी है कि अगर जनता के प्रति वो काम कर रहा है, जनता को पसंद नहीं आ रहा, जनता कोई क्वेश्चन कर रही है तो उसका वो जवाब दे कि ये काम क्यों नहीं हुआ? क्यों नहीं हो रहा? कैसे हो रहा है? क्या करा? सब बताना। कानून का शासन इसका तीसरा सिद्धांत होता है सुशासन का। यानी सभी नागरिक और जो संस्थाने हैं वो अंतर्गत समान रूप से उत्तरदायित्व और न्याय स्वतंत्र हो। ठीक है? चौथा भागीदारी हो यानी नीति गठन और निर्णय प्रक्रिया में नागरिक की भागीदारी सुनिश्चित हो। जैसे जन सुनवाई, मतदान प्रणाली और पंचायती व्यवस्था। समानता और समावेशन भी इसका सिद्धांत है जिसमें समाज के सभी वर्गों को समान अवसर और अधिकार मिले हैं। प्रभावशीलता और दक्षता भी इसकी सिद्धांत है जिसमें सरकारी संसाधनों का उपयोग किया जाता है। लागत और परिणाम के आधार पर सर्वोत्तम तरीके से किया गया जाता है। सहमति पूर्ण निर्णय या सहमति आधारित नीति बनाई जाती है। विभिन्न हित समूह के बीच संतुलन बनाकर निर्णय लिया जाता है। ए गवर्नेंस क्या होता है? इसकी अवधारणा जानते हैं। ए गवर्नेंस का अर्थ होता है कि जिसे पूर्ण रूप से इलेक्ट्रॉनिक गवर्नेंस कहा जाता है। मींस शासन को इंटरनेट के माध्यम से देना। प्रशासन, नागरिक सेवाएं और सरकारी प्रक्रियाओं को डिजिटल टेक्नोलॉजी, इंटरनेट और सूचना और संचार प्रौद्योगिक के माध्यम से चलाना। मतलब अब अपने शासन को इन सभी माध्यमों से चलाना। इसका उद्देश्य यह होता है कि सरकारें कार्य में निष्पादन हो और तेजी से और सरल बनाया जाए। मींस इंटरनेट से अब आधार कार्ड बना लेते हैं हम। है ना? हम वोटर आईडी कार्ड बना लेते हैं। हम बिजली का बिल भर देते हैं। तो इससे क्या होता है? पहली बात तो निष्पादन होता है। ये तेज आप 2 मिनट में कोई भी चीज बना लेते हो। सरल होता है कि लाइन नहीं लगाना पड़ता। आपको फोटोकॉपी नहीं करानी पड़ती। तो नागरिक को सरकारी सेवाओं को बिना मध्यस्था के बीच प्रदान की जाती है। क्योंकि आप किसी मध्यस्था किसी ऑफिस में जाओगे ये बनाने तो एक मिडिल मैन होगा जो आपसे पैसे भी ले सकता है। आपको टाइम भी ज्यादा खर्च कर सकता है। तो ये सारी चीजें इससे बचती है। सरकारी प्रक्रिया को पारदर्शिता और भ्रष्टाचार मुक्त बनाता है। क्योंकि आप अगर डायरेक्ट घर बैठे बनाओगे तो वो पारदर्शिता भी होगी क्योंकि आपका सारा डाटा रिकॉर्ड हो रहा होगा। दूसरी चीज भ्रष्टाचार मुक्त होगा। क्योंकि किसी के पास आप जा नहीं रहे हो बनवाने तो आपके क्या है कोई बिचौलिया नहीं होगा। ई गवर्नमेंस के प्रमुख चार मॉडल होते हैं। पहला मॉडल होता है सरकार से नागरिक जिसको हम जी टू सी कहते हैं। ठीक है? जैसे पासपोर्ट आवेदन करना, आधार कार्ड बनवाना, जन प्रमाण पत्र बनाना, बिजली बिल भुगतान करना। तो ये सारी चीज आप नागरिक जो है वो डायरेक्ट ई गवर्नमेंट्स में जीटूसी के माध्यम से यानी आप अपने लैपटॉप फोन के माध्यम से इन सब की वेबसाइट होती है उस पे जाके आप बनवा सकते हो घर बैठे। दूसरा होता है सरकार से व्यवसाय के लिए यानी जी टू बी इसमें जैसे कि जीएसटी आपको भरना हो, व्यापार लाइसेंस लेना हो, ई निवादा करना हो तो ये सारी चीजें आपको अब किसी एजेंसी में जाके ना कराना पड़ेगा। घर पे बैठ के ही आप इनके पोर्टल पे जाके कर सकते हो। तीसरी चीज होती है सरकार से सरकार यानी जी टू जी यानी विभागों के बीच डेटाबेस साझा करना। डिजिटल फाइल का प्रबंधन करना। पहले क्या होता था? एक फाइल दूसरे फाइल द्वारा सरकार को भेजती सरकार की बहुत सारी एजेंसी होती है। अब क्या है? मान लो आरबीआई ने कोई रिपोर्ट मांगी है ना आरबीआई ने कोई रिपोर्ट मांगी और जो हमारा ईडी है उससे मांगी या ईडी ने आरबीआई से मांगी तो अब ये दोनों एक दूसरे को डिजिटली भी दे सकते हैं डाटा। सरकार से कर्मचारी भी है जी टू ई यानी जैसे वेतन स्लिप ऑनलाइन दिए जाती है ई लेखन और परीक्षण पोर्टल। अब ये सारी चीजें क्या है? कर्मचारियों को ऑनलाइन ही दे दी जाती है। तो ये सब हमारी ई गवर्नमेंस में आता है। तो सुशासन और ई गवर्नेंस का संबंध अगर बताऊं तो सुशासन का सिद्धांत होता है ट्रांसपेरेंसी पारदर्शिता लाना। ठीक है? यानी जनता और सरकार के बीच एकदम खुला वातावरण हो। कोई चीज छुपी ना हो। ई गवर्नमेंट्स उसे कैसे लागू करता है? ई गवर्नमेंट्स उसे सूचना के माध्यम सूचना वेबसाइट के माध्यम से पोर्टल के माध्यम से मोबाइल ऐप के माध्यम से ट्रांसपेरेंसी उपलब्ध करवाता है। बहुत सारी ऐसी एप्स है जो आपको सरकार क्या कार्य कर रही है? कैसे कर रही है? कौन सी योजना लागू की है? ये सब बताने का कार्य करता है। शू शासन का दूसरा सिद्धांत होता है जवाबदेही। तो जवाबदेही को ई गवर्नमेंस कैसे लागू करता है? तो डिजिटल ट्रैकिंग, ऑनलाइन शिकायत। तो ये सब चीज आप करवा सकते हो। एफआईआर करा सकते हो, डिजिटल ट्रैकिंग करा सकते हो ना आरटीआई जो हमारा एक्ट है इसके तहत आप किसी से भी कोई क्वेश्चन कर सकते हो किसी भी सरकारी अफसर से। तो ये सब आप क्या है? ई गवर्नमेंट्स के द्वारा कर सकते हो। सुशासन का तीसरा जो सिद्धांत है वो भागीदारी होता है। यानी जनता का सरकार में भागीदारी। तो ऑनलाइन मतदान द्वारा फीडबैक प्लेटफार्म द्वारा आप क्या कर सकते हो? आप ई गवर्नमेंस द्वारा आप सुशासन को अच्छा कर सकते हो। सुशासन का सिद्धांत दक्षता भी होती है। तो दक्षता को बढ़ाने में भी ई गवर्नमेंट्स अपना रोल निभाती है। जैसे डिजिटल फाइन, तात्विक सेवा यह प्रदान करना। सुशासन का सिद्धांत कानून का शासन होता है। तो ई गवर्नमेंट्स इसे कैसे लागू करता है? ऑनलाइन रिकॉर्ड और न्याय पोर्टल भी दे रखा है कि वहां पे भी आप कंप्लेन कर सकते हो। तो भारत में सुशासन और ई गवर्नमेंस दोनों का ही महत्व है। दोनों ही भ्रष्टाचार में कमी करने का कार्य करता है। डिजिटल भुगतान जब आप करते हो तो आपके पास रिकॉर्ड होता है। आपकी फाइल सेफ रहती है। ऑनलाइन फाइल रहती है। आपकी पारदर्शिता प्रक्रिया जो है वो बिचौलिए से बच जाती है कि आपको घूस नहीं देना। पहले आप घूस देते थे। सरकार के पास ही रिकॉर्ड नहीं जाता था। अगर आप अब आप किसको घूस दोगे? अब तो ऑनलाइन जा रहा है पैसे। समय और संसाधन की इससे बचत होती है। अब सेवा, पैन कार्ड, आधार कार्ड, पासपोर्ट, टैक्स भरना यह सब आप एक क्लिक में अपने घर बैठे पोर्टल से कर सकते हो। जनता को सशक्त बनाना भी इसका कार्य है। नागरिक अपने अधिकार को जाने, योजना को जाने, प्रक्रिया को जाने और उसको प्राप्त कर सके। तो सुशासन और ई गवर्नमेंस यह अवसर देता है। बेहतर निर्णय लेना, डिजिटल डाटा संग्रह से सरकार को जनता की जरूरत समझने में मदद मिलती है। ग्रामीण और शहरी दूरों के बीच दूरी कम होती है। कॉमन सर्विस सेक्टर जो है और डिजिटल इंडिया अभियान है। ग्रामीण क्षेत्रों में टेक्नोलॉजी को जोड़ रही है। तो गांव और शहर की दूरियां अब खत्म हो रही है। ई गवर्नमेंस के उदाहरण क्या-क्या है? आधार परियोजना आधार कार्ड आप ऑनलाइन बना सकते हो। डिजिटल इंडिया मिशन, उमंग ऐप, भीम ऐप, ई कोर्ट जिसमें आप कंप्लेन कर सकते हो डिजिटली स्वच्छ भारत ऐप, राष्ट्रीय ई- गवर्नमेंस योजना। तो ये सारी हमारी सुशासन की देन है और हमारी ई गवर्नमेंट्स की देन है। तो सुशासन और ई गवर्नमेंस की चुनौती भी है। तकनीकी बाधा है। मान लो इंटरनेट उपलब्धता मान लो कि मैं बैठी हूं अभी दिल्ली में तो इंटरनेट चल रहा है। मान लो मैं चली गई कश्मीर मैं चली गई लद्दाख। वहां पे इंटरनेट नहीं आ रहा तो वहां पे ई गवर्नेंस कैसे काम करेगा? एक सुर शासन कैसे काम करेगा? वहां पे ये बाधा आ सकती है। तो ये उसकी बाधा है साइबर सुरक्षा क्योंकि ई गवर्नमेंस आजकल डिजिटली बहुत ज्यादा साइबर चोरी हो रही है। तो ये समस्या बन सकती है। डिजिटल विभाजन हो सकता है। डिजिटल साधन शिक्षित मतलब विभाजन मान लो कि मेरे को तो फोन चलाना आता है। ठीक है? मान लो मेरी मम्मी या मेरे पापा को फोन चलाना नहीं आता। तो वो कैसे आधार कार्ड बनाएंगी? वो कैसे लाभ कमा पाएंगी? मतलब सरकार की योजना का ई- गवर्नमेंस के तहत नहीं कमा पाएंगी क्योंकि उनको फोन चलाना नहीं आता। उनको इंटरनेट का नॉलेज नहीं है। तो ये भी एक समस्या है। तीसरा क्या है? भाषा बाधाभाधा जैसे कि ज्यादातर जो पोर्टल्स होते हैं वो अंग्रेजी भाषा में होते हैं। अब ज्यादातर भारत तो है ग्रामीण वाला देश है तो गांव के लोग कैसे उसको हैंडल करेंगे? तो ये भी एक बाधा है ई गवर्नेंस और सुशासन का। भ्रष्टाचार और राजनीतिक हस्तक्षेप। डिजिटल कलर के बावजूद भी कई ऐसी भ्रष्टाचार है जो हो रही है अभी भी। तो ये भी एक चुनौती है ई गवर्नेंस के लिए भी और सुशासन के लिए भी। डाटा गोपनीयता सब साइबर अपराध यानी डाटा को रिकॉर्ड करना उसको ऑनलाइन जो है इनको सुरक्षा देना भी कि सरकार इसकी सुरक्षा कर रही है कि नहीं कर रही ये भी एक मुद्दा बन जाता है तो सुशासन या ई गवर्नमेंस आधुनिक लोकतंत्र की नेव है भारत जैसे विशाल देश में भारत जैसे ये अवधारणा ना केवल प्रशासनिक सुधार लाती है बल्कि नागरिक को सशक्त बनाने का काम करती है पारदर्शिता लाने का काम करती है राज्य में समान सहभागिता लाती है जनता और सरकार की वहीं ई गवर्नमेंस जो है वो जो ई गवर्नमेंट्स है वो इस सिद्धांत को लागू करने में उपकरण का उपयोग करती है क्योंकि ये हमें इंटरनेट के माध्यम से सेवाएं देती हैं सरकार की। तो ये दोनों ही हमारे भारत को मजबूत बनाती है। ठीक है? हमारा नेक्स्ट क्वेश्चन देखते हैं। हमारा नेक्स्ट क्वेश्चन यूनिट नंबर थ्री से बनता है। हमारा यूनिट नंबर थ्री है जवाबदेही यानी नागरिक और शासन की जवाबदेही। तो इस हमारा क्वेश्चन नंबर फाइव क्या है? कि नागरिक चार्टर क्या है? इसका महत्व क्या है? और शासन में योगदान क्या है? इसका इसकी चर्चा करनी है। इंट्रोडक्शन से स्टार्ट करते हैं कि नागरिक चार्टर क्या है? तो इंट्रोडक्शन से स्टार्ट करें तो लोकतांत्रिक शासन प्रणाली का आधार ही नागरिक होती है। क्योंकि नागरिक द्वारा ही लोकतंत्र में प्रतिनिधि चुने जाते हैं। जब नागरिक को यह समझ आता है कि सरकार उनसे कैसे व्यवहार करेगी? उनको कौन-कौन सी सेवा उपलब्ध कराएगी? उन सेवा का समय क्या होगा? गुणवत्ता क्या होगी? और प्रक्रिया क्या होगी? तभी तो लोकतंत्र अच्छे से चलेगा और प्रशासन में पारदर्शिता होगी और उत्तरदायित्व होगी। तो इसी सोच से नागरिक चार्टर की अवधारणा विकसित होती है। तो नागरिक चार्टर का यह उद्देश्य है केवल सरकारी सेवाओं की जानकारी ही देना नहीं है जनता को बल्कि नागरिकों को सशक्त बनाना है। नागरिक को सरकारी विभागों को जवाबदेह बनाना है। सुशासन लाना है और इसे व्यवहारिक रूप से लागू करना है। तो चार्टर नागरिक चार्टर एक सामाजिक अनुबंध है। सोशल कॉन्ट्रैक्ट है जो कि जनता और सरकार के बीच होता है। यहां सरकार वादा करती है जनता से कि वह नागरिक की गुणवत्ता युक्त और समय मुक्त सेवा उपलब्ध कराएगी। लोगों को सरकार करती है ना वादा। तो नागरिक चार्टर की परिभाषा क्या है? नागरिक चार्टर एक सार्वजनिक दस्तावेज होता है जिसमें किसी सरकार या सार्वजनिक संस्था द्वारा क्या करे जाती है? जनता को स्पष्ट जानकारी दी जाती है। क्या-क्या जानकारी दी जाती है? जैसे कि सेवा प्राप्त करने की प्रक्रिया क्या होगी? मान लो कोई योजना बनाई भारत सरकार ने। अब यह सेवा आपको कैसे प्राप्त करनी है यह बताया जाएगा उस सरकार द्वारा और इस सेवा को प्राप्त करने के लिए आपको कौन-कौन से दस्तावेज लगेंगे यह बताया जाएगा। सेवा प्रदान करने का समय क्या होगी? कौन सी डेट पे आप कर सकोगे? कौन से समय पे यह बताया जाएगा। शुल्क की जानकारी क्या यह फ्री होगा या इसमें कोई पैसा लगेगा? तो कैसे कितना लगेगा? यह बताना। जिम्मेदार आधार अधिकारी का नाम होना। इसमें शिकायत निवारण व्यवस्था होना। मतलब आपको इसमें कुछ हो रहा है, प्रॉब्लम्स हो रहे तो आप शिकायत कर सकते हो। नागरिक के अधिकार और जिम्मेदारियां बताई जाती है। तो ये सारी चीजें को चार्टर एक्ट में रखा जाता है। तो नागरिक चार्टर की उत्पत्ति कैसे हुई और वैश्विक इसकी पृष्ठभूमि क्या है? अगर देखें तो तो नागरिक चार्टर की अवधारणा पहली बार यूनाइटेड किंगडम यानी यूके में हुई थी। 1991 में प्रधानमंत्री जॉन मेजर के शासनकाल में। इसका उद्देश्य था कि सरकार को नागरिक सरकार तो नागरिक की ही रहती है। तो इस सिद्धांत को व्यवहार रूप से लागू करना है कि कैसे सरकार नागरिक की है। कैसे होगी नागरिक की? तो विश्व स्तर पर नागरिक चार्टर का महत्व समझने के बाद कई देशों ने यह अपनाया जैसे ऑस्ट्रेलिया ने, न्यूजीलैंड ने, कनाडा ने, सिंगापुर ने और भारत ने भी कि हमें नागरिक चार्टर को लाना चाहिए। तो भारत में नागरिक चार्टर का विकास कैसे हुआ? भारत में नागरिक चार्टर की शुरुआत जो है वो 1997 में हुई जब प्रशासनिक सुधार विभाग ने इसी रूपरेखा को तैयार किया। शुरुआत में लगभग 115 सरकारी विभागों ने चार्टर की जानकारी दी और समय के साथ-साथ राज्य, केंद्र सरकार और स्थानीय निकायों ने भी इसको बढ़ा-चढ़ा के बढ़ाया। भारत में इसके विकास के चरण की बात करें तो पहला चरण 1997 से 2005 में जागरूकता बढ़ाई गई लोगों में और प्रयोग कैसे किया जाता है? सरकार की सेवा को वह बताना स्टार्ट हुआ। विभिन्न विभागों ने चार्टर बनाए। लक्ष्य था कि पारदर्शिता लाना और जिम्मेदारी को स्थापित करना अपनी जनता के प्रति। परंतु यह अधिकतर कागजों तक ही सीमित था। प्रैक्टिकल कभी हो नहीं पाया। मतलब कानून ही तो बना देते थे कि हां ऐसा-सा करेंगे पर प्रैक्टिकली हम देखें तो ऐसा नहीं हो पाता था। दूसरा चरण 2006 से 2014 में आया जब कानून आधारित सुधार किए गए। इसके दौरान कई राज्यों ने लोक सेवा गारंटी लागू की। यदि सेवा समय पर ना मिले तो अधिकारी पर जुर्माना लगाया जाएगा। मतलब कोई सरकारी अधिकारी से आप कोई काम करा रहे हो उसने टाइम पे नहीं किया वो काम तो उस पर जुर्माना लगेगा। सेवा समयबद्ध और बाध्यकारी होगी। तीसरा चरण कब आया? 2015 में आया डिजिटल नागरिक चार्टर। डिजिटल इंडिया मिशन के बाद नागरिक चार्टर डिजिटल रूप से उपलब्ध होना शुरू हो गए। अब लोग वेबसाइट के माध्यम से मोबाइल के माध्यम से ऐप क्यूआर के माध्यम से क्या कर सकते हैं? जानकारी प्राप्त कर सकते थे सरकार की योजना का। नागरिक चार्टर का उद्देश्य यह था कि नागरिक चार्टर का उद्देश्य से का उद्देश्य केवल सेवाएं देना ही नहीं है लोगों को बल्कि शासन को नागरिक केंद्रित बनाना है। यह नागरिकों की उपेक्षाओं को स्पष्ट करता है। सेवा देता है। शिकायत का समाधान लोगों को देता है कि कैसे करनी है। सेवा प्राप्ति की प्रक्रिया कैसी हो उसको आसान बनाता है। सुशासन और व्यवहार लागू कराता है। तो नागरिक चार्टर के मुख्य तत्व है सेवा सूची और सेवा मानक। यानी इसमें बताया जाता है कि कौन-कौन सी संस्थाएं कौन-कौन सी सेवाएं देती हैं। दूसरा सेवा देने की समय सीमा क्या होगी? कब से कब तक आप सरकारी सेवा ले सकते हैं? पात्रता और आवश्यक दस्तावेज कौन-कौन से आपको सेवा लेने में लगेंगे? पारदर्शिता को दिखाता है कि शुल्क प्रक्रिया रहेगी, मुफ्त रहेगी। शिकायत निवारण तंत्र बनाए जाते हैं। आपके लिए शिकायत कर सकते हैं। तो नागरिक चार्टर का महत्व यह होता है कि नागरिकों को सशक्त बनाता है। सुशासन का आधार प्रदान करता है। जिसमें जवाबदेही, पारदर्शिता, दक्षता और सहभागिता बनाने की कोशिश की जाती है। भ्रष्टाचार में कमी की लिए किया जाता है। समयबद्ध एवं उपलब्ध होना, समयबद्ध सेवाएं देना, कम समय में और उपलब्धता होना, प्रशासन में विश्वास बड़े लोगों का इसलिए चार्टर बनाया गया है। शासन के नागरिक चार्टर का योगदान रहा है। नागरिक और सरकार के बीच संतुलन बनाना, संबंध बनाना और प्रशासनिक को जवाबदेही सुनिश्चित करना, सेवा में मानकीकरण करना, डिजिटल शासन को बढ़ाना इसकी कुछ चुनौती भी रही है। अधिकांश नागरिक को इसकी जानकारी नहीं थी। कुछ विभाग औपचारिक दस्तावेज तक रह गए हैं। मतलब प्रैक्टिकल इसका यूज़ नहीं हुआ। दंड और जवाबदेही तंत्र कभी-कभी कमजोर हो जाता है। तो परीक्षण और व्यवहारिक सुधार की भी कमी देखी गई है। ग्रामीण स्तर पर जागरूकता कम देखने को मिलती है। समाधान यह है और सुधार की दिशा में यह कार्य कर सकते हैं कि जन जागरूकता अभियान चलाया जा सकता है। सरकारी कर्मचारियों को ट्रेनिंग दी जा सकती है। नागरिक को अनिवार्य बनाया जा सकता है। इसकी प्रत्या के लिए डिजिटल प्लेटफार्म का ज्यादा से ज्यादा यूज़ करा जा सकता है। बढ़ाया जा सकता है। जवाबदेही आधारित कानून लागू की जा सकती है। तो नागरिक चार्टर लोकतांत्रिक शासन को नागरिक केंद्रित बनाता है। यह ना केवल सरकार के कार्यों को पारदर्शिता और जवाबदेही बनाता है बल्कि साथ-साथ अधिकारों को लोगों के सशक्त बनाता है। इसकी सफलता तभी संभव है जब सरकार प्रशासन और नागरिक तीनों मिलके सही से काम करें। तो सही मायने में नागरिक चार्टर आधुनिक प्रशासन को मानव केंद्रित प्रभावी पारदर्शी बनाने के लिए क्रांतिकारी कदम है। हमारा नेक्स्ट क्वेश्चन है क्वेश्चन नंबर सिक्स कि सूचना का अधिकार यानी आरटीआई एक्ट 2005 और इसके द्वारा पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की प्रक्रिया क्या है? उसको समझाना है आपको। ठीक है? सो इंट्रोडक्शन से स्टार्ट करते हैं। तो लोकतंत्र व्यवस्था का मूल आधार या सिद्धांत होता है कि सत्ता जनता की होती है। लोकतंत्र में सरकार केवल उसका प्रतिनिधित्व ही करती है। यदि सरकार जनता की इच्छा, जनता के हित, जनता की उपेक्षाओं के अनुसार कार्य अगर करेगी तभी तो लोकतंत्र जीवंत रहेगा। लेकिन लंबे समय तक भारत में प्रशासनिक गोपनीयता की अवधारणा पर आधारित रहा है। ब्रिटिश शासनकाल ने से अपनाया गया था। जनता सरकार की कार्यप्रणाली, नीति, खासी, निर्णय, प्रक्रिया इन सब का जायजा नहीं ले पाती थी, जान नहीं पाती थी। तो इससे भ्रष्टाचार बढ़ने लग गया, पक्षपात बढ़ने लग गया। तो इसके बाद पहले लोग सरकार गैर उत्तरदायित्व होती थी। कोई जवाब नहीं देती थी जनता को। शासन और जनता के बीच ये दूरियां बनी हुई थी। तो ऐसे में मांग उठी कि पारदर्शिता शासन की। तो सूचना का अधिकार अधिनियम यही बताता है आपको कि किसी भी कर्मचारी, किसी भी सरकारी दफ्तर से आप क्या कर सकते हो? आप उसने पैसे कहां खर्च करे, कैसे कार्य कर रहा है? सबकी जानकारी आप ले सकते हो। ठीक है? तो सूचना का अधिकार अधिनियम का अर्थ क्या है? आरटीआई का सूचना का अधिकार अधिनियम एक कानून है जिसके तहत भारत का प्रत्येक नागरिक किसी भी सार्वजनिक जो प्राधिकरण है यानी पब्लिक अथॉरिटी है उससे सूचना मांग सकता है और उसको देना ही पड़ेगा और यह विभाग उस सूचना को निर्धारित समय सीमा के भीतर उपलब्ध कराता है। यानी एक टाइम होता है। टाइम के अंदर उसने नहीं दिया ना तो आप उस पे और केस कर सकते हो। तो आरटीआई अधिनियम यह हमें बताता है कि सूचना सरकारी की नहीं है बल्कि जनता की संपत्ति है। तो आरटीआई हमें यह बताता है कि जो सूचना है जो जानकारी है वो जो काम कर रहे हैं वो सरकार का नहीं है बल्कि वो जनता का हक है जानना। तो आरटीआई अधिनियम का ऐतिहासिक विकास क्या है? तो आरटीआई लागू होने से पहले भारत में ऑफिशियल सिक्योरिटी एक्ट 1923 लागू था। जिसका उद्देश्य था सरकारी सूचनाओं को गिरने रखना कि वह कहां पैसे खर्च कर कैसे कर रही है। इसको जनता को नहीं बताया जाता था। समय के साथ यह कानून गैर जवाबदेही बनता जा रहा था। सूचना के अधिकार संघर्ष की शुरुआत 1990 के दशक में राजस्थान के भीलवाड़ा और अजमेर जिलों से हुई थी। जहां मजदूर किसान शक्ति संगठन ने क्या करा था? सरकारी फाइलों और मजदूरों मजदूरी और भुगतान को सार्वजनिक तौर पे पारदर्शिता की मांग की कि हमें देखना है ये चीज कि आप ये सारे पैसे कहां खर्च करते हैं। ठीक है? अर्ना रॉय ने किया था इसका नेतृत्व। तो जन सुनवाई मॉडल के माध्यम से जनता के सामने ये फाइल आई तब पता चलता है कि मजदूर और मजदूरी का भुगतान रिकॉर्ड में दिखाया गया। तो वास्तविक में कुछ भुगतान नहीं किए गए थे। तो इस आंदोलन ने आरटीआई एक्ट की नीव रखी थी। ठीक है? आरटीआई अधिनियम की प्रमुख विशेषताएं क्या है? तो सरल आवेदन प्रक्रिया है। आरटीआई आरटीआई आवेदन साधारण कागज पर सामान्य भाषा हिंदी, अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषा में भी आप आरटीआई कर सकते हो। लिखा जा सकता है। ठीक है? दूसरी चीज क्या है कि सूचना उपलब्ध कराने का इसमें समय होता है। यानी सामान्य मामलों में 30 दिन के भीतर जिस भी कार्यालय जिस भी संस्था से आप जवाब मांग रहे हो उसको देना ही पड़ेगा। जीवन या स्वतंत्रता से जुड़ी सूचना 48 घंटे के भीतर ही पर देना पड़ता है। तीसरे पक्ष में सूचना 45 दिन के भीतर आती है। तो दंड का प्रावधान भी है। यदि अधिकारी जानबूझकर सूचना रोकता है। जैसे आपने सूचना मांगा उसने नहीं दिया जवाब तो गलत सूचना दे या कोई गलत सूचना दे देता है या लेट कर देता है तो उस पर आप क्या कर सकते हो? तो ₹250 जुर्माना लगता है और कम से कम और अधिकतम ढाई कह सकते हो 25000 का जुर्माना लगता है। सभी सरकारी संस्थाएं इसके अधीन आती है। इन्हें सारी सरकारी संस्थाएं आरटीआई के अंतर्गत आती है। चाहे केंद्र सरकार की कोई भी संस्था हो चाहे कोई भी राज्य सरकार की संस्था हो। स्थानीय निकाय हो, पंचायती हो, नगरपालिका हो या सरकारी वित्त पोषित हो, संस्थान हो, विश्वविद्यालय हो, सार्वजनिक क्षेत्र उपकरण हो तो आप सबसे क्या कर सकते हो? आरटीआई एक्ट के तहत आप सवाल कर सकते हो। आरटीआई जो है वह पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित करता है? तो आरटीआई अधिनियम शासन की कारवाही को खुला और सत्यपाित करने योग्य बनाता है और यह माध्यम से पारदर्शिता स्थापित की जाती है। यानी सरकारी रिकॉर्ड तक पहुंचना उपलब्ध करवाना इसका काम होता है। यानी अब नागरिक सरकारी कार्यों को योजना को फंड को और उसके उपयोग को निर्णय प्रक्रिया को जानकारी को सीधे प्राप्त कर सकता है। इससे गोपनीयता समाप्त होती है और सूचना जो है वह सार्वजनिक होती है। यानी सूचना जनता की होती है। सार्वजनिक संपत्ति होती है। फाइल नोटिंग्स तक पहुंच। यानी आरटीआई के माध्यम से नागरिक यह भी जान सकते हैं कि किसी निर्णय को लेने में अधिकारियों ने क्या-क्या टिप्पणियां की है। इस निर्णय प्रक्रिया में खुली होती है। ये मान इसमें मनमानी कम होती है। यह भी पता लगता है। तीसरा सरकारी धन के उपयोग की जानकारी। आरटीआई के माध्यम से धन आवंटन और व्यायाम का विवरण प्राप्त कर जनता कर सकती है कि पैसा सही जगह जा रहा है या नहीं जा रहा है। योजना और सेवाओं की निगरानी कर सकती है। शिक्षा, स्वास्थ्य, राशन, मनरेगा योजना, सड़क, पेयजल, बिजली आदि संबंधित जितनी भी योजना है इन सब की भी आप जानकारी ले सकते हो कि कहां पैसे खर्च हुए। आरटीआई जो है वह जवाबदेही कैसे सुनिश्चित करता है। तो सरकारी कर्मचारियों के लिए जिम्मेदारी तय करता है। यह पहले क्या करता है? अब अधिकारी जानते हैं कि उनका हर निर्णय सार्वजनिक हो सकता है। इसलिए वे जिम्मेदार के रूप से कार्य करते हैं कि कहीं कोई आरटीआई मांग ना ले गलत ना हो जाए। तो एक अच्छा चीज हो जाता है। भ्रष्टाचार में कमी होती है। है ना? घोटाले उजागर करने के डर से लोग अच्छे से काम करते हैं। 2G स्पेक्ट्रम घोटाला जैसे हुआ। कॉमवेंथम गेम्स घोटाला ये सारे घोटाले जो है सरकारी तंत्र पर निगाहें बढ़ी। इससे नागरिक की निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी बढ़ती है। आईटीआई ने नागरिक की भूमिका को निष्क्रय कराए। सक्रिय भागीदारी होती है। उनकी इसमें अपील और शिकायत तंत्र आरटीआई दो स्तर की अपील प्रणाली है जिसमें गलत उत्तर मिलने पर नागरिक न्याय प्राप्त कर सकता है। आरटीआई की आरटीआई की उपलब्धियां क्या है? सरकारी रिकॉर्ड डिजिटलाइजेशन की वृद्धि होती है। राशन प्रणाली में पारदर्शिता आती है। स्कूल में मिड डे मील निरीक्षण किया जा सकता है। इससे सड़क निर्माण मनरेगा धोखाधड़ी भी कम हुई है। इससे सार्वजनिक स्वभाव में दक्षता भी बढ़ी है। आरटीआई की चुनौतियां क्या है? हर धमकी और आरटीआई कार्यकर्ता की हत्या हो जाती है। है ना? सूचना आयोग में लंबित मामले आते हैं देखने को। कई विभागों में जानकारी देने से इंकार भी कर दिया जाता है। 2019 संशोधन में आयोग की स्वतंत्रता भी कम हो गई है। कहीं ना कहीं इसकी चुनौती भी है। तो निष्कर्ष के तौर पे क्या लिख सकते हैं? सूचना का अधिकार अधिनियम आधुनिक भारत की लोकतांत्रिक यात्रा का अत्यंत महत्वपूर्ण चरण है। इसने शासन को खुला पारदर्शी जवाबदेही बनाया है। जनता को अपने अधिकार को समझने और लागू करने की शक्ति प्रदान की जाती है। इसमें यह कानून केवल सूचना प्राप्त करने का उपकरण नहीं है बल्कि लोकतांत्रिक सशक्तिकरण का आधार है। भ्रष्टाचार के खिलाफ हथियार और सुशासन का मार्गदर्शन करती है। जब नागरिक जागरूक होते हैं, कार्यवाही होते हैं, पारदर्शी होते हैं तो अधिकार जो अधिकारी होता है उसको जवाबदेही होना ही पड़ता है जब जनता जागरूक होती है तभी लोकतंत्र सशक्त बनता है। तो ये क्वेश्चन होता है आपका यहां पे खत्म। चलते हैं हमारे नेक्स्ट क्वेश्चन पे। हमारा नेक्स्ट क्वेश्चन है क्वेश्चन नंबर सेवन कि लोकपाल और लोक जो लोकायुक्त होती है उसकी भूमिका और उनकी प्रभावशाली प्रभावशीलता का मूल्यांकन कीजिए। यानी लोकपाल और लोकायुक्त क्या होते हैं? भूमिका से स्टार्ट करते हैं। लोकतंत्र में सरकार की शक्ति सीमित होती है और उसका मुख्य उद्देश्य जनता की सेवा करना होता है। लेकिन जब सत्ता के साथ पारदर्शिता आती है, जवाबदेही आती है, नैतिकता आती है और यह सब कमजोर हो जाती है तब भ्रष्टाचार बढ़ता है। भ्रष्टाचार केवल आर्थिक संसाधनों का नुकसान नहीं करता है बल्कि लोकतंत्र को खत्म करता है। नागरिक के अधिकार को छीनता है। न्याय व्यवस्था को छीनता है। प्रशासनिक दक्षता को कमजोर करता है। तो भारत में लंबे समय तक भ्रष्टाचार का स्तर इतना बढ़ गया था। इतना बढ़ गया था कि नागरिक के बीच सरकार के प्रति अश विश्वास फैल गया था। ऐसे समय में एक स्वतंत्र निष्पक्ष शक्तिशाली संस्था के लोगों को आवश्यकता महसूस हुई और शासनिक पदाधिकारी के खिलाफ लोगों ने शिकायतें और जांचे करना स्टार्ट कर दिया। ऐसी आवश्यकताओं ने जन्म दिया लोकपाल को और लोकायुक्त को। तो इन भ्रष्टाचार विरोधी निगरानी संस्था एंटी करप्शन जो बॉडीज थी उसके रूप में स्थापित किया गया जिसका उद्देश्य था प्रशासनिक ईमानदारी पारदर्शिता जवाबदेही सुनिश्चित करना। तो लोकपाल और लोकायुक्त क्या होते थे? इसका अर्थ क्या है? लोकपाल मतलब लोकपाल वह स्वतंत्र वैधानिक संस्था है जो केंद्रीय स्तर पर उच्च राजनीतिक पद अधिकारी जैसे प्रधानमंत्री हुई, मंत्री, सांसद हुए, सरकारी अधिकारी हुए। इनके सार्वजनिक सेवक के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामले की जांच करती है। व लोकायुक्त क्या होते हैं? लोकायुक्त राज्य स्तर पर कार्य करने वाली संस्था होती है जो राज्य सरकार के मंत्री, विधायक, अधिकारी, सरकारी कर्मचारी और इनके भ्रष्टाचार की जांच करती है। इन संस्थाओं की मुख्य विशेषता स्वतंत्र, निष्पक्ष राजनीतिक प्रभाव से मुक्त उद्देश्य देना होता है। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या है इनकी? कि लोकपाल विचार का जन्म 1960 के दशक में हुआ था। 1963 में तात्कालीन जो विधि मंत्री थे एएलएम सिंहली उन्होंने पहली बार लोकपाल की संकल्पना को बताया था। इसके बाद यह विषय बहुत तेजी से बढ़ गया और इसने ठोस कदम उठाया। 1970 से 2012 तक लोकपाल बिल आठ बार संसद में पेश हुआ था। लेकिन कई कारणों से यह पारित नहीं हो पाया था। अन्ना हजारे और जनकपाल आंदोलन की अगर बात करें तो लोकपाल को लागू करने में 2011 का जनकपाल आंदोलन सबसे निर्णायक था। जिसमें अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी, अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं ने दिल्ली के जंतरमंतर पर भ्रष्टाचार विरोध आंदोलन चलाया था। अनशन पे इस आंदोलन को विशाल जनसमर्थन मिला था। अंतः सरकार ने लोकपाल स्थापना का निर्णय स्वीकार किया था। लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम 2013 में पारित हुआ था। 18 दिसंबर 2013 को संसद ने बिल को पारित किया। 1 जनवरी 2014 को यह कानून लागू हो गया था। लोकपाल और लोकायुक्त की संरचना क्या है? तो लोकपाल की संरचना को जानते हैं। इसमें कुल आठ सदस्य होते हैं। जिसमें 50% सदस्य न्यायिक पृष्ठभूमि के होने चाहिए। यानी न्यायालय के होने चाहिए। लोकपाल का प्रमुख लोकपाल अध्यक्ष होता है। सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख मुख्यधीश या सुप्रीम कोर्ट के जज हो सकते हैं ये। ठीक है? लोकायुक्त की संरचना कैसे बनाई जाती है? तो लोकायुक्त का गठन राज्य सरकार करती है। इसकी संरचना राज्य के अनुसार अलग-अलग होती है। अधिकांश राज्यों में न्यायाधीश के वरिष्ठ सदस्यों द्वारा यह चलाया जाता है। ठीक है? तो लोकपाल और लोकायुक्त की नियुक्ति कैसे की जाती है? तो प्रधानमंत्री द्वारा की जाती है। लोकसभा अध्यक्ष हो सकते हैं। यह सर्वोच्च न्यायालय मुख्य न्यायालय वाले लोग हो सकते हैं। विपक्ष के नेता हो सकते हैं। एक प्रतिस्पर्धी न्यायवादी लोग हो सकते हैं। लोकपाल लोकायुक्त की शक्ति एवं कार्यकारी क्या है? तो शिकायत दर्ज करने की शक्ति होती है। कोई भी नागरिक या संगठन भ्रष्टाचार के विरुद्ध लिखित शिकायत दर्ज करा सकता है। जांच की शक्ति भी इनके पास होती है। लोकपाल के पास सीबीआई और अन्य जांच एजेंसी होती है। तलाशी और जब्ती की शक्ति भी इनके पास होती है। राज्य और केंद्र दोनों स्तर पर इनके पास तलाशी दस्ता मतलब दस्तावेज जब्त कर सकते हैं। पूछताछ करने का अधिकार होता है। अनुशात्मक कारही की इसमें अनुशंसा होती है। लोकपाल संबंधित अधिकार निलंबित करने हटाने इन सब का अधिकार इनको होता है। लोकपाल और लोकायुक्त की क्या भूमिका होती है? भ्रष्टाचार पे नियंत्रण रखते हैं। इन संस्थाओं का मुख्य उद्देश्य होता है कि उच्च स्तर के भ्रष्टाचार को नियंत्रित कराया जाए जो कि सरकार द्वारा किए जाते हैं। ठीक है? प्रशासनिक जवाबदेही भी बढ़ाना इनका कार्य होता है। इनके कारण मंत्री, विधायक, सांसद सबको जवाबदेही होना पड़ता है। नागरिक के अधिकारों की ये लोग रक्षा करते हैं। यानी लोकपाल और लोकायुक्त नागरिक को भ्रष्टाचार के खिलाफ शक्ति मंच देते हैं। जिसमें वो मिलके सरकार के खिलाफ आवाज उठा सकते हैं। लोकतंत्र को मजबूत बनाते हैं। यह संस्था लोकपाल और लोकायुक्त के क्या प्रभाव है? लोकपाल ने भ्रष्टाचार पर चर्चा को संवैधानिक और वैधानिक तरीके से स्थापित किया है। जनता को शिकायत दर्ज करने का मंच दिया है और राजनीतिक और प्रशासनिक जवाबदेही की भावना इससे बढ़ी है। सीमाएं और चुनौती भी है। लोकपाल लोकायुक्त की नियुक्ति में देरी और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी होती है कभी-कभी। हालांकि कानून 2014 में लागू हुआ था। लेकिन पहले लोकपाल की नियुक्ति 2019 में 4 साल बाद हुई थी। समझ रहे हो? तो शक्ति में व्यवहार सीमाएं भी देखी जाती है। कभी-कभी कभी-कभी बाध्यकारी नहीं है यह लोग। अनदेखा कर देते हैं। संसाधन और कर्मचारी की भी कमी देखने मिलती है। लोकपाल लोकायुक्त जो है संस्थाओं में पर्याप्त अधिकारी कानून जांच एजेंसियां की कमी है। राज्यों में असमानता है। कुछ राज्यों के मज मजबूत लोकायुक्त हैं। जबकि कुछ के कुछ जबकि कुछ के नाम मात्र के हैं। तो प्रभावशालीता का मूल्यांकन करें तो लोकपाल और लोकायुक्त ने भ्रष्टाचार पर रोक लगाने में एक सकारात्मक भूमिका निभाई है। लेकिन अपेक्षित परिणाम इसके देखने को मिले हैं। मतलब भूमिका तो निभाई है। इन्होंने भ्रष्टाचार को रोकने का कार्य तो किया है पर प्रैक्टिकल तौर पे वह दिखता नहीं है। तो इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि सरकार ने उन्हें कितनी मतलब शक्ति दी है कि उस जांच कर सके वो सरकार की ही नीतियों का। उनकी शक्ति कितनी लागू की जाती है इस पर भी निर्भर करती है और नागरिक कितने सक्रिय है इस बात पर भी बहुत ज्यादा निर्भर करती है। तो निष्कर्ष में क्या लिखोगे कि लोकपाल और लोकायुक्त की जो स्थापना है वह भारत में पारदर्शिता, जवाबदेही और सुशासन की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। यह संस्थाएं आशा का प्रतीक है कि एक दिन भारत में एक प्रशासनिक ढांचा भ्रष्टा मुक्त जो कह सकते हो केंद्र है नागरिक केंद्र समाज बनेगा। हालांकि वर्तमान में इसकी कार्य क्षमता तो अच्छी नहीं है, चुनौतीपूर्ण भी है। फिर भी यह संस्था लोकतंत्र के लिए एक प्रतिनिधित्व का काम करती है। क्योंकि यह सरकार की जवाबदेही को सुनिश्चित करने का काम करती है। तो भविष्य में यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति और संसाधन जो संसाधन है और कानूनी मजबूती और जन भागीदारी इन सभी के साथ जुड़के अगर लोकपाल और लोकायुक्त जो है वह भारत के लोकतंत्र और को और भी अधिक बनाए तो ये आई थिंक लाभकारी साबित होगा। ठीक है? तो हमारा ये क्वेश्चन होता है यहां पे खत्म। आई होप आपको ये क्वेश्चन समझ आया हो। चलते हैं अब हमारे नेक्स्ट क्वेश्चन पे। हमारा नेक्स्ट क्वेश्चन है कि सोशल ऑडिट क्या है? उदाहरण सहित बताइए और यह शासन में जवाबदेही कैसे सुनिश्चित करता है? यह बताना है। तो सोशल ऑडिट का अगर इंट्रोडक्शन जाने तो क्या है कि लोकतांत्रिक शासन का मूल उद्देश्य जनता की भलाई होती है। समानता होती है और पारदर्शिता और विकास को बनाना होता है। शासन तभी प्रभावी बनेगा तभी स्वीकार्य होगा और जनता मुखी तभी होगा जब जनता की आवश्यकता और अधिकार शासन द्वारा उसकी व्यवस्था में केंद्र में हो। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्रशासनिक और स जो सरकारी ढांचे हैं उसमें पारदर्शिता को बनाने के लिए उत्तरदायित्व को बनाने के लिए और जनता की भागीदारी ज्यादा से ज्यादा विकसित करने के लिए इनमें से एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणा जिसको सोशल ऑडिट है उसको किया जाता है। सोशल ऑडिट जो है लोकतंत्र शासन का एक उपकरण है जिसके माध्यम से जनता जो है वह स्वयं सरकारी योजना खर्च और निर्णय और उस जो भी वो सरकार है उसको कार्यवित करा रही है उसके जांच परख करती है। यह केवल एक वित्तीय जांच प्रक्रिया नहीं है बल्कि यह एक सामाजिक जवाबदेही और नागरिक सहभागिता को मजबूत करने का काम करती है। ठीक है? तो सोशल ऑडिट की विशेषताएं क्या हैं? तो जन सहभागिता आधारित प्रक्रिया है यह। सोशल ऑडिट का सबसे महत्वपूर्ण तत्व होता है जनता की सक्रिय भागीदारी को दिखाना। इसमें निर्णय सरकारी अधिकारी नहीं बल्कि समाज के लाभकारी लोग लेते हैं। एनजीओ के लोग, सामाजिक कार्यकर्ता लोग या गैर जो पार्टी के लोग होते हैं। पारदर्शिता पर आधारित प्रक्रिया होती है। इसमें योजना से जुड़े दस्तावेज हो, बजट हो, रजिस्टर हो, टेंडर हो, भुगतान हो, इन सभी योजनाओं का को क्या किया जाता है? जनता के सामने पेश किया जाता है। इसमें जवाबदेही सुनिश्चित करना भी होता है। इसमें अधिकारियों को जनता के प्रश्नों का उत्तर देना होता है। व्यापक मूल्यांकन भी होता है। यानी सोशल ऑडिट केवल वित्तीय जांच नहीं है बल्कि यह भी देखा जाता है कि जो कार्य सरकार ने किया है जनता के लिए क्या वो लाभकारी है जनता के लिए कि नहीं है और जनता को इससे फायदा पहुंच रहा है कि नहीं पहुंच रहा है। निष्पक्षता और सामुदायिक स्वामिकता की भी ध्यान रखा जाता है। यह प्रक्रिया लाभकारी हितों पर आधारित होती है। इसलिए निष्पक्ष और प्रभावी ज्यादा होती है यह। सोशल ऑडिट का उद्देश्य होता है कि सरकारी योजना में भ्रष्टाचार दुरुपयोग को रोकना पारदर्शिकता नागरिक अधिकारिक शासन को बढ़ावा देना जनता को योजना के बारे में जानकारी देना सरकारी संस्था के प्रति लोगों का विश्वास बढ़ाना विकास कार्यों की गुणवत्ता और प्रभावशीलता की जांच भी करना यह सुनिश्चित करती है कि योजना का लाभ लोगों को ज्यादा से ज्यादा पहुंचे। भारत में सोशल ऑडिट की उत्पत्ति कब हुई थी, कैसे हुई थी और विकास कैसे हुआ था? तो भारत में सोशल ऑडिट की अवधारणा नए लोकतंत्र के साथ विकसित हुई थी बल्कि यह ग्रामीण स्तर पर सामाजिक आंदोलन जवाबदेही मांगने की परंपरा से उभरी है। इसकी शुरुआत राजस्थान में मजदूर किसान शक्ति संगठन नामक संगठन द्वारा की गई थी। ठीक है? इन्होंने सरकार से अपनी जो गोपनीयता है उसको मांगा था। सोशल ऑडिट को कानूनी रूप से 2005 में मान्यता मिली है। आरटीआई एक्ट के रूप में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम यानी मनरेगा जो है उसका उसने इसे अनिवार्य कर दिया था। इसके बाद कई योजना ने इसको अपने अंतर्गत लिया। तो सोशल ऑडिट की प्रक्रिया क्या है? योजना से संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराती है। यह बजट को, भुगतान को, परियोजना में लगे काम को, बिल कितना लगा, लाभ को हुआ नहीं हुआ? ये सारी जानकारी जनता को देती है। ग्राम स्तर पर सत्यापान कराती है। यानी स्थानीय नागरिक इन दस्तावेज की वास्तविकता की तुलना निरीक्षण और समुदाय प्रक्रिया द्वारा करते हैं। लाभ भारतीयों से बातचीत और फीडबैक भी लिया जाता है। यह सामाजिक प्रभाव और लाभ जो भी इस योजना का फायदा उठा रहे हैं उससे बात की जाती है और उससे पूछा जाता है। जन सुनवाई की जाती है। इसमें प्रशासन, अधिकारी, जनता, मीडिया इन सभी को इन चीजों के मंच प्रदान किया जाता है। रिपोर्ट तैयार की जाती है और सुधारात्मक कारवाई की जाती है कि गलत भुगतान, भ्रष्टाचार, लापरवाही निर्माण कार्य में ठीक किया जाता है। इसे सोशल ऑडिट का महत्व है कि शासन में पारदर्शिता बढ़ाती है। सरकारी खर्च का सही उपयोग करवाती है। योजना की गुणवत्ता बढ़ाती है और प्रशासन को जवाबदेही बनाती है और जनता के प्रति यह बनाती है लाभकारी। भ्रष्टाचार और घोटालों को भी नियंत्रित करती है। तो उदाहरण बताऊं तो सोशल ऑडिट का सफल उपयोग आंध्र प्रदेश मॉडल पर अपनाया गया है। आंध्र प्रदेश ने भारत के सबसे सफल सोशल ऑडिट मॉडल विकसित किए हैं। जहां मनरेगा में सोशल ऑडिट के कारण लाखों रुपए की अनियम्यताओं का पता चला और कई अधिकारी पे कार्यवाही भी की गई। राजस्थान में भी जन सुनवाई अभियान में यह चीज को अपनाया गया था। झारखंड उड़ीसा में भी इस चीज को अपनाया गया था। तो सोशल ऑडिट की चुनौती होती है कि कभी-कभी जनता को इसकी जागरूकता नहीं पता रहती। जागरूकता नहीं रहती। सरकारी और प्रशासनिक प्रतिरोध भी कभी-कभी रहता है। दस्तावेज में कभी-कभी पारदर्शिता की कमी दिखाई देती है। तकनीकी विशेषताओं का कभी-कभी अभाव हो जाता है। राजनीतिक हस्तक्षेप से भी चुनौती आती है। सुरक्षा और दबाव की समस्या बढ़ जाती है कि जो कंप्लेन कर रहा है उस पे खतरा हो जाता है। भविष्य और सुधार हेतु सुझाव बताएं तो सोशल ऑडिट को सभी सरकारी योजना में अनिवार्य करना चाहिए। हमें जनता को डिजिटल संसाधन के माध्यम से परीक्षित करना चाहिए। कैसे उनको ऑडिट करना है। मजबूत कानूनी ढांचा तैयार हो ताकि रिपोर्ट को तुरंत कारवाई हो। स्कूल, कॉलेज, सोशल ऑडिट की शिक्षा शामिल की जाए। सोशल ऑडिट संस्थानों को स्वतंत्र और वित्तीय रूप से सक्षम बनाया जावे। सोशल ऑडिट केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है बल्कि यह जनतंत्र को मजबूत बनाने का माध्यम है। यह जनता को केवल लाभार्थी के रूप में नहीं बल्कि शासन के सक्रिय सहभागी के रूप में स्थापित करता है। पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और जन सहभागिता के सिद्धांत पर आधारित यह व्यवस्था सुशासन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। तो यदि सोशल ऑडिट को सही रूप से लागू किया जाए तो सरकारी योजना को अधिक प्रभावी, पारदर्शिता, न्यायपूर्ण और कल्याणकारी बनाया जा सकता है। तो अब चलते हैं हमारे नेक्स्ट क्वेश्चन पे। क्वेश्चन नंबर नाइन पे जो कि यूनिट नंबर फोर से बनता है। नागरिक और शासन संबंध यूनिट नंबर फोर है आपका। उससे ये क्वेश्चन बनता है कि नागरिक समाज क्या है? शासन और लोकतंत्र में भूमिका और योगदान को स्पष्ट कीजिए। यानी सिविल सोसाइटी क्या होती है? तो लोकतंत्र केवल मतदान, चुनाव और सरकार के गठन तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह व्यापक प्रक्रिया है जिसमें नागरिक की भागीदारी, नागरिक के अधिकार, नागरिक की सामाजिक न्याय, नागरिक की पारदर्शिता, उत्तरदायित्व इन सभी को शामिल किया जाता है। लोकतंत्र को जीवंत रखने के लिए, प्रभावी रखने के लिए और जनता के प्रति रखने के लिए नागरिक समाज की भूमिका बहुत ज़्यादा इंपॉर्टेंट होती है। नागरिक समाज एक ऐसा सामाजिक ढांचा होता है, जो सरकार और नागरिक के बीच सेतु का कार्य करता है। यह समाज में नागरिक की आवाज बनता है और शासन को पारदर्शिता बनाता है। नीतियों को समावेशी बनाता है और सत्ता का दुरुपयोग ना हो इसकी निगरानी करता है। तो भारत जैसी विविधता भरे राष्ट्र के लिए लोकतंत्र संस्था का समर्थन करता है और सामाजिक सद्भावना, सहभागिता, सुशासन इन सब में भूमिका निभाता है सिविल सोसाइटी। तो नागरिक समाज की परिभाषा क्या है? तो नागरिक समाज उन सभी गैर सरकारी संगठन, समूह, संस्थाओं, आंदोलन, समुदाय इन सभी जो सरकार के स्वतंत्र और समाज के हित अधिकार के लिए उद्देश्य कार्य करते हैं उन सब से बनता है। इसी को सरल भाषा में बताऊं, तो नागरिक समाज वह संगठनात्मक तंत्र है जिसमें नागरिक अपने हितों की, अपने अधिकार की, अपनी जरूरतों के लिए एकजुट होके कार्य करते हैं। शासन तंत्र इससे उत्तरदायित्व बनाते हैं। तो, नागरिक समाज के मुख्य घटक क्या है? नागरिक समाज के कई घटक होते हैं। जैसे गैर सरकारी संगठन हो सकते हैं। नागरिक समाज में कोई स्वैच्छिक संगठन हो सकते हैं। समुदाय समूह हो सकता है। श्रमिक संघ हो सकता है। महिला संगठन हो सकती है। मानव अधिकार संगठन होता है। छात्र संघ हो सकता है। मीडिया और प्रेस हो सकती है। सामाजिक कोई आंदोलन वाले लोग हो सकते हैं। डिजिटल नागरिक मंच हो सकता है। तो ये सभी लोगों को सिविल सोसाइटी में रखा जाता है। तो नागरिक समाज के क्या कार्य होते हैं? नागरिक समाज जो है नागरिक के अधिकार की रक्षा करती है। नागरिक समाज मानव अधिकार की, समाज की न्याय की, कानून के, संरक्षण की इन सभी की रक्षा करने का काम करती है। उदाहरण मानव अधिकार आयोग, बाल अधिकार संगठन ये सब क्या करती है? मानव के लिए ही तो कार्य करती है। जागरूकता फैलाने का काम करती है। नागरिक समाज नागरिक को संविधान के बारे में, कानून के बारे में, योजना के बारे में बताती है। नीति निर्माण में भी योगदान दिलाती है। नागरिक समाज शोध करता है कि नीति सुझाव भी देता है सरकार को और सरकार के सामने सामाजिक समस्याओं का समाधान भी प्रस्तुत करता है। सामाजिक न्याय और समानता को बढ़ावा भी देता है। सामाजिक भेदभाव, जाति, लैंगिक, असमानता, गरीबी, शोषण इन सबके खिलाफ आवाज उठाता है। शासन की निगरानी करता है। नागरिक समाज, सरकार की नीति, बजट उनके उपयोग, उनके प्रशासनिक प्रक्रिया इन सब पर निगरानी रखता है जिससे पारदर्शिता बनी रहती है। लोकतंत्र और नागरिक समाज का संबंध तो लोकतंत्र केवल राजनीतिक ढांचा नहीं है बल्कि सामाजिक संरचना का भी हिस्सा है। लोकतांत्रिक शासन तभी सफल होता है जब नागरिक सक्रिय जागरूक होता है, संगठित होता है। नागरिक समाज लोकतंत्र में निम्न प्रकार के योगदान देखने को मिलते हैं। जिसमें नागरिक भागीदारी सुनिश्चित करता है। ये लोग मतदान से, आंदोलन से, जन संवाद से, सामूहिक निर्णय से अपना योगदान देते हैं। जवाबदेही बढ़ती है। सरकार को नीतियों के प्रति अपने जवाब देना पड़ता है। पारदर्शिता बनती है। आरटीआई एक्ट जो है ऑडिट सोशल ऑडिट है। इससे आप सरकार की किसी भी कार्य पे निगरानी रख सकते हो। लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत तो नागरिक समाज की शासन में क्या-क्या भूमिका होती है? तो शासन का उद्देश्य जो है वो सुशासन है। तो शासन को हमेशा कैसा होना चाहिए? गुड गवर्नेंस की तरह होना चाहिए। जिसमें पारदर्शिता, उत्तरदायित्व, समानता और सहभागिता और न्याय को शामिल होता है गुड गवर्नेंस में क्योंकि ये सारी चीजें आती हैं। नागरिक समाज शासन को अधिक प्रभावी बनाता है। जब नागरिक समाज में शासन में मिला होता है, एक्टिव होता है तो शासन और भी अच्छा होता है। नीति निर्माण में मध्यस्था की भूमिका की अगर बात करें तो नागरिक समाज में नीति निर्माण की प्रक्रिया में आम जनता और सरकार के बीच संवाद स्थापित करने का काम करता है। नागरिक समाज। नागरिक समाज का उदाहरण दूं तो शिक्षा का अधिकार जब राइट टू एजुकेशन एक्ट 2009 बना था तो इसमें कई जो एनजीओ थे और सामाजिक संगठन थे उसने इस एक्ट को बनाने में योगदान दिया था। मतलब सामाजिक समूह सरकार को कानून बनाने में भी सहायता करती है। अपने सुझाव देती है। सेवा की गुणवत्ता को सुधारने का कार्य करती है। लाइक स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा में नागरिक समाज सरकारी तंत्र की सहायता करता है। उदाहरण आंगनबाड़ी सुधार, महिला सशक्तिकरण कार्य। तो ये सब सरकार जो करती है इन्हें कहीं ना कहीं एनजीओ, सरकारी संस्थाएं जो सामाजिक संस्थाएं होती है उसके डाटा के आधार पे करती है। तो भ्रष्टाचार नियंत्रण भी करता है नागरिक समाज। नागरिक समाज भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही पर निगरानी रखता है उदाहरण जन लोकपाल जो आंदोलन था जिसमें अन्ना हजारे मूवमेंट हुआ था दिल्ली में यह एक नागरिक जो समाज का आंदोलन था जन लोकपाल आंदोलन था जिसमें क्या करा गया था सरकार के खिलाफ कार्यवाही की गई थी भ्रष्टाचार के खिलाफ तो भारत में नागरिक समाज के उदाहरण जो है वह एमकेएसएस जो राजस्थान में सोशल ऑडिट और आरटीआई आंदोलन पहली बार इसी की वजह से लागू हुआ था सेवा की बात करें तो महिला आर्थिक सशक्तिकरण का समूह है। नर्मदा बचाओ आंदोलन, पर्यावरण संरक्षण आंदोलन था, क्राय जो कि बच्चों के अधिकार का था। तो नागरिक समाज के सामने चुनौती आती है कि राजनीतिक हस्तक्षेप कभी-कभी इसमें हो जाती है। नेताओं द्वारा इस में हस्तक्षेप किया जाता है। फंडिंग और संसाधनों की कमी होती है तो नागरिक समाज एक अच्छा कार्य नहीं कर पाती है। नौकरशाही अवरोध भी कभी-कभी नागरिक समाज को रोकती है। जनता में जागरूकता की कमी होती है तो तो जनता में जागरूकता की कमी होगी तो नागरिक समाज तो जनता से मिलके बनती है। तो कहीं ना कहीं यह इफेक्टिव नहीं होगी। तो मीडिया का व्यवसायकरण कभी-कभी मीडिया बिक जाती है। सरकार द्वारा ही संचालित होती है। जिससे क्या है? नागरिक समाज बाधित होता है। क्योंकि नागरिक समाज में मीडिया भी आती है। कुछ एनजीओ की विश्लेषण पर प्रश्न चिन्ह लगते हैं। कुछ ऐसी एनजीओ होती है जो सिर्फ सरकार के गुणगान गाती है। तो ऐसे एनजीओ भी जो है वो कहीं ना कहीं क्या करती है? नागरिक समाज को हानि पहुंचाती है। तो सुधार और उपाय इसके ये है कि नागरिक समाज को कानूनी समर्थन मिले और सुरक्षा मिलनी चाहिए जिससे उसकी पारदर्शिता बनी रहे। पारदर्शिता फंडिंग सिस्टम भी विकसित किया जाए। मतलब ऐसी फंडिंग हो जिसमें ट्रांसपेरेंसी हो। लोग जाने कि कितनी फंडिंग की जा रही है। शिक्षा के माध्यम से नागरिक समाज जागरूकता बढ़ाई जा सकती है। ज्यादा से ज्यादा लोगों को जागरूक किया जा सकता है। शिक्षा दी जा सकती है कि आप जानिए कि नागरिक समाज होता क्या है? और इसमें मिलके आप कैसे सरकार का सहयोग कर सकते हो और सरकार और नागरिक समाज के बीच इससे सहयोगात्मक मॉडल विकसित होगा। तो निष्कर्ष में क्या लिखोगे? क्योंकि नागरिक समाज लोकतंत्र की आत्मा और शासन की रीड है। यह सरकार और नागरिक के बीच पुल का कार्य करती है और समाज में समानता, न्याय, अधिकार की रक्षा करती है और जन सहभागिता को भी बढ़ाती है। तो यदि नागरिक समाज सशक्त होगा, स्वतंत्र होगा, सक्रिय होगा तो शासन ऑटोमेटिकली ही पारदर्शिता होगा, उसमें जवाबदेही होगा और जन की भागीदारी। तो क्वेश्चन नंबर 10 हमारा है कि दिल्ली का भागीदारी मॉडल और समुदाय की सहभागिता शासन और जवाबदेही को कैसे मजबूत करती है? उदाहरण सहित बताना है आपको। तो दिल्ली का एक सहभाग भागीदारी मॉडल है और सामुदायिक सहभागिता इसके बारे में बताना है कि ये जवाबदेही को कैसे सुनिश्चित करती है सरकार के प्रति। तो भूमिका से स्टार्ट करें तो भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। जहां शासन जो है वह केवल सरकार की जवाबदेही तक ही नहीं सीमित रहती है बल्कि नागरिक की जो सक्रिय भूमिका है उस पर भी निर्भर करती है। तो नागरिक अगर सशक्त होंगे सक्रिय होंगे तो लोकतंत्र भी मजबूत होगा। लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यह है कि शासन लोगों के लिए लोगों द्वारा और लोगों का ही होना चाहिए। हालांकि व्यवहारिक स्तर पर सरकार और जनता के बीच दूरी बढ़ती गई है। जिससे नीतियां, योजना और उसको लागू करने में कई समस्याएं आई है। इस पृष्ठभूमि में नागरिक की भागीदारी और अवधारणाएं सामने आई है। तो दिल्ली का जो भागीदारी मॉडल है, भारत के शहरी शासन का एक ऐतिहासिक प्रयास माना जाता है। से यह मॉडल जनता, सरकार, प्रशासनिक संस्था और स्थानीय निकाओं के बीच साझेदारी को बढ़ावा देता है ताकि शासन जो है वो अधिक पारदर्शी बने, जवाबदेह बने, सहभागी हो। ठीक है? तो भागीदारी मॉडल की अवधारणा क्या है? तो भागीदारी मॉडल 1998 में दिल्ली सरकार द्वारा शुरू किया एक प्रशासनिक सुधार कार्यक्रम था। जिसका उद्देश्य था कि शासन में नागरिक के निर्णय को शामिल करा जाए। उनकी बातों को सुना जाए। सेवा वितरण प्रणाली को अधिक पारदर्शी और जवाबदेही या बनाया जाए। सरकारी विभाग और नागरिक समूह के बीच सहयोग को बढ़ावा देना। तो यह इस सिद्धांत पर आधारित था। ठीक है? तो सरकार अकेले शासन नहीं कर सकती। शासन तभी सफल होगा जब नागरिक उसमें भागीदारी लेंगे। अपने विचार को रखेंगे। तो भागीदारी मॉडल की शुरुआत और उसके ऐतिहासिक संदर्भ को जाने तो 1990 के दशक में दिल्ली तेजी से शहरीकरण और जनसंख्या वृद्धि का सामना कर रहा था। ठीक है? तो इसमें सफाई व्यवस्था कमजोर हो रही थी। यातायात प्रबंधन भी अच्छा नहीं था। प्रदूषण भी बढ़ रहा था। अभी भी बढ़ रहा है। सरकार विभागों में भ्रष्टाचार और जवाबदेही की बहुत ज्यादा कमी थी। तो जनता और प्रशासन के बीच संवाद की कमी में असंतोष बढ़ा हुआ था। ऐसे समय में तात्कालीन मुख्यमंत्री जो उस समय की थी शीला दीक्षित उसने प्रशासनिक सुधार के रूप में भागीदारी मॉडल को लांच किया था दिल्ली में। भागीदारी मॉडल का उद्देश्य था कि शासन में पारदर्शिता को लाना। शासन में जवाबदेही को बढ़ाना। नागरिक को निर्णय को अपने कानूनों में अपने जो भी कानून बना रहे हैं उसमें शामिल करना। सरकारी सेवाओं में गुणवत्ता सुधार करना। स्थानीय समस्याओं को स्थानीय स्तर पर ही हल कर देना। इसकी कार्यप्रणाली कैसी थी? कैसे काम करता था यह? तो भागीदारी मॉडल जो है वह समूह का निर्माण करता था। इन समूह में कौन-कौन आते थे? इसमें आते थे आर डब्ल्यूए के मतलब रेजिडेंस वेलफेयर एसोसिएशन, व्यापारी संघ आते थे। मार्केट एसोसिएशन, स्कूल प्रबंधन की समितियां, पर्यावरण, जल और महिला समूह इन सबको इसमें शामिल किया गया था। परीक्षण और वर्कशॉप कराया जाता था। यानी सरकार द्वारा बजट प्रक्रिया को समझ सके। ऐसा बनाया जाता था। शहरी प्रशासन की नीतियों को जान सके। निगरानी और शिकायत पे प्रबंधन कर सके। विभागीय समन्वय कराया गया था। यानी मॉडल में कई विभाग शामिल थे। जैसे कि पब्लिक वर्क डिपार्टमेंट को, मुनिसिपटी कॉरपोरेशन को, दिल्ली ट्रांसपोर्टेट कॉरपोरेशन को, जल बोर्ड को और दिल्ली पुलिस को इसमें शामिल किया गया था। इसका समाधान आधारित चर्चा क्या थी कि भागीदारी मॉडल की क्या-क्या उपलब्धियां थी? तो नागरिक जागरूकता इससे बढ़ी थी। नागरिक अधिकार, नीति प्रक्रिया, बजट कैसे बनता है? कानून के प्रति जागरूक ये लोग हो गए थे। सेवा में सुधार हुई थी। सड़क, पानी, पार्क भवन कुछ हद तक अच्छे हुए थे। भ्रष्टाचार में कुछ हद तक कमी हुई थी। सरकार, नागरिक का विश्वास बढ़ा था एक दूसरे पे। तो नागरिक भागीदारी का शासन और जवाबदेही का प्रभाव, शासन अधिक लोकतांत्रिक हुआ इससे क्योंकि जनता का भागीदारी था इसमें। जवाबदेही प्रणाली मजबूत हुई। इससे स्थानीय समस्याओं स्थानीय समस्याओं का तेज समाधान होने लगा। जैसे कि सड़क, पानी, कचरा प्रबंधन जैसी समस्या स्थानीय स्तर पर ही हल होने लगी। पारदर्शिता में भी सुधार हुआ। शासन की प्रक्रिया खुली हो गई। स्पष्ट हो गई। लोगों के सामने आ गई। तो मॉडल की आलोचना भी होती है इस मॉडल की। इस मॉडल की आलोचना यह है कि प्रतिनिधित्व समिति इसमें कम था। केवल मा मध्यम और उच्च वर्ग के ही लोग इसमें शामिल थे। जुग्गी और गरीब वर्ग के लोगों को इसमें शामिल नहीं किया गया था। निर्णय की शक्ति बहुत ज्यादा कम थी। भागीदारी समूह की भूमिका सलाहकार तक ही सीमित थी। निर्णय जो है वो अधिकतर बहुत ज्यादा कम लोगों द्वारा लिए जाते थे। राजनीतिक हस्तक्षेप भी था। कुछ मामले में राजनीतिक प्रभाव देखने को मिलता था। निरंतरता की समस्या भी देखने को मिलती थी। सरकारी जो मॉडल है उसका प्रभाव धीरे-धीरे इसमें कम होने लगा। अन्य शहर ने पर इसका प्रभाव यह पड़ा कि इस मॉडल को अपनाया कर्नाटक में जन भागीदारी मॉडल को अपनाया। महाराष्ट्र में दूसरे नाम से मोहल्ला समिति सिस्टम के नाम से इसे अपनाया गया। केरल का पीपलस प्लानिंग मॉडल के नाम पे इसे अपनाया गया। तो कहीं ना कहीं यह प्रभाव छोड़ता है। ठीक है? तो दिल्ली का जो भागीदारी मॉडल है उसने भारतीय शासन में एक महत्वपूर्ण सामाजिक और राजनीतिक प्रयोग रहा है जिसने यह सिद्ध किया है कि जब जनता शासन में भागीदार बनती है एक्टिव रहती है तब प्रशासन बहुत ज्यादा मजबूत हो जाता है उत्तरदायित हो जाता है और लोकतांत्रिक हो जाता है क्योंकि लोग इसमें एक्टिव सक्रिय रहते हैं तो हालांकि इस मॉडल में कुछ सीमाएं थी लेकिन इसमें भारत में सहभागी शासन की नीव तो रखी है तो नागरिक केंद्र प्रशासन की दिशा में यह एक ऐतिहासिक कदम रहा है। आई होप आपको यह समझ आया हो। तो यहां पे होता है आपका पूरा सिटीजनशिप एंड गवर्नमेंट्स का इंपॉर्टेंट क्वेश्चन विद आंसर्स खत्म। सारे क्वेश्चन जितने भी इंपॉर्टेंट बनते थे आपके यूनिट वाइज वो मैंने आपको इसमें करा दिया। सो आपको ये वीडियो दो बार देखनी है। यूनिट्स पढ़नी है। देन आपको पीडीएफ को बाय करना है। और एक बार पीडीएफ को आप अपने से भी पढ़ना तो आपको समझ आएगा। ठीक है? सो वीडियो अगर आपको अच्छी लगी हो वीडियो को लाइक कीजिए, सपोर्ट कीजिए।

More transcripts

Browse all transcripts

Finding this tool useful? Bookmark us (cmd+D) for easy and fast access!