0:00 यूपीपीसीएस प्री में जितना टाइम बचा हुआ है अगर आपको एक्चुअली में कट ऑफ निकालना है तो ट्राइड एंड टेस्टेड फार्मूला यूज़ करो। एससीएस का कंपाइलेशन लिस्टिंग जो हमने अपडेट और रिवाइज करके दिया है सिर्फ उससे पढ़ाई कर लो। उसके साथ हमारा करंट अफेयर लगा लो। नवंबर 2025 से लेके अभी तक का पूरा मिसलेनियस पापा जो हम देंगे वो जो है पढ़ लेना। इकोनमी पापा वीडियो बजट पापा वीडियो विडो ये पढ़ाई वाला काम हो गया। और इसके साथ एससीएस की पेड क्वज़ और एसएस की टेस्ट सीरीज़ लगा लो। ये तीन चीज करके चाहे जैसा पेपर आ जाए ईजी मॉडरेट टपटिकल कॉन्सप्चुअल फ़क्चुअल हिंदी हर हाल में कट ऑफ आपका आराम से निकल सकता है क्योंकि ये तीनों चीज मिला के लगभग 130 से 135 क्वेश्चन आ जाते हैं भाई कट ऑफ के लिए ज्यादा से ज्यादा 90 95 भी अगर सही हो गए तो आराम से कट ऑफ निकल जाता है। एक और चीज है कि भाई एससीएस की जो टेस्ट सीरीज होती है ना उसमें हम उसी तरह के क्वेश्चन बनाते हैं जैसे आजकल पूछे जा रहे हैं नए डायनेमिक पैटर्न में और जैसे पूछे जा सकते हैं आजकल यूपीएससी 2026 के बाद तो जरूर इसमें ध्यान दें कि क्वेश्चन की प्रैक्टिस सिर्फ ऐसे क्वेश्चन से करें जो एक्चुअली जैसे आ सकते हैं आसान क्वेश्चन ईजी क्वेश्चन लगाने से कभी कठिन क्वेश्चन सॉल्व नहीं होंगे। कठिन अगर क्वेश्चन आ रहे हैं एग्जाम में तो कठिन क्वेश्चन की ही टेस्ट सीरीज लगानी पड़ेगी जो सिर्फ 1:00 स्टडी फॉर सिविल सर्विज में आपको मिल सकती है। हमारी टेस्ट सीरीज आप ऐप से ज्वाइन कर सकते हैं। उसको लगाएं पूरा इवन आप हमारी टेस्ट सीरीज और पेड क्विज दोनों ऐप से भी मिल जाएगी। Telegram में भी मिल जाएगी। सिर्फ टेस्ट सीरीज और अगर पेड क्विज भी लगा लें आप ना तो भी कम से कम 50% सवाल आपका पीसीएस प्री का सही। तो अंततः हम लिस्टिंग का वीडियो लेकर प्रस्तुत हैं। पर्यावरण और पारिस्थितिकी छोटा सा टॉपिक। अगर बाकी विषयों को आप जनरल स्टडी के देखेंगे तो उसकी तुलना में पर्यावरण और पारिस्थितिकी यानी एनवायरमेंट और इकोलॉजी यह सबसे छोटे दायरे में सिमटा हुआ होता है। करंट अफेयर इसका एक मेजर पोर्शन है लेकिन जो स्टैटिक पार्ट है वो सीमित है। सीमित चीजें पढ़कर कम मात्रा में चीजों को पढ़कर आप ज्यादा से ज्यादा प्रश्नों को सही कर सकते हैं। करंट अफेयर आपको वैसे भी पढ़ना है। उसे आप इग्नोर करके जा नहीं सकते। छोड़कर जाने का विचार तो है नहीं करंट अफेयर को। तो वो पढ़ेंगे तो उसमें पर्यावरण और पारिस्थितिकी से जुड़े हुए जितने लेटेस्ट चीजें हैं जितने लेटेस्ट मुद्दे हैं वो कवर हो जाएंगे। बाकी स्टैटिक पार्ट इसका बहुत ज्यादा नहीं 2:00 होता है। तुलनात्मक रूप से बाकी विषयों के तो ये आसान चीज है। [गला साफ़ करने की आवाज़] जो चीज आसानी से कवर हो जाए और ज्यादा से ज्यादा उसका आउटपुट आपको मिले। ज्यादा से ज्यादा बेनिफिट मिले वह आपको सबसे पहले खत्म करनी चाहिए। ठीक है? तो पर्यावरण और पारिस्थितिकी उन्हीं मुद्दों में से उन्हीं विषयों में से एक। लिस्टिंग का यह वीडियो है। लिस्ट यानी पूरी सूची और सूची किस चीज की? तो तथ्यों की तथ्य यानी फैक्ट पर्यावरण पारिस्थितिकी से जुड़े हुए जितने भी हैं जितने आवश्यक हैं वैसे तो बहुत सारे हैं लेकिन जितने आवश्यक है और जितने स्टैटिक पोर्शन में आपको कवर करके जाने चाहिए वो सब यहां मौजूद है। कंपाइलेशन का अलग से आएगा। कांसेप्ट वहां पर क्लियर हो जाएगा जो फैक्ट है यहां पर आप उसे रट लीजिएगा। तो ये एक तरह से रटने वाला काम है इस वीडियो में और कुछ नहीं है। कांसेप्ट है लेकिन उतने नहीं है। कंपाइलेशन में आपको डिटेल वही चीजें मिलेंगी। तो उसकी चिंता मत करिए। उसका वीडियो अलग आएगा। पहले इसको देख लीजिए। जितने फैक्ट है उनको समेट लीजिए। हिंदी माध्यम में है लेकिन लिस्ट में या फिर किसी फ़क्चुअल चीज में क्या हिंदी और क्या अंग्रेजी वही स्थान का नाम, वही बायोस्फीयर रिजर्व, वही सारी चीजें आप 3:02 हिंदी में भी देखेंगे। वही सारी चीजें अंग्रेजी में देखेंगे। भाई किसी लोकेशन का नाम ट्रांसलेट तो आप कर नहीं सकते। तो ज्यादातर चीजें आपको आसानी से समझ में आ जाएंगी। आप माध्यम किसी भी किसी भी माध्यम के हो इससे फर्क नहीं पड़ता है। अगर आप हमारे पेड कोर्सर्सेस की जानकारी चाहते हैं तो तीन-तीन नंबर दिए हैं भाई। आप किसी पर भी संपर्क कर लीजिएगा। इन नंबरों पर आप फोन कर सकते हैं और ये नंबर सर का है तो इस पे आप सिर्फ WhatsApp कर सकते हैं। फोन करेंगे तो कोई जवाब नहीं मिलेगा। ठीक है? आगे चलते हैं। तो असली बात शुरू होती है यहां से। हर बार जब आप पर्यावरण पढ़ना शुरू करते हैं तो ये प्रश्न उठता है कि पर्यावरण असल में है क्या? तो वैसे तो एनवायरन एनवायरमेंट एनवायरमेंट जो शब्द है अंग्रेजी का है ना तो उसका यहां ट्रांसलेशन किया गया है कि भाई एनवायरोन जो है वो एक फ्रांसीसी भाषा का शब्द है। पर्यावरण से उसका कोई ताल्लुक नहीं है। पर्यावरण एक शुद्ध हिंदी का शब्द है जो कि संस्कृत से आया हुआ है। तत्सम लेकिन इनवायरोन जो है ये फ्रांसीसी शब्द है। इनवायरोन का मतलब होता है घेरना। वैसे ही हिंदी में परी का मतलब होता है घेरना। परी मतलब चारों ओर। परी शब्द जो है ये परिधि 4:04 से बना हुआ है। वृत्त जब आप पढ़ते हैं ना रेखा गणित में ज्यामिति पढ़ते हैं ज्योमेट्री उसमें वृत्त बनाते हैं। बीच में एक केंद्र होता है। आपको एक निश्चित त्रिज्या यानी रेडियस मिल मिलती है। मान लीजिए 5 सें.मी. 3 सें.मी. आप गोला प्रकार उठाते हैं। ठीक है? जो लंगड़ा प्रकार कहा जाता है। एक पैर उसका आधा ही होता है। ठीक है? उठाते हैं और केंद्र पर ऐसे उसकी सुई रखकर घुमा देते हैं। पेंसिल उसके दूसरे हिस्से में लगी होती है। और जो चीज बनती है जो आकृति आपके सामने बनकर आती है वो वृत्त होती है। अब वृत्त का जो ये दायरा है ये घेरा है इसी को कहा जाता है परिधि। ठीक? एक केंद्र को उसके चारों ओर ये दायरा घेर रहा है और यही जो दायरा है ये जो आवरण एक तरह का है इसको परिधि कहा जाता है। और उसी से यह परी शब्द निकाला गया है। परी का मतलब होता है चारों ओर। वैसे ही एनवायरून का मतलब होता है घेरना। ठीक। और पर्यावरण शब्द को अगर आप देख रहे हैं तो परी के साथ एक और चीज जिसमें संधि विग्रह आप करते हैं ना तो परिधन आवरण। परिधन आवरण। आवरण मतलब ढक्कन। किसी चीज के ऊपर अगर आवरण पड़ा है 5:05 तो आप उसे उठाकर मतलब आवरण को हटाएंगे तभी उस चीज का दर्शन होगा। अदरवाइज वो चीज ढकी हुई है, सुरक्षित है। जैसे आपने फोर व्हीलर खरीदी या टू व्हीलर है आपकी। धूल मिट्टी पड़ रही है, धूप से खराब हो रही है, बारिश का पानी उस पर जा रहा है। आप एक वाटर प्रूफ उस पे कवर डाल दीजिए। ठीक? अब क्या हुआ? वो आवरण उसकी रक्षा करेगा। वो कवर उसकी रक्षा करेगा। ऐसे ही बहुत सारी चीजों को आप आवरण पहना कर रखते हैं। आप खुद धूप में निकलते हैं तो ऊपर से सर ढक कर जाते हैं या छाता लगा कर जाते हैं तो वो भी क्या है? आवरण है। ठीक वैसे ही हमारे चारों ओर भी एक आवरण मौजूद है। हमारे का मतलब यहां पर समस्त जीव जाति से है। समस्त प्राणियों से है। सारे जितने भी प्राणी पृथ्वी पर मौजूद हैं इस जैवमंडल में। जैवमंडल आगे का शब्द है लेकिन यहां इस्तेमाल किया। तो उन सभी जीवों के चारों ओर एक आवरण मौजूद है जो कि बाहरी प्रकोपों से बाहरी जो आपदाएं हैं या बाहरी जो विसंगतियां हैं उनसे उनकी रक्षा करता है। और वही जो आवरण है उसको हम पर्यावरण कहते हैं। ये एक ऐसा आवरण है जो ना सिर्फ आपको ढकता है बल्कि आपको पोषित करता है। आपको खाने पीने के लिए चीजें उपलब्ध कराता है। 6:06 आपको रहने के लिए आवास देता है। यही आपका आवास है। यही आपकी आजीविका है। यही आपका सब कुछ है। और यही आपका रक्षक भी है। प्रोटेक्टर भी है। ठीक है? तो यही चीज कहलाती है पर्यावरण और मजे की बात यह है कि यह दुष्ट स्वार्थी मनुष्य जो है क्षमा कीजिएगा शुरुआत में ही इतने अभद्र शब्दों का इस्तेमाल किया लेकिन यह मनुष्य ऐसा है कि अपने इसी आवरण को खाता जा रहा है। बाकी कोई ऐसा गद्दार प्राणी नहीं है जो कि अपने ही खोल को काट कर कुतर कर चूहों की तरह उसमें छेद बना डाले। लेकिन मनुष्य की फितरत ऐसी है कि वो करता है ऐसा। लोग कहेंगे कि मैम जी भाषण दे रही हूं। नहीं भाषण नहीं दे रहे हैं। लेकिन पर्यावरण आप बार-बार पढ़ते हैं तो उसका अर्थ ही क्या है? जब आप उसकी गहराई ना समझ सके। चलिए तो यहां देखिए एनवायरन का मतलब होता है घेरना। किसको घेरना? तो जो जैविक घटक है, अजैविक घटक है, सबको चारों ओर से घेर कर प्रोटेक्ट करना, सुरक्षित रखना। ठीक है? अब आगे चलते हैं। जीवन और विकास की संभावनाएं इसी घेरे में संभव हो पाती है। अगर यह घेरा नहीं होता तो जीवन नहीं होता। दूसरा मामला है विश्व पर्यावरण दिवस का। 7:07 तो भाई विश्व पर्यावरण दिवस जो है यह स्टॉकहोम कन्वेंशन जो हुआ था, स्टॉकहोम सम्मेलन हुआ था, उसी की वर्षगांठ के तौर पर सेलिब्रेट किया जाता है। तो 1972 का जो स्टॉकहोम सम्मेलन था ये हुआ था स्वीडन में। ठीक है? जगह दी हुई है स्वीडन। याद रखिएगा। और पहला पर्यावरण दिवस मनाया गया उसके ठीक अगले साल जब तय किया गया ये जो स्टार होम सम्मेलन है ना यहां तय किया जाता है कि अब जब भी अगले बार ये तारीख आएगी 5 तारीख 5 जून की तारीख 5 जून से लेकर वो चलता है कुछ दिनों तक तो 5 जून की तारीख जब अगले साल आएगी या उसके अगले साल आती रहेगी तो उसमें हम वर्षगांठ इसकी मनाएंगे सेलिब्रेट करेंगे जैसे आप अपना जन्मदिन मनाते हैं ना या कोई दिवस मनाते हैं बिल्कुल वैसे ही तो अगले साल 5 जून 1973 यानी ये तारीख देख रहे हैं तो इसमें पहला पर्यावरण दिवस मनाया जाता है और पहली थीम इसकी थी केवल एक पृथ्वी। केवल एक पृथ्वी ओनली वन अर्थ। ठीक है? आगे देखिए यूएईपी यानी यूनाइटेड नेशन एनवायरमेंटल एनवायरमेंट प्रोग्राम। ये देखें संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम 8:08 जो है इसकी स्थापना हुई 1972 में। सब वही 73 72 के आसपास के हैं। जो सम्मेलन हुआ था स्टॉकहोम में उसी का परिणाम था कि इसकी स्थापना होती है। मुख्यालय इस पर्यावरण कार्यक्रम का नैरोबी में है। नैरोबी अर्थात केन्या में। इसके बाद थोड़ा सा अपने देश में आते हैं। ये तो पूरी दुनिया की बात हो रही है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 बार-बार इससे दोहराद दोहरा कर प्रश्न पूछे जाते हैं। तो थोड़ा ठीक से इसको पढ़ लीजिएगा। 1984 में जब भोपाल गैस कांड होता है, रातोंरात जब फैक्ट्री में रिसाव शुरू होता है, कार्बाइड की फैक्ट्री रहती है। रिसाव वहां शुरू होता है, लीकेज शुरू हो जाता है और प्लांट के फटने का ब्लास्ट होने का वहां खतरा उत्पन्न हो जाता है। तो तय होता है कि भाई वहां से गैस को रिलीज़ कर दो ताकि प्रेशर कम हो जाए और ये जो खतरा है उसको टाला जा सके। लेकिन समस्या ये रहती है कि जो गैस वहां से रिलीज़ होती है वो इतनी ज्यादा और पूछा जाता है कौन सी गैस रिलीज़ होती है। है ना? तो कुल मिलाकर वहां से रिलीज होने के बाद वो गैस कितनी तबाही फैलाएगी ये जानते थे वहां पर जो लोग थे फैक्ट्री के मालिक थे या जो जितने 9:09 विशेषज्ञ थे चेतावनी भी जारी होती है लेकिन रात का समय रहता है और वो चेतावनी जब तक लोगों तक पहुंचती है उससे पहले गैस पहुंच जाती है और इतनी भारी तादाद में लोग मरे थे गिनती सरकारी आंकड़ों में कम आपको दिखाई देती है लेकिन असल मौतें और असल जो लोगों कीिंदगियां गई थी और बर्बाद हुई थी उससे ज्यादा वो कहीं मतलब भारी मात्रा में थी तो उसके बाद यह चर्चा उठती है कि ऐसी विनाशकारी चीज पर अंकुश होना चाहिए और अंकुश होना चाहिए तो संविधान का जो अनुच्छेद है 253 उसका इस्तेमाल करके यह अधिनियम पास किया गया और इसमें बहुत सारे प्रावधान है। इसको छाता विधान यानी अंब्रेला लेजिसलेशन कहा जाता है। पर्यावरण शिक्षा केंद्र की बात करें तो इसका जो मुख्यालय है ये अहमदाबाद में है यानी गुजरात में स्थापना इसकी अगस्त 1984 में ही हुई थी। पर्यावरण में हम संरक्षण की बात करते हैं और पूरी दुनिया पर्यावरण के संरक्षण की बात कर रही है। लेकिन हमारा जो संविधान है उसमें पर्यावरण संरक्षण की चर्चा पहले से ही मौजूद है। भले ही हम उसको नजरअंदाज कर दे और अपने फायदे की चीजों को सिर्फ देखें। लेकिन मौजूद है उसमें बातें जैसे। आप 10:11 देखें। सबसे पहले तो 48 ए यह जो संविधान का अनुच्छेद आर्टिकल नंबर 48 ए है यह नीति निर्देशक तत्वों के अंतर्गत आने वाला आर्टिकल है और इसमें कहा गया कि राज्य के द्वारा पर्यावरण की यानी जो हमारे चारों ओर की पारिस्थितिकी जीव जाति हैं या वनस्पतियां है या समूचा पर्यावरण है उसकी रक्षा का प्रयास किया जाना चाहिए। यह राज्य का कर्तव्य है और उसके बाद नागरिक कर्तव्य भी है। मौलिक कर्तव्य में भी उसका वर्णन है। 51 ए का जो क्लॉज़ जी है उसमें नागरिकों के कर्तव्य के अंतर्गत भी पर्यावरण की रक्षा को जोड़ा गया है। नागरिकों के कर्तव्य में बहुत सारे कर्तव्य गिनाए गए हैं। बस दिक्कत ये है ना कि इसे बाध्यकारी नहीं बनाया गया है। मतलब नागरिक नागरिकों के ये कर्तव्य हैं। आपको इस कर्तव्य का पालन करना चाहिए। अगर आप भारत के नागरिक हैं। लेकिन आपके ऊपर कोई ऐसी गला दबाने वाली जबरदस्ती नहीं है कि आप पालन करिए ही। लेकिन असल में अगर आज के परिप्रेक्ष को देखा जाए और लोगों की फितरत प्रवृत्ति को देखा जाए तो यह जो मौलिक कर्तव्य हैं इनको अनिवार्य बना देना चाहिए। जैसे रूस में कुछ हद तक जो मौलिक कर्तव्य हैं उनकी 11:12 अनिवार्यता है और ये वहीं से ये प्रेरित भी हैं सोवियत संघ से रूस आज वाला नहीं पहले का जो सोवियत संघ ठीक है? तो ये जो नागरिक कर्तव्य हैं इनको कंपलसरी बना देना चाहिए। सभी को ना भी बनाए तो जो प्रकृति की रक्षा वाला है, पर्यावरण की रक्षा वाला है, देश की रक्षा वाला है, जीव जातियों की रक्षा वाला है उन सब को अनिवार्य बना देना चाहिए। ठीक बात है? आगे चलते है। 42वां संविधान संशोधन अधिनियम जो है 1976 द्वारा ये जोड़ा गया था। मतलब बताया जा रहा है मौलिक कर्तव्य कब जोड़ा गया था? तो वो तो पॉलिटी में आप वैसे भी कवर कर चुके हैं। यहां पर सिर्फ इतना जानना है कि पर्यावरण से संबंधित कौन-कौन से आर्टिकल संविधान में मौजूद है। बाकी हमें पूरी राज्य व्यवस्था से यहां मतलब नहीं। तो पर्यावरण कई प्रकार का होता है। मनुष्य के दृष्टिकोण से देखा जाए तो तीन प्रकार का होता है। भौतिक, अजैविक। ठीक है? जिसमें स्थलमंडल, जलमंडल, वायुमंडल आते हैं। जैविक पर्यावरण होता है जिसमें हम लोग आते हैं। बाकी प्राणी आते हैं और वनस्पतियां आती है। इसके अतिरिक्त एक और पर्यावरण की वैरायटी होती है। ये है अपना सांस्कृतिक पर्यावरण जिसमें कि धार्मिक, पारिवारिक, 12:12 शैक्षिक, सामाजिक ये सारी प्रणालियां, सारा सिस्टम कवर होता है। तो हमने चर्चा की स्थलमंडल, जलमंडल और वायुमंडल की। स्थलमंडल मतलब पृथ्वी का 29 फीसदी हिस्सा। 29% भाग जो है ये स्थलमंडल है यानी जमीन है। आप वैसे भी जानते हैं कि पृथ्वी हमारी अंतरिक्ष में देखने पर अंतरिक्ष में कहीं भी किसी ग्रह से या किसी स्पेस स्टेशन से आप देखते हैं नीले रंग की दिखाई देती है। उसका ज्यादातर हिस्सा नीला चमकीला गेंद की तरह से दिखाई देती है। उसके पीछे वजह है इसके सरफेस पर ढेर सारा पानी। तो पानी ही ज्यादा है। भले ही पीने लायक ना हो, इस्तेमाल के लायक ना हो। महासागरों में भरा हो खारा पानी। लेकिन पानी की तादाद बहुत ज्यादा है। उसकी तुलना में जमीन यानी स्थल खंड काफी कम। तो वही चीज है। 29% हिस्सा सिर्फ जमीन है। बाकी जो है जलमंडल है और बहुत सारा है। अभी आगे देखेंगे। हां पृथ्वी तीन परतों से बनी हुई है। तीन परतें सियाल, सीमा और निफे। निफे सबसे अंतिम बीच वाली परत है। मतलब केंद्र है उसका कोर जिसे आप कहते हैं। और बाकी ऊपरी परत जो परपटी कहलाती है यानी क्रस्ट कहलाती है। वो सियाल है यानी सिलिकॉन और 13:13 एल्युमिनियम उसमें पाए जाते हैं मूल रूप से। बीच का जो हिस्सा है सिलिकॉन और मैग्नीशियम वाला वो असल में सीमा है यानी उसे आप मध्य भाग अर्थात मेंटल कहते हैं। अब मेंटल जो है वो वास्तव में मेंटल है। कहने का मतलब ये है कि उसके अंदर केमिकल कॉम्बिनेशन बड़े विचित्र हैं। बहुत तरह की बहुत तरह के तत्व पाए जाते हैं और बहुत तरह की पदार्थों की अवस्थाएं भी पाई जाती है। ये बीच का हिस्सा है ना? अंदर कोर है। और उसके बाद ऊपर हमारी क्रस्ट है। क्रस्ट मूल रूप से पत्थर है। और पत्थर किस तरह का है? है वही सिलिकॉन और एलुमिनियम का मिक्सचर है। लेकिन बीच का जो हिस्सा जो सैंडविच बीच में हो गया है ये चौड़ा भी काफी है। असल में इसमें बहुत तरह के रसायनों का समायोजन होता है। ठीक? अब आगे चलते हैं। ये निफे जो है इसमें ऊपरी हिस्सा मतलब कोर की बात हो रही है। तो कोर का जो आउटर पार्ट होता है, आउटर कोर होती है, बाहरी कोर होती है। वो कैसी होती है? लिक्विड स्टेट में है मतलब जेली जैसी है और एक दिशा में निश्चित गतिमान है। गोल-गोल घूम रही है। जिससे कि इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड जनरेट होता है जो कि पृथ्वी के चारों ओर एक चुंबकीय क्षेत्र बनाता है और पृथ्वी को प्रोटेक्ट करता है बाहरी जो आपदाएं हैं उनसे मतलब 14:15 सेलेस्टियल जितनी चीजें आती है बाहर से चाहे वो सूर्य का विकिरण हो या अन्य चीजें हो उनसे प्रोटेक्ट करता है। तो ये घूम रहा है लिक्विड और एकदम बीच का जो केंद्र है वो पूरी तरह से ठोस है। तो ये संरचना हमारी पृथ्वी की है। स्थलमंडल की चर्चा हो रही थी, इसलिए इसमें यह जिक्र किया गया कि समूची पृथ्वी है कैसी? बाकी जलमंडल कैसा है? तो जलमंडल में पृथ्वी की सतह पर नीचे और ऊपर मौजूद सारा पानी कवर होता है। सिर्फ हम महासागरों की बात नहीं करते जब हम जलमंडल की चर्चा करते हैं। उसमें जितना भी प्रकार का पानी हो सकता है मतलब जल हो सकता है। उसमें से बहुत सारे जल के स्रोत या जल का स्वरूप ऐसा है जो कि चट्टानों के साथ या अन्य जो भौतिक तत्व है उनके साथ बंधा हुआ है। यानी वो मुक्त अवस्था में नहीं पाया जाता है और ना हम उसे मुक्त अवस्था में प्राप्त करके अभी जो हमारे पास टेक्नोलॉजी उपलब्ध है इस्तेमाल कर सकते हैं। नहीं कर सकते है ना। तो कुल मिलाकर सारे ही प्रकार का जितने भी प्रकार का जल का जल राशि मौजूद है, जल का भंडार मौजूद है, सबको हम जलमंडल में कवर करते हैं। 71% हिस्सा पृथ्वी की जो सतह है, पृथ्वी की जो 15:15 सतह है, उसका 71% हिस्सा पानी से ढका हुआ है। और पृथ्वी के कुल सतह क्षेत्रफल का यानी जो सरफेस एरिया है उसका लगभग 5. 10 मिलियन वर्ग कि.मी. ठीक है? 510 मिलियन स्क्वायर किलोमीटर जिसमें से कि पानी लगभग 361 मिलियन किलोमीटर है। मतलब कुल सतह का क्षेत्रफल पृथ्वी का कितना है? 510 है और उसमें से भी पानी वाला जो हिस्सा है वो 361 है। अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि बचा ही कितना। है ना? अब नंबर आता है इसके बाद वायुमंडल का। पृथ्वी के चारों ओर गैसों का आवरण है। ये सौभाग्य की बात है। हर सेलेस्टियल बॉडी के चारों ओर ये गैसों का आवरण यानी वायुमंडल हो यह आवश्यक नहीं। सबसे बड़ी सौभाग्य की बात तो यह है और अच्छी चीज है कि यह गैसों का आवरण जीवन के लिए अनुकूल है जो कि और किसी ग्रह के पास ऐसा नहीं है। बहुत से ग्रह हैं जिनका कि वायुमंडल है लेकिन जीवन के लिए अनुकूल परिस्थितियां नहीं है। वह सिर्फ पृथ्वी के पास है। कम से कम अभी तक जितने ज्ञात ग्रह और जो पिंड है हमें मालूम हुए हैं मतलब 16:16 जिन पर रिसर्च हुई। ठीक है? ठीक है? तो ये जो गैसों का आवरण है ये मूल रूप से पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण की वजह से है। अब आप सोच रहे होंगे कि पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण ही इतना पावरफुल कैसे हो गया? बाकी जो ग्रह हैं उनके पास भी होना चाहिए और होता भी है। ये तो द्रव्यमान पर निर्भर करता है। है ना? तो बृहस्पति के पास सबसे ज्यादा गुरुत्वाकर्षण है। लेकिन बृहस्पति के ऊपर तो आंधियां चल रही है। असल में मैटर ये नहीं करता है कि आपके पास गुरुत्वाकर्षण कितना है और कितना द्रव्यमान है। वो तो ठीक है कि वो गैसों को बांध कर रखेगा। तो बृहस्पति के चारों ओर भी उसका वायुमंडल। लेकिन जीवन जीने के लिए अनुकूल जो गैसें चाहिए कार्बन डाइऑक्साइड चाहिए, ऑक्सीजन चाहिए, नाइट्रोजन भी कुछ हद तक चाहिए। बाकी जो छोटी छोटी मात्रा में हमारे वायुमंडल में उपस्थित गैसें होती हैं वो सब भी चाहिए। ठीक है? सबका समायोजन हमें जीवित रहने के काबिल बनाता है या जीवन के लिए अनुकूल परिस्थिति बनाता है। तो वो सारी उन ग्रहों के पास नहीं है। जो जो भी है उनके पास नहीं है। ठीक है? तो कुल मिलाकर गुरुत्वाकर्षण के बल पर यह पूरा जो वायुमंडल है यह टिका हुआ है और गुरुत्वाकर्षण का केंद्र जैसे-जैसे दूर होता जाएगा वैसे-वैसे प्रभाव भी कम होता 17:18 जाएगा। तो पृथ्वी पता लगा यहां पर है तो गुरुत्वाकर्षण का जो प्रभाव है वो इसी दायरे में ज्यादा रहेगा यानी निचले हिस्से में। तो क्षोभमंडल और समताप मंडल तक तो बढ़िया काम करता है। उसके बाद धीरे-धीरे करके थिन होने लगता है, पतला होने लगता है। क्षीणता इसमें आने लगती है। क्योंकि अब पृथ्वी की पकड़ इन हवाओं के झुंड पर ये जो गैसेस हैं इनके ऊपर कम होने लगती है। कमजोर पड़ने लगती है। तो ये गैसें जो है ना ये बिखरने लगती है। इनके अणु दूर-दूर होने लगते हैं और विलीन होने लगते हैं। आप देखेंगे कि जो सबसे बाहरी हिस्सा है एक्सोस्फीयर जिसे कहा जाता है बहिर्मंडल। उसका बाहरी हिस्सा मतलब उसकी जो आउटर लिमिट है उसका हम पता नहीं लगा पाते। क्योंकि वो अंतरिक्ष में बिखर गया है। ग्रेविटी जहां पर जीरो हुई या जहां से प्रभाव उसका काम करना बंद किया वहीं से वो विलीन हो गया। अंतरिक्ष में कहां विलीन हुआ? उसकी बॉर्डर लाइन खींचना मुश्किल है। तो यही है निश्चित ऊपरी सीमा नहीं है। अच्छा इसके बाद कुछ अजैविक और जैविक तत्व हैं। वही बायोटिक एबायोटिक कंपोनेंट। जो बायोटिक कंपोनेंट है वो सभी आप जानते ही हैं। हम लोग भी उसमें मौजूद हैं। सूक्ष्म जीव भी मौजूद है। बहुत सारे हैं। और बाकी जितने जीव-जंतु हैं वो आते हैं और 18:19 वनस्पतियां अनिवार्य रूप से आती हैं। है ना? अजैविक तत्व वैसे तो जिंदा नहीं होते हैं लेकिन जीवन के लिए अनुकूल दशा बनाने में और यहां तक कि जीवन को उत्पन्न करने में इन्हीं का अभिन्न योगदान है। अगर हम अपने शरीर को देखते हैं या किसी भी जीवित प्राणी के या जीवित जो चीज है उसके शरीर को देखते हैं उसकी संरचना को देखने का प्रयास करते हैं बारीकी से साइंटिफिकली तो हम पाते हैं कि उसमें वही अजैविक घटक हैं जो कि आपस में कॉम्बिनेशन बनाते हैं तो कोशिकाएं बनती हैं। डीएनए बनता है। तमाम चीजें जो हमारे शरीर के अंदर छोटी से लेकर बड़ी तक मौजूद हैं वो सब किससे बनी हुई है? वो सब अजैविक तत्वों से ही बनी हुई है। तो इन अजैविक तत्वों का ही जो समायोजन है यह क्या करता है? यह जीवित प्राणियों का निर्माण करता है। जीवित प्राणी कहीं जादू से नहीं आ गए कि एकदम से ऐसे मंत्र मारा और खड़े हो गए। यह अजैविक तत्वों के ही दुर्लभ संयोजन से बने हुए हैं। और इनका ये दुर्लभ संयोजन हुआ कैसे आखिर? क्यों नहीं है? ऐसे भी हो जाता है कि हम यहां कार्बन रख दे, वहां ऑक्सीजन रख दे, वहां हाइड्रोजन रख दे और अपने आप कोई प्राणी बन जाए। ऐसा नहीं होता है। तो यह दुर्लभ 19:19 संयोजन सूर्य की वजह से हुआ है। सूर्य का प्रकाश ही उस जीवन की संभावना को तराशने का काम करता है। पत्थर सामने है और शिल्पी को बिठा दिया गया। तो शिल्पकार क्या करेगा? उस पत्थर को काट छांट कर मनचाही आकृति उससे निकाल लेगा। तो वह शिल्पी अपने पूरे सौरमंडल में सूर्य है। इसीलिए सूर्य को पिता कहा जाता है भारतीय संस्कृति में। यह हमें आकार देता है। हमें शरीर देता है। ठीक है? और माता है पृथ्वी जहां हमारा पालन पोषण होता है। तो जैव तत्व भाई यहां आध्यात्मिक होने की बात नहीं की जा रही है। अपने अपना जो भारतीय दर्शन है ना वो विज्ञान से गहराई से जुड़ा हुआ है। और थोड़ा सा रुचि लेकर नहीं पढ़ेंगे तो ये तथ्य दिमाग में घुसेंगे भी नहीं। अब आप सोच रहे होंगे कि ये परिभाषा क्यों पढ़ाई जा रही है? तो परिभाषा से संबंधित आपको वन लाइनर ऐसे जो मतलब चार पांच स्टेटमेंट देकर और ट्रू फॉल्स खोजने वाले यानी गलत सही तलाशने वाले जो प्रश्न होते हैं वो दे दिए जाते हैं। तो उसे आप कहां से हल करेंगे? जब तक आपको ये समझ में नहीं आएगा। बाकी डिटेल कंपाइलेशन में होगा। यहां देखिए। अच्छा पर्यावरण की परिभाषा तो आपने देखी। पारिस्थितिकी का जरा देख लीजिए। तो 20:22 पारिस्थितिकी जो है इसमें आप देखें कि जीवो और उनके भौतिक पर्यावरण। पर्यावरण क्या था? जीव को चारों ओर से ढक कर पालने पोसने वाला एक ढक्कन आवरण। और पारिस्थितिकी क्या है? यह जीवों और उनके भौतिक पर्यावरण के बीच के संबंध का वैज्ञानिक अध्ययन है। जो भी जीवित प्राणी हैं उनका अपने आसपास के भौतिक पर्यावरण के साथ, फिजिकल एनवायरमेंट के साथ तालमेल होता है और अगर वो तालमेल ना रहे तो प्राणी जीवित नहीं रह पाएंगे। ये सीधी बात है। तो वह जो तालमेल है वो कैसा है? किस तरह का रिलेशन है? उसको जानने का प्रयास मनुष्य हमेशा करता है। बाकी प्राणी नहीं करते हैं। बाकी प्राणी अपना तालमेल बिठाकर रहते हैं। प्रकृति के हिसाब से रहते हैं। तालमेल ऐसा होता है कि प्रकृति जैसे चलाती है वैसे चलते हैं। प्रकृति को अपने हिसाब से ढालने का प्रयास नहीं करते हैं। लेकिन मनुष्य खुराफाती स्वभाव का है। ज्यादा बुद्धि भी दोष का कारण बनती है। तो वह सोचता है कि भला ऐसा क्यों है? तो वह अध्ययन करने में लग जाता है, रिसर्च करने में लग जाता है और वही रिसर्च रिसर्च की जो विधा है, रिसर्च का जो विज्ञान है, उसी को कहा जाता है इकोलॉजी यानी पारिस्थितिकी। 21:24 तो यह अध्ययन जीवन, पर्यावरण और उनके बीच की जटिल अंतर क्रियाओं को समझने में मदद करता है। तो परिभाषा यह कहती है कि जीवों के पार पारस्परिक या वातावरण के साथ मतलब जीवों का आपसी तालमेल भी होता है। आपस में भी एक दूसरे से लेना देना होता है। ठीक है? तो वह पारस्परिक और वातावरण के साथ उनका जो संबंध होता है उसका जब आप वैज्ञानिक अध्ययन करते हैं उसकी साइंटिफिक स्टडी करते हैं तो वही चीज कहलाती है पारिस्थितिकी यानी इकोलॉजी। अब ये पारिस्थितिकी शब्द और असल में पारिस्थितिकी शब्द नहीं वो तो हिंदी रूपांतरण है। इकोलॉजी शब्द। इकोलॉजी शब्द जो है ये किससे बना हुआ है? यह ओकियोलॉजी से बना हुआ है। कहने का मतलब यह है कि अर्निस्ट हैकेल नाम के जो व्यक्ति थे यह जर्मन साइंटिस्ट हैं और समय था 1866 का। ग्रीक भाषा ये है। ओकियोस का मतलब होता है या ओकियोस कहा जाता है इसे। इसका मतलब होता है घर। ठीक है? घर या फिर रहने का स्थान। और लोगोस का मतलब होता है अध्ययन। तो हम अपने घर के बारे में पढ़ते हैं। अब 22:25 घर के बारे में अगर आपको अपने घर के बारे में रिसर्च करनी हो तब आप क्या करेंगे? वहां रहने वाले सारे परिवार के सदस्य कौन-कौन से हैं? घर का पूरा जो सिस्टम है वह कैसे चलता है? कैसे अर्निंग होती है? कहां से बजट बनता है? और कैसे सामान आता है? कितनी कितने खर्चे में पूरा निपटारा होता है? जो सदस्य हैं उनका आपस में तालमेल कैसा है? आपस में उनका व्यवहार कैसा है? एक दूसरे से उनकी जो गतिविधियां है वो ठीक है या नहीं? किसका किससे ज्यादा गहरा कनेक्शन है? किसका किसके बिना काम नहीं चल सकता है? है ना? कौन सदस्य उसमें कमजोर है? कौन मजबूत है? किसकी क्या खासियत है? ये सब आप अध्ययन करेंगे ना अगर आपको अपने घर पर रिसर्च करने के लिए कह दिया जाए और उतना ही नहीं आप घर जिस जमीन पर बना हुआ है घर की बनावट कैसी है कब का बना है मजबूत है या कमजोर है कितनी मंजिल कितने कमरे वो सब भी देखेंगे तो ठीक वैसे ही यहां भी आप अपने घर का अध्ययन कर रहे होते हैं और घर है हमारी प्रकृति हमारी पृथ्वी ठीक है इसके बाद एक शब्द आता है जैव वासिकी नाम से शब्द का अर्थ वैसे भी स्पष्ट है 23:25 लेकिन यहां किसने शब्द का इस्तेमाल किया मतलब शब्द का पहली पहली बार प्रयोग किया तो नाम दिया है ये है आईजे एस हिलेयर ठीक है आईजे एस हिलेयर इन्होंने विभिन्न जीवों के मध्य आपसी संबंधों का अध्ययन करने वाले विज्ञान को कहा जैवसिकी ठीक है नाम याद रखिएगा पूछा जाता है किसने किस शब्द का इस्तेमाल किया और ऐसा नहीं है कि हिलेयर महोदय जो है वो एकाएक उठे और कहे कि जैव वासिकी होती है मतलब ये विज्ञान है एक ऐसा नहीं वो शब्द को इजाद नहीं कर रहे थे वो तो रिसर्च पेपर लिख रहे थे शोध पत्र इन बड़े-बड़े बड़े वैज्ञानिकों के होते हैं लंबे चौड़े और उस शोध पत्र में तमाम खास शब्दों का उल्लेख उल्लेख किया जाता है जो कि लोगों के लिए नए होते हैं। टेक्नोलॉजी की साइंस की दुनिया में नए होते हैं। तो उन शब्दों को उनसे काट कर अलग कर दिया जाता है कि भाई इस पूरे लंबे से खर्रे में जो लंबा शोध पत्र है रिसर्च पेपर है उसमें ये शब्द है। अब इस शब्द को थोड़ा फेमस करते हैं। इस शब्द का हम इस्तेमाल करते हैं। ये नया मिला है। नई चीज की ओर दिमाग ज्यादा आकर्षित होता है। तो वैसे ही अपना पीछे 24:26 आपने इकोलॉजी देखा और यहां पर जैववासिकी को देख रहे हैं। अब इसके बाद यहां आ जाइए। देखिए प्रारंभिक पारिस्थितिकी दृष्टिकोण कैसा था? यानी शुरुआत में जब हमने पारिस्थितिकी को और पर्यावरण को पढ़ना सीखना समझना आरंभ किया तो वो समय कौन सा था? जाहिर सी बात है कि ऐसी जो टेक्निकल चीजें हैं अगर हम एकदम इनकी जड़ खोजने जाएंगे तो यूनान में जाएंगे। यूनानी पुराने जो यूनानी वनस्पति विज्ञानी थे इनका नाम था थियोफ्रेड्स। लगभग यह बात है 371 से लेकर 287 ईसा पूर्व इतिहास की घटनाओं से आप इन्हें जरा तालमेल लगाएंगे तो आपको समझ में आएगा कि उस समय यहां राजा रजवाड़े शासन कर रहे थे। ठीक है? तो यह उन शुरुआती विद्वानों में से एक थे जिन्होंने कि पारिस्थितिकी दृष्टिकोण को अपनाया था। और पारिस्थितिकी यानी इकोलॉजी शब्द बनने से सदियों पहले यह समय काफी पीछे का है ना। ये ध्यान दीजिएगा कि ये बिफोर जीसस क्राइस्ट ईसा मसीह के जन्म से 371 साल पीछे की बात ठीक है आप समझ सकते हैं कितना पुराना है तो वही कहा गया कि पारिस्थितिकी यानी इकोलॉजी शब्द बनने 25:26 से सदियों पहले ही उन्होंने पौधों का अध्ययन करके अध्ययन किया पौधों का अध्ययन इसलिए किया क्योंकि पौधे ही पहले आए पृथ्वी पर पौधे पहले उगे उसके बाद ही जीवन की दशाएं बाकी अन्य प्राणियों के लिए अनुकूल बनी तो पौधों का अध्ययन करके उनके आवास पर्यावरण की स्थितियों जैसे कि जलवायु नमी धूप पहाड़ ढलान इन सब के संदर्भ में अध्ययन करके उन्होंने जो प्रारंभिक पारिस्थितिकी दृष्टिकोण है उसको लोगों के सामने प्रस्तुत किया। लेकिन उस समय के जो वैज्ञानिक होते थे वो असल में वैज्ञानिक ऐसे लैब वाले वैज्ञानिक नहीं थे कि लैब में बैठे हुए हैं वहां पर अपना लेकर डीएनए और आरएनए रिसर्च कर रहे हैं या फिर कुछ भी मतलब उनके पास इंस्ट्रूमेंट्स हैं अपरेटस हैं जिससे कि वो रिसर्च कर रहे हैं और सबके सामने ऐसे प्रूफ दिखा रहे हैं लिखित प्रूफ दिखा रहे हैं विजुअल प्रूफ दिखा रहे हैं लोग मान रहे हैं ऐसा नहीं होता था पहले के जो वैज्ञानिक होते थे वो असल में दार्शनिक होते थे दर्शन की उनके अंदर गहरी समझ होती थी विज्ञान भी दर्शन से गहराई से जुड़ा हुआ पहले से ही चाहे वो भारतीय दर्शन हो या विदेशी दर्शन हो पश्चिमी तो ये दार्शनिक होते थे लोगों को 26:28 ऐसे प्रवचन की तरह सुनाते थे कि पहले वनस्पतियां धरती पर आई वनस्पतियों ने अपना पूरा साम्राज्य कायम किया और वनस्पतियों ने कुछ ऐसी दशा उत्पन्न की जिसकी वजह से बागी जीव जो है वो उत्पन्न हुए एक-एक करके तो लोग कहते थे कि इनका दिमाग फिर गया है चल दिया है तो ज्यादातर लोग इन्हें पागल समझते थे मतलब इन दार्शनिकों को सुकरात और उनके शिष्यों का भी यही हाल था और बाकी जो दार्शनिक हैं उनकी भी स्थिति कुछ ज्यादा बेहतर नहीं थी। अभी जब आप ज्योग्राफी पढ़ते हैं तो उसमें जियोसेंट्रिक और हेलियोसेंट्रिक हाइपोथेसिस आप देखते हैं ना तो वो जब आई थी कॉपरनिकस की हो या जिसकी भी हो बहुत ज्यादा अकलमंद नहीं समझा जाता था। यहां तक कि अल्बर्ट आइंस्टीन के भी जमाने में आप देखेंगे कि जब वो जब उनके द्वारा थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी को दिया जाता है तो उस गहरे सिद्धांत को समझने वाले बहुत गिने चुने लोग थे और बाकी लोग उनकी खिल्ली उड़ाते थे। ठीक है? तो तत्काल में आपको समझा जाए ये आवश्यक नहीं है। लेकिन जो प्रारंभिक पारिस्थितिकी दृष्टिकोण है ये थ थियोफ्लेट्स के द्वारा दिया गया था। इन्हें कितनी आलोचना झेल झेलनी पड़ी होगी ये समझने वाली बात। समुदाय की अवधारणा 27:31 क्या है? तो पारिस्थितिकी में इस अवधारणा को जंतुओं पर लागू करने का जो श्रेय है वो कार्ल मोबियस का है। कार्ल मोबियस को याद रखिएगा। 1877 काफी बाद के हैं। इकोलॉजिकल ट्रांजिशन क्या होता है? इकोलॉजिकल ट्रांजिशन यानी पारिस्थितिकी संक्रमण। यह कासेप्ट 1976 का है। जॉन बेनेट के द्वारा दिया गया था और एक मिडोज़ रिपोर्ट करके पेपर जारी हुआ था। इसको द लिमिट टू ग्रोथ भी कहा जाता है। इस अवधारणा को उसी से लिया गया था। लेकिन मूल रूप से इस अवधारणा को मतलब इस कांसेप्ट को सबके सामने रखने का और इसे बकायदा एक्सप्लेन करने का काम ये जॉन बेनेट का है। तो हमें इसी इन्हीं को इसका श्रेय देना चाहिए। ठीक है? ठीक है? वैसे ही ये रिसर्च पेपर है। द लिमिट टू ग्रोथ मतलब वृद्धि की भी एक सीमा होती है। इसके बाद डीप इकोलॉजी को आप देख रहे हैं। नॉर्वेजियन ये दार्शनिक है। इनका नाम है आर अर्नेनेसनेस। ठीक है? ऑर्नेनेसनेस कहा जाता है। तो डीप इकोलॉजी शब्द को इन्होंने इस्तेमाल किया। बुखारेस्ट में एक कन्वेंशन हो रहा था। एक सम्मेलन हो रहा था। वहां पर ये बोल रहे थे, भाषण दे रहे थे। उसी में इन्होंने डीप इकोलॉजी शब्द का 28:31 इस्तेमाल किया। जब बड़े लोग बोलते हैं उनके दिमाग में कुछ शब्द निकलते हैं या फिर शब्द उपजते हैं और उसको वो अपनी जुबान से बाहर ले आते हैं तो वह शब्द भले ही सुनने में साधारण लगे लेकिन वो अविस्मरणीय बन जाते हैं। लोग उन्हें लंबे समय तक याद रखते हैं। बाद में इसे अमेरिकी पर्यावरण वित्त थे जॉर्ज सेशंस उनके साथ मिलकर आगे विकसित किया गया। मामला टेक्नोलॉजी का हो और अमेरिका उसमें अपनी टांग ना अड़ाए ऐसा नहीं हो सकता है। अच्छा भारत में इसकी शुरुआत कैसे हुई? तो भारत में अगर देखा जाए गहराई से तो बहुत पहले ही शुरुआत हो चुकी थी। हम अपनी प्रकृति को सोचने और समझने का प्रयास काफी समय पूर्व स्टार्ट कर चुके थे। है ना? गुरुत्वाकर्षण इत्यादि के बारे में लोगों को पहले से मालूम था। भले ही जग जाहिर नहीं किया गया। हम फालतू की चीजों में उलझे रह गए। तो भारत में पारिस्थितिकी के जनक थे रामदेव मिश्र। इकोलॉजी का इन्हें जनक माना जाता है। ये पर्यावरण विद और वनस्पति शास्त्री थे। भारत सरकार ने 1972 में पर्यावरण योजना और समन्वय के लिए एक संस्थागत तंत्र के रूप में नेशनल कम कमेट ऑन कमेट ऑन एनवायरमेंटल प्लानिंग एंड कोऑर्डिनेशन ठीक है नेशनल 29:33 कमेटी ऑन एनवायरमेंटल प्लानिंग प्लानिंग एंड कोऑर्डिनेशन एनसीपीसी इसको कहा जाता है इसकी स्थापना की थी पूछा जा सकता है कि भाई इस समिति की स्थापना कब हुई तो आप समय याद रखिए अब इसके बाद क्या होता है कि 1980 में पर्यावरण विभाग और उसके बाद फिर पर्यावरण और वन मंत्रालय स्थापित होता है। एक कड़ी में सब जुड़े हुए हैं। सबसे पहले एक कमेटी गठित होती है जिसका एनवायरमेंटल प्लानिंग और कोऑर्डिनेशन से कनेक्शन था। उसके ठीक कुछ 8 साल बाद लगभग आठ साल बाद पर्यावरण विभाग बनता है और फिर उसके 5 साल बाद आप देखते हैं कि एक मंत्रालय बन जाता है तो पर्यावरण को धीरे-धीरे करके हमने महत्व देना सीखा और तब तक हम सचेत हुए जब तक कि बहुत विलंब हो चुका है और हमने बर्बाद ज्यादा कर लिया है। समष्टि को देख लेते हैं। एक निश्चित क्षेत्र में रहने वाली एक ही प्रजाति ध्यान दीजिएगा। बारीक यहां शब्द का अंतर होगा और शब्दों के अपने अर्थ हैं। इसलिए थोड़ा सा ध्यान देकर आपको देखना होगा। ठीक है? ठीक है? समष्टि का मतलब क्या होता है? एक निश्चित क्षेत्र में रहने वाली एक ही प्रजाति के जीवों के समूह को समष्टि कहा जाता है। शर्त यह है कि एक ही प्रजाति होनी चाहिए। अगर शेर है 30:33 तो शेर ही होना चाहिए। चीता है तो चीता ही होना चाहिए। बंदर है तो बंदर ही होना चाहिए। मनुष्य है तो मनुष्य ही होना चाहिए। और यह जीव ऐसे होने चाहिए जो आपस में अंतः क्रिया करें। भाई एक ही प्रजाति के जीव हैं तो निश्चित तौर पर आपस में अंतः क्रिया करेंगे। प्रजाति अगर अलग होती तो भी अंतः क्रिया होती। मतलब एक दूसरे से लेना देना होता। है ना? हम अपने जिस माहौल में रह रहे होते हैं उसके चारों ओर और भी जीव पाए जाते हैं। है ना? आप अपने आसपास गाय भैंस को टहलता हुआ देखते हैं। बंदर आ जाते हैं। आप पीछे पड़ जाते हैं उनके। कुत्ते आसपास मंडराते रहते हैं। है ना? बहुत सारे जीव होते हैं। पक्षी तमाम तरह के हैं। कीड़े मकोड़े हैं। तो रहते सारे जीव हैं आसपास। लेकिन यहां शर्त है कि प्रजाति एक ही होनी चाहिए। तब जाकर उनकी अंतः क्रिया आपस में हो रही है अथवा नहीं। इसको देखेंगे और ऐसे ऐसा जो झुंड है उसको हम समष्टि कहेंगे। समुदाय क्या होता है? समुदाय में प्रजातियां अलग-अलग होती हैं। ठीक है? एक क्षेत्र में रहने वाली विभिन्न प्रजातियां विभिन्न प्रजातियों के जीवों का जो समूह है उसको हम समुदाय कहते हैं। जो कि आपस में अंतः क्रिया करते हो। ऐसा ना हो कि सब 31:34 एक पास रह रहे हो और एक दूसरे से कोई मतलब ही ना हो। और ऐसा हो ही नहीं सकता है। अगर कुछ जीव प्रजातियां जो कि अलग-अलग हैं, कुछ हाथी रह रहे हैं, कुछ घोड़े रह रहे हैं, कुछ गाय भैंस रह रही है, कुछ मनुष्य रह रहे हैं। अगर आसपास रह रहे हैं अगल-बगल और उनका हैबिटेट साझा हो रहा है आपस में। ठीक है? तो ऐसी परिस्थिति में उनके बीच में अंतः क्रिया ना हो, यह हो ही नहीं सकता है। तो समुदाय ऐसे ही बनते हैं। पर्यावास का मतलब क्या है? पर्यावास तात्पर्य है उस भौतिक पर्यावरण से वह स्थान जहां कि कोई जीव रहता है। ठीक है? मतलब जीव का पता जैसे आप कहीं किसी गली में रहते हैं, किसी मोहल्ले में रहते हैं, किसी अपार्टमेंट में रहते हैं तो वह आपका एक एड्रेस होता है, पता होता है। ठीक वैसे ही किसी किसी भी जीव का किसी भी जीवित प्राणी का एक पारिस्थितिकीय पता होता है, एक प्राकृतिक पता होता है। उसी को हम कहते हैं पर्यावास। और इस पते पर आपको मिलेगा क्या-क्या? तो उस जीव को रहने के लिए स्थान मिलेगा, उस जीव को खाने के लिए भोजन मिलेगा, पानी मिलेगा। और सबसे बड़ी बात आश्रय मिलेगा। ठीक है? 32:35 पर्यावास यानी हैबिटेट आपने देखा। अब इसके बाद नंबर आता है नीश का यानी निकेत का। हिंदी में हम लोग कहते हैं निकेत वैसे कहते हैं नीश। किसी भी प्रजाति के समस्त क्रियाकलाप और कार्यात्मक लक्षण जिसके द्वारा वह पर्यावरण के संसाधनों का इस्तेमाल करती है। वह कहलाता है निकेत यानी नीश। जोसेफ ग्रीनेल्स के द्वारा सबसे पहले यह शब्द इस्तेमाल किया गया नीश। इसका मतलब ये हुआ कि हैबिटेट में तो कई सारी प्रजातियां एक साथ रह सकती हैं। ठीक है? मतलब एक पता है, एक कॉलोनी है और उस कॉलोनी में बहुत सारे लोग रह रहे हैं। कोई प्रोफेसर है, कोई डॉक्टर है, कोई इंजीनियर है, सब रह रहे हैं। है ना? लेकिन अगर आप नीश की बात करते हैं, निकेत की बात करते हैं तो उसमें मतलब नीश जो है ना वो दो प्रजातियों के बीच में साझा नहीं हो सकता है। क्योंकि नीश जो है वो असल में उनका व्यवसाय है। उनके जीने खाने का जरिया है और जीने खाने का जरिया अगर आपस में साझा होगा तो प्रकृति में तब भीषण टकराव होता है। पता लगा जो इनका व्यवसाय है वही इनका भी व्यवसाय है। मिस्टर ए का जो व्यवसाय है 33:36 मिस्टर ए का जो जीवन यापन का स्रोत है जिससे कि वह जीवित रहेंगे खा पीकर। ठीक है? अपना गुजारा करेंगे। वही चीज जो है वो B को भी चाहिए। दोनों के बीच में भिड़ंत हो जाएगी और उसमें से जो 20 पड़ेगा जो भारी पड़ेगा जो योग्य होगा वही जीवित रहेगा। अब यहां योग्यतम की उत्तरजीविवता का सिद्धांत 30 इस पर भी लागू होगा। ठीक है? जो सर्वाइव करने की ताकत रखेगा जिसके अंदर ज्यादा स्टैमिना होगा वो दूसरे पर भारी पड़ जाएगा या तो उसको मार मार डालेगा। और नहीं मार पाया तो उस जगह से कम से कम खदेड़ देगा कि जाओ कोई दूसरा नीच ढूंढो जो कि सिर्फ तुम्हारा हो। किसी दूसरे के नीच में साझा मत करो। तो नीश जो है ना वो साझा नहीं हो सकता है। ध्यान दीजिएगा। हैबिटेट एक हो सकता है। निकेत एक नहीं हो सकता है। ये दोनों के बीच का मुख्य अंतर। तो वही निकेत की विशिष्टता यहां दी हुई है कि किसी भी पर्यावास में दो प्रजातियों का निकेत समान नहीं हो सकता है। और अगर समान होता है तो स्पर्धा होती है जब तक कि दूसरा वहां से चला ना जाए यानी विस्थापित ना हो जाए। अच्छा अगला शब्द आता है इकोन। यह शब्द बड़े महत्वपूर्ण है। इन सभी से प्रश्न बन भी चुके हैं और बनने की पूरी पूरी संभावना रहती है। इकोोटोोन होता क्या 34:39 है? दो अलग-अलग पारिस्थितिकी तंत्रों जैसे कि वन और घास का मैदान जंगल है और घास का मैदान है। दोनों अलग-अलग हैं। या फिर आप नदी और समुद्र को ले लीजिए। इनके बीच का जो संक्रमण क्षेत्र है वो इकोन कहलाता है। जैसे मैंग्रोव, एस््ुरी है ना? ये सब क्या है? ये संक्रमण क्षेत्र ही तो है। जैसे ए्चुरी है। नदी समुद्र में मिल रही है। ए्चुरी बन रही है। या मैंग्रोव का भी जो तंत्र होता है। मैंग्रोव क्या है? खारे पानी में उगने वाले पौधे हैं, वनस्पतियां हैं, गरान जिनको कहा जाता है। तो मैंग्रोव भी जो है वो एक तरह का इगोटन है। वहां दो तरह के पारिस्थितिकी तंत्र आपस में संयोजित हो रहे हैं, मिल रहे हैं। वही चीज जंगल और घास के मैदान के बीच की भी हो सकती है। तो ये जो इकोन है इनके बारे में एक खास बात देखी गई है कि इन पर जो पर्यावरण के बदलाव है, पर्यावरण का जो संकट है, पारिस्थितिकी संकट जिसको आप कहते हैं, उसका गहरा असर पड़ता है। मतलब अगर कुछ नष्ट होने की संभावना होती है तो विनाश इनको जल्दी प्रभावित करता है। लेकिन दूसरी इसकी अच्छी बात क्या होती है कि इनके अंदर रीजनरेशन पावर अच्छी होती है और 35:40 रीजनरेशन पावर से भी जो बढ़कर चीज है कि ये बहुत ज्यादा प्रोडक्टिव होते हैं। इकोन यानी ट्रांजिशन एरिया एक संक्रमण क्षेत्र तो जितनी उत्पादकता उन दो अलग-अलग पारिस्थितिकी तंत्रों में नहीं होती है उतनी इन इस मिश्रित क्षेत्र में होती है। इनका दायरा सीमित होता है। ये बहुत ज्यादा बड़े दायरे में नहीं फैले होते हैं। लेकिन जितने भी दायरे में यह फैले होते हैं, उतने में इनका प्रोडक्शन बहुत अच्छा होता है, प्रोडक्टिव होते हैं पर्यावरण के लिए। यानी बहुत उपयोगी होते हैं। एज इफेक्ट दिया हुआ है कि इकोटोन यानि संक्रमण क्षेत्र में दो अलग-अलग तंत्रों के मिलने की वजह से जीवो की विविधता बहुत ज्यादा होती है। उनकी डेंसिटी बहुत ज्यादा होती है। दोनों जो मूल तंत्र है उनसे कहीं ज्यादा होती है और इसी को एज इफेक्ट कहा जाता है। जो बात अभी आपको बताई ना उसी को एक परिभाषा में ढाल दिया गया है। इसके बाद नंबर आती है यह देखिए। सबसे महत्वपूर्ण चीज तो यही है वहन क्षमता। और आज के समय में हमारी पृथ्वी अपनी वहन क्षमता से कहीं ज्यादा वहन कर रही है और करा रही है। जितनी पृथ्वी के पास वहन क्षमता है मतलब प्राणियों को ढोने की शक्ति है। प्राण जो जीव जातियां हैं उनकी 36:41 आवश्यकता को पूरी करने की शक्ति है। उससे कहीं ज्यादा पृथ्वी दबाव झेल रही है। संसाधन डगमगा रहे हैं। खत्म हो रहे हैं। पृथ्वी चरमरा रही है। जैसे एक टूटी कुर्सी पर आप बैठ जाइए। उसके चारों पैर अब टूटने की कगार पे हैं और आपका वजन बढ़ता जा रहा है। तो वही स्थिति हम मनुष्यों की हो गई है। बाकी जीवों की आवश्यकता नहीं बढ़ रही है। उनकी आवश्यकता की जो चीजें हैं उनको हम खाते जा रहे हैं। हमारी आवश्यकता खत्म ही नहीं हो रही है। तो जीवों की वह अधिकतम संख्या जिसे कि कोई पर्या विशिष्ट पर्यावरण यहां पर्यावरण शब्द का सिर्फ इस्तेमाल नहीं किया गया है। विशिष्ट पर्यावरण बिना किसी नुकसान के स्थाई रूप से पोषित कर सकता है। कोई नुकसान ना हो। मतलब पर्यावरण को किसी भी तरह की हानि या क्षति ना हो। जितना उस जीव प्रजाति ने पर्यावरण से लिया उतना अपने आप वहां पर प्रतिपूर्ति हो जाती हो, रिकवरी हो जाती हो। ठीक है? ऐसी परिस्थिति हो। जैसे एक चारागाह है घास का मैदान। अब वहां पर कुछ पशु जो है वो चर रहे हैं। दो-तीन मवेशी हैं। दो-तीन घोड़े हो सकते हैं। हाथ ये हिरण हो सकते हैं या गाय भैंस ही हो सकती हैं। बकरियां हो सकती है। मतलब सीमित संख्या में और जो मैदान है घास का वो 37:44 थोड़ा बड़ा है। तो घास बेतहाशा उग रही है। वो क्या करते हैं? चर जाते हैं। चर कर घासों की संख्या को नियंत्रित रखते हैं। ठीक है? जितना चरते हैं फिर अगले दिन उस उतनी ही घास फिर पनप जाती है। फिर चर लेते हैं। फिर सीमित हो जाती है। तो ऐसे क्या होता है? प्रकृति के अंदर संतुलन बना रहता है। सारी चीजें नियंत्रित रहती है। मतलब घास भी ज्यादा नहीं होगी। जीवों का पेट भी भर जाएगा और पर्यावरण को किसी तरह की क्षति भी नहीं पहुंचेगी बल्कि फायदा होगा। लेकिन वही कल्पना करिए कि अभी वहां पर एक पूरा झुंड आ जाए। बकरियों का, गायों का या भेड़ों का और वो रोज वहां पर चढ़ना आरंभ कर दे तो घास को उगने का समय ही नहीं मिलेगा। यानी रिकवरी का टाइम खत्म हो गया। प्रतिपूर्ति का समय खत्म हो गया। एक बार फिर से अपने आप को सुधारने के लिए, रिफिल करने के लिए प्रकृति को मौका ही नहीं मिल रहा है। चारागाह को एक दिन चर कर पूरा उजाड़ दिया गया और अगले दिन फिर चरने आ गए। तो घास उगेगी ही नहीं, उग ही नहीं पाएगी। धीरे-धीरे करके वो जमीन रेगिस्तान में बदलने लगेगी। घास की जड़े मिट्टी को बांध कर रखती है। अब वहां मृदा अपरदन शुरू हो जाएगा। जब घास वहां से हटेगी और उग नहीं पाएगी। जब बरसात होगी तो मिट्टी की ऊपरी परत धुल जाएगी। जमीन बंजर होगी फिर 38:45 रेगिस्तान बन जाएगी। यह डेजर्टिफिकेशन का एक क्रूर स्वरूप आप देखते हैं। कहने का मतलब ये है कि ये वहन क्षमता जो है ये वही लिमिट है जहां तक कि पर्यावरण हमें अच्छे तरीके से खुशी-खुशी दे सकता है। इसके बाद अब आगे चलते हैं। पारिस्थितिकी से जुड़ी हुई चीजें हम देख रहे थे। अब पारितंत्र से जुड़े हुए कुछ इंपॉर्टेंट फैक्ट है उनको भी देख लेते हैं। तो पारितंत्र की परिभाषा क्या कहती है? किसी क्षेत्र विशेष के समस्त जीवों तथा जो निर्जीव भौतिक कारक कारक होते हैं उनके बीच होने वाली जटिल अन्योन क्रियाओं वाला पर्यावरण जो क्रियाएं हैं वो कैसी है? जटिल है। काफी उलझी हुई है एक दूसरे से। तो ऐसा जो पर्यावरण है यह पारितंत्र को दर्शाता है और यह प्रकृति की एक कार्यात्मक इकाई है। फंक्शनल यूनिट है। ये स्थिर या फिर निष्क्रिय नहीं रहती है। पारितंत्र शब्द आया कहां से है? तो ए जी टॉसले नाम के एक व्यक्ति थे। 1935 का समय है। उन्हीं के द्वारा इस शब्द की रचना की गई थी। ठीक है? एजी टॉसले ये सारे नाम आपके लिए कुछ नए नहीं है। आप बार-बार इनको पढ़ते हैं। 39:47 ओकेओस और यहां देख रहे हैं आप सिस्टम मतलब घर और तंत्र से ये मिलकर बना हुआ है। घर का तंत्र जैसे आपके घर का एक सिस्टम होता है और वो उसी तरीके से चलता है लंबे समय से। ठीक वैसे ही प्रकृति का भी अपना एक तंत्र है। अब एजी टंसले की चर्चा है तो उनके योगदान को भी देख लीजिए। देखिए टॉसले महोदय ने इकोलॉजी के विज्ञान को काफी अच्छी परिभाषा दी। न्यू फाइटोलॉजिस्ट नाम की एक पत्रिका थी मैगजीन थी। उसकी यह स्थापना करते हैं 1902 में। नाम याद रखिएगा और 1931 तक इसके संपादक के रूप में काम करते हैं। ठीक है? 1931 तक इसके संपादक के रूप में काम करते हैं। और उसके बाद एजी टंसले जो है ये ब्रिटेन में इकोलॉजी के विज्ञान के खोजकर्ता भी माने जाते हैं। मतलब कुल मिलाकर बात ये है कि अपने देश में तो इनका नाम रहता ही है। उसके अलावा एक जो वैज्ञानिक पत्रिका है साइंटिफिक मैगजीन है उसके ये संपादक हैं और साथ ही साथ एक अह शोध पत्र लिखने वाले विचारक दार्शनिक भी हैं। विचारक दार्शनिक शब्द का इस्तेमाल यहां पर एक वैज्ञानिक के 40:47 लिए इसलिए किया गया क्योंकि गहराई से सोचना और सिर्फ लैब में टेस्ट करके एक प्रूफ दिखा देना दोनों में फर्क होता है। तो यह जो ऐसे वैज्ञानिक होते थे ना चाहे टैंसले को आप देख रहे हैं या इससे पीछे वाले अर्निस्ट हेकल वगैरह तो ये सभी अपने विचार व्यक्त करते थे कि ऐसा हो सकता है। मतलब अपनी हाइपोथेसिस दिखाते थे। जो प्राकृतिक पारितंत्र है उसकी भी परिभाषा देख लेते हैं। तो प्रकृति में जो स्वतः विद्यमान तंत्र होता है। अब स्वतः विद्यमान तंत्र बहुत सारे हैं। जैसे जंगल का अपना सिस्टम है। रेगिस्तान का अपना सिस्टम है। नदियां अपने तरीके से उनके अंदर भी एक पूरा पारितंत्र एक पूरी समूची सृष्टि मौजूद है। समुद्र का पूछना ही नहीं है। और ऐसे बहुत सारे तंत्र हैं। छोटे और बड़े कुछ बहुत बड़े हैं तो कुछ बहुत छोटे हैं। और ये सारे इकोसिस्टम ज्यादातर नहीं बल्कि लगभग सारे इकोसिस्टम जो है वो सौर ऊर्जा से चलते हैं। जिन इकोसिस्टम्स को हम सोचते हैं कि यह सौर ऊर्जा से नहीं चल रहा है। इसके पीछे कोई केमिकल एनर्जी या कुछ और भी हो सकता है। लेकिन उसमें जब आप गहराई से उतरते हैं और उसका शोध करते हैं तो आपको मालूम होता है कि वो जो एनर्जी आप समझ रहे थे कि वो केमिकल से आ रही है तो 41:48 केमिकल एनर्जी भी प्रोड्यूस होती है सोलर एनर्जी का इस्तेमाल करके। मतलब अंततः जो केंद्र है वो सूर्य है। सूर्य से ही सारी ऊर्जा नियंत्रित होती है। तो इसमें जितने भी तंत्र हैं जितने भी प्राकृतिक पारितंत्र चल रहे हैं उनका सिस्टम चल रहा है वो सब सोलर एनर्जी से चलते हैं। डायरेक्ट अथवा इनडायरेक्ट। कुछ के बारे में कहा गया कि हाइड्रोथर्मल या फिर वेंट इकोसिस्टम या रासायनिक ऊर्जा। तो ये सब कहां से आते हैं? इनका भी जो अंतिम स्रोत है ना वो सूर्य ही है। अब इसके बाद देखें मानव निर्मित पारितंत्र को। तो मनुष्यों के द्वारा निर्मित जो पारितंत्र होता है उसमें बगीचे, खेत, एक्वेरियम ये सब आएंगे। ये सब सौर ऊर्जा पर निर्भर है। इसमें कोई संदेह नहीं है। लोग कहते हैं अब देखिए यहां पर देखिए कहा गया ना कि खेत सौर ऊर्जा पर निर्भर है। अब आप कहेंगे कि देखिए सौर ऊर्जा पर खेत निर्भर है। जो नगरीय और औद्योगिक पारितंत्र है वो कहां सौर ऊर्जा पर निर्भर है। हमें जाड़े में धूप की आवश्यकता होती है। गाड़ी और मशीनें चलाने के लिए तो हम पेट्रोल डीजल का इस्तेमाल करते हैं। सीएनजी चाहिए होता है। एलपीजी चाहिए होता है। है ना? तो ये जीवाश्म ईंधन भाई लोग कहां से आया? जीवाश्म ईंधन को बनाने के 42:50 लिए भी सौर ऊर्जा इस्तेमाल हुई है। जीवाश्म ईंधन और क्या है? ये जीवित प्राणी ही तो थे जो कि मर गए फिर दफन हो गए। फिर दबाव में जाकर ये काले कीचड़ में कन्वर्ट हो गए। पेट्रोलियम बन गए। उसको आप रिफाइन कर करके इस्तेमाल करते हैं। तो ये जीवित प्राणी आखिर इनका पोषण कैसे हुआ? ये दबे और उसके बाद जो भीषण दबाव इन्होंने झेला उन सब में जो अंतिम योगदान किसका था? वो सोलर एनर्जी का था। तो सारी चीजें सौर ऊर्जा से नियंत्रित होती हैं। कोई भी इसमें से ऐसा सिस्टम नहीं है जो बिना सूर्य के ना चल पाए। माफ़ कीजिएगा बिना सूर्य के चल पाए। ठीक है? अच्छा इसके बाद आप देखेंगे सबसे बड़ा पारितंत्र क्या है? तो सबसे बड़ा पारितंत्र है समुद्र। ये तो देख के ही मालूम होता है। जलमंडल का 97% हिस्सा यही है। और समुद्री जल में नमक पाया जाता है। 85% नमक पाया जाता है। वही अपना NaCl सोडियम क्लोराइड। ठीक है? एक और परिभाषा है जैवमंडल की। पृथ्वी के चारों ओर व्याप्त सबसे बड़ा पारिस्थितिकी तंत्र जो कि मृदा यानी मिट्टी, जल और वायु की पतली परत से बनता है। ठीक है? उसमें 43:52 मिट्टी भी आ जाएगी, पानी भी आ जाएगी, आ जाएगा और हवा भी आ जाएगी। तो इनकी पतली परत से बनने वाला जो सबसे बड़े आकार का विशालकाय पारिस्थितिकी तंत्र है उसी को हम कहते हैं जैवमंडल और यह अपने अंदर रहने वाले समूचे जीवों का भरण पोषण करता है। और जलीय पारितंत्र के भी प्रकार अब देख लेते हैं। अभी तक तो स्थलीय पारितंत्र जो है उसको देखा हमने। तो यह जो जलीय पारितंत्र है, इसमें पहला प्रकार होता है इसके प्रकारों को ही देख रहे थे। तो स्थिर जल का लेंटिक और लोटिक। तो जो बहता पानी है उसमें आप समझ सकते हैं कौन-कौन चीजें आएंगी। नदियां। नदियों की विशेषता यह है कि लगातार प्रवाहित होती रहती है। कोई एक स्रोत होता है। वहां से निकलती हैं और उसके बाद अंततः समुद्र में या किसी बड़ी नदी में मिल जाती हैं। स्थिर जल के पारितंत्र भी समझना बहुत आसान है। झील, झीलों का पानी मतलब झील का मतलब एक बड़ा गड्ढा जिसके अंदर पानी स्टोर हो रहा है। तालाब उसी का छोटा रूप। दलदल जो है वो भी आपके स्थिर जल के ही पारितंत्र कहे जाएंगे। क्योंकि अंततः उनके अंदर भी पानी ही है। और वह ठहरा हुआ पानी। इसके बाद अब नंबर आता है ऐुरी का यानी ज्वार नदमुख 44:55 इसको हिंदी में कहा जाता है ज्वार नदमुख वैसे ऐुरी आप कहते हैं नदी का मीठा पानी और समुद्र का खारा पानी आपस में जिस स्थान पर मिलता है वहां बनती है ए्चुरी डेल्टा जितना इनका बड़ा आकार नहीं होता है डेल्टा बड़े आकार के होते हैं आमतौर पर ए्चुरी उतनी बड़े साइज की नहीं होती है तो दायरा इनका भले ही छोटा हो लेकिन नदी और समुद्र दोनों की तुलना में ये ज्यादा उत्पादक क्षेत्र होते हैं नदी नदी बहुत बड़ी है। समुद्र उससे भी कहीं ज्यादा बड़े हैं। लेकिन उन दोनों की उत्पादकता की अगर तुलना करें तो वह इस ऐरी की उत्पादकता के सामने फीकी पड़ जाती है। ठीक है? नर्मदा को आप देखते हैं ना अरब सागर में गिरने से पहले एक छोटी सी एचुरी बनाती है। तो ऐसी ही ऐरिया बनती है। ज्यादातर तब होता है ऐसा जब नदी बिना किसी लागपेट के समुद्र में समा जाए। यानी बहुत ज्यादा लंबा रास्ता उसे ना तय करना पड़े। प्रवाह तेज ही रहे। बहुत धीमे प्रवाह के साथ अंत में लंबी दूरी तय करते हुए अगर समुद्र में जाकर मिलेगी तो बीच में बहुत सारा बहुत सारी जो सिल्ट है वो जमा हो जाएगी। डेल्टाओं का निर्माण होने लगेगा तो फिर डेल्टा बनेगा 45:56 हिस्ट्री नहीं बनेगी। है ना? बहुत सारी वितरिकाएं बन जाएंगी उसकी। आप देखते हैं कि पश्चिमी घाट के जो पश्चिमी घाट का फुट हिल एरिया है, गिरिपथ क्षेत्र है, वहां से निकलने वाली नदियां एक लंबा रास्ता तय करती हैं और पूर्वी घाट वाले क्षेत्र से ढलान से होते हुए नीचे उतरती हैं और बंगाल की खाड़ी में समा जाती हैं। लेकिन इस लंबे रास्ते में एक तो उनका बहाव पहले से ही धीमा हो चुका होता है। दूसरा जब लंबे रास्ते के एकदम आखिरी मुहाने पर पहुंचती हैं तो वहां बहुत सारी उनकी डिस्ट्रीब्यूटरीज बन जाती हैं। वितरिकाएं बन जाती हैं। अब उन वितरिकाओं में बहते हुए बीच में सिल्ट का जमाव हो गया तो बड़े-बड़े डेल्टा बनते हैं। बड़े-बड़े साइज के डेल्टा और वह पूरा पूर्वी घाट की चौड़ाई को बढ़ाते हैं तो वह फर्टाइल एरिया तो होता है लेकिन ए्चुरी बनने के लिए आदर्श संभावना वहां पर नहीं बनती है। ए्चुरी बनती है नर्मदा के द्वारा और जो पश्चिमी घाट का क्षेत्र है वो इसके लिए उपयुक्त भी है। नदियां बहुत ज्यादा संघर्ष नहीं करती है। सीधे समुद्र में जाकर धारा प्रवाह गिरती हैं। तो ऐसे में कम मौका मिलता है और ज्यादा मात्रा में सिल्ट का जमाव नहीं होता है। तो एक छोटा सा क्षेत्र डेवलप होता है जिसको कि ऐरी कहते हैं। आप भूगोल नहीं पढ़ रहे हैं लेकिन पर्यावरण की 46:56 चर्चा है तो उसमें थोड़ी सी ये चीजें आ जाती हैं। अब इसके बाद अजैविक घटक है। अजैविक घटक में कुछ तो भौतिक होते हैं। भौतिक में सबसे अहम चीज है सबसे मुख्य और इसके बिना एकदम काम नहीं चलेगा। यह है सूर्य का प्रकाश। बाकी जितने घटक आप देख रहे हैं वो सब सूर्य के प्रकाश से ही कंट्रोल होते हैं। चाहे वो तापमान हो, चाहे वो आद्रता हो यहां तक कि दबाव भी। दबाव जो है ना वह भी अंततः सूर्य के प्रकाश पर ही जाकर केंद्रित होता है। अब आप उसके पीछे गुरुत्वाकर्षण और चुंबकीय क्षेत्र और परिक्रमण परिभ्रमण ना जाने कितनी चीजों को ले आएंगे। लेकिन अंततः अगर उसको आप गहराई से पकड़ेंगे ना तो आपको लगेगा कि ये सब सोलर रेडिएशन और सोलर रेडिएशन से ज्यादा सूर्य की ग्रेविटी पर कंट्रोल होते हैं। और उसके बाद आप आगे देखें यहां पर जो अजैविक घटक है उसके दूसरे प्रकार में अकार्बनिक घटक आते हैं। अकार्बनिक घटक में कार्बन डाइऑक्साइड खुद है। ध्यान दीजिएगा ये कार्बन अकेला नहीं है। यहां पर यौगिक की बात हो रही है। दूसरा नाइट्रोजन है, ऑक्सीजन है, पानी खुद है, चट्टान हैं। चट्टानों में बहुत तरह के तत्व हैं और मिट्टी है। मिट्टी के अंदर भी 47:57 प्रचुर मात्रा में तत्वों का आपस में कॉम्बिनेशन है। मिट्टी कैसी है उस पर निर्भर करता है। लेकिन ये अकार्बनिक है और कार्बनिक में जितने भी कार्बनिक पदार्थ है वो सब आ जाएंगे। सभी निर्जीव ही तो है। भले ही उनसे सजीवों का निर्माण होता है। जैसे प्रोटीन है, लिपिड है। ये सब सजीव और निर्जीव के बीच की कड़ी बनते हैं। है ना? इनके इनके द्वारा ही एक सजीव शरीर बन पाता है। तो अब जैविक घटकों पर थोड़ा और ठीक से बात कर लेते हैं। मतलब इनकी थोड़ी और पोल खोल लेते हैं। तो इसमें पहले इनको वर्गीकृत कर दिया गया है। बंटवारा कर दिया गया है। जैविक घटकों में जो पहली वैरायटी होती है वो होती है प्रोडक्शन करने वालों की। यानी ये होते हैं स्वपोषी। अपना भोजन खुद बनाते हैं और दूसरों को भी भोजन उपलब्ध कराते हैं। अगर यह बीच में मौजूद ना हो तो लोग भूखे मर जाएंगे। कोई सोलर पैनल नहीं है कि खड़े होकर चार्ज हो जाएंगे। है ना? उन्हें कोई ना कोई माध्यम चाहिए। हम मनुष्यों को भी अपने अंदर सूर्य ऊर्जा मतलब सूर्य की ऊर्जा को प्राप्त करने के लिए माध्यम की आवश्यकता होती है। तो हरे पौधे, शैवाल और कुछ बैक्टीरिया जो कि मूल रूप से प्रकाश संश्लेषण करते हैं 48:57 यानी फोटोसिंथेसिस करते हैं। उसके जरिए अकार्बनिक पदार्थों से कार्बनिक पदार्थों का निर्माण करते हैं। तो ये कहलाते हैं उत्पादक। यह अपना भोजन तो खुद बनाते ही हैं। सीधे-सीधे शब्दों में अगर कहा जाए तो सौर ऊर्जा को सौर विकिरण को यह रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तित करने की काबिलियत रखते हैं। और ये काबिलियत सिर्फ इन्हीं के पास होती है। या तो हरे पौधों के पास या शैवालों के पास यहां तक कि कुछ बैक्टीरिया के पास। ये मनुष्यों के पास या किसी और जानवर के पास नहीं होती। हम मनुष्य चाहे जितने अकलमंद हो जाए जितनी टेक्नोलॉजी हमारे हाथ में आ जाए लेकिन ये पावर कुदरती तौर पर हमारे पास नहीं। ठीक है? तो इसके लिए हमें निर्भर रहना पड़ता है इन जीवों पर यानी हरे पौधों पर, शैवालों पर या फिर बैक्टीरिया पर मूल रूप से हरे पौधों पर। तो यहां कुछ बैक्टीरिया बैक्टीरिया जो है उनके बारे में भी कहा गया कि ये काइमोसिंथेसिस का इस्तेमाल करते हैं। कुल मिलाकर बात ये है कि यही झुंड है जो कि फोटोसिंथेसिस कर सकता है। हम मनुष्य या बाकी जीव नहीं कर सकते हैं। इसके बाद नंबर आता है खाने वालों का। अभी तो खिलाने 49:58 वालों को आपने देखा। इसमें है सबसे पहले उपभोक्ता। यह है परपोषी। दूसरे के दूसरे पर आश्रित है और दूसरा मतलब हरे पौधे। इसमें पहली वैरायटी पूरी तरह से हरे पौधों पर आश्रित है। शाकाहारी। उसके बाद है मांसाहारी। मांसाहारी ऐसे हैं जो कि शाकाहारी जीवों को खाते हैं। कभी-कभी मांसाहारी जीवों को भी खा लेते हैं। मतलब कुल मिलाकर इनका मुख्य भोजन है मांस। और कुछ प्राणी ऐसे होते हैं जिन्हें जो कुछ मिलेगा वह सब खा सकते हैं। मतलब मांस भी खा सकते हैं, सब्जियां भी खा सकते हैं। यहां तक कि सड़ी गली चीजों का भी सेवन कर सकते हैं जो कि अखाद्य है। तो ऐसे जो प्राणी होते हैं इनको सर्वाहारी कहा जाता है। इसमें कुत्ता, सूअर और कौवे जैसे जीव आते हैं और उसके अलावा आप देखेंगे मनुष्यों को भी रखा जाता है। ठीक है? तो सर्वाहारी प्राणी हां मनुष्य भी परिस्थितियां बिगड़ने पर कुछ भी खा सकता है। तो उपभोक्ता की श्रेणी ये है। इसके बाद है अपघटक और ये हम खाते हैं तो करते क्या है असल में? जैसे शाकाहारी जीव है मान लीजिए हिरण है तो वो क्या कर रहा है? घास चर रहा है। घास से वो रासायनिक ऊर्जा 50:59 को अपने अंदर ट्रांसफर कर रहा है। घास के अंदर संचित जो केमिकल एनर्जी है जो कि असल में सौर ऊर्जा का ही रूपांतरित रूप है। बदला हुआ स्वरूप है। उसको वो इस्तेमाल कर रहा है। अपने लिए स्टोर कर रहा है। अब हिरण को किसी भेड़िए ने या किसी तेंदुए ने या किसी बाघ ने खा लिया। तो बाघ का तो पेट भर गया। उसको जो एनर्जी प्राप्त हुई वो हिरण के अंदर स्टोर की हुई एनर्जी थी। उसका भी सिर्फ एक हिस्सा ही मिलेगा छोटा सा। अभी 10% रूल भी देखेंगे। ठीक है? तो इस प्रकार से यहां चलता है। मतलब रासायनिक ऊर्जा आप शिफ्ट होगी एक जीव से दूसरे जीव में। इसके बाद नंबर आता है कुछ अपरदकों का। ये क्या करते हैं? जैसे केंचुआ हो गया, दीमक हो गया, कण खजूरे भी इसी में शामिल होते हैं। ये ऐसे प्राणी होते हैं जो कि मृत कार्बनिक पदार्थों को जिन्हें कि डेट्रिटस कहा जाता है इनको खा खाते हैं और खाते हैं इसके बाद इनके छोटे-छोटे टुकड़े तोड़ देते हैं जिससे कि इनका अपघटन हो जाता है और ये वापस प्रकृति में विलीन हो जाते हैं। ये पूरी प्रक्रिया जो प्रकृति के अंदर चल रही है। जीवों का पोषण फिर जीवों की मृत्यु एक समय के बाद फिर उनके शरीर का विघटन सड़ना गलना फिर उनका 51:59 मिट्टी में मिल जाना नष्ट हो जाना। फिर एक बार वहां से ऊर्जा का विमुक्त होना, विभिन्न तत्वों का निकलना और पर्यावरण को वापस प्राप्त हो जाना, फिर नए जीवों का निर्माण ये पूरा चक्र है। चल रहा है। इसे सृष्टि का चक्र या प्रकृति का चक्र आप कह सकते हैं। इसके बाद है खाद्य श्रृंखला। पारितंत्र में भोजन ऊर्जा को भोजन के रूप में एक प्राणी से दूसरे प्राणी तक पहुंचाने वाली जो कड़ी होती है, उसको कहा जाता है उत्पादक। मतलब शुरुआत यहीं से होती है ना यह कहने का मतलब है। तो उसको कहा जाता है खाद्य श्रंखला। ठीक है? कहने का मतलब यह कि ऊर्जा का ट्रांसफर हो रहा है एक व्यक्ति से एक ट्रॉपिक लेवल से दूसरे ट्रॉपिक लेवल में। दूसरे ट्रॉपिक लेवल से तीसरे ट्रॉपिक लेवल में और 100% नहीं ट्रांसफर हो रहा है। सिर्फ 10% रूल लागू होता है। 100% का भी 10% 100 का भी 10% फिर जितना 10% प्राप्त हुआ उसका भी 10% प्रतिशत मतलब कहने का तात्पर्य ये है कि ये जो 10% रूल है ये क्या होता है? घटाता जाता है ऊर्जा को। मतलब एक ट्रॉपिक लेवल से जब दूसरे 53:00 ट्रॉपिक लेवल में ऊर्जा का रूपांतरण होता है, ट्रांसफर होता है तो वहां पर ऊर्जा की मात्रा बहुत सीमित हो जाती है। यही वजह है कि खाद्य श्रंखलाएं बहुत ज्यादा लंबी नहीं होती है। ये चार या पांच ट्रॉपिक लेवल तक मैक्सिमम जाती है। उसके बाद लंबी नहीं खींच पाती है। वहीं समापन हो जाता है। तो ये कड़ी है। चराई खाद्य श्रृंखला या घास के मैदान की खाद्य श्रृंखला आप इसको कहेंगे। इसकी शुरुआत हरे पौधों से होती है। यानी स्वपोषी जो उत्पादक है वहीं से होती है। और इन स्वपोषी जीवों को खाने वाले शाकाहारी माफ़ कीजिएगा स्वपोषी जीव का मतलब यहां पर पौधों से है। तो इन पौधों को खाने वाले जो जीव है वो शाकाहारी जीव कहलाएंगे। और इन शाकाहारी जीवों को खाने वाले मांसाहारी होंगे। यह स्थलीय और जलीय दोनों पारितंत्रों में पाया जाता है। ध्यान दीजिएगा। इसके बाद एक और खाद्य श्रंखला यानी एक और फूड चेन बनती है जो कि है अपर्द खाद्य श्रंखला। इसमें मृत कार्बनिक पदार्थों से सब कुछ शुरू होता है। मरे हुए जो जीव हैं, सड़े गले पदार्थ हैं जिनके अंदर कार्बन मौजूद है वहां पर बैक्टीरिया काम करते हैं और वो क्या करते हैं? इन्हें छोटे-छोटे सरल अणुओं पे 54:01 तोड़ने का काम करते हैं। उससे उन्हें तो पोषण मिलता ही है। साथ ही साथ इनके जो जटिल अणु हैं, जटिल कार्बनिक पदार्थ है, पूरा जो जमा जमाया शरीर है वो विघटित हो जाता है और सड़ गल कर अंत में प्रकृति में विलीन हो जाता है। इसके बाद अब नंबर आता है खाद्य जाल का क्योंकि प्रकृति बहुत उलझी हुई चीज है। ये पूरा पारितंत्र सिर्फ एक फूड चेन से नहीं चल सकता है। सिर्फ कुछ प्रकार के प्राणियों से नहीं चल सकता है। अनगिनत प्रजातियां हैं और उतनी ही ज्यादा उलझी हुई फूड चेन है। एक फूड चेन बनी, एक खाद्य श्रृंखला बनी, फिर दूसरी बनी, फिर तीसरी बनी। और यह आसपास ही बनती गई। तो जब आसपास बनती गई, तो इनका आपस में इंटरेक्शन होने लगा। मतलब एक ट्रॉपिक लेवल वाली जो फूड चेन है, वो चली जा रही है। चली जा रही है। दूसरी उसके पैरेलल जा रही है। फिर तीसरी उसके पैरेलल जा रही है। और फिर इन्हें इन इन जो फूड चेन है, इनके अंदर जो मौजूद जीव जातियां हैं, वो एक दूसरे से लेनदेन कर रही हैं। मान लीजिए कि बीच में कहीं कोई कमी आ गई तो फिर ये जो जीव जातियां हैं ये क्या करेंगी? जो अपने बगल वाली सबसे नजदीकी फूड चेन होगी उससे कांटेक्ट करेंगी और वहां पर उपस्थित 55:01 पदार्थ से अपना काम चला लेंगी। इससे क्या होगा? यह प्रजातियां नष्ट होने से बच जाएंगी। भले ही जो संसाधन है वो सीमित हो गए। यहां पर मान लीजिए समाप्त हो गए तो संसाधन इन्होंने मतलब जो रिसोर्सेज हैं यहां से प्राप्त कर लिए। इनमें कम हुआ तो इन्होंने यहां से प्राप्त कर लिए। इनके अंदर जो कम है यहां से भी ले सकते हैं। मतलब आपस में इनका भी इंटरेक्शन चलता रहता है। तो ऐसे करके ये जो खाद्य श्रृंखलाएं हैं ना ये पूरा ऐसे जाल बन जाती है। उलझ जाती है। एक नेट तैयार हो जाता है। इसीलिए इसका नाम रखा गया है खाद्य जाल। ये खाद्य श्रृंखलाओं का ही पूरा आपस में तालमेल है यानी उलझा हुआ स्वरूप। तो एक जंतु जो है वह कई सारी खाद्य श्रंखलाओं का मेंबर हो सकता है। एक फूड नेट के अंदर आप देखेंगे कि एक प्राणी बहुत सारी खाद्य श्रंखलाओं में मेंबर हो सकता है। मतलब उन सभी खाद्य श्रंखलाओं में उसकी उपस्थिति को आप देख सकते हैं जहांजहां से कि उसकी आवश्यकताएं पूरी होती हो या जहां-जहां वो आवश्यकता पूर्ति का माध्यम बनता हो। दोनों चीजें ऊर्जा का प्रवाह हमेशा एक दिशा में होता है। लौट कर ऊर्जा नहीं आती है। ध्यान दीजिएगा। और हमेशा जब नीचे से ऊपर के स्तर में आप जाएंगे यानी पहले ट्रॉपिक लेवल से आखिरी ट्रॉपिक लेवल 56:03 में तो ऊर्जा की मात्रा हमेशा कम होती जाएगी। संख्या पिरामिड को देख लीजिए। पिरामिड तीन प्रकार के आपने पढ़े हैं पर्यावरण में और कंपाइलेशन में आप देखेंगे भी। तो पहला होता है नंबर पिरामिड यानी संख्या पिरामिड। प्रत्येक पोषी स्तर पर जीवों की संख्या का यह प्रतिनिधित्व करता है। प्रत्येक जो ट्रॉपिक लेवल होता है उस पर जीवों की तादाद को यह दिखाता है। और एक पारितंत्र का अगर आप संख्या पिरामिड बनाएंगे तो ये सीधा भी हो सकता है और उल्टा भी हो सकता है। अब ये इस पर निर्भर करता है कि पारितंत्र कौन सा है। घास के मैदान की अगर बात की करेंगे आप घास का मैदान अगर पारितंत्र है तो आप देखेंगे कि घास संख्या में ज्यादा है। घास तो बहुत बेतहाशा उगती है। अगर उनको पौधे के हिसाब से गिनना हो तो बड़ा टेढ़ा काम। है ना? तो घास के एक मैदान में आप घासों की तादाद गिन नहीं सकते। अनगिनत होती है। और उस पर रहने वाले जो मतलब आश्रित रहने वाले जो शाकाहारी जीव हैं उनकी तादाद घासों जितनी नहीं होती। कितने भी ज्यादा जीव हो, कितने भी कीड़े-मकोड़े हो या छोटे प्राणी हो लेकिन वो घास की संख्या जितने मात्रा में नहीं होंगे। उनसे कम होगी। और उन शाकाहारी 57:05 जीवों को खाने वाले जो मांसाहारी जीव हैं वो उन शाकाहारी जीवों की भी तुलना में कम होंगे। जैसे तुलनात्मक रूप से आप देखें कि एक घास का मैदान है बड़ा सा। है ना? अब उसमें बहुत सारे टिड्डे रह रहे हैं। क्रिकेट्स रह रहे हैं। ग्रॉस हॉपर रह रहे हैं और वो घास के जो तिनके हैं उनको खाते हैं। मतलब घास के अलग-अलग पार्ट्स का पार्ट्स को खाकर अपना पेट भरते हैं। अब इन टिड्डों को खाने वाले वहां पर मेंढक हैं। तो आप देखेंगे कि घास बहुत आयात है। पूरे मैदान को ढके हुए हैं। टिड्डों की संख्या उस घास की तुलना में कम है। और मेंढकों की तादाद इन टिड्डों की तुलना में इन जो क्रिकेट्स हैं इनकी तुलना में और कम है। अगर कुछ 1000 क्रिकेट्स वहां पर रह रहे हो मान लीजिए तो मेंढक उसकी तुलना में कुछ सैकड़े में ही होंगे। सैकड़े भी कम ही मतलब 50 60 की संख्या हो सकती है। एक घास के मैदान में उतने ही वयस्क मेंढक टिकेंगे या छोटे-छोटे बच्चों की गिनती करेंगे। ठीक है? मतलब कहने का ये कि घास की तुलना में जो उन पर निर्भर रहने वाले जीव हैं और फिर उन पर निर्भर रहने वाले जो मांसाहारी जीव हैं वो क्रमशः घटते जाएंगे। तो ऐसी परिस्थिति में जो घास वाला पिरामिड होगा 58:05 वो कैसा होगा? सीधा वो। ठीक है? जहां पर उत्पादकों की तादाद ज्यादा हो और उपभोक्ता उनकी तुलना में कम हो, वहां पर पिरामिड का आधार यानी जो बेस है वह हमेशा चौड़ा होता है। ऐसी स्थिति में पिरामिड हमेशा सीधा बनेगा। और अगर यही जो उत्पादक है ये संख्या में कम है और इन पर निर्भर रहने वाले उपभोक्ताओं की तादाद ज्यादा है तो पिरामिड कैसा बनेगा? उल्टा। क्योंकि इसका बेस जहां पर प्रोडक्शन हो रहा है वो तादाद जीवों की कम है। जीव द्रव्यमान का पिरामिड कैसा होता है? जैसे जो जलीय पारितंत्र है वहां पे ब्लू ग्रीन एल्ग को आप देखते हैं नील हरित शैवाल तो जनसंख्या इनकी तो बहुत ज्यादा होती क्योंकि रोज पैदा होते हैं लेकिन जितने रोज पैदा होते हैं उतनी ही तादाद में मरते भी है इनकी मोटैलिटी भी उतनी ही अच्छी खासी होती है तो परिणाम ये होता है कि जितने पैदा हुए उतने ही मरे तो सीमित मात्रा में होते हैं ठीक है और इन पर निर्भर रहने वाले जीव बहुत सारे तो ऐसी स्थिति में वहां पर पिरामिड उलट जाता है जीव द्रव्यमान यानी बायोमास वाला जो पिरामिड है उसका क्या हालचाल है यह हमेशा जो स्थलीय पारितंत्र होते हैं वहां पर 59:07 सीधा होता है। ठीक है? टेरेस्ट्रियल जो इकोसिस्टम है उसके अंदर ये सीधा होता है। और जब आप इसे जलीय पारितंत्र में ले जाएंगे एक्वाटिक इकोसिस्टम में तो वहां पर आप देखेंगे कि ये इनवर्टेड हो जाएगा यानी उल्टा हो जाएगा। ऊर्जा पिरामिड की हमेशा अच्छाई होती है कि ये सीधा होता है। ऊर्जा का प्रवाह हमेशा एक दिशा में होता है। वो कभी उलट नहीं सकता। तो यही बात है। आगे चलते हैं। ठीक है? ठीक है? अब यहां देखें अगर आप अगला टॉपिक तो ये है जैव भूरासायनिक चक्र यानी बायोकेमिकल साइकिल इसको कहा जाता है। और यह जो जियोकेमिकल साइकिल है इसमें आप समझ सकते हैं कि ये चक्रीय प्रक्रम है। जैसे जल चक्र है, नाइट्रोजन चक्र है, कार्बन चक्र है, सल्फर चक्र है। ये सभी जो है ये जीवो और पर्यावरण के माध्यम से तत्वों के संचलन या परिसंचण के रूप में परिभाषित किए जाते हैं। अब ये जो भूजव रासायनिक चक्र हैं, इनकी वैरायटी नीचे दी हुई है। जैसे कि पहला है आपका कार्बन चक्र। कार्बन वह भू कार्बन चक्र की बात की जा रही है। कार्बन चक्र वह भूजव रासायनिक चक्र है जिसमें कि पृथ्वी पर ठीक है? पृथ्वी पर कार्बन, 1:00:08 मृदा, जल और वायुमंडल में विनियमित होता है। यानी लेनदेन कार्बन का होता है। कार्बन डाइऑक्साइड वायुमंडल में मौजूद है थोड़ी मात्रा में। तो वहां से कार्बन डाइऑक्साइड को हरे पौधे ग्रहण कर रहे हैं। ऑक्सीजन को छोड़ रहे हैं। अब वह कार्बन डाइऑक्साइड उसका जो कार्बन है वो हरे पौधों के अंदर संचित हो रहा है। ठीक वैसे ही जो जीवित प्राणी है वो क्या कर रहे हैं? वो कार्बन डाइऑक्साइड को छोड़ रहे हैं। ऑक्सीजन को ग्रहण कर रहे हैं। तो कार्बन का भंडारण एक तो हरे पौधों के अंदर है। हरे पौधों का सेवन जो करेगा उसको भी कार्बन प्राप्त होगा और उसके अंदर कार्बनिक पदार्थों का संचय होता जाएगा। कार्बनिक यौगिकों का संचय होगा। जब वो प्राणी मरेगा तो वहां से भी कार्बन मुक्त होगा। प्लस जो जीवित जीवधारी है वो मुक्त कर रहे हैं कार्बन मतलब कार्बन डाइऑक्साइड तो वहां से कार्बन डाइऑक्साइड रिलीज हो रही है। तो यह पुनर्चक्रण चलता रहता है। हरे पौधों के द्वारा कार्बन डाइऑक्साइड को अब्सॉर्ब किया जाता है और बाकी जो जीवित प्राणी हैं जो कि आमतौर पर उपभोक्ता हैं वह कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं। तो वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड जो है ये कार्बन का एक महत्वपूर्ण स्रोत है और यह 1:01:09 चक्र वायुमंडल में कार्बन का संतुलन बनाए रखता है जो कि संतुलन अभी बिगड़ता जा रहा है। क्योंकि जितना मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड रिलीज हो रही है उतनी ज्यादा मात्रा में खपाई नहीं जा पा रही है। क्योंकि इसे खपाने वाले एकमात्र माध्यम है हरे पौधे और उनकी तादाद हमने पहले से ही सीमित कर दी है और कम होते जा रहे हैं खत्म होते जा रहे हैं। दूसरी ओर कार्बन का उत्सर्जन बढ़ता जा रहा है। तो ऐसी स्थिति में एक असंतुलन होना स्वाभाविक है और वो समस्या उत्पन्न कर रहा है। ये जो ग्लोबल वार्मिंग हम लोग चिल्ला रहे हैं वो उसी की वजह से हो रही है। हालांकि अकेली कार्बन डाइऑक्साइड जिम्मेदार नहीं है लेकिन सबसे बड़ा विलयन यही है। इसके बाद नाइट्रोजन चक्र को आप देख रहे हैं तो नाइट्रोजन चक्र भी एक जैव भू रासायनिक चक्र है निसंदेह जो कि प्रकृति में नाइट्रोजन और कार्बनिक माफ कीजिएगा नाइट्रोजनिक जो यौगिक हैं उनके रूपांतरण को सीधा दर्शाता है। आप जानते हैं कि वायुमंडल में सबसे ज्यादा तादाद में पाई जाती है नाइट्रोजन और नाइट्रोजन एक तटस्थ गैस है जो कि आग को जलने में सपोर्ट नहीं करती है। ये तो इसका रासायनिक गुण हो गया। वायुमंडल पर वायुमंडल जो है यह पृथ्वी में पूरी पृथ्वी के चारों ओर के 1:02:10 जो आसपास की चीजें हैं उनमें मौजूद सबसे बड़ा भंडार है नाइट्रोजन का। पौधे मूल रूप से मिट्टी से नाइट्रेट देख रहे हैं नाइट्रेट और अमोनियम इन आयनों के रूप में इनके ऊपर जो माइनस और प्लस चार्ज लगा है उससे आप समझ लीजिएगा कि ये आयन है। नाइट्रेट और अमोनियम जो है ये आयन है। तो इन आयनों के रूप में नाइट्रोजन को पौधे ग्रहण करते हैं। और वहां वो भी कहां से ग्रहण करते हैं? मिट्टी से ग्रहण करते हैं और जंतु पौधे या अन्य जो जीव हैं मतलब जितने भी जीवित प्राणी हैं उनको भोजन के रूप में ग्रहण कर करने के लिए मतलब भोजन के जो आवश्यक तत्व है वो ग्रहण करते हैं। उसमें नाइट्रोजन की भी आवश्यकता होती है। नाइट्रोजन आपको प्रोटीन आपके शरीर में प्रोटीन अहम चीज है उसके बिना शरीर बनेगा ही नहीं। तो प्रोटीन को बनाने के लिए नाइट्रोजन चाहिए। न्यूक्लिक अम्लों को बनाने के लिए नाइट्रोजन की आवश्यकता मतलब ये एक अनिवार्य घटक है। आवश्यक घटक नहीं है बल्कि अनिवार्य घटक है। 78% हिस्सा हमारे वायुमंडल का इसी से बना हुआ है। और नाइट्रोजन जीवन के लिए आवश्यक बहुत सारे अणुओं में पार्टिसिपेट करता है। जैसे कि प्रोटीन के अलावा न्यूक्लिक एसिड जो है 1:03:11 डीएनए आरएनए और बहुत सारे विटामिंस भी ऐसे हैं। नाइट्रोजन चक्र की कुछ पांच प्रक्रियाएं होती है जिन पर कि आयोग बार-बार प्रश्न पूछता है और वो प्रश्न आपके यहीं से हल हो जाएंगे। ज्यादा आपको भागने की जरूरत नहीं पड़ेगी। ये जो लिस्टिंग का वीडियो है ना थोड़ा सा हो सकता है कि मेरे प्रवचन करने की वजह से लंबा खींच जाए। लेकिन अगर आप इसे इत्मीनान से देख लेते हैं तो बहुत सारे प्रश्न और अगर संयोग अच्छा रहा मान लीजिए कि चांस बहुत बढ़िया रहा तो लगभग सारे प्रश्न आप हल करने में सक्षम होंगे। कोई भी एनवायरमेंट का क्वेश्चन गलत नहीं होगा। सारे तथ्य हमने समेट के इसमें इकट्ठे कर लिए। तो नाइट्रोजन स्थिरीकरण की बात हो रही है। गैसीय नाइट्रोजन का अमोनिया में कन्वर्ट होना। ठीक है? जो गैसीय नाइट्रोजन है, गैस की अवस्था में वायुमंडल में मौजूद नाइट्रोजन है, वह अमोनिया में कन्वर्ट हो रही है। तो उसको हम कहेंगे नाइट्रोजन स्थिर हो रही है। नाइट्रोजन का स्थिरीकरण हो रहा है। इसके बाद एक और प्रक्रिया होती है नाइट्रीकरण। यहां पर अमोनिया जो है ये नाइट्रेट या फिर नाइट्राइट। या तो नाइट्रेट में या फिर नाइट्राइट में बदल जाती है। इसके बाद तीसरा प्रोसेस है 1:04:12 स्वांगीकरण। नाइट्रेट और अमोनिया का मतलब हमने क्या देखा कि नाइट्रो अमोनिया जो है वो पहले नाइट्राइट या नाइट्रेट में बदली। अब ये जो नाइट्रेट या नाइट्राइट है ये क्या कर रहे हैं? ये प्रोटीन अथवा डी एन ऐ में बदल जा रहे हैं। और अमोनीकरण में क्या होगा? अब ये प्रोटीन और डीएनए में बदले तो कोई नया जीव बना। अब वह जीव कुछ लंबे समय तक जिया उसके बाद समाप्त हो गया। जब समाप्त हो गया तो जो मरा हुआ उसका शरीर है या जो उसके अपशिष्ट हैं उनका फिर से अमोनिया में कन्वर्ट होना यही कहलाता है अमोनीकरण। और फिर अंतिम प्रक्रिया है विनाइट्रीकरण। यहां एक बार फिर से नाइट्रेट जो है वह वापस गैसीय नाइट्रोजन में बदल जाता है और वायुमंडल को वापस दे दिया जाता है। यानी जहां से आया था वहीं चला गया। जलचक्र क्या इसमें देख सकते हैं आप? जल चक्र बाकी चक्रों जितना उलझा नहीं है। बिल्कुल सीधा है। इसमें आप देखें कि वायुमंडल, जलमंडल, स्थलमंडल, जीवमंडल इनके बीच में जल की निरंतर गति और पुनर्चक्रण की ये प्रक्रिया है। वाष्पीकरण, वाष्पोत्सर्जन, संघनन, वर्षण, अंत्यसंधन, 1:05:13 अधश्रवण, सतही अपवाह, भूजल प्रवाह ये सब सारी प्रक्रियाएं हैं। थोड़ा सुनने में नाम कठिन लग सकते हैं। लेकिन ये जलचक्र की ही प्रक्रियाएं हैं। जैसे ही पानी घुलनशील खनिज युक्त चट्टानों में से या उनके ऊपर से बहता है। चट्टानों के ऊपर से होकर पानी बहता है। यह कोई अचंभे की बात तो है नहीं। आप आराम से समझ सकते हैं। नदियों का पानी, झरने का पानी या किसी और स्रोत का पानी। तो जो चट्टानों में मौजूद खनिज होते हैं क्योंकि पानी का बहाव है तो पानी घर्षण कर रहा है चट्टान के साथ। तो चट्टान के भी जो तत्व है वो पानी में मिलते जाते हैं, मिलते जाते हैं। तो कुछ खनिज जो है वो पानी में घुल जाते हैं। और इस प्रकार से नदियां भूमि से समुद्र तक कई पोषक तत्व ले जाती हैं। और इसका उपयोग समुद्री जीवों द्वारा किया जाता है। नदियां आजकल पोषक तत्व से ज्यादा प्रदूषण ले जा रही है समुद्र में और समुद्र के अंदर जो डायरेक्ट प्रदूषण जा रहा है वो तो कहना ही क्या? दोनों मिलकर महासागर को भी तबाह किए हुए हैं। और समुद्र और नदी के बीच में सबसे बड़ा अंतर यही है कि नदी तो प्रदूषित होगी और उसमें बहाव अगर बना रहा तो धीरे-धीरे 1:06:14 करके मान लीजिए कि प्रदूषण को हमने स्टॉप कर दिया। मतलब जितना अपशिष्ट हम नदी के अंदर गिरा रहे हैं या जा रहा है उन सबको हमने रोक दिया जो कि नहीं रोक रहे हैं अभी तत्काल में। लेकिन अगर ऐसा कर दिया तो नदी साफ हो जाएगी। ठीक है? नदी में बहाव है तो कचरा धीरे-धीरे करके साफ हो जाएगा। पानी क्लियर हो जाएगा। लेकिन समुद्र का क्या? समुद्र को आप साफ भी नहीं कर सकते। वो एक ऐसे गंदे गड्ढे की तरह से बन जाएगा जिसके अंदर कचरा अब जमा हो चुका है। और वो इतनी ज्यादा मात्रा में है कि उसे आप कहीं भी ले आकर डंप नहीं कर सकते। है ना? दूसरी पृथ्वी तैयार हो जाएगी। और उसके अंदर अगर रहने दिया तो वो एक गटर वाली स्थिति है कि उसके अंदर बहाव ही नहीं है। नदी में तो गनीमत थी कि बहाव था। यहां बहाव नहीं है। पानी उसी के अंदर सड़ रहा है। तो एक प्रदूषित तालाब जैसा बड़े तालाब जैसा समुद्र बन जाएगा। फिलहाल आगे देखें तो नदियां आमतौर पर करती क्या है? अपने साथ जो पोषक तत्व ले जाती है वो समुद्र में उेल देती हैं। समुद्र के अंदर जो न्यूट्रिएंट्स की आपूर्ति होती है वो ऐसे ही होती है। तो जल एक चक्रीय रूप में किसी भी पारितंत्र के एक घटक से दूसरे घटक में जाता रहता है। अब समुद्र में नदियों का 1:07:16 पानी गया। वहां पर जो जीवधारी है वो उससे पोषण प्राप्त कर रहे हैं। उसके बाद फिर समुद्र के पानी का वाष्पीकरण हो गया। वाष्प बनकर उड़ा। आसमान में गया। बादल बने। वहां से संघनन हुआ। फिर पानी बरसा। है ना? तो ये सामान्य प्रक्रिया है। इसके बाद ऑक्सीजन चक्र है। पृथ्वी पर बहुत अधिक मात्रा में तो नहीं लेकिन हां एक अच्छी मात्रा में पाया जाने वाला तत्व है। सबसे ज्यादा तो नाइट्रोजन पाया जाता है। और इसकी मात्रा मूल रूप से वायुमंडल में 21% है। आणविक ऑक्सीजन होती है। मतलब ऑक्सीजन का एक अणु होता है जिसमें कि ऑक्सीजन के दो परमाणु पाए जाते हैं। O2 का यही मतलब है। ऐसे ही ओजोन को आप देखते हैं तो ये ओजोन का एक अणु है जिसमें कि ऑक्सीजन के तीन परमाणु होते हैं। तो ये टू और थ्री का यही मतलब यहां होता है। फिलहाल आप जानते भी हैं। तो कार्बन डाइऑक्साइड और जलवाष्प जैसे यौगिकों में भी ऑक्सीजन पाई जाती है। भूपर्पटी यानी जो अर्थ की क्रस्ट है वहां पर ये धातुओं और जो सिलिकॉन के ऑक्साइड है अब सिलिकॉन डाइऑक्साइड है तो उसमें क्या है? ऑक्सीजन मौजूद है। तो वहां भी ये यौगिक अवस्था में होती है। कार्बोनेट, सल्फेट, नाइट्रेट इस तरह के जो पदार्थ होते हैं, खनिज होते हैं उनमें पाई जाती 1:08:18 है। अगर हम अपने शरीर के अंदर या अन्य जीवधारियों के शरीर के अंदर देखें तो जितने भी जैविक अणु है, जैविक अणुओं में जैसे कार्बोहाइड्रेट्स ठीक है? कार्बोहाइड्रेट्रेट्स, प्रोटीन, न्यूक्लिक एसिड, वसा, लिपिड जो भी आप कहिए मतलब इन सभी के लिए ऑक्सीजन एक अनिवार्य घटक है। तो ऑक्सीजन चक्र ये नियंत्रित होता है और ऑक्सीजन चक्र को विनियमित करने वाले जो एकमात्र स्रोत है वो हरे पौधे हैं। वही कार्बन डाइऑक्साइड को प्रोसेस करके ऑक्सीजन रिलीज करते हैं। ऑक्सीजन को बाहर छोड़ते हैं। और कोई ऐसा हमारे पास इंस्ट्रूमेंट नहीं है जिससे कि हम ऑक्सीजन को छुड़वा सके इतने बड़े पैमाने पर। तो यह ऑक्सीजन का उत्सर्जन करके बाकी जीवधारियों को बांटने का और पूरे ऑक्सीजन चक्र को नियंत्रित करने का काम हरे पौधे करते हैं या यह जो उत्पादक है ये करते हैं। मतलब फोटोसिंथेसिस की प्रक्रिया जहां-जहां होगी वहां वहां ये चीज होगी। तो इनकी तादाद सिकुड़ती जा रही है। ये चिंताजनक बात है। अब यहां मामला बदल गया है। हम भूजव रासायनिक चक्र को पहले ही देख चुके हैं। अब हमें देखना चाहिए 1:09:18 वन्य जीव संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण कानून और नीतियां। यहां से भी बहुत तेज प्रश्न पूछे जाते हैं। तो आइए बिना देर किए देखना आरंभ करते हैं। देखिए कानून दिया है, वर्ष दिया है, उद्देश्य दिया है। सबसे पहले भारतीय वन अधिनियम है 1927 का है अंग्रेजों के समय का। बताइए किस अंग्रेज का जमाना था? और उसके बाद आप देखें इसका उद्देश्य क्या रहा होगा? उद्देश्य था वनों का संरक्षण करना, वन अपराधों की रोकथाम करना और वन्य जीवों की सुरक्षा करना। इसके बाद वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 का है। लुप्त प्राय प्रजातियों की सुरक्षा, राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारणों की स्थापना। यह इसका उद्देश्य था। सीधे-सीधे हम लोग 1927 से 1972 में आ गए। तो आजाद भारत का ये सबसे पहला प्रयास था। उसके बाद फिर एक के बाद एक आते हैं। जैव विविधता अधिनियम है। ध्यान दीजिएगा कि यहां पर हम वन्य जीवों की बात कर रहे हैं। पूरे पर्यावरण की बात नहीं कर रहे हैं। पर्यावरण संरक्षण वाले अभी नीचे आएंगे। तो जैव विविधता अधिनियम है। 2002 में आया था। 1:10:19 जैव विविधता का संरक्षण, जैविक संसाधनों का सतत इस्तेमाल यह इसका उद्देश्य था। वन अधिकार अधिनियम 2006 का है। वनवासियों और जनजातीय समुदायों के वन अधिकारों की रक्षा इसका पर्पस। तो दो ये 1927, 1972, सन 2002 और 2006। इसके पश्चात अब हमें देखने चाहिए पर्यावरण संरक्षण कानून। तो सबसे पहले 1986 वाला ही आएगा। सीधी बात है पर्यावरण की सुरक्षा और प्रदूषण पर नियंत्रण। यह इसकी सबसे अहम प्राथमिकता थी। ठीक है? सबसे मुख्य प्राथमिकता थी। और उसके बाद नंबर आता है जल प्रदूषण निवारण और नियंत्रण अधिनियम जो कि 1974 का है। ये पर्यावरण संरक्षण अधिनियम से भी पहले वाला है। इसमें क्या था कि जल संसाधनों की रक्षा करेंगे और जल प्रदूषण को रोकेंगे। अधिनियम बना देना सरल है। एक लंबी चौड़ी मेज पर एसी वाले हॉल में बैठकर चर्चा कर लेना और आसान है। लंबे-लंबे भाषण देना मेरी तरह वो भी बहुत आसान काम है। लेकिन इन तरीकों को अमल में ले आना और मानना स्वीकार करना कि 1:11:21 हम सिर्फ उतना ही प्रकृति से लें जितना कि आवश्यकता है। उससे ज्यादा एक टुकड़ा भी ना लें। लोभ ना करें। यह बहुत मुश्किल काम है और मनुष्य यही नहीं कर पा रहा है। बाकी सब कर रहा है लेकिन यह नहीं कर पा रहा है और यह जब तक नहीं करेगा तब तक कुछ नहीं होगा। तो जल प्रदूषण निवारण और नियंत्रण अधिनियम जो है ये आप देख रहे हैं। इसके बाद वायु प्रदूषण निवारण और नियंत्रण अधिनियम ठीक वैसे ही जैसे पानी वाला था वैसे ही हवा वाला ये 1981 में आता है। इसका भी पैटर्न वही है। वायु की गुणवत्ता बनाए रखेंगे और वायु प्रदूषण को कम करेंगे। राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एक्ट जो है यह एनजीटी एक्ट आपका 2010 का है। पर्यावरण से जुड़े हुए मामलों में तुरंत सुनवाई क्योंकि अदालत में अगर जाएगा जो आपके हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट है या स्थानीय अदालतें हैं तो वहां फाइलों के पुलिंदे और मुकदमों के ढेर वैसे ही जमा रहते हैं। जजों के ऊपर काम का बोझ वैसे ही इकट्ठा रहता है। बोझ तले सब दब रहे होते हैं। अब उसमें पर्यावरण का कोई मुद्दा पहुंच गया कि इतने सारे पेड़ काट दिए गए या यहां पर अवैध खनन हो रहा है या जो कुछ भी तो वह मामला एक अलग से उसमें सर 1:12:23 दर्द बन जाएगा और ऐसे मामलों में तत्काल एक्शन की आवश्यकता होती है। हालांकि सारे मामलों में त्वरित कार्रवाई ही चाहिए लेकिन इसमें तो चाहिए ना तत्काल। कोई जंगल कट रहा है अगर तत्काल एक्शन नहीं लेंगे तो फिर बाद में क्या करेंगे? वहां पर सूना उजाड़ मैदान देखने आएंगे। नहीं ना? तो तत्काल में एक्शन की आवश्यकता होती है। इसलिए त्वरित कार्रवाही के लिए ये काम किया गया था। एनजीटी यानी जो ट्रिब्यूनल है उसकी स्थापना की गई। इसके बाद आगे बढ़े कुछ पर्यावरण संरक्षण नीतियां हैं। शुरू करते हैं 1988 से। पहली है वन संरक्षण नीति या राष्ट्रीय वन नीति इसको कहा जाता है। वन संरक्षण नीति के नाम से आए तो आप कंफ्यूज मत होइएगा। ये राष्ट्रीय वन नीति ही है। और ये कब वाली है? तो 1988 की है। पर्यावरणीय स्थिरता और पारिस्थितिकी संतुलन का अनुरक्षण करना। ठीक है? सुरक्षा करना ये इसका उद्देश्य था। राष्ट्रीय जैव विविधता कार्य योजना मतलब ये एक्शन प्लान था 2008 का और इस एक्शन प्लान का अंततः उद्देश्य था जैव विविधता का संरक्षण और सतत इस्तेमाल मतलब उपयोग भी करें और 1:13:23 संरक्षण भी करें दोनों चीज जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना ये भी एक एक्शन प्लान 2008 का ही है। जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए एक नवीकरणीय ऊर्जा और जल और कृषि सुधार पर आधारित रिपोर्ट थी ये। इसके बाद राष्ट्रीय पर्यावरण नीति 2006 सतत विकास की अवधारणा तब तक आ चुकी थी और काफी चर्चित हो गई तो सतत विकास और पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा। जहां हमें पर्यावरण से संबंधित या प्रकृति से जुड़ी हुई किसी आफत का समाधान नहीं सूझता है ना, वहां पर हम ये शब्द बहुत शौक से चिपका देते हैं। सतत विकास कि सस्टेनेबल सारा डेवलपमेंट होगा और आजकल एआई जो है कुछ शब्दों को बहुत इत्मीनान से इस्तेमाल करता है। सस्टेनेबल फ्लेक्सिबल और उसको हिंदी में ट्रांसलेट करेगा तो कहेगा कि सतत और लचीला लचीली इमारतों का निर्माण किया गया। सुनकर आपको हंसी आती होगी लचीली इमारतें कैसी होती है? रबर जैसी होती है। वहां पर फ्लेक्सिबिलिटी का मतलब यह नहीं होता। फ्लेक्सिबिलिटी का मतलब यह होता है कि प्रकृति के जितने थपड़े हैं, प्रकृति की जितनी विसंगतियां है, आपदाएं हैं, उनको झेल सके, ऐसा निर्माण हम करें और वास्तव 1:14:25 में ऐसा निर्माण संभव ही नहीं है। अगर प्रकृति नष्ट करने पर तो लाए तो कुछ नहीं बचेगा। आप जितनी भी फ्लेक्सिबिलिटी आजमा लीजिए कोई दिक्कत नहीं। तो मतलब यह है कि जहां हमें कुछ नहीं सूझता है वहां हम सस्टेनेबल शब्द चिपका देते हैं। चलिए किताबी ही ज्ञान यहां लेना भी है। तो देखिए तो यहां कहा गया कि जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना ये 2008 की है। अच्छा इसके बाद राष्ट्रीय पर्यावरण नीति जो है ये 2006 की है। यहां देखिए सतत विकास और पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा इसका उद्देश्य है। प्रथम राष्ट्रीय जल नीति 1987 की है। सितंबर 1987 में लागू की गई उसके बाद 2002 और 2012 में संशोधित किया गया। इसको अपडेट किया जाता है समय के साथ-साथ। कुल मिलाकर 2012 वाली जो वाटर पॉलिसी है वो अपने देश में चल रही है वर्तमान में। अभी क्या चल रहा है वो आपको एग्जैक्टली पता होना चाहिए। करंट सिचुएशन मालूम होनी चाहिए। ठीक है? अब इसके बाद अगला जो हमारा तथ्य है ये काफी ज्यादा इंपॉर्टेंट है। अभी तक जो पढ़ा वो भी महत्वपूर्ण था। सब कुछ यहां इंपॉर्टेंट है। एक भी पेज स्किप करने लायक नहीं है। तो देखें आप यहां पर भारत में 1:15:27 राष्ट्रीय उद्यान कौन-कौन से हैं? और पहली चीज तो राष्ट्रीय उद्यान होता क्या है? नेशनल पार्क क्या होते हैं? तो नेशनल पार्क यानी राष्ट्रीय उद्यान ये ऐसे क्षेत्र होते हैं जिसे कि राज्य सरकार द्वारा वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत वन्य जीव और उसके पर्यावरण संरक्षण संवर्धन और विकास के लिए घोषित किया गया। यह घोषित क्षेत्र होते हैं। इन्हें उच्च सुरक्षा प्रदान की जाती है। पशुओं की चराई यहां पर पूरी तरह से प्रतिबंधित होती है। वन्य जीवों और वन उपज का विनाश करना पाबंद होता है। ऐसा नहीं कर सकते। उनका दोहन नहीं कर सकते और यहां से हम किसी भी जीव प्रजाति को बाहर नहीं ले जा सकते जब तक कि अपरिहार्य स्थिति ना बने और सरकारी सहमति ना बने। कुल मिलाकर हर प्रकार की जो अवैध गतिविधियां होती हैं जो कि जीवों को डिस्टर्ब करें। पारिस्थितिकी को डिस्टर्ब करें वो सब यहां पर प्रतिबंधित होती हैं। सिवाय उन परिस्थितियों के जिनकी कि अधिनियम के तहत विशेष रूप से अनुमति दी गई है तो वो विशेष परिस्थितियां हर जगह होती हैं। अनुमत प्रावधानों के तहत निष्कासित वन उपज 1:16:28 का उपयोग नेशनल पार्क के अंदर और आसपास रहने वाले लोगों की व्यक्तिगत और वास्तविक जरूरतों के लिए किया जा सकता है। लेकिन हम व्यवसायिक उद्देश्य से हरगिज़ नहीं कर सकते। तो निश्चित तौर पर भारत में अगर देखा जाए तो यह जो नेशनल पार्क है यह आईयूसीएन की संरक्षित श्रेणी वाली जो मतलब क्षेत्र प्रबंधन श्रेणी जो है उसकी कैटेगरी टू के अनुरूप माने जाते हैं। ठीक है? उसकी जो कैटेगरी नंबर टू है सेकंड है उसके अंतर्गत माने जाते हैं। और भारत में ऐसा पहला राष्ट्रीय उद्यान बना था हेली नेशनल पार्क। हेली नेशनल पार्क जो है ये 1936 में स्थापित किया गया था। और वही नेशनल पार्क अभी जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क के नाम से जाना जाता है। जिम कॉबेट जो है वह एक शिकारी थे। अंग्रेज शिकारी थे। वन्य जीव संरक्षण और रामगंगा नदी इस पार्क के बीच से होकर गुजरती है। तो इसीलिए इसका नाम रामगंगा नेशनल पार्क करने की करने का प्रस्ताव था। लेकिन अभी तक हुआ नहीं। तो वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 भारत में वन्य जीव संरक्षण के लिए कानूनी ढांचा देता है। जो आधार मिलता है ना वन्य जीवों की सुरक्षा का कि अच्छा इस जीव का शिकार 1:17:28 करेंगे तो ये सजा हो सकती है। इसके शिकार करने पर कोई पाबंदी नहीं है। इसको मार सकते हैं या इसके लिए कोई खास सजा नहीं होती है। हल्की सजा होती है। ये सब कहां से मालूम होता है? तो उसका स्रोत यही है 1972 का ये जो वाइल्ड लाइफफ़ प्रोटेक्शन एक्ट और प्रोजेक्ट टाइगर 1972 की चर्चा हो रही है। 73 की बात ना करें ऐसा नहीं हो सकता है। तो प्रोजेक्ट टाइगर का शुभारंभ हुआ था 1973 में और बाघों के यथास्थान यानी इन सीटों संरक्षण और उनकी आवास की सुरक्षा के लिए ये काम किया गया। जितने जोशखरोश के साथ हमने बाघों की सुरक्षा पर ध्यान दिया उतना ही अन्य जीव जातियों की सुरक्षा पर ध्यान दिया होता तो यह नौबत नहीं आई होती। बहुत सारे जीव जो है वो विलुप्त होने की कगार पर तब तक पहुंच गए और बहुत से हो भी गए और अभी अगर हाथियों पर हमने ध्यान नहीं दिया तो ये जो एशियन एलीफेंट्स हैं ये भी लुप्त हो जाएंगे और दिखाई नहीं देंगे। इनकी भी स्थिति डायनासोरों वाली हो जाएगी। बाघ को तो हमने बचा लिया। अभी हाथी उससे भी ज्यादा संकट में है। लोगों को महसूस नहीं हो रहा है लेकिन उसकी स्थिति और ज्यादा खराब होती जा रही है। इसके बाद आप देखेंगे हेमिस राष्ट्रीय उद्यान। ये बात नहीं है कि 1:18:29 हाथियों के संरक्षण के लिए सरकार प्रयास नहीं कर रही है। लेकिन उस जज्बे के साथ नहीं कर रही। हेमिस राष्ट्रीय उद्यान केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख में है। क्षेत्रफल के लिहाज से भारत का सबसे बड़ा है। मतलब एरिया वाइज इसका जो साइज है कितना है? तो तीन 3500 स्क्वायर कि.मी. से भी ज्यादा है। ठीक है? अब 3500 कि.मी. बहुत बड़ा दायरा होता है। यह जो ट्रांस हिमालय वाला क्षेत्र है, वहां पर एक उच्च ऊंचाई वाला संरक्षित क्षेत्र है और काफी दुर्गम इलाका है। विशेष रूप से यहां का जो स्नो लेपर्ड है, वह काफी फेमस। भारत का सबसे छोटा राष्ट्रीय उद्यान या तो सबसे बड़े साइज का था हेमिस लद्दाख वाला और सबसे छोटा है साउथ बटन। जैसा इसका नाम है वैसा ही इसका साइज है बटन। ठीक है? तो ये जो बटन आइलैंड है ये साउथ बटन आइलैंड नेशनल पार्क अंडमान निकोबार द्वीप समूह में मौजूद है। ठीक है? है। अंडमान निकोबार द्वीप समूह में मौजूद है। यह पार्क रानी झांसी समुद्री राष्ट्रीय उद्यान का ही हिस्सा है और हैवलाक द्वीप द्वीप से 24 कि.मी. की दूरी पर समुद्री राष्ट्रीय उद्यान भी है। ये कच्छ की खाड़ी जामनगर 1:19:30 यानी गुजरात में मौजूद है। 1982 में बनाया गया था। किंबबुल लमजाऊ नेशनल पार्क ये है। मणिपुर का ही है। तैरता हुआ नेशनल पार्क। यहां जो घास पाई जाती है वो पानी की एक कीचड़ वाली सतह पर तैर रही है और किबुल लमजाऊ में जो पानी है ये लोकटक झील मतलब किंबुल लमजाऊ नेशनल पार्क का नाम है और जो वहां तैरती हुई घास की जमीन है वो एक झील के ऊपर है और वह जो दलदली झील है वो लोकटक कही जाती है। ठीक है? उस लेखक को लोकटक कहा जाता है। वहां एक विशेष प्रजाति का हिरण पाया जाता है जिसको कि शंगाई कहते हैं। जब वह घास की इस गुदगुदी जमीन पर गद्देदार जमीन पर चलता है ऐसा लगता है डांस कर रहा है। इसलिए उसको डांसिंग डियर भी कहा जाता है। नृत्य करता हुआ हिरण। तो किबुलमजाऊ नेशनल पार्क में जो ये पानी आता है लोकटक झील के अंदर ये किस चीज का पानी है? कहां से आता है? यह ब्रह्मपुत्र का पानी है और कुछ नहीं। ठीक है? ब्रह्मपुत्र का ही पानी गहरे स्थान पर इकट्ठा हो गया है। इसके बाद आगे चलें। जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान यानी वही हेली नेशनल पार्क आप देखते हैं। यहां देखिए सबसे पुराना नेशनल पार्क जिम कार्बेट उद्यान का 1:20:32 पुराना नाम भी दे दिया है। अभी पीछे देख कर आए हैं। इसमें कुछ नई बात नहीं है। अच्छा दुधवा को देख लीजिए। गैंडा परियोजना यहीं से चलाई गई थी 1984 में और बाघ परियोजना की शुरुआत उत्तराखंड में जिम कार्बेट से ही की गई थी। प्रोजेक्ट टाइगर जो है वो स्टार्ट हुआ था जिम कॉबेट से। इसको याद रखिएगा। अब यहां पर भारत की कुछ क्रिटिकल कंडीशन वाले जो नेशनल पार्क हैं उनको देख लीजिए। क्रिटिकल इस मामले में भी हैं क्योंकि यह दुर्गम इलाकों में है और क्रिटिकल इस मामले में भी है इनकी जो चरम स्थिति है वो इसलिए भी है कि यह अपनी पारिस्थितिकी के लिए जाने जाते हैं और इन पर खतरा भी उतना ही ज्यादा है। ठीक है? सबसे पहले है नामदफा। नामदफा का जब नाम आता है तो हमारे दिमाग में उड़ने वाली गिलहरी आ जाती है जो कि अपनी झबरी पूंछ को पैराशूट की तरह यूज़ करके छलांग लगाती है। लगता है उड़ रही है। ठीक है? तो नामदफा नेशनल पार्क जो है ये अरुणाचल में है। सबसे पूर्वी सिरे पर है ये भारत के जहां की अरुणाचल और म्यांमार की सीमा आपस में मिल जाती है। यानी भारत और म्यांमार के बॉर्डर आपस में मिलते हैं। ये सबसे पूर्वी हो गया। सबसे उत्तरी हेमिस है। लद्दाख में है। यह आपका स्नो लेपर्ड 1:21:33 है। इसकी जैव विविधता हिमालय पारितंत्र के हिसाब से है। इसके बाद कच्छ की खाड़ी वाला सबसे पश्चिमी है। वेस्टर्न मोस्ट मरीन नेशनल पार्क इसको कहा जाता है। ये डॉल्फिन को आप देख रहे हैं। इसके बाद आप सबसे दक्षिण वाले को भी देख लीजिए। ये गैलिथिया बे है। गैलिथिया बे पड़ेगा। अंडमान निकोबार द्वीप समूह में। सबसे दक्षिण का हो गया। और मन्नार की खाड़ी वाला जो है वो भारत के मुख्य भूभाग पर। वैसे तो ये द्वीप है ना अंडमान वाला। भले ही भारत का द्वीप है लेकिन ये भारत की मुख्य भूमि से लगा तो है नहीं अलग बिखरा हुआ है समुद्र में तो अगर मुख्य जो जमीन है भारत की ये वाली निचला हिस्सा वहां पे सबसे दक्षिणी अगर देखा जाए तो ये मन्नार की खाड़ी समुद्री राष्ट्रीय उद्यान है ये तमिलनाडु के तट पर है सबसे दक्षिणी तो ये सारे जो यहां उद्यान है इन्हें आपने देखा कुल मिलाकर भारत में 107 ऐसे नेशनल पार्क 107 नेशनल पार्क हैं और राज्यवार इनको हम अब देखने जा रहे हैं जो कि मोस्ट इंपॉर्टेंट है। आंख एकदम खोलकर और कान खड़े कर कर सुनिए और देखिएगा। देखिए इसमें राज्य का नाम दिया है, राष्ट्रीय उद्यान 1:22:33 का नाम दिया है, जिला क्षेत्र दिया है। और हां अधिसूचित कब किया गया था इन्हें? बतौर पार्क वो दिया हुआ है। तो उत्तर प्रदेश में सिर्फ एक है दुधवा। ठीक है? और ये दुधवा नेशनल पार्क लखीमपुर खीरी में पड़ता है। 1977 का है। उत्तराखंड में छह हैं टोटल। जिम कार्बेट, गंगोत्री, गोविंद, नंदा देवी और राजाजी। राजाजी किस नाम पर? चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के नाम पर। तो जिम कार्बेट यानी पुराना वाला हेली नेशनल पार्क और अभी इसका नाम रखना चाहिए रामगंगा नेशनल पार्क। यह नैनीताल पौड़ी गढ़वाल वाली वाले रीजन में पड़ता है। 1936 का है सबसे पुराना। गंगोत्री नेशनल पार्क उत्तरकाशी में है। 89 का गोविंद वाला भी वहीं पर है। 90 का है। नंदा देवी चमोली में पड़ता है। 82 और राजाजी नेशनल पार्क पौड़ी गढ़वाल हरिद्वार देहरादून पूरा फैला हुआ है। 1983 में इसको अधिसूचित किया गया था। इसके बाद है फूल फूलों की घाटी। ठीक है? यह फूलों की घाटी नेशनल पार्क है। यह जो राष्ट्रीय उद्यान है, यह भी चमोली का है। 1982 का है। बिहार में सिर्फ एक नेशनल पार्क है वाल्मीकि ये पश्चिमी चंपारण में 1:23:34 पड़ता है। 1990 में इसको अधिसूचित किया गया था। इसके बाद पापीकोंडा नेशनल पार्क ये आंध्र का है। आंध्र में कुल मिलाकर चार क्षमा कीजिएगा। तीन है। आंध्र पहले एक बड़ा प्रदेश होता था तो अभी तेलंगाना उससे अलग हो गया। तो कुल मिलाकर पापीकोंडा, राजीव गांधी और वेंकटेश्वर। तो पापीकुंडा नेशनल पार्क जो है यह आप देखेंगे कि अलूरी सीताराम राजू और पूर्वी गोदावरी क्षेत्र जो है वहां पर मतलब एलुरू वाला जो रीजन है और पूर्वी गोदावरी वाला जो रीजन है ठीक है वहां पर पड़ता है 2008 का समय था अधिसूचना इसको प्राप्त हुई थी राजीव गांधी रामेश्वरम राष्ट्रीय उद्यान कड़प्पा जो कुड़प्पा वाला रीजन है वहां पर पड़ता है 2005 वेंकटेश्वर तिरुपति और कड़प्पा 1989 सबसे पुराना यही है इसके बाद है मॉलिंग नेशनल पार्क ये अरुणा अरुणाचल का है। नामदफा और मौलिंग दोनों अरुणांचल के हैं। नामदफा आपने देखा ही कि ये चांगलांग मतलब अरुणांचल और म्यांमार का बॉर्डर है। वहां पर स्थित है चांगलांग वहां पर पड़ता है। 1983 का ये अधिसूचित किया गया था। और मॉलिंग जो है ये ऊपरी सियांग में मौजूद 1:24:35 है। मतलब पश्चिमी सियांग और पूर्वी सियांग का ये जॉइंट है और 1986 में इसको अधिसूचना प्राप्त हुई थी। असम में कई सारे हैं। ध्यान से देखें इसे। तो असम में एक तो है डिब्रू सखोआ जो कि तिनसुकिया और डिब्रूगढ़ में फैला हुआ है। यह 1999 का है। काजीरंग का बहुत पुराना है 1974 का। एक सींग वाले गैंडे के लिए जाना जाता है और एक सींग वाले गैंडे के अलावा यहां हाथी इत्यादि भी पाए जाते हैं। तो गोलाघाट नगांव और सोनिकपुर मानस नेशनल पार्क चिरांग और बक्सा में है 90 नामेरी सोपुर 1998 ओरंग दरांग और सोनिकपुर दोनों में फैला हुआ है। विस्तार इसका ठीक-ठाक है। 1999 रायमोना असम का छठवां नेशनल पार्क है। ध्यान दीजिएगा। असम का छठवां नेशनल पार्क है और भारत का 105वां ठीक है? असम का छठवां है और भारत का कौन से नंबर का है? 105वां है। कोंकराझार में इसकी लोकेशन है। जून 2021 में इसको अधिसूचित किया गया था। जब अधिसूचना मिली थी तो उसके कुछ समय बाद ही यूपीएससी का प्रीलिम्स होने वाला था। तो खूब 1:25:37 चिल्ला-चिल्ला कर YouTube पे लेक्चर लोग रिकॉर्ड करते थे कि याद रखना 105वां ये है और 106वां ये है और उसके बाद प्रश्न बने तो क्रिकेट पर प्रश्न पूछा गया। ठीक है? तो आयोग कहां से पूछेगा इसका दावा आप नहीं ठोक सकते हैं। चिल्लाने की जरूरत नहीं है। आप सिर्फ फैक्ट बताइए। लोगों को तथ्यों से अवगत कराइए। कांसेप्ट अपना क्लियर करवाइए। बस यह दावा कहीं भी नहीं करना चाहिए कि यह प्रश्न आ ही जाएगा। संस्था दूसरी है परीक्षा कराने वाली प्रश्न बनाने वाली। पेपर आपने तो सेट किया नहीं। चलिए तो वही दावा हम भी नहीं करते हैं। बस हां ये है कि ये जो लिस्टिंग का वीडियो है इसमें शुरुआत में मैंने इसलिए कहा कि आपको ज्यादातर प्रश्न यहां से मिल जाएंगे क्योंकि पर्यावरण के लगभग सारे तथ्य हमने समेटे हुए हैं। इसलिए ये संभावना है। दावा किसी भी प्रकार का नहीं। लेकिन हां जितने तथ्य आपको पढ़कर स्टैटिक पार्ट में जाने चाहिए वह सब यहां मौजूद है। चलिए दहिंग पटकई नेशनल पार्क जो है यह असम का सातवां नेशनल पार्क है और भारत का 106वां है। ये डिब्रूगढ़ और तिनसुकिया में फैला है। वही जून 2021 में इसको अधिसूचना मिली थी। इसके बाद है छत्तीसगढ़। गुरु घासीदास संजय राष्ट्रीय उद्यान। संजय राष्ट्रीय उद्यान 1:26:38 भी कहते हैं। गुरु घासीदास नेशनल पार्क भी कहते हैं। तो ये है कहां पे? में ये कोरिया नाम की जगह है। ये कोरिया वो साउथ कोरिया नॉर्थ कोरिया नहीं है। कोरिया नाम की जगह है छत्तीसगढ़ में। तो वहां पर मौजूद है। ये 1981 में अधिसूचित हुआ था। इंद्रावती कुटुरू नेशनल पार्क जो है ये दंतेवाड़ा बीजापुर रीजन में फैला हुआ है। 82 का है। इसके बाद है कांगेर वैली बस्तर में 1982 का। गोवा में है भगवान महावीर। मोलम नेशनल पार्क उत्तरी गोवा में 1978 का। गुजरात में आ जाइए। कई सारे हैं। पहले तो है बेलावदार यानी ब्लैक बक नेशनल पार्क भावनगर में। फिर है 76 का है ये गिर नेशनल पार्क एशियन जो लायन है वो सिर्फ यहीं पर पाया जाता है। अब यहां से पुनर्वास करके कहीं और ले जाए वो अलग बात है लेकिन वर्तमान में सिर्फ यही इसका नेचुरल हैबिटेट है। तो गिर नेशनल पार्क जूनागढ़ और गिर तथा सोमनाथ वाले इलाके में फैला हुआ है। 75 में इसको अधिसूचित अधिसूचित किया गया था। कच्छ की खाड़ी समुद्री नेशनल पार्क जो है ये जामगर अभी जस्ट पीछे देखकर आए। बांसदा बांसदा ये नौसारी में पड़ेगा। 1979 का है। 1979 का हरियाणा में दो हैं। 1:27:41 कलेसर है और सुल्तानपुर है। कलेसर आपका यमुनानगर में है। 2003 में अधिसूचित हुआ था और यह है गुरुग्राम में सुल्तानपुर वाला। ठीक है? सुल्तानपुर से अपने यूपी में मत आ जाइएगा। सुल्तानपुर नेशनल पार्क जो है ये गुरुग्राम में पड़ता है। 1991 में अधिसूचना मिली थी। इसके बाद हम आए हिमाचल में। हिमाचल वैसे है तो छोटा सा लेकिन यहां नेशनल पार्कक्स की संख्या काफी अच्छी खासी है। ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क कुल्लू में है बल्कि तीन कुल्लू में है। इंदरकिला है, खीरगंगा है और ग्रेट हिमालयन है। जगह अगर समान है तो आप उसको एक साथ रखकर याद कर सकते हैं। हां, अधिसूचना का समय भिन्न है। जैसे ग्रेट हिमालयन इसमें सबसे पहले का है 1984। बाकी दोनों जो है इंदरकिला और खीरगंगा दोनों 2010 के। पिन वैली लाहौल स्पीति में है। यह 1987 का है। और कर्नल शेरजंग सिंबल यह सिरमौरी में पड़ता है। 2010 का है। झारखंड में सिर्फ एक ही है। बेतला लातेहार में है। 1986 का है। कर्नाटक में कई सारे हैं। अंशी बांदीपुर, बनरघट्टा या बनरघट्टा, कुद्रेमुख और नागरहुल। तो अंशी नेशनल पार्क जो है यह आप देखेंगे उत्तर कन्नड़ 1:28:42 में है। 1987 का अधिसूचित है। वैसे ही बांदीपुर है। मैसूर और चामराज नगर में पड़ता है। 1974 का है। बेंगलुरु का बनरघट्टा है 1974। कुद्रेमुख चिकमंगल इसकी लोकेशन कहां पे है? है जो साउथ कन्नड़ है चिकमंगल वाला एरिया है वहां पर है 1987 और नागरले राजीव गांधी नेशनल पार्क ये कोडागू मैसूर में पड़ता है 88 ठीक है यहां पर एक फिल्म की शूटिंग हुई थी काफी पहले पुरानी कई दशकों पुरानी फिल्म है बहादुर बच्चे देखिएगा नागर होले उसमें पूरा उसी नेशनल पार्क की जो पृष्ठभूमि है दिखाया गया है और वहां पर तस्करों का एक झुंड सक्रिय रहता है बुद्धिमान बच्चे उन तस्करों को अंत में पकड़वाते हैं। इसके बाद है केरल। केरल में अनामुडी शोला शोला जंगलों को कहा जाता है। ध्यान दीजिएगा ये जंगलों को पश्चिमी घाट में संबोधित किया जाता है। तो अनाइमुडी शोला नेशनल पार्क है। इडुक्की में है और एवीकुलम नेशनल पार्क है। ये भी इडुक्की में ही है। लेकिन दोनों का समय थोड़ा भिन्न है। इसमें जो अनाइमुडी है वो 2003 का अधिसूचित है लेकिन एरवीकुलम बहुत बहुत ज्यादा पुराना है। ये 1978 का है। ठीक है? आगे चलें और भी है। 1:29:43 मथिकेतन शोला ये भी इडुक्की में है। 2003 का। पंपाशोला भी डुक्की में है और पेरियार भी डुक्की और जो पथनमा ढिट्टा नाम की जगह है वहां पर फैला हुआ है। इसमें से पेरियार वाला ज्यादा पुराना है। दो काफी पुराने हैं। एक तो आपने देखा इसमें एबिकुलम है दूसरा आपका पेरियार है। पेरियार का जो अधिसूचना का समय है वो 1982 का है। और अंत में आता है देखिए ये भी पुराना ही है। साइलेंट वैली साइलेंट वैली नेशनल पार्क ये पलप्गढ़ जिले में पूरी तरह से है जिसको कि पालघाट डिस्ट्रिक्ट भी कहा जाता है। 1984 का है। मध्य प्रदेश में वर्तमान में अगर आप देखेंगे मध्य प्रदेश इस मामले में काफ़ी समृद्ध है। नौ नेशनल पार्क हैं और दो की और प्रस्तावना है। मतलब दो और अभी प्रपोजल में चल रहे हैं वो भी आ जाएंगे। तो अभी जो है उनको देखिए संजय गांधी कान्हा माधव पेंच सतपुड़ा पन्ना घुगुआ वन विहार ओमकारेश्वर और कुनोपालपुर इतने सारे हैं। एक-एक करके देखते हैं। संजय राष्ट्रीय उद्यान सीधी में है और सीधी में इसकी जो अधिसूचना इसको प्राप्त हुई है ये 1981 की है। उसके बाद है कान्हा मंडला में 1955 1:30:45 माधव नेशनल पार्क शिवपुरी 1959 पेंच नेशनल पार्क शिवनी छिंदवाड़ा 1975 सतपुड़ा नेशनल पार्क होशंगाबाद 1981 पन्ना नेशनल पार्क पन्ना छतरपुर फैला हुआ है 1981 अधिसूचना का समय है ये ठीक है गुगुआ जीवाश्म ये फासिल नेशनल पार्क है मंडला में डिंडोरी में पड़ता है लोकेशन इसकी 1983 का है वन विहार आपका भोपाल में है ही है 1979 का है ओंकारेश्वर प्रस्तावित है। प्रपोजल इसका है खंडवा देवास और खरगोन में यह पूरा फैला हुआ एरिया है। इसको नेशनल पार्क घोषित करने का प्लान 2025 में था प्रपोजल। कुनोपालपुर आपका शिवपुर और मुरैना में फैला हुआ है। इसके बाद आते हैं महाराष्ट्र में। महाराष्ट्र में एक तो है चंदौली। सांगली में पड़ता है 2004 गुगामल अमरावती में 1975। नवेगांव नगजीरा कहा जाता है। गोंदिया में है ये। गोंदिया जगह का नाम है। 1975 में अधिसूचना प्राप्त हुई थी। ठीक वैसे ही ये पेंच है। जवाहरलाल नेहरू नेशनल पार्क भी इसको कहा जाता है। नागपुर में पड़ता है। 1975 का है। संजय गांधी बोरीवाली नेशनल पार्क ये ठाड़े मुंबई में 1:31:46 है। 1983 का है। सभी पुराने ही हैं। कुछ को छोड़कर तडोबा भी पुराना ही है। ये काफी पुराना है। 1955 का घोषित है। चंद्रपुर में इसकी लोकेशन। मणिपुर में दो है। एक तो किंबुलमजाऊ है। बिनपुर में ये 1977 का है। और दूसरा है शिरोई। शिरोई आपका पड़ता है इंफाल में। यह 82 का है। मेघालय में दो है। एक तो बाल बालपक्रम है और दूसरा नोकरेक है। बालपक्रम गारो हिल्स का जो साउथर्न एरिया है वहां पर मौजूद है। 1986 की अधिसूचना इसकी है। और नोकरेक जो आप देख रहे हैं ये पश्चिमी गारो हिल्स में पड़ता है। 97 का है। इसके बाद मिजोरम में भी दो मुरलन और पोंगपुई। मुरलन चंपई में है 1991। फमपुई नीला पर्वत इसको शाब्दिक अर्थ के तौर पर देखा जाता है। लॉन्ग टलाई नाम की जगह है। 1992 नागालैंड में सिर्फ एक है इतांकी। यह दीमापुर में पड़ता है। 93 में इसको अधिसूचित किया गया था। उड़ीसा में आ जाइए। उड़ीसा में दो आप मुख्य देख रहे हैं और यही है। एक है सिमलीपाल और दूसरा है भीतरकणिका। तो भीतरकणिका जो है ये 1:32:46 केंद्रपाड़ा जिले में पड़ेगा। 1998 की अधिसूचना इसको प्राप्त हुई है। ठीक है? और सिमलीपाल मयूरभंज में है 2025 ठीक है। अच्छा सिमलीपाल का जो प्रस्ताव है ना ये 2025 का अधिसूचित तो है ही है लेकिन इसका जो प्रपोजल था वो काफी पुराना था। 1980 में पहली बार प्रस्तावित किया गया था इसको। ठीक है? फिर 86 में जो इसका प्रस्तावित क्षेत्रफल है उसको बढ़ा दिया गया। लगभग 845 स्क्वायर कि.मी. के आसपास कर दिया गया। फिर 45 साल का इंतजार इसको करना पड़ा। ये बहुत लंबी कहानी हो गई। ठीक है? सिमलीपाल नाम तो बहुत पुराना है लेकिन इसको बहुत बाद में अधिसूचना मिलती है। उसके पीछे की हिस्ट्री है। 45 साल इसको लंबा इंतजार करना पड़ता है और अंत में फिर 24 अप्रैल की तारीख होती है। 24 अप्रैल की जो तारीख होती है 2025 की उसमें जो ओसा की सरकार है वो इसको अधिसूचित करती है और इस प्रकार से सिमली पाल जो है ना ये 107वें नंबर का नेशनल पार्क बनता है। ध्यान दीजिए। तो ठीक बात है। अब आगे चलते हैं और जिले हैं, राज्य हैं उनको देखना है। राजस्थान 1:33:48 में आते हैं। यहां भी अच्छे खासे हैं। जैसे मरुभूमि राष्ट्रीय उद्यान है सबसे पहले। ठीक है? जैसलमेर और बाड़मेर में फैला हुआ है। 1980 का है। केवला देवघाना भरतपुर में है। 1981 का है। रणथंबोर सवाई माधोपुर डिस्ट्रिक्ट में पड़ता है। यहां देख रहे हैं आप 1980 का है। मुकुंदरा हिल्स जो है ये कोटा में है। 2004 का सरिस्का अलवर जिले में पड़ता है। 1982 का है। सिक्किम में है कंचनजंगा। उत्तरी सिक्किम में है। 77 1977 का है। मतलब 1977 का। तमिलनाडु में भी कई नेशनल पार्क हैं। जैसे कि गुंदी है सबसे पहले चेन्नई का 1978 का। फिर मन्नार की खाड़ी वाला है। भारत की जमीन पर सबसे दक्षिणी है ना? अगर अंडमान निकोबार को नहीं देखें सिर्फ मुख्य भूमि को देखें तो उसमें सबसे दक्षिण में यही नेशनल पार्क मौजूद है। मन्नार की खाड़ी नेशनल पार्क रामनाथपुरम तोती कोरिन में पड़ता है। और ये तोती कोरिन वाला जो है इसको अधिसूचित किया गया था 1986 में। अन्नामलाई नेशनल पार्क जिसको कि इंदिरा गांधी नेशनल पार्क भी कहा जाता है वो तिरुपुर जिला है। 1989 1:34:48 में इसे अधिसूचित किया गया था। वहां पर पड़ता है तिरुपुर जिले में। मुदुमलाई नीलगिरी में है और मुखर्ती जो है ये भी नीलगिरी में ही है। दोनों 1990 के हैं। इसके बाद आइए तेलंगाना में। अगर तेलंगाना आंध्र में रहता तो फिर एक साथ पढ़ते लेकिन यहां अलग-अलग। तो कासू ब्रह्मानंद रेड्डी राष्ट्रीय उद्यान। यह हैदराबाद में है। 1998 का है। महावीर हरण वन हरिणा वनस्थली राष्ट्रीय उद्यान कहा जाता है। यह रेड्डी में पड़ता है। ठीक है? रेड्डी जगह है। 1994 में इसको अधिसूचना मिली थी। इसके बाद है मृगावनी। ये रेड्डी में ये भी इसकी लोकेशन है। 1994 में इसको अधिसूचित किया गया था। त्रिपुरा में दो है। एक तो क्लाउडेड लेपर्ड लेपर्ड नेशनल पार्क है और दूसरा बिसन राजबरी नेशनल पार्क। तो क्लाउडेड लेपर्ड नेशनल पार्क जो है यह वेस्टर्न त्रिपुरा में है। 2007 की अधिसूचना है। और बिसन नेशनल पार्क जो है राजबरी वाला यह भी दक्षिणी त्रिपुरा में पड़ता है और 2007 का ही अधिसूचित। इसके बाद आइए पश्चिम बंगाल में चलते हैं। बुक्स अलीपुर द्वार नाम की जगह है वहां पर 1992 1:35:49 में। गोरूमारा जलपाईगुड़ी में है 92 जलदापाड़ा लोकेशन ही जलदापाड़ा है 2012 नेरा वैली दार्जिलिंग 86 सिंगल लीला दार्जिलिंग 86 सुंदरवन आप जानते ही हैं 24 परगना जिला है 1984 का है काफी पुराना है कैंपेल बे नेशनल पार्क जो है ये अंडमान का है 1982 में अधिसूचना मिली थी अंडमान निकोबार आइलैंड इसका स्थान है और उसी प्रकार से गैलिथिया बे है ये निकोबार में पड़ता है 1992 में अधिसूचना मिली थी महात्मा महात्मा गांधी मरीन बंदूर नेशनल पार्क ये अंडमान का है 83 माउंट हेरियट अंडमान का है 87 रानी झांसी समुद्री राष्ट्रीय उद्यान अंडमान का ही है 96 सैंडल पीक अंडमान का है 79 1979 मिडिल बटन आइलैंड पोर्ट ब्लेयर का है स ये 1987 का है उसी प्रकार से नॉर्थ बटन आइलैंड अंडमान का है ये 1979 यानी 1979 का है साउथ बटन आइलैंड ये सारे बटन है छोटे-छोटे आकार के 1:36:50 द्वीपीय हिस्से तो अंडमान निकोबार द्वीप समूह का ये भी क्षेत्र है 87 ठीक है 87 में इसको अधिसूचित किया गया था ज्यादातर 87 वाले हैं नहीं तो उसी के आसपास के हैं। ठीक है अब आगे चलते हैं यहां देखिए जम्मू कश्मीर को और लद्दाख को जम्मू कश्मीर में कुल मिलाकर तीन है जिसमें से कि दो श्रीनगर में और एक बारामूला में है। पहला अपना सलीम अली नेशनल पार्क है जो कि श्रीनगर में है। 92 में अधिसूचना मिली थी। दूसरा है दाचीगाम। कश्मीरी स्टग यानी जो लाल हिरन होता है उसके लिए प्रसिद्ध है। तो दाचीगाम नेशनल पार्क श्रीनगर और पुलवामा दोनों में फैला हुआ है। 1981 का है। काजीनाग काजीनाग ठीक है? काजीनाग जो नेशनल पार्क है ये बारामूला का है और ये सन 2000 का है। किस्तवाड़ भी आप ध्यान देंगे तो ये भी कश्मीर में ही है और किस्तवाड़ जो है ये किस्तवाड़ और डोडा जिलों में फैला हुआ है। 1981 में इसको अधिसूचना मिली थी। लद्दाख का है हेमिसाहाई। पहले ये कश्मीर का था लेकिन अब लद्दाख जब केंद्र शासित प्रदेश अलग हो गया तो ये लेह जिले में लद्दाख के पड़ता है। 1981 का है। तो ये तो हमने कुल मिलाकर देख लिए सारे। अब भारत के जो पांच सबसे बड़े 1:37:51 वाले हैं क्षेत्रफल के आधार पर उनको देख लेते हैं। सबसे पहले है हेमिस जम्मू कश्मीर का 3350 स्क्वायर कि.मी. इसका टोटल एरिया है। स्थापना हुई थी 1981 में। फिर है डेजर्ट नेशनल पार्क। राजस्थान स्थापना का समय 1992 3162 स्क्वायर किलोमीटर में फैला हुआ है। गंगोत्री नेशनल पार्क उत्तराखंड का 1989 का आज स्थापित है। 2900 2390.02 मतलब मोटे तौर पर 2390 स्क्वायर कि.मी. विस्तार नामदफा भी अच्छा खासा बड़ा है। 1808 स्क्वायर कि.मी. 1983 अरुणाचल कंचनजंगा आप सिक्किम में जानते ही हैं। 77 में इसे स्थापित किया गया था। यह 1784 स्क्वायर कि.मी. फैला हुआ है। सबसे बड़ा इसमें हेमिस है। बाकी जितने हैं वह इसी क्रम में छोटे हैं थोड़े से। इसके बाद अब सबसे जो छोटे वाले हैं उनको भी देखेंगे। लेकिन यहां भारत के नक्शे पर जरा राज्यभार देख लीजिए। वही नेशनल पार्क है जिन्हें आप देख कर आ रहे हैं। बस नक्शे में थोड़ा सा एक बार नजर घुमा लेते हैं। तो शुरू करते 1:38:51 हैं उत्तर से ही। यहां देखें कश्मीर वाले पहले देख लेते हैं। सलीम अली, दाचीगाम, काजीनाग और किश्तवार जम्मू कश्मीर। लद्दाख का सिर्फ एक है हेमिसाई। उसके बाद ग्रेट हिमालयन इंदरकिला खीरगंगा पिन वैली और कर्नल शेरजंग सिंबलवाड़ा यह हिमाचल के हो गए। कालेसर राष्ट्रीय उद्यान सुल्तानपुर राष्ट्रीय उद्यान ये दोनों कहां के हैं? तो कालेसर और सुल्तानपुर दोनों आपके पड़ेंगे हरियाणा वाले इलाके में। ठीक है? इसके बाद मरुभूमि केवलादेव, मुकुंदरा हिल्स, रणथंबौर और सरिस्का बेशक राजस्थान। अपने यूपी में सिर्फ एक है। है ना? दुधवा राष्ट्रीय उद्यान उत्तराखंड में कई सारे हैं। तो उत्तराखंड में आप देखेंगे कार्बेट है, गंगोत्री है, गोविंद है, नंदा देवी है, राजाजी है और वैली ऑफ़ फ्लावर यानी फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान है। उसी प्रकार से बिहार में भी सिर्फ एक है वाल्मीकि राष्ट्रीय उद्यान। सिक्किम में आपका कंचनजंगा है छोटा सा। ठीक? ये देख रहे हैं बुक्स, गोरूमारा, जलदापाड़ा, 1:39:54 नेरा, सिंगलीला, सुंदरवन ये सब जो है ये पश्चिम बंगाल में हैं। यहां वाले फिर यहां देखेंगे बलपक्रम और नोकरेकिक। बलपक्रम और नोकरेक ये मेघालय के हैं। क्लाउडेड लेपर्ड और बिसन यह दोनों नेशनल पार्क त्रिपुरा के हैं। अगरतला त्रिपुरा वाला एरिया आप देख रहे हैं। और हां असम का देखें तो डिब्रूसखोवा काजीरंगा मानस नामेरी ओरंग रायमोना देहिंग पटकई ये सारे के सारे जो हैं ये असम के हैं। नागालैंड में आप जानते ही हैं इतांकी है। किंबु लमजाऊ आपका मणिपुर में है। मिजोरम में मुरलिन और फोंगपुई है। नीचे आ जाते हैं। जरा गुजरात को देखिए। थोड़ा ऊपर कर लेते हैं। अब भारत के नक्शे को देखिए। तो हां गुजरात का आप देखेंगे तो ब्लैक बक बेलावदार यह हो गया इसके बाद गिर है समुद्री राष्ट्रीय उद्यान है बांसदा है चंदोली गोगामल नवेगांव नगजीरा पेंच संजय गांधी और तडोबा ये आपके महाराष्ट्र के हो गए मोलम जो है ये गोवा का हो गया अंशी बांदीपुर बनरघट्टा कुदरेमुख नागर होले ये सारे के सारे जो है ये कर्नाटक के हैं अनाईमुडी शोला एरवीकुलम मण मथिकेतन शोला 1:40:57 पंपादुम शोला पेरियार साइलेंट वैली ये सारे जो हैं यहां वाले थोड़ा हो सकता ब्लर दिखाई दे रहा हो लेकिन यहां पर लिखा हुआ है ये केरल के हो गए। तमिलनाडु में कौन-कौन से हैं? तो गोइंदी है, मन्नार की खाड़ी है, अन्नामलाई है, मधुमलाई है और मुखर्ती है। उड़ीसा में भीतरकणिका और सिमलीपाल है। आंध्र में कौन-कौन से हैं? पापीकोंडा है, राजीव गांधी, रामेश्वरम और श्री वेंकटेश्वर राष्ट्रीय उद्यान। मध्य प्रदेश में नौ है टोटल। आप देखें बांधवगढ़ संजय कान्हा माधव पेंच सतपुड़ा पन्ना फौसिल नेशनल पार्क मंडलावाला वन विहार भोपाल का ओमकारेश्वर और कुनोपालपुर ठीक है और क्या बच गया है अच्छा तेलंगाना रह गया बीच में आंध्र को देखा तेलंगाना छूट गया तेलंगाना नीचे कासू ब्रह्मानंद रेड्डी महावीर हरिणा और मृगावनी ये तीन जो है ये तेलंगाना के हो गए वैसे ही अगर आप अंडमान निकोबार में चले आएंगे तो यहां पर आप देखेंगे कैंपेल बे गैलिथिया बे महात्मा गांधी मरी मरीन, माउंट हेरियट, रानी झांसी, सैंडल पीक, मिडिल बटन, नॉर्थ बटन और साउथ बटन। इस तरीके से ये फैले हुए हैं 1:41:58 अंडमान निकोबार आइलैंड में। तो ये पूरा विस्तार नेशनल पार्क का वही जो डाटा आपने पीछे लिखित देखा है उसी को चित्र में नक्शे में आप देख रहे थे ताकि दिमाग में बैठे। अब इसके बाद देखेंगे नेशनल पार्क को बहुत देख लिया। भारत में जो बाघ अभयारण्य है टाइगर रिजर्व। तो बाघ संरक्षण प्राधिकरण जो है अपने देश में यानी एनटीसीए। इसका गठन वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 की ही धारा यानी 38 एल क्लॉज़ वन के अंतर्गत किया गया था। ठीक है? धारा संख्या भी आपको पता होनी चाहिए। लेकिन उससे ज्यादा यह महत्वपूर्ण है कि आप जाने कि किस अधिनियम के अंतर्गत इसको स्थापित किया गया है। प्रोजेक्ट टाइगर जब लांच किया गया तो उसके तहत राष्ट्रीय पशु बाघ के संरक्षण के लिए एक अग्रणी पहल की गई। और क्या खास बात हो सकती है? तो राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण यानी एनटीसीए और भारतीय वन्य जीव संस्थान यानी डब्ल्यूआईआई यह कई राज्य वन एजेंसियों और संरक्षण गैर सरकारी संगठनों की सहायता से 2006 से 2006 से भारत सरकार की चार वर्षीय बाघ जनगणना 1:42:59 का नेतृत्व कर रहे हैं। जैसे आजकल इंसानों की गणना चल रही है ना। अभी घरों की गणना हुई है। आप देखते होंगे आपके घर पर ऐसे कुछ विशिष्ट नंबर लिख दिए गए हैं जो जनगणना कराने वाले मतलब करने वाले जो कर्मचारी आते थे तो वो क्या करते थे? आपसे पूरा डाटा अता-पता करते थे। Google मैप पर आपके घर की लोकेशन वगैरह देखते थे और उसके बाद सारा डाटा इकट्ठा करने के बाद चौक से या मार्कर से आपके गेट या आपकी दीवारों पर नंबर लिख कर जाते थे। ठीक है? कुछ अल्फा न्यूममेरिक ऑर्डर में लिख कर जाते थे। तो वैसे ही गणना होती है हर प्राणी की। इंसानों की जैसे गणना होती है ठीक वैसे ही और इन प्राणियों की गणना यह प्राणी खुद नहीं करते हैं मनुष्य करता है तो बाघों की गणना का तरीका क्या होता है पहले क्या करते थे ना पहले फुटप्रिंट गिनते थे बाघ के पंजे को गिनते थे पता लगता था एक ही बाघ जो है वो 10 एरिया में चल दिया है तो 10 बार गिन गया तो इसमें समस्या होती थी मतलब एग्जैक्ट नंबर नहीं प्राप्त होता था मतलब इतने भी बेवकूफ गिनने वाले नहीं होते थे लेकिन फिर भी जो फुटप्रिंट है उनके आधार पर गिनना उतना भरोसेमंद नहीं होता है तो उसके बाद जो बाघों के शरीर पर पैटर्न 1:44:00 होते हैं ना मतलब जो स्ट्रिप होती हैं, पट्टियां होती हैं काली-काली। वह हर बाग पर सिमिलर नहीं होता है। तो उसको अगर बारीकी से समझ लिया जाए तो हमें पहचानने में आसानी हो जाएगी कि अच्छा इसको हमने गिन लिया है और इसको नहीं गिना है। तो आजकल तो गिनने के हजार तरीके हो गए हैं। बाघों की जनगणना का नेतृत्व ऐसे ही होता है। और संख्या भी इनकी इतनी ज्यादा नहीं है। मतलब 3000 के अंदर बाघ अगर हैं तो उनको गिनना इतना मुश्किल काम नहीं है। ठीक बात है। हिंसक पशु है और जंगली है। जंगल में छिपा हुआ है। लेकिन सीमित है ना? लाखों की तादाद में रहता, तो फिर गिनना वैसे भी कठिन हो जाता। फिर कोई गिनता भी नहीं। लोग खोज कर मारने लगते। तो आगे चलते हैं। बाघ अभयारण्यों का गठन कोर या बफर रणनीति पर किया गया है। इसके बाद आप देखेंगे आंध्र प्रदेश में स्थित नागार्जुन श्रीसैलम जो अभयारण्य है ये भारत का सबसे बड़ा टाइगर रिजर्व टाइगर रिजर्व है। ध्यान दीजिएगा। और यह प्रकाशम, नंदियाल और पलनाडू नाम के जो जिले हैं आंध्र के वहां फैला हुआ है। महाराष्ट्र में वर्धा जिले का जो हिंगानी है वहां पर है बोर बोर टाइगर रिजर्व। ये सबसे छोटे साइज का है। 1:45:01 सबसे छोटा है। बोर जो है वो सबसे छोटा है। नागार्जुन सागर श्रीसैलम जो है या नागार्जुन श्रीसैलम ये सबसे बड़ा है। ध्यान दीजिएगा। भारत का पहला जो टाइगर रिजर्व है ये जिम कॉर्बेट ही है। लुप्तप्राय जो रॉयल बंगाल टाइगर था उसके हैबिटेट का संरक्षण करने का प्रयास यहीं से शुरू किया जाता है। हेली नेशनल पार्क के रूप में स्थापित हुआ था ये 1936 में। बाद में इसका नाम जिम कार्बेट के नाम पर रख दिया गया। प्रसिद्ध संरक्षणवादी और लेखक नहीं बल्कि प्रसिद्ध शिकारी भी थे जिम कार्बेट। मतलब नाम तो यह होता था कि खूंखार जानवरों का शिकार करते हैं जो आदमखोर हो जाते हैं। लेकिन असल में शिकारी थे और अंग्रेज सारे के सारे संरक्षण की आड़ में आड़ में शिकार करते थे। बड़े पैमाने पर हाथी और अन्य जो वन्य प्राणी थे उनको शिकार बनाते थे अपना। बाकी हम भारतीयों के लिए पाबंद कर देते थे कि नहीं मारना नहीं है। लेकिन अपने खुद वही काम करते थे। तो खैर वो उनकी मनमानी थी। यहां पर जिम कार्बेट के नाम पर इसका नाम रखा गया है और 1973 में यह भारत का पहला बाघ अभयारण्य बन गया। 73 यह जो थारीदार बिल्ली है यानी बाघ इसके 1:46:01 संरक्षण को बढ़ावा देने के साथ-साथ इसके प्राकृतिक आवासों की रक्षा के लिए एक वैश्विक प्रणाली की आवश्यकता थी और इसीलिए एक दिन तय किया गया कि इस दिन हम मिल बैठकर इस बात पर विचार करेंगे। एक दिन तो कम से कम ऐसा होना चाहिए। तो वो तारीख है 29 जुलाई की। अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस इस दिन मनाया जाता है। तो अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस की शुरुआत हुई 2010 में रूस का जो सेंट पीटर्सबर्ग है वहां पर एक टाइगर समिट आयोजित की गई थी। जहां की जंगली बाघों की संख्या में गिरावट और उनके विलुप्त होने की स्थिति पर चिंता जाहिर की गई। ना सिर्फ भारत में बल्कि पूरी दुनिया में यह जो धारीदार बिल्ली है बड़े साइज की यह तादाद में कम होती जा रही है। भारत में तो बढ़ रहे हैं ज्यादा तादाद में है और अच्छी खासी मात्रा है। लेकिन दुनिया के बाकी हिस्सों में इनकी स्थिति बहुत खराब। तो ऐसी स्थिति में इस पर चर्चा की गई कि ऐसा काम करना चाहिए जिससे कि इनका संरक्षण हो सके और इसी काम को प्रोत्साहित करने के लिए एक तय किया गया दिन है जुलाई का जो कि अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस के तौर पर मनाया जाता है। ये ध्यान दीजिएगा कि बाघ से पहले भारत का राष्ट्रीय पशु बना था शेर। एशियन 1:47:03 लायन जो है वो सबसे पहले हमारा राष्ट्रीय पशु था और ये 1973 से पहले तक रहा। लेकिन जब 73 में प्रोजेक्ट टाइगर और फिर बाघ के संरक्षण की बात होने लगी तो कहा गया कि शेर को संरक्षण की अभी जरूरत नहीं है। जाने दो इसको एक तरफ रखो। हम बाघ को अपना राष्ट्रीय पशु बना लेते हैं ताकि लोग इस पर फोकस करें। अगर ऐसी बात है तो फिर अब जो एशियन लाइन है उसकी भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। गिर उसका प्राकृतिक आवास भारत में एकमात्र वो नेचुरल हैबिटेट है जो कि एशियन लायन के लिए बचा हुआ है। पहले दायरा फैला हुआ था और वहां भी इनकी स्थिति बहुत ज्यादा दयनीय है। जो एशियन लायन है उनका जेनेटिक ऑर्डर अब उतना अच्छा नहीं रह गया जितना पहले ये मजबूत और हट्टे-कट्टे रहा करते थे। अफ्रीकी शेरों जितने यह बड़े साइज के और उतने झबरेदार नहीं होते हैं। लेकिन फिर भी जो मध्यम कद काठी होती है उसमें मजबूत होते हैं। लेकिन इनकी इम्यूनिटी और इनका जो स्ट्रक्चर है वो लगातार डाउन हो रहा है। डिक्रीज करता जा रहा है। ऊपर से डिस्टेंपर और तमाम तरह के जो खतरनाक वायरस है उनका खतरा इनके सिर पर मंडराता रहता है। तो संरक्षण की दरकार तो इनको भी उतनी ही मजबूत है। उतनी ही मजबूत संरक्षण की दरकार एशियन एलीिफेंट्स को है 1:48:05 और तमाम जीवों को है। लेकिन फिलहाल बाघ को तवज्जो दी गई और इसे राष्ट्रीय पशु बनाया गया 1973 में। तो यहां कुछ वैरायटी है। जैसे कि आप देखेंगे ग्लोबल टाइगर फोरम है जिसे कि आप जीटीएफ कहते हैं और ग्लोबल टाइगर इनिशिएटिव है जिसे कि आप जीटीआई कहते हैं। ये दोनों है क्या चीज? पहले नंबर पर है ग्लोबल टाइगर फोरम। यह एक अंतर सरकारी अंतरराष्ट्रीय निकाय है जो कि विशेष रूप से बाघों के संरक्षण के लिए काम करता है। यह कोई नई बात नहीं है। ये सब संरक्षण की ही पहल है। नई बात यह है 1993 का जो समय था नई दिल्ली में बाघ संरक्षण पर एक गोष्ठी आयोजित की जाती है और वहां पर यह तय किया गया कि बाघों की सुरक्षा के लिए एक वैश्विक अभियान चलाया जाएगा और उसी के तहत 94 में इसकी स्थापना हुई थी। ग्लोबल टाइगर फोरम जो है इसकी स्थापना हुई थी और इसका मुख्यालय है नई दिल्ली में। 3 साल बाद इसकी बैठक होती है। अब यहां आप देख रहे हैं ग्लोबल टाइगर इनिशिएटिव इसको 2008 में लांच किया गया था। इसे सरकारों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों, नागरिक समाज, संरक्षण, वैज्ञानिक समुदाय, निजी क्षेत्र सबके एक विशिष्ट गठबंधन के रूप में 1:49:05 मिलीजुली जो साझा प्रतिक्रिया है, प्रयास है, उसके रूप में लांच किया गया था। उद्देश्य है जो जंगली बाघ है, उनको विलुप्त होने से बचाना। ठीक है? आगे बढ़ते हैं। 58 टाइगर रिजर्व है यानी बाघ अभयारण्य है अपने देश में। तो यहां पर राज्य दिया है, बाघ अभयारण्य का नाम दिया है, अधिसूचना का समय और कुल क्षेत्रफल दिया है। असम में कुल मिलाकर चार हैं। काजीरंगा, मानस, नामेरी औरंग तो काजीरंगा का अधिसूचना का समय है 2007 1173 स्क्वायर कि.मी. लगभग ये फैला हुआ है। मानस 200837 स्क्वायर कि.मी. नामेरी सन 2000 का है 464 स्क्वायर कि.मी. ओरांग 2016 492 स्क्वायर कि.मी. अरुणाचल में तीन है नामदफा पक्के और कमलांग नामदफा 198752 पक्के 2012 1198.45 स्क्वायर कि.मी. कमलांग 2017 783 स्क्वायर कि.मी. आंध्र में सिर्फ एक है नागार्जुन सागर श्रीसैलम 2007 और क्षेत्रफल देखिए 3296 1:50:08 इसके बाद तेलंगाना में अमराबाद और कावल है। ठीक है? तो अमराबाद जो है यह 2015 का अधिसूचित है। कावल उससे थोड़ा पुराना है 2012 का है। दोनों का क्षेत्रफल वही और 2015 के आसपास है। बिहार में वाल्मीकि है 2012 का है 899। छत्तीसगढ़ में इंद्रावती है। 2009 का ये है। 2799 स्क्वायर कि.मी. इसका विस्तार है। इसके अलावा आप देखेंगे छत्तीसगढ़ में इंद्रावती के अलावा अचानक कमार अमरकंटक है। 2009 का 914 उदंती सीता नदी है 2009 का और गुरु घासीदास तमोर पिंगला जो कि 56वां टाइगर रिजर्व है 56वां टाइगर रिजर्व है ये 204 में डिक्लेअ किया गया था इसका जो टोटल एरिया है वो 2829 है झारखंड का पलामू टाइगर रिजर्व है 2012 का है 1129 स्क्वायर किमी लगभग या आप इसे 1130 ही मान लीजिए इतना इसका दायरा है कर्नाटक में कई सारे हैं एक-एक करके देखें बांदीपुर 2007 1456 नागर नागर होले 2007 ये नेशनल पार्क भी है और टाइगर रिजर्व भी है। 2007 1205.76 1:51:09 भद्रा 2007 1064 काली 2007 1097 बिलीगिरींगा टेंपल या रंगनाथ टेंपल 2007 574.82 स्क्वायर कि.मी. केरल में आप देखेंगे दो टाइगर रिजर्व है। एक तो पेरियार है 2007 का 925 स्क्वायर कि.मी. और परबीकुलम है। परमकुलम को आप यहां पर देख रहे हैं। 2009643.66 मध्य प्रदेश में आइए। टाइगर स्टेट इसको कहा जाता है। बाघों की सबसे ज्यादा तादाद और संरक्षण के लिए सबसे ज्यादा सक्रिय प्रयास। तो सतपुड़ा टाइगर रिजर्व है 2007 का और इसका जो एरिया है इसका जो एरिया है वह है 2133.30 कान्हा 200751.79 संजय दुबरी 2011 1674.50 पेंच 2007 1179.63 बांधवगढ़ 2007 1536.93 वीरांगना दुर्गावती ये 54वें नंबर का है। 2023 में डिक्लेअ हुआ था। 39.12 1:52:10 स्क्वायर कि.मी. इसका टोटल एरिया है। पन्ना 2007 का है। 1598 10 स्क्वायर कि.मी. इसका विस्तार है। और राता पानी 57वें नंबर का है। 2024 का है। 1271.4 स्क्वायर कि.मी. टोटल इसका एरिया है। माधव टाइगर रिजर्व 58वें नंबर का है। 2025 का है। 1651 स्क्वायर कि.मी. टोटल इसका विस्तार है। इसके बाद आ जाइए महाराष्ट्र में। तो मेलघाट है सबसे पहले 2007 का। 2768 52 स्क्वायर कि.मी. पेंच है 2007 का 741.22 स्क्वायर कि.मी. तदडोबा अंधेरी तडोबा अंधेरी है 2007 का 1727.59 सह्याद्री 2012 1165.57 नवे गांव नगजीरा 2013 1894.94 और बोर सबसे छोटे आकार का 2014 816 स्क्वायर कि.मी. यह नेशनल पार्क के तौर पर कहा गया था सबसे छोटा। यहां पर टाइगर रिजर्व की बात हो रही है तो 18 816.27 स्क्वायर कि.मी. टोटल इसका एरिया है। 1:53:12 अच्छा मिजोरम में दंपा है एकमात्र 2007 का है। 988 इसका टोटल विस्तार है। राजस्थान में कई सारे हैं। जैसे आप देखें कि रणथंबोर है सबसे पहले 2007 का है। 14119 स्क्वायर कि.मी. टोटल इसका विस्तार है। सरिस्का है 2007 का 1213.34 मुकुंदरा 2013 759.99 रामगढ़ बिधारी बाग बाघ अभयारण्य या टाइगर रिजर्व 52वें नंबर का था। 2022 का डिक्लेअर था 1501.89 स्क्वायर कि.मी. टोटल इसका विस्तार। धौलपुर करौली 55वां है। 2023 में डिक्लेअर किया गया था। 1057.88 इसका टोटल विस्तार। उत्तर प्रदेश में दुधवा तो है ही है। उसके अलावा पीलीभीत है, अमनगढ़ है, रानीपुर है। तो दुधवा जो है यह 2010 का डिक्लेअ हुआ था। 2271 माफ़ कीजिएगा 221.77 स्क्वायर कि.मी. यानी वर्ग कि.मी. विस्तार है। पीलीभीत 2014 730 अमनगढ़ 2012 80 छोटा सा है। और रानीपुर चित्रकूट वाला 53वें 1:54:14 नंबर का वैसे पड़ेगा देश भर में। 2022 का है। 529.36 स्क्वायर कि.मी. टोटल इसका विस्तार। उत्तराखंड में आ जाते हैं। सबसे पहले है जिम कार्बेट 2010 इसका समय है टाइगर रिजर्व के तौर पर डिक्लेअर होने का। 1288.31 और राजाजी नेशनल पार्क और साथ में यहां पर बात हो रही है टाइगर रिजर्व की। तो राजाजी टाइगर रिजर्व 2015 में अधिसूचित हुआ था। 1075.17। पश्चिम बंगाल में बुसा और सुंदरवन है। बुसा 2009 का है। सुंदरवन 2007 का है। सुंदरवन का साइज बड़ा है और यह रॉयल बंगाल टाइगर का घर भी है। इसके बाद ओसा का सतकोशिया है 2007 1963.87। अच्छा तमिलनाडु में आते हैं। तो तमिलनाडु में सबसे बड़े साइज का कौन सा है? कालकट मुंडन थुरई जो है वो सबसे बड़ा है। और नीचे बाघ अभयारण्यों को भी हम नक्शे पर देखने वाले हैं। ठीक है? तो कालकट मुंडन थुरई जो है ये 2007 का है 1601 अन्नामलाई वो भी 2007 का और मुदुमलाई भी 2007 का अन्नामलाई हालांकि बड़ा है और मुदुमलाई थोड़ा सा छोटा है थोड़ा नहीं अच्छा खासा 1:55:15 छोटा है सत्यमंगलम आपका 1408 स्क्वायर किमी का है 2013 में डिक्लेअ हुआ था और श्री विल्ली पिथूर मेघामलाई 51व नंबर का है 2021 का है 1016.57 स्क्वायर किमी टोटल इसका विस्तार है तो यहां पर बना हुआ है नक्शा और इसमें वही टाइगर रिजर्व दिए हुए हैं कुछ ज्यादा नई जानकारी जानकारी नहीं है। बस नक्शे में दी हुई है। जैसे आप देखे राजा जी और कॉबेट ये उत्तराखंड में है। फिर यहां दुधवा, पीलीभीत ये सब जो है ये यूपी के हैं। रानीपुर यहां पर है। ठीक है? सरिस्का रामगढ़, मुकुंदरा है, रणथंबोर ये सब राजस्थान के हो गए। वैसे ही पन्ना है, बांधवगढ़ है। और एक सेकंड जरा सा नीचे आ जाते हैं। ये देखिए। तो यहां पर पन्ना है। यह संजय दुबरी को आप देख रहे हैं। यह बांधवगढ़ है। इसके बाद यह दुर्गावती यहां सतपुड़ा सब आपस में मिक्स हो गया है। इधर आप माधव को देख रहे हैं। राधा पानी है। ये नवे गांव नगजीरा है। छत्तीसगढ़ वाला इलाका आप देख रहे हैं। अचानक कमार अमरकंटक है ना यहां पे पलामू है। यहां अगर आप देखेंगे तो ओरंग है, नामेरी है, काजीरंगा है, नमदापाड़ा है, 1:56:16 कमलांग है, अरुणांचल वाला पक्के टाइगर रिजर्व है। और इधर वाल्मीकि है बिहार का एकमात्र। वैसे ही वेस्ट बंगाल में यह सुंदरवन है। सबसे ज्यादा बाघों के लिए प्रसिद्ध क्षेत्र। उसके बाद यहां सह्याद्री है महाराष्ट्र का। मेलघाट तो है ही है। काली इधर नीचे आप देख रहे हैं। अमराबाद और नाग नागार्जुन सागर श्रीलम है। इंद्रावती इधर है। उदंती सीता नदी तडोबा अंधेरी बोर मेलघाट सब आपने देखा है। कुछ नया नहीं है इसमें। ठीक है? नॉन फॉरेस्ट और फॉरेस्ट करके दोनों दिया हुआ है। जहां ज्यादा हरियाली है वहां पर जंगली एरिया है। इसमें कोई संदेह नहीं है। और जहां पर नीला दिखाई दे रहा है वह पानी का क्षेत्र है। ये तो मैप के सामान्य संकेत है। और ये कोई बात नहीं है कि पानी रहेगा तो बाघ नहीं रह सकता है। सुंदरवन वाला जो एरिया है वहां पर मैंग्रोव वनस्पतियां उगती हैं। समुद्र और नदी का मिलन होता है। तो ऐसे पानी वाले इलाके में मतलब पानी के नमी वाले इलाके में बाघ का पाया जाना और वो भी नेचुरली पाया जाना ये थोड़ा अनोखी बात है। बाग सूखी घास की जो लंबी-लंबी झाड़ियां और मैदान होते हैं उनमें रहना पसंद करता है। पानी चाहिए होता है लेकिन पानी गैंडे की तरह नहीं चाहिए होता है कीचड़ वाला। लेकिन 1:57:17 यहां पर रॉयल बंगाल टाइगर शौक से रहता है। तो ये चीज है। अब आगे चलते हैं। नीचे भी है कई सारे जैसे नागर होले हैं, मधुमलाई है। देख रहे हैं परमबीकुलम है, पेरियार है, कलक्कड़ है। यहां सत्यमंगलम है। ये बिलगिरींगा वाला है और ये शिवलिथुर है। ये अनामलाई है। ये बांदीपुर है। भद्रा है। चलिए आगे चलते हैं। तो अगला अभी बाघ जनगणना बची हुई है क्योंकि टाइगर रिजर्व देख रहे हैं तो पूरा काम इसका कर ही के जाएंगे। 2022 की ये बाघ गणना है और इसके आंकड़े जारी किए गए थे 9 अप्रैल 2023 को। तो 2022 में बाघों की तादाद इस रिपोर्ट के अनुसार 3167 हो गई। 3167 हो गई है जो कि वर्ष 2018 की जो बाघ गणना थी उससे कहीं ज्यादा है। हालांकि वृद्धि अगर वैसे देखी जाए तो कुछ खास नहीं है लेकिन बात बाघों की हो रही है तो ठीक-ठाक वृद्धि हुई। पहले इतनी थी अब इतनी हो गई। 4 साल का समय बाघों की संख्या में 6.7% की वृद्धि हुई। एशियाई शेरों की तादाद भी 1:58:18 भारत में ही एकमात्र पाई जाती है। मतलब एशिया वैसे तो बड़ा कॉन्टिनेंट है लेकिन एशियाई शेर सिर्फ भारत में पाए जाते हैं। 2015 में लगभग इनकी आबादी 525 थी। 2020 में इनकी आबादी बढ़कर 675 हो गई। लेकिन 2020 के बाद वाला डाटा नहीं उपलब्ध। जंगली बाघों की आबादी सबसे ज्यादा 70% जो है वह भारत में है। इसका मतलब आप समझ रहे हैं गिनती के कुछ हजार बाघ ही पूरे दुनिया भर में हैं। और 2014 से 2018 के दौरान बाघों की आबादी में लगभग 33% की वृद्धि हुई है और 2018 से 22 के दौरान इनकी जो तादाद है मतलब आबादी है वो सीमित सीमित मात्रा में बढ़ी है। मतलब 6.7% के आसपास वृद्धि दर्ज की गई थी। तो प्रोजेक्ट टाइगर के 50 साल पूरे हो गए। और कब पूरे हुए? 9 अप्रैल 2023 को मैसूर कर्नाटक का जो है वहां पर एक मेगा अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम आयोजित किया गया और टाइगर शेर इस तरह की जो सात बिग कैट प्रजातियां हैं बिल्लियों के परिवार में जो बड़े सदस्य हैं उनके संरक्षण के लिए बिग कैट अलायंस का शुभारंभ किया गया। राष्ट्रीय बाघ गणनाएं यह बाघ 1:59:20 संरक्षण प्राधिकरण यानी एनटीसीए जो है उसी के द्वारा की जाती है। इसमें जो राज्य के वन विभाग हैं, राज्यों के वन विभाग हैं और एनजीओस हैं, वन्य जीव संस्थान है सब सहयोग करते हैं। ऐसा नहीं है कि सिर्फ एनटीसीए अकेले कर लेता है। इसमें गहरा सहयोग होता है हर प्रकार का। मतलब व्यक्तिगत स्तर का, व्यक्ति स्तर का, तकनीकी स्तर का। हर चार साल के अंतराल पर यह गणना की जाती है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण एनटीसीए जो है यह आप देखेंगे कि एक वैधानिक निकाय है। जो मिनिस्ट्री है पर्यावरण मंत्रालय है उसी के अधीन। ध्यान दीजिएगा ये वैधानिक निकाय है। संवैधानिक नहीं है। कई बार ये वैधानिक संवैधानिक में उलझाकर आपको पूछता है। मतलब करेंगे क्या? पर्यावरण और पॉलिटी यानी राज्य व्यवस्था दोनों को मिक्स करके एक प्रश्न तैयार करेंगे। जिसमें कि वैधानिक संवैधानिक का चक्कर होगा। हो सकता है कुछ आर्टिकल दे दिए जाए और साथ में इस प्राधिकरण की चर्चा कर दी जाए कि इस पर दिए गए जो कथन है उनके संबंध में विचार करिए और बताइए कि कौन सा कथन सही है या कौन सा कथन गलत है। इस तरह के प्रश्न यूपीएससी तो पहले पूछता ही था। अब यूपीपीसीएस में भी पूछे जाते हैं। तो ठीक 2:00:20 है। 2005 में टाइगर टास्क फ़ोर्स की सिफारिशों के बाद इसको स्थापित किया गया था। एनटीसीए जो है इसका गठन वही वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 और उसकी धारा 38 एल क्लॉज़ वन के अंतर्गत किया गया है। ठीक है? चलिए अब आगे चलते हैं। राज्यवार जो बाघ जनगणना होती है उसका क्या 2022 में राज्यवार जो बाघ जनगणना हुई थी उसमें मैसूर मेंकि प्रोजेक्ट टाइगर का 50 साल अभी पूरा हुआ है तो हमने देखा ना बिग कैट अलायंस का गठन किया गया वो सारा काम हुआ मोदी जी आए थे और तमाम लोग इकट्ठे हुए थे न्यूनतम आबादी बाघों की घोषित की गई 3167 जो कि कैमरा ट्रैप क्षेत्र का अनुमान है। ये अनुमान है। ध्यान दीजिएगा। जन जनगणना जो है ना यह बाघों की गणना या किसी भी जंगली जीव की जब गणना की जाती है तो हम यह नहीं कहते हैं कि एक्सजेक्टली इतने ही बाघ हैं। मतलब इतने ही बाघ हैं। इससे ना तो एक कम हो सकता है ना ज्यादा हो सकता है। इसीलिए बहुत बार ऐसा होता है कि हम बहुत सारी प्रजातियों को उनके जीते जी मुर्दा घोषित कर देते हैं। मतलब कह देते हैं कि ये प्रजाति अपने हैबिटेट में इतने साल से दिखी नहीं। तो यह विलुप्त हो गई है और पता 2:01:21 लगता है अगले 10 साल में वह दिख जाती है। तो कैमरे के द्वारा या जो ऐसे हमारी निगाह में या सेटेलाइट से जो कुछ पकड़ में आता है उसी के आधार पर हम अंदाजा लगाते हैं या गणना करते हैं। हर बात को पर्सनली चाय पर इनवाइट नहीं किया जाता है कि मिस्टर बताइए आप आपका नाम क्या है और आप कितने साल के हैं? कितने समय से यहां पर रह रहे हैं। है ना? ये सब उनसे क्वेश्चन तो पूछ नहीं सकते हैं। आदमी की जनगणना इतनी मुश्किल है तो बाघों की जनगणना तो आप अंदाजा लगा ही सकते हैं। तो ये सिर्फ एक अनुमान है। यानी इससे ज्यादा भी हो सकते हैं, कम भी हो सकते हैं। इसके बाद 29 जुलाई 2023 की बात है। कॉर्बेट राष्ट्रीय माफ़ कीजिएगा कार्बेट टाइगर रिजर्व जो है नेशनल पार्क के अंतर्गत ही। यहां पर मनाया गया वैश्विक बाघ दिवस और इसके मौके पर केंद्रीय राज्य मंत्री थे अश्विनी कुमार चौबे। उनके द्वारा एक रिपोर्ट जारी की गई। कुल मिलाकर बात यह है कि कैमरा ट्रैप्ड कैमरे की निगाह में आने वाला और कैमरे की निगाह में नहीं आने वाला। दोनों जो क्षेत्र हैं दोनों ओर से भारतीय वन्य जीव संस्थान द्वारा डाटा का विश्लेषण किया गया और बाघों की आबादी की जो ऊपरी सीमा है वो इतनी रखी गई। 3925 2:02:25 समझ रहे हैं? ये न्यूनतम है 3167 कम से कम इतने तो है ही। इससे ज्यादा ही होंगे कम नहीं होंगे और ज्यादा कितने हैं? इतने 3925 हो सकता है इस समय तक 4000 हो गए हो और औसतन संख्या 3682 होने का अनुमान है जिसमें कि हर साल 6.1% की वार्षिक वृद्धि हो रही है। तो 18 राज्यों में 58 टाइगर रिजर्व्स का नेटवर्क है और प्रयास रंग लाया है कुल मिलाकर दुनिया के लगभग 75% जंगली बाघ की आबादी अपने यहां ही रहती है। और बाघों की सबसे बड़ी आबादी यानी अकेले 785 बाघ जो है वह तो एमपी में ही है। उसके बाद दूसरे नंबर पर है कर्नाटक। तीसरे नंबर पर है उत्तराखंड। चौथे नंबर पर है महाराष्ट्र। मध्य प्रदेश में जो छह बाघ अभयारण्य अभी-अभी आप देखकर आए हैं उनमें से बांधवगढ़। इस बाघ अभयारण्य में बाघों की संख्या सबसे ज्यादा है। ठीक है? बांधवगढ़ जो बाघ अभयारण्य है यहां बाघ सबसे ज्यादा पाए जाते। अच्छा बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व जो है ना यहां बाघों की संख्या अभी भी सबसे ज्यादा है और पहले भी जो 90 का दशक हुआ करता था उस समय भी यहां 2:03:25 पर एक से एक बढ़कर बाघ पाए जाते थे। यहां पर चार्जर नाम का एक बहुत ही फेमस बाग हुआ करता था। कभी आप Google सर्च करिएगा या आपने किया होगा, पढ़ा भी होगा इसके बारे में। तो यह बहुत शक्तिशाली था। मतलब पूरा आक्रामक एक अल्फा मेल जो होता है उस कैटेगरी का था। और चार्जर नाम इसको मिला क्यों था? क्योंकि ये लोगों को दौड़ाता था। मतलब इसकी टेरिटरी थी और टेरिटरी इसका जो साम्राज्य था वो बहुत बड़ा था। कोई भी सफारी वाहन, कोई जीप, कोई हाथी पर सवार होकर जो टूरिस्ट आते हैं वो सब इसकी इसका जो इलाका होता था वहां जब प्रवेश करते थे तो ये बहुत तेजी से झप झपटता था। बाकी बात देखकर निकल जाए। आप फोटो खींच रहे हैं। वह फोटो खिंचवा कर निकलते बने। है ना? आप हल्ला कर रहे हैं। कोई दिक्कत नहीं। लेकिन चार्जर सामने पड़ जाए तो हमला बोल देता था। और ये मॉक चार्ज एक तरह से उसका होता था। मतलब डराने का तरीका था। नुकसान किसी को नहीं पहुंचाया। लेकिन हां रोमांच सभी सभी को हो जाता था। भाई बाघ सामने से आ रहा है। हमला कर दिया। और 1991 में जो चक्रधारा रीजन था वहां के शक्तिशाली बाग बंका को यह हरा देता है। वहां का जो एरिया था बंका का उसका छीन लेता है और वहां पर अपना वर्चस्व स्थापित कर देता है। और इसकी 2:04:25 जो वाइफ थी उसका नाम था सीता वो बहुत मशहूर बाघिन थी। तो चारचार पॉइंट मतलब बाद में क्या होता है ना इसी की जो वंशावली होती है इसी के जो लड़के बच्चे होते हैं क्योंकि इसका जीन बहुत स्ट्रांग रहता है। तो इसकी जो आगे की पीढ़ी होती है वो भी मजबूत बाघों की होती है। है ना? तो उसमें जो इसके युवा बच्चे होते हैं उनहीं से इसकी लड़ाई होने लगती है। अंत में टेरिटरी की लड़ाई में घायल होता है और मारा जाता है। तो इसके लिए चार्जर पॉइंट नाम से एक पूरा जोन बनाया गया है और इसका एक स्मारक भी है। ठीक है? आगे चलते हैं। कुछ रोचक घटनाएं होती हैं जो कि ऐसे ही चर्चा में आ जाती है। 58 बाघ संरक्षित क्षेत्रों में से उत्तराखंड में क्बेट टाइगर रिजर्व में सबसे अधिक यानी 260 बाघों की आबादी दर्ज की गई है। तो अब आइए यहां पर जो टेबल बनी है टैबुलर स्ट्रक्चर का यही अच्छा स्वरूप होता है कि बात करते-करते हम सीधे फैक्ट पर आ जाते हैं। तो यहां भी देखिए सबसे ज्यादा बाघों की आबादी वाले राज्य हैं और सबसे ज्यादा बाघों की संख्या वाले जो राज्य हैं। माफ़ कीजिएगा अभयारण्य है वो दिए हुए हैं। मतलब राज्यवार पहले देखेंगे उसके बाद अभ्यारण्य के हिसाब से देखेंगे। राज्यवार सबसे पहले है मध्य प्रदेश 785 2:05:26 बाग है। 2022 तक की स्थिति है। कर्नाटक 4 साल पर ये होती है तो आप समझ सकते हैं कि अब ये कब होगी। कर्नाटक 563 उत्तराखंड 560 महाराष्ट्र 444 तमिलनाडु 306। जिम कार्बेट देखिए सबसे ज्यादा बाघों की संख्या वाले जो नेशनल पार्क बाघ अभयारण है नेशनल पार्क तो ये है ही है उसके अलावा बाघ अभयारण है तो उन बाघ अभयारण्यों में सबसे पहले नंबर पर आता है जिम कार्बेट 260 बाघ यहां पाए जाते हैं बांदीपुर न्यूनतम 260 बांदीपुर कर्नाटक का 150 नागर होले कर्नाटक का 141 बांधवगढ़ मध्य प्रदेश का 135 दुधवा उत्तर प्रदेश का 135 ये 2022 का डाटा है अब वन्य जीव अभयारण्य यानी वाइल्ड लाइफ सेंचुरी को देखिए। पहले तो वाइल्ड लाइफफ़ सेंचुरी होती क्या है? ये जो वन्य जीव अभयारण्य है ये असल में क्या होता है? किसी भी आरक्षित वन या प्रादेशिक जल में शामिल क्षेत्र के अलावा किसी भी क्षेत्र को राज्य सरकार द्वारा अभयारण्य के रूप में अधिसूचित किया जा सकता है। और अगर ऐसा क्षेत्र पर्या पर्याप्त पारिस्थितिकी अपनी धारण करता है। 2:06:29 वहां पर पर्याप्त जीव-जंतु पाए जाते हैं। फूल पौधे पाए जाते हैं। वृक्ष पाए जाते हैं। वहां की जो वहां का जो ज्योग्राफिकल स्ट्रक्चर है, भू आकृति विज्ञान है वो परफेक्ट है। तो कुल मिलाकर यह पूरी तरह से परफेक्ट या उत्कृष्ट माना जाता है। पर्यावरण की रक्षा प्रचार और विकास के लिए मतलब जीवों का वहां पोषण भली-भांति हो सकता है ऐसा माना जाता है और ऐसे ही क्षेत्रों को वन्य जीव अभयारण्य क्षेत्र के तौर पर घोषित किया जाता है जो कि संवेदनशील हो लेकिन पोषण देने वाले जहां कि ज्यादा से ज्यादा जीवों का गुजारा हो सके। आगे वही कहा गया कि वन्य जीव अभयारण्य एक ऐसा स्थान होता है जहां कि जानवरों के आवास और परिवेश को किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप से बचाया जा सके। कई स्थानों पर अवैध शिकार, हत्या, जानवरों से जानवरों को पकड़ने के लिए जो खुले तौर पर प्रतिबंध है वह लागू। मतलब कुल मिलाकर जानवरों का आपस में जो शांतिपूर्ण अस्तित्व है उसको प्रदान करने का उद्देश्य होता है। तो भारत के जो वन्य जीव अभयारण्य है उनको आईयूसीएन श्रेणी चार के संरक्षित क्षेत्रों के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया 2:07:29 है। 72 का जो वन्य जीव संरक्षण अधिनियम था उसमें राज्य सरकार को विशिष्ट क्षेत्रों को वन्य जीव अभयारण्य घोषित करने की अनुमति दी थी। वही क्षेत्र जिन्हें कि पर्याप्त पारिस्थितिकी भू आकृति विज्ञान और प्राकृतिक मूल्य का माना जाता था। असम में मानस राष्ट्रीय उद्यान, मानस वन्यजीव अभयारण्य यह भारत में स्थापित होने वाला पहला अभयारण्य है और यह एक राष्ट्रीय उद्यान है जो कि यूनेस्को प्राकृतिक विश्व धरोहर स्थल प्रोजेक्ट टाइगर, हाथी रिजर्व और बायोस्फीयर रिजर्व सभी के रूप में काम करता है। ध्यान दीजिएगा यह जो राष्ट्रीय उद्यान है मानस इसके बारे में बात की जा रही है। एक नेशनल पार्क है। यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट है। प्रोजेक्ट टाइगर का हिस्सा है। उसके अलावा एलीिफेंट रिजर्व है और बायोस्फीयर रिजर्व है। पूरा मल्टीपर्पज है। कच्छ का रण यह भारत का सबसे बड़ा वन्य जीव अभयारण्य है और गहीर माथा आप जानते ही हैं कि यह ऑलिव रिडले जो टर्टल होते हैं उनके लिए जाना जाता है। ये जो कछुए हैं ये अमेरिका के तट से सीधा भारत के तट पर पहुंचते हैं और यहां आकर अपना घोंसला बनाते हैं यानी रेत में गड्ढे खोदकर उसमें अंडे देते हैं और उसके बाद जब प्रजनन की प्रक्रिया इनकी पूरी हो जाती है 2:08:31 तो ये वापस अपना समुद्र में लौट जाते हैं। अपने अंडों को वही रेत में दबाकर छोड़ जाते हैं। अंडे अंदर ही अंदर रेत के अंदर परिपक्व होते हैं और फिर बच्चे उनमें से निकलते हैं यानी छोटे-छोटे कछुए और वह रेत के ऊपर आते हैं। फिर रेंग कर धीरे-धीरे करके इनकी जो रफ्तार होती है ये समुद्र में चले जाते हैं और पूरी जो कछुए के बच्चों की आबादी है कुछ मारे जाते हैं कुछ शिकारियों का शिकार बन जाते हैं। जितने सक्सेसफुली समुद्र में उतर पाते हैं वो जीते हैं और आगे जाकर वो अपनी आबादी बढ़ाते हैं। ये इनका तरीका है। बीते जो कुछ वर्ष हैं उसमें इन कछुओं की तादाद में तेजी से कमी आ रही है। क्योंकि जो उड़ीसा का समुद्री तट और इनका जो प्रजनन क्षेत्र है वहां अतिक्रमण मनुष्य का मनुष्य का हस्तक्षेप बहुत ज्यादा हो गया है। प्रदूषण बहुत ज्यादा हो गया है। मछुआरे के जाल में फंस के ये मारे जाते हैं। प्रिडेटर्स का शिकार हो जाते हैं। जो समुद्री रेत है उस पे पर्यटकों की आवाजाही से इनकी पूरी प्रक्रिया ही बाधित हो जाती है। उसके अलावा समुद्र में उतरते हैं तो वहां पता लगा महासागर में तेल फैला हुआ है। जहाज का तेल फैला हुआ है या किसी भी तरह का प्रदूषण है। उसके ये शिकार बन जाते हैं।कि नाजुक बच्चे हैं। है ना? है ना? बड़े-बड़े समुद्री जीव शिकार बनते हैं। ये तो 2:09:32 छोटे-छोटे बच्चे हैं। और उसके अलावा जो भी पैदा हो रहे हैं ना अंडे से बाहर निकल रहे हैं और सर्वाइव कर रहे हैं सक्सेसफुली उसमें भी मैक्सिमम मादा है। ये गर्मी बढ़ने का असर है। जब ज्यादा गर्मी बढ़ती है तो अंडे में से निकलने वाले जो बच्चे होते हैं उनकी ज्यादा संभावना होती है कि वो मादा होंगी। तो इसलिए इनकी आबादी भविष्य में संकट में आने वाली है। ऐसा लग रहा है। और ऐसा सारी जीव प्रजातियों के साथ कमोबेश हो रहा है। लड़कियों की तादाद बढ़ रही है। मतलब मादाओं की तादाद बढ़ रही है। विभिन्न प्रजातियों पर यह शोध किया गया और देखने के लिए मिला है। यह गर्मी बढ़ने का असर है। मतलब ग्लोबल वार्मिंग का असर है। फिलहाल गहिर माथा को इसके पारिस्थितिकी महत्व पर विचार करने और समुद्री कछुओं को बचाने के प्रयासों के तहत 1997 में उड़ीसा सरकार द्वारा कछुआ अभयारण्य घोषित किया गया। ठीक बात है। आगे चलते हैं। यहां देखिए ये है वन्य जीव अभयारण्य। प्रमुख जितने भी हैं राज्य दिया है और वन्यजीव अभयारण्य कहां पर कितने मतलब कौन-कौन से हैं वो दिया है राज्यवार। हिमाचल में चंद्रताल है, पोंग डैम है, रेणुका है, बांधली है, दरंग घाटी है, धौलाधर है, तालरा है, नारगू है और शिकारी 2:10:33 देवी। दिल्ली में भी एक है। इंदिरा प्रियदर्शनी वन्य जीव अभयारण्य या फिर असोला भाटी भी इसको कहा जाता है। आइए अब नागालैंड में चलते हैं। नागालैंड में फकिम, पहाड़, सिंहफन और पुलीब। झारखंड में दलमा या डालमा इसको कहते हैं। गौतम बुद्ध, हजारीबाग, पारसनाथ, पलामू, तोपंची, लावालों, पालकोट, उधवा, उधवा लेख कोरडमा महंदर और भेड़िया मिजोरम में दमफा थोरांग लटांग गेंगपुई ख्वांगलांग और टोकालो अरुणांचल में पखुई सेसा आर्किड और दिवांग कर्नाटक में दांडेली घाट प्रभा चिंचोली तालकावेरी सोमेश्वर तालकावेरी असल में सोमेश्वर भद्रा भीमगढ़ ब्रह्मगिरी कावेरी और पुष्पगिरी शरावती घाटी ये सारे जो हैं ये कर्नाटक के वन्यजीव अभयारण्य उसके बाद वन्य जीव अभयारण्यों को अगर देखें त्रिपुरा में तो गुमती सिपाही जाला रोवा और कृष्णा केरल में थ थडेकट है ये पक्षी अभयारण्य है इडुक्की है नियार है 2:11:33 परंबीकुलम है मालाबार है पेरियार है वायनाड है कुमारकाम है चिनार है ठीक है चिनार है अरलम है और चिमोनी वैसे ही उत्तराखंड में आएंगे तो यहां पर आप देखेंगे केदारनाथ अस्कोट कस्तूरी मृग बिनसार गोविंद और सोना नदी नंदौर आंध्र में कोरिंका कोलेरू नागार्जुन सागर श्रीसैलम मध्य प्रदेश में आएंगे तो बोरी गांधी सागर राष्ट्रीय चंबल उद्यान है। उसके अलावा पन्ना, राधा पानी, सोनघड़ियाल और ओरछा तेलंगाना में पाखल एतुर नगरम, कावल, किन्नेरसानी, पोरचम, प्राणहिता, नागार्जुन सागर, श्रीसैलम ये सारे वन्य जीव अभयारण्य है। वैसे ही महाराष्ट्र में आ जाए फनसड़, बोर, कलसुबाई, हरिश्चंद्र घाट, मेलाघाट, नागाजीरा ये पक्षी अभयारण्य है। पेनगंगा, उमरे, खारंगला, कोयना, भीमाशंकर, तुंगारेश्वर, ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, कनारगांव और घोड़ाजड़ी। बिहार में भी कई सारे हैं जैसे कि बरेला झील है। सलीम अली जुब्बा साहनी पक्षी विहार इसको कहा जाता है। भीमबाद है। गौतम बुद्ध कांवरले कैमूर वाल्मीकि 2:12:34 विक्रमशिला गंगा डालफिन। ठीक है? ये राजगीर में पड़ता है। और ओसा में आ जाइए। ओसा में भीतरकणिका चिल्का गहिरमाथा नंदन कानन सतकोशिया सिमलीपाल बैसीपल्ली और हदगढ़ ये सारे फिर चंडीगढ़ में यहां देखिए सुखना झील और सिटी बर्ड है राजस्थान में माउंट आबू सरिस्का जवाहर सागर राष्ट्रीय चंबल उद्यान केवलादेव रामसागर शेरगढ़ कैला देवी नाहरगढ़ राम रामगढ़ विस्तारी इसके बाद है पंजाब में हरिके अबूवर अबोहर झज्जर और बचोली पश्चिम बंगाल में सुंदरवन चिंतामणि हालिडे बलरामपुर लोथियन और महानंदा छत्तीसगढ़ में अचानक कमार सीता नदी भैरमगढ़ बादलखोल भोरामदेव उदंती वाइल्ड वाइल्ड बफेलो सेंचुरी है मतलब वहां जंगली भैंस पाई जाती है इसके बाद असम में आ जाए देपोरवील है पूर्वीकारी अगलोंग है लावोखोवा है नंबोर है चक्रशिला है अमचंग है और बुराचापारी 2:13:35 इसके बाद आगे बढ़े तो यहां देखेंगे आप गोवा को गोवा में भगवान महावीर मोल्यम है, बोंडला है और मदेई है। तमिलनाडु में कोडाई नाल है, नलई है, पॉइंट कैलमर है, पुलीकट है, सत्यमंगलम है, कलक्कड़ इंदिरा गांधी, वेदांत थंगल, कावेरी कराई बेट्टी, काजू बेली और थन गुजरात में कच्छ बस्टर्ड सेंचुरी, गिर कच्छ की खाड़ी, नल सरोवर, नारायण सरोवर, चिंकारा वाला, जंगली गधे के लिए जो वाइल्ड एस के लिए बना हुआ सेंचुरी है। पोरबंदर वाला है, बर्ड सेंचुरी उसको भी ऐड कर लीजिए। जंबूगोंडा है। इसके अलावा रतन महल है, थोल लेखक है, ससनगिरी है, मिथियाल है। ये सारे गुजरात के हैं। सब के सब गुजरात के हैं। उत्तर प्रदेश में भी ठीक-ठाक है। ध्यान से देखिएगा। बखरा है, कैमूर है, महावीर स्वामी है। राष्ट्रीय चंबल उद्यान है। ओखला पक्षी विहार है। पटना पक्षी विहार है। पटना नाम है लेकिन ये है उत्तर प्रदेश में। हस्तिनापुर, रानीपुर, सुहागी बरवा, सुरसरोवर, चंद्रप्रभा, कतरनिया घाट, बिशनपुर माफ़ कीजिएगा। किशनपुर, सोहेलवा ये सारे उत्तर 2:14:36 प्रदेश के हैं। हरियाणा में आते हैं। भिंडावास, खपरवास, कालेसर, वीर शिकारगढ़, छिछरा और नाहर। ठीक है? ये सारे मणिपुर में यांगो पोकपी लोकचाओ, खोंग जंगंबा। ठीक है? खोंग जंगंबा चिंग इसको कहा जाता है। जिरी मकरू है, कैलम है, थिंग थे और जिलाड और बनिंग है। यह सारे हैं। इसके बाद आगे बढ़े। दादरानगर हवेली और दमनदीप में एक ही है सिर्फ। इसके बाद सिक्किम में आप देखेंगे फबोंग लो कीतम बर्ड सेंचुरी और मैनम पंगोलाखा है। अंडमान निकोबार में बंबू आइलैंड है, बैरन है, बैरन है। चैनल आइलैंड है, पीकाक है, टर्टल आइलैंड है, कर्ल्यू है, मेगापोड है। जम्मू कश्मीर में गुलम्ग, लिंब, नंदिनी, सुरिंसर मानसर। लक्षद्वीप में लक्षद्वीप नहीं बल्कि लक्षद्वीप। ठीक है? पूरा क्ष रहेगा। पिट्टी है। ठीक है? पिट्टी बर्ड सेंचुरी। नेक्स्ट आगे बढ़ते हैं। यहां देखिए शरावती घाटी ये अभयारण्य और राज्य दिया हुआ है। वही चीज है। शरावती 2:15:38 घाटी जो अभयारण्य है ये कर्नाटक में है। सतकोशिया गार्ज को आप देख रहे हैं उड़ीसा में है। पिरोटन गुजरात में है। अटुर नगरम तेलंगाना में है। गोमारा पश्चिम बंगाल में है और पोजेरम तेलंगाना में है। आगे बढ़े। यहां देखें आप पक्षी अभयारण्य को। वन्य जीव अभयारण्य तो आपने देख लिए। पक्षी अभयारण्य देख लेते हैं। तो पक्षी अभयारण्यों में अगर देखा जाए तो भारत का सबसे पुराना जो पक्षी अभयारण्य है यह तमिलनाडु राज्य में है और यह है वेदांग थंगल। इसकी स्थापना अंग्रेजों ने की थी। उन ये 1798 का है। भरतपुर पक्षी अभयारण्य जिसको कि केवलादेव घाना राष्ट्रीय उद्यान के नाम से भी जाना जाता है। ये है राजस्थान में। रायगंज वन्य जीव अभयारण्य जिसको कि कुलिक कहा जाता है। यह पड़ता है दिनाजपुर जिला उत्तरी दिनाजपुर जिला रायगंज के पास में यानी वेस्ट बंगाल इसकी लोकेशन है। कुमारकोम पक्षी अभयारण ये वबानंद पक्षी अभयारण्य भी कहा जाता है और ये केरल की जो वबानंद झील है उसी के पास में मौजूद है। तो ये रही सूची राज्य दिया है और पक्षी अभयारण्य का नाम दिया है। सबसे पहले है कदलुंडी केरल में है। 2:16:39 कुमारकोम भी केरल में है। मंगलवरम यह आपका केरल में है। पथिरमलम यह भी केरल में है। थड्डे कट केरल में है। इसके बाद नांगी और नकटी बिहार में है। कांवर लेक बिहार में है। इसमें से बहुत सारी जो है वो आप देखेंगे कि रामसर साइट्स भी हैं। कुशेश्वर भी बिहार में है। नफसगढ़ ड्रेन पक्षी अभयारण दिल्ली में है। सलीम अली बर्ड सेंचुरी पक्षी अभयारण ये गोवा में है। गोगा आपका गुजरात में है। सरसई नवार उत्तर प्रदेश में है। लाख बहोसी उत्तर प्रदेश में है। नवाबगंज भी वहीं पर ओखला पटना समन समसपुर सांडी गो ये सब जो है सांडी तक आपने देखा ये सब यूपी में है गोगाबल आपका बिहार में है संजय गांधी जैविक उद्यान ये भी बिहार में है चिंतामोनी कर पक्षी अभियान ये आपका पश्चिम बंगाल में खिजड़िया गुजरात में है कच्छ बस्टर्ड भी गुजरात में है कुलिक पक्षी अभयारण्य रायगंज में है पश्चिम बंगाल और रसिक बिल जो है यह पश्चिम बंगाल में है नलसरोवर गुजरात में पोरबंदर पक्षी विहार ये भी गुजरात में है मयानी महाराष्ट्र में 2:17:41 है। करनाला भी महाराष्ट्र में है। थोल लेखक पक्षी विहार गुजरात में है। बाजना पक्षी विहार भी गुजरात में है। महान मतलब ग्रेट इंडियन बस्टर्ड जो सेंचुरी है, नेशनल पार्क है। यहां देख रहे हैं आप महाराष्ट्र का है। नंदूर मधमेश्वर नंदूर मधमेश्वर कहा जाता है। ये जो बर्ड सेंचुरी है, पक्षी अभयारण है, ये महाराष्ट्र में है। भिंडावास हरियाणा में है। वोकेरा वेटलैंड है और ये वेटलैंड आपका जम्मू कश्मीर में पड़ता है। नेक्स्ट आप यहां पर खपरवास को देख रहे हैं। हरियाणा में है। लांगटांग मिजोरम में है। गमगुल हिमाचल में पड़ता है। और चिल्का झेल चिल्का झील या चिल्का ले उड़ीसा की है ही है। अतिवेरी कर्नाटक केवलादेव राजस्थान बांकापुर मोर अभयारण्य है और ये कर्नाटक में है। तालछापर राजस्थान में है। बोनाल पक्षी अभयारण्य कर्नाटक में है। चित्रांगुदी तमिलनाडु में है। गुडवी पक्षी अभयारण्य कर्नाटक में है। करंजीकुलम पक्षी अभयारण्य तमिलनाडु में है। कल कगलाडु पक्षी अभयारण्य कर्नाटक में है। और कुथनकुलम जो आप देख रहे हैं ये तमिलनाडु में है। मगदी पक्षी अभयारण्य कर्नाटक में है। सुचिंद्रम 2:18:42 थेरूर पक्षी अभयारण्य तमिलनाडु में है। मंदागड्डे पक्षी अभयारण्य कर्नाटक में है। और उदय मार्तंडपुरम कहा जाता है। उदय मार्तंडपुरम लिखा हुआ है। लेकिन असल में उदय मार्तंडपुरम ये तमिलनाडु में है। पुतनहल्ली झील है और ये बर्ड सेंचुरी है। ये आपका कर्नाटक में पड़ेगा। वेदांग थंगल तमिलनाडु का है। वेलोड भी तमिलनाडु का है और वेटांगुंडी जो है ये भी तमिलनाडु का है। ठीक है? ये तीन जो आप देख रहे हैं लाइन से ये तीनों तमिलनाडु में इसके बाद है रंगनाथ हिटू कर्नाटक का है। अटापाका जो है ये आंध्र का है और नेल्लापट्ट जो है ये भी आंध्र का दिखाई देता है। पुलीकट लेख कहां पड़ेगा? आंध्र और तमिलनाडु दोनों में फैला हुआ है। वैसे ही उपलपा जो है ये आंध्र का है। तो यहां पर बना हुआ है नक्शा और इसमें वही सारे वेटलैंड और पक्षी अभयारण्य दे रखे हैं जो अभी आप देख कर आ रहे हैं। ठीक है? तो शुरू करते हैं। इसमें शुरू क्या करना है? देखा तो है ही है एक बार इसमें भी देख लीजिए चित्र में भी नक्शे में भी होकरा वेटलैंड जो है ये आपका जम्मू कश्मीर का है भिंडावास खापरवास यह पड़ेगा हरियाणा में नफजगढ़ ड्रेन पक्षी 2:19:42 अभयारण्य ये दिल्ली में है वैसे ही हिमाचल में गमगूल है सरसई नवार लाख बहुसी नवाबगंज ओखला पटना समन समसपुर सांडी ये सब यूपी वाले हैं है नांगीनकटी कवल कुशेश्वर गोगाबल संजय गांधी ये सब बिहार के हैं। वैसे ही अगर आप इधर आएंगे तो यहां लांगतांग को देख रहे हैं मिजोरम में है। यहां देखेंगे केवला और तालछापर यह राजस्थान का हो गया। गोगा, खिजड़िया, कच्छ बस्टर्ड, नलसरोवर, पोरबंदर, थोल यह सब गुजरात के हैं। ठीक है? मयानी, करनाला, ग्रेट इंडियन बस्टर्ड ये सब महाराष्ट्र वाला हो गया। चिंतामोनी अभयारण, कुलिक पक्षी अभयारण्य ये सब पश्चिम बंगाल का हो गया। अब आइए नीचे चलते हैं। नंदूर मधमेश्वर जो है ये भी महाराष्ट्र का है। अच्छा इसके बाद अतिवेरी पांकापुर बोनाल गुडवी कगलाडू मगदी मंदागड्डे पुतनहल्ली रंगनाथ हिडू ये सारे जो पक्षी अभयारण्य है ये कर्नाटक के हैं। सलीम अली पक्षी अभयारण्य ये सिर्फ एकमात्र है गोवा का और गोवा है ही कितना बड़ा। इसके बाद कदुंडी, कुमारकोम, मंगलवनम, पथर मल्लम और थड्डेकट 2:20:43 ये सारे केरल के हैं। तमिलनाडु में आप देखिएगा तमिलनाडु में चित्रांगुली है करंजीकुलम है कुथन कुथनकुलम है सुचिंद्रम है उदय मार्तंडपुरम है वेदांग थंगल है बेलोड है और वेटांगुटी ये सारे आंध्र प्रदेश में अटापाका नीला नीलापट्टू पुलीकट श्री पेसुनीला नरसिम्हा और उपलपाडू ये सारे ठीक है देख लिया आगे चलते हैं अब आ जाइए जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र यानी बायोस्फीयर रिजर्व तो जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र ऐसे इलाके होते हैं जो कि ज्योग्राफिकली अगर देखा जाए तो जीव जंतुओं और प्राकृतिक भूभाग दोनों को मिलाकर बनते हैं। मतलब जो जीव प्रजातियां जहां रह रही हैं उनके प्राकृतिक आवास को ही हम बचाएंगे। तो ये बात तो पीछे हमने नेशनल पार्क में भी देखी थी। लेकिन यह जो जीव प्रजातियां हैं ये अकेले वहां नहीं रहती हैं। वहां मनुष्यों का भी आवास होता है। मतलब मतलब मनुष्यों की भी आवाजाही होती है। बाकी गतिविधियां भी इस क्षेत्र में चल रही होती हैं। तो उनको हम चलने देते हैं। वैसे ही चलने देते हैं। मतलब एक बफर जोन जैसा बनाते हैं और 2:21:44 यह जो जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र होते हैं यह एक तरह से एक साझी जीवन यापन की तकनीक है। जैसा कि हमें पर्यावरण सिखाता है। जैसा कि हमें प्रकृति सिखाती है। कि सारी जो जीव प्रजातियां हैं सबको मिलजुलकर रहना चाहिए। एक दूसरे से लेनदेन जो हमारा पहले से ही चलता आ रहा है मतलब एक दूसरे पर जो निर्भर निर्भरता है वो तो रहेगी ही लेकिन हमें सबके सह अस्तित्व का ध्यान देना चाहिए। तो जो हम सस्टेनेबल डेवलपमेंट और सह अस्तित्व की बात करते हैं शांतिपूर्ण सह अस्तित्व की बात करते हैं उसी का साकार स्वरूप है ये बायोस्फीयर रिजर्व। और इन सभी बायोस्फीयर रिजर्व का जो केंद्र बिंदु होता है वह आमतौर पर कोई नेशनल पार्क होता है जहां के बहुत स्ट्रिक्ट रूल रूल रेगुलेशन जो है वो काम करते हैं। ठीक बात है। अब आगे देखते हैं। तो कुल मिलाकर स्थानीय सामुदायिक प्रयास और वैज्ञानिक प्रबंधन दोनों इसमें काम करता है। सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए जो यूनेस्को का मैन एंड बायोस्फीयर यानी एम एबी प्रोग्राम जो है मैब। उसी के अंतर्गत इनको विकसित किया गया है। तो बायोस्फीयर रिजर्व का जो कार्यक्रम है यह 1971 में यूनेस्को ने शुरू किया था और इसकी घोषणा केंद्र 2:22:46 सरकार अधिसूचना जारी करके अपना दी थी। तो मैन एंड बायोस्फीयर प्रोग्राम के अंतर्गत सरकारें इनको यह जो क्षेत्र हैं इनको नामांकित करती है और बायोस्फीयर रिजर्व बनाने का उद्देश्य वही होता है जीवन के सभी रूपों और उनके सहायक तंत्रों को पूरी तरह से विकसित करना उनके प्राकृतिक आवास में उनका आवास बदले बिना सिर्फ हम बाहर बाहर से निगरानी करते रहें और वो जिस स्वाभाविक स्वरूप में पनप रहे हैं और जैसे जहां पनप रहे हैं जो प्रजाति जहां रह रही है उसको वहीं रहने देना। तो दुनिया का जो पहला बायोस्फीयर रिजर्व है यहां दुनिया की बात हो रही है। विश्व की बात हो रही है। ध्यान दीजिएगा। विश्व का पहला बायोस्फीयर रिजर्व 1979 में स्थापित किया गया था। 1979 भारत में कुल मिलाकर इनकी संख्या 18 ही है। मान्यता प्राप्त यूनेस्को के द्वारा कुल मिलाकर 13 है। कच्छ की खाड़ी 12454 स्क्वायर कि.मी. ये सबसे बड़ा बायोस्फीयर रिजर्व है। सबसे बड़ा है। और नीलगिरी बायोस्फीयर रिजर्व सबसे पहला है जिसको कि अधिसूचना मिली थी 1 सितंबर 1986 को। डिब्रू सखोवा का क्षेत्रफल सबसे कम है। हमने देखा कि कच्छ की खाड़ी वाला सबसे 2:23:47 बड़ा है। तो डिब्रू सखोवा जो यहां आप देख रहे हैं असम वाला ये सबसे छोटा है 900 माफ़ कीजिएगा 765 स्क्वायर कि.मी. इसका विस्तार है स्क्वायर कि.मी. हालांकि छोटा नहीं है उतना दायरा लेकिन अब 12000 से तुलना करेंगे तो छोटा लगेगा ही। तो सबसे बड़ा है कच्छ की खाड़ी वाला और सबसे छोटा है डिब्रू सखोवा। तो ये रहे वो 18 जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र। ना सिर्फ उनका नाम और अधिसूचना की तारीख दी है बल्कि राज्य के साथ-साथ वहां पर रहने वाले जीव-जंतु भी। वैसे तो बहुत सारे प्राणी रहते हैं लेकिन जो मुख्य जीव पाए जाते हैं जिनके लिए वो फेमस है तो वो यहां पर दिए हुए हैं। नीलगिरी सबसे पहले 1986 क्षेत्रफल है 5520। ये वायनाड, नागरले, बांदीपुर, मधुमलाई, नीलांबुर, साइलेंट वैली, सिरवानी इन सब में फैला हुआ है। यानी पूरा अच्छा खासा विस्तार है। और तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक वाला पूरा हिस्सा मतलब तीन राज्यों में इसका विस्तार। नीलगिरी ताहर और सिंह पुच्छी मकाक एक प्रकार की वानर प्रजाति है जिसका कि जिसकी कि पूछ जो है वो शेर जैसी होती है। तो ये दो यहां के मुख्य जीव-जंतु हैं। बाकी तो मतलब पाए ही जाते हैं। इसके बाद 2:24:49 नंदा देवी है। चमोली पिथौरागढ़ और बागेश्वर जिले में फैला हुआ है। उत्तराखंड के 5860 इसका टोटल विस्तारण 1988 में अधिसूचना मिली थी। स्नो लेपर्ड यहां की खासियत है। उसके अलावा काला भालू, भूरा भालू, कस्तूरी मृग, हिम मुर्गा, सुनहरा बाघ क्षमा कीजिएगा। सुनहरा बाज और काला बाज दोनों यहां पर पाए जाते हैं। ठीक है? गोल्डन ईगल भी पाया जाता है और ब्लैक ईगल भी पाया जाता है जिसको भी शिकारा कहा जाता है। तो नंदा देवी जो बायोस्फीयर रिजर्व है इसको आप देख रहे हैं। इसके बाद नोकरेक है 1988 820 स्क्वायर कि.मी. विस्तार है। रेड पांडा यहां की खासियत। हालांकि ये पांडा कहा जाता है लेकिन देखने में ये गिलहरी जैसा लगता है। थोड़ा बड़े साइज का। इसके बाद आप देख रहे हैं ग्रेट निकोबार को 885 स्क्वायर किलोमीटर विस्तार है। साल्ट वाटर क्रोकोडाइल यहां पाए जाते हैं। जरा सतर्क होकर जाइएगा। 1989 के टाइम में इसको अधिसूचित किया गया था। मन्नार की खाड़ी में आ जाते हैं। डगांग यानी समुद्री गाय जो कि समुद्री घास को चरकर अपना जीवन यापन करती है और बड़ी ही सीधी होती है। लेकिन 2:25:50 मनुष्य की विनाशकारी गतिविधियां और जो जलवायु परिवर्तन हो रहा है उसका तेजी से शिकार हो रही है। तो 1989 में इसको अधिसूचना मिली थी। 10,500 स्क्वायर कि.मी. इसका विस्तार है। जलीय क्षेत्र है। इसके बाद नंबर आता है मानस का 1989 2837 कोकराझार बोंगाई गांव बारापेट नलबाड़ी और कामरूप असम का क्षेत्र है ही है। पूरा विस्तार लाल पांडा और सुनहरा लंगूर इसकी खासियत। दरांग जिला भी जो है असम का इसमें कवर होता है। इसके बाद सुंदरवन आप समझ ही रहे हैं। गंगा और ब्रह्मपुत्र का यह पूरा तंत्र है। डेल्टाई सिस्टम है और 9630 स्क्वायर कि.मी. टोटल विस्तार है। 1989 में अधिसूचना मिली थी। रॉयल बंगाल टाइगर का यह नेचुरल हैबिटेट है और ऐसा दुनिया में पहली बार देखा जाता है कि कहीं भी इतना भारीभरकम जो बाघ है अच्छी खासी पर्सनालिटी वाला वो दलदली क्षेत्र में रहता है। ऐसा पहली बार और एकमात्र यही दिखाई देता है। सिमलीपाल ये उड़ीसा का है। मयूरबंद जिला यहां गौर पाए जाते हैं। गौर नहीं असल में गौर पाए जाते हैं। जिनको कि गलती से कुछ जो बुद्धिमान लोग हैं वो जंगली भैंस समझ लेते हैं। कहते हैं कि 2:26:51 अमेरिकन बाइससन की तरह से इंडियन बाइसन है। तो बाईसन जो होते हैं वह असल में भैंस होते हैं। मतलब भैंस की प्रजाति भैंस के कुल से आते हैं। और यह जो गौर है यह सबसे शक्तिशाली और सबसे बड़े आकार का मस्कुलर बोबवियन होता है। ये गौवंश है। गाय के परिवार का सबसे बड़ा सदस्य है। इसकी जो मांसपेशियां होती है वो बिल्कुल एक शाकाहारी पहलवान जैसी होती हैं। जिम में भी वैसी बॉडी नहीं बनी। ठीक है? है तो गौर गौर अलग चीज है और बायसन अलग चीज है। रॉयल बंगाल टाइगर यहां देखें आप और जंगली हाथी यह सब जो है यह सिमलीपाल की खासियत है उड़ीसा डिब्रू सखोआ को आप देखेंगे डिब्रूगढ़ और तनसुकिया जिले में असम में पाया मतलब फैला हुआ है ये सुनहरा लंगूर इसकी खासियत है 97 का अधिसूचित है दिहांग दबांग अरुणाचल का है ही सियांग और दिवांग घाटी का हिस्सा है यहां मृग हिरण पाया जाता है मिशमी तकिन पाया जाता है लाल गोरल पाया जाता है और एशियाई काला भालू पाया जाता है घबराइए नहीं ये सारे जिंदा जीव ही है और कुछ नहीं है इसके बाद आगे बढ़ते हैं। अच्छा क्षेत्रफल इसका अच्छा खासा है। दिहांग दीबांग का देखिए एरिया। 2:27:52 इसके बाद आता है मध्य प्रदेश का पंचमढ़ी। यह मध्य प्रदेश के बैतूल, होशंगाबाद और छिंदवाड़ा में फैला हुआ है। यहां जॉइंट स्क्वेरल और फ्लाइंग स्क्वेरल दोनों पाई जाती हैं। यानी जो विशालकाय गिलहरी है वो भी मिलती है और उड़ने वाली गिलहरी भी। तो कोई गिलहरी उड़ नहीं सकती है। लेकिन अपने हाथ और पंजे की मांसपेशियों को फैलाकर और अपनी पूंछ को पैराशूट की तरह यूज़ करके ये गिलरियां लंबी छलांग लगाती है। तो ऐसा लगता है कि उड़ रही। ठीक है। इसके बाद कंचनजंगा है। सिक्किम मतलब कंचनजंगा की पहाड़ी और सिक्किम का सिक्किम राज्य का हिस्सा है। यह 2619 स्क्वायर कि.मी. विस्तार है। रेड पांडा और स्नो लेपर्ड इसकी खासियत है। अगस्ता मलाई आपका पड़ता है तमिलनाडु में। तिरुणवेली और कन्याकुमारी जिला है। कुछ हिस्सा केरल में भी चला जाता है। तिरुवनंतपुरम कोल्लम और पथनम थीटा जिले में। तो यहां नीलगिरी ताहर के साथ-साथ हाथी पाए जाते हैं। 3500 स्क्वायर कि.मी. मोटे तौर पर एरिया है। 2001 में अधिसूचना मिली थी। अचानक अमरकंटक है 3835 स्क्वायर किलोमीटर। मध्य प्रदेश का अनूपपुर और डिंडोरी डिस्ट्रिक्ट है और 2:28:52 काला हिरण यहां पाया जाता है जिसको कि आप चिंकारा कहते हैं। यहां भेड़िए पाए जाते हैं और साथ ही साथ जॉइंट स्क्वेरल यहां भी मिलती है। 2005 इसकी अधिसूचना का समय है। अच्छा एक चीज है ये अचानक कमर अमरकंटक जो है ये मध्य प्रदेश के साथ-साथ छत्तीसगढ़ को भी कवर करता है। बिलासपुर वाला हिस्सा उसमें कवर होता है। कच्छ गुजरात राज्य का कच्छ राजकोट सुरेंद्रनगर और पाटन जिला जो है वो इसमें कवर हो रहा है। यहां पर जंगली गधा पाया जाता है। भारतीय जंगली गधा 2008 का वक्त है इसको अधिसूचना मिली थी। कोल्ड डेजर्ट कहां पाया जाएगा? ये पाया जाएगा हिमालय क्षेत्र में। तो हिमाचल प्रदेश में जो चंद्रताल और सरचू और किब्बर वन्य जीव अभयारण्य है उसका हिस्सा ये पूरा कैप्चर करता है। पिन वैली नेशनल पार्क के आसपास का क्षेत्र। कुल मिलाकर यहां हिम तेुआ ही खासियत है। विशेष रूप से क्षेत्र तो काफी बड़ा है। 7770 शेषांचलम ये आंध्र प्रदेश का जो चित्तूर और कुड़प्पा जिला है उसके कुछ भाग को कवर करता है। स्लेंटर लोरिस और पेंगुलिन जो कि बहुत गंभीर रूप से लुप्त प्राय प्रजाति है और शिकार होती है। मतलब शिकार इसको बनाया 2:29:52 जाता है अवैध तरीके से इसकी खाल के लिए। तो ये यहां पर पाए जाते हैं। 2010 का समय है। इसको अधिसूचना मिली थी। नेक्स्ट आप देख रहे हैं पन्ना। यहां चीता, चीतल, चिंकारा, सांभर और स्लॉथ पाए जाते हैं। ठीक है? ये स्लॉट जो है ये बहुत ही सुस्त होते हैं। मतलब एकदम धीमी रफ्तार में चलते हैं। एकदम लगता है कि मरने वाले हैं। ऐसी उनकी कंडीशन रहती है। जबकि वो जिंदा होते हैं लेकिन आलसी होते हैं। स्वभावगत आलसी होते हैं। 2998.98 स्क्वायर कि.मी. टोटल इसका विस्तार है। मतलब इनको तेज भूख भी लगी रहे तो इनकी रफ्तार तेज नहीं हो सकती। 2011 में इनको अधिसूचना मिली थी पन्ना को। तो यहां पर ये बायोस्फीयर रिजर्व है भारत के। यह पीआईबी से लिया हुआ चित्र है लेकिन थोड़ा धुंधला है। कोई बात नहीं देखें। कोल्ड डेजर्ट और नंदा देवी यहां हिमालय क्षेत्र हो गया। कंचनजंगा को आप देख रहे हैं। यहां दिहांग दिबांग को देख रहे हैं। ये मानस डिब्रू शिकवा है और नोकरेक ये मेघालय वाला और इधर मतलब नॉर्थ ईस्ट का। इसके बाद ग्रेट रन जो कच्छ का है गुजरात वाला पंचमढ़ी को आप यहां पन्ना और पंचमढ़ी मध्य प्रदेश का देख रहे हैं। सुंदरवन और सिमलीपाल ये उड़ीसा 2:30:55 और ये पश्चिम बंगाल का आपने देख लिया। अचानक अमरकंटक और ये पूरा क्षेत्र मध्य प्रदेश का आपने देखा शेषांचलम यहां आप आ गए गल्फ ऑफ मन्नार नीलगिरी ये ग्रेट निकोबार वाला हो गया यहां अगस्ता मलाई हो गया इस तरीके से आपने बायोस्फीयर रिजर्व को यहां पर नक्शे में भी मोटे तौर पर देख लिया है तो अब यहां पर जो यूनेस्को के नेटवर्क वाले 13 है वो तो रह ही गए उनको भी देख लेते हैं। सबसे पहले नंबर आता है नीलगिरी का और सबसे पहले इसी को शामिल किया गया था 2000 सन 2000 में। ठीक है? मन्नार की खाड़ी को 2001 में, सुंदरवन को 2001 में, नंदा देवी को 2004 में और नोकरे को 2009 में, पंचमणि को 2009 में, सिमलीपाल को 2009 में, अचानक अमरकंटक को 2012 में, ग्रेट निकोबार को उसके अगले साल 2013 में, फिर अगस्त्या मलाई को 3 साल बाद 2016 में, जग कंचनजंगा को 2 साल बाद 2018 में। ठीक है? ये कोई लॉजिकल रीजनिंग नहीं चल रही है। ऐसे ही पन्ना को देख रहे हैं आप। यह सन 2020 का है। फिर प्लस टू उसके बाद कोल्ड डेजर्ट सीधे-सीधे आकर 2025 में बीच में 2:31:57 कोरोना की मार पड़ी थी। तो 5 साल बाद ये कोल्ड डेजर्ट को भी यूनेस्को की लिस्ट में शामिल किया गया। कुल मिलाकर 13 तो अभी हमने बाघों को बचा लिया और कई सारी जीव प्रजातियों के संरक्षण के उपाय किए। अब एशियन एलीिफेंट का नंबर है। भारत में वैश्विक स्तर पर काफीेंस है इस मामले में। दुनिया के कुल जो जंगली एशियाई हाथी हैं उनका लगभग 60% हिस्सा आपने देखा ना लगभग 70 से 72% आबादी जो है वो बाघों की रहती है मोटे तौर पर और एशियन एलीिफेंट्स की भी जो मैक्सिमम आबादी है 60% वो अपने यहां ही निवास करती है और अपने यहां उनके जान पर सबसे ज्यादा संकट भी है। 33 हाथी रिजर्व 14 राज्यों में फैले हुए हैं। 80000 स्क्वायर किलोमीटर से भी ज्यादा के जंगल कवर करते हैं। विश्व हाथी दिवस मनाया जाता है 12 अगस्त को और उद्देश्य है कि अभी मौजूद जीवित जो धरती पर मौजूद सबसे बड़ा स्तनपाई प्राणी है उसके सुरक्षा के महत्व से लोगों को अवगत कराना। बताना कि हाथी जो है वो सिर्फ आप भगवान गणेश का रूप मानकर पूज लेते हैं और उसके बाद उसका भरपूर दुरुपयोग करते हैं। अवैध शिकार हो जाता 2:32:58 है। उसका वाहन के रूप में इस्तेमाल करके उसकी जिंदगी खराब कर देते हैं। आपके खेतों में घुस आए तो उसके मुंह में पटाखा ठूस देते हैं। है ना? ऐसे गणेश जी मानकर पूजा करेंगे गणपति बप्पा और ले आगे उसके मुंह में बम ठूस दिया बेमौत मारा गया तो इस तरह की प्रकृतियों से बाज आइए इंसान बने रहिए हैवान बनेंगे तो प्रकृति आपसे डबल हैवान बनेगी और वो जब हिसाब करेगी ना तो देते बहुत रोना आएगा आंसू कम पड़ जाएंगे तो कुल मिलाकर बात ये है कि विश्व हाथी दिवस जो है ये मनाया जाता है 12 अगस्त को एशियाई और अफ्रीकी हाथी दोनों की दुर्दशा हो रही है ऐसा नहीं है कि जो एशियन एलीिफेंट है बेचारे वही भी इस दुर्दशा के शिकार जो अफ्रीकी हाथी हैं उनकी भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं। इनका तो आकार प्रकार और बड़ा होता है। बहुत लंबे-लंबे दांत होते हैं। ये शिकार बनते हैं और तेज। तो दोनों की ओर गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है और इसीलिए यह दिवस मनाया गया। यह जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र की की स्टोन प्रजाति के रूप में सेवा करते हैं। जंगल को हाथी बहुत कुछ देते हैं। लोगों को लगता है कि 2:33:58 यह कितना खाते हैं। पूरे जंगल को रौद देते हैं। इन्हें खाने के लिए ही पूरा जंगल चाहिए। और कहीं घुस जाए तो फिर तबाही ही तबाही है। रहने के लिए ढेर सारी जगह चाहिए। लेकिन ये जंगल और पारिस्थितिकी तंत्र को कितना देते हैं ये कोई नहीं सोचता है। ठीक है? तो ये असल में कीस्टोन प्रजाति हैं और एक कीस्टोन प्रजाति अगर किसी पारितंत्र से किसी इकोसिस्टम से रिप्लेस कर दी जाए तो वो इकोसिस्टम ऐसे बहरा जाएगा ऐसे ढह जाएगा ना ये बहरा जाएगा जो ये पूर्वांचल का शब्द है मतलब ऐसा गिरेगा मतलब झटके में गिरेगा धराशाई हो जाएगा जमीदोज हो जाएगा पता ही नहीं चलेगा बहुत सारी प्रजातियां उस लोड को संभाल ही नहीं पाएंगी जिसको कि इस की स्टोन ने संभाला हुआ है। ठीक है? गिनती के पांच हाथी जो हैं वो हजारों की संख्या में जो बाकी जीव प्रजातियां हैं उनको रिप्लेस कर सकते हैं। उनकी जगह ले सकते हैं। कहने का मतलब यह है कि ये कीस्टोन प्रजाति है और ऐसी प्रजातियों को तो हर कीमत पर बचाना चाहिए। 7 दिसंबर 1992 को केंद्र सरकार द्वारा जो सिंभूम यानी झारखंड का इलाका है वहां पर प्रोजेक्ट एलीिफेंट को शुरू किया 2:34:59 गया था। लेकिन दुख की बात ये है कि जिस जोश खरोश के साथ हम इस समय बड़ी बिल्लियों को बचा रहे हैं। उस जोश के साथ हम हाथियों का संरक्षण नहीं कर पा रहे हैं। वही वही जज़्बा हमें चाहिए हाथियों को बचाने के लिए। ठीक है? माइक नाम का जो प्रोग्राम है बनाया गया है। हाथियों की अवैध हत्या पर निगरानी लगाने के लिए। और दक्षिण एक दक्षिण एशिया में शुरू किया गया था ये प्रस्ताव के तहत। यहां देख रहे हैं आप। जो माइक प्रोग्राम है इसको 1997 में कॉन्फ्रेंस ऑफ द पार्टीज मतलब जो कॉब का जो 10वां सम्मेलन था कॉप 10 था उसमें अपनाए गए प्रस्ताव के जरिए कन्वेंशन ऑन इंटरनेशनल ट्रेड इनेंजर्ड स्पीशीज ऑफ वाइल्ड फोना एंड फ्लोरा मतलब जो सिटीज था उसके द्वारा स्टार्ट किया गया तो कुल मिलाकर ये तो बात हुई दुनिया की केंद्र सरकार क्या कर रही है जो मौजूदा हाथी संरक्षण की नीति है उसकी समीक्षा करने और भविष्य के हस्तक्षेप को तैयार करने के लिए महेश रंगराजन के नेतृत्व में एक टास्क फोर्स बना दी गई। सरकार यही करती है या कोई भी बड़ी संस्था या बड़े जो अधिनायक हैं देश चलाने का दुनिया चलाने का 2:36:00 दावा करते हैं वो अक्सर यही करते हैं। कोई टास्क फोर्स बना देंगे। कोई कमेटी बना देंगे। किसी आदमी को नियुक्त कर देंगे कि भाई जांच पड़ताल करो। वो जांच पड़ताल की रिपोर्ट आती रहेगी। जनता का आक्रोश धीमा हो जाएगा। लोगों की जागरूकता ठंडी पड़ जाएगी। और स्थिति जस की तस चलती रहेगी। दुर्दशा वैसी की वैसी चलती रहेगी। ठीक है? पेपर लीक के मामले में हड़ताल करिए, अनशन करिए। उसके बाद आश्वासन हुआ कि हम एक कमेटी गठित करेंगे। यह हो जाएगा, वो हो जाएगा। भले कुछ ना हो। लेकिन तात्कालिक तौर पर तो हमने आक्रोश को दबा दिया। और ऐसा सिर्फ एक सरकार या एक अधिनायक नहीं करता है। ये सब करते हैं। सत्ताधारी जितने होते हैं सब इसी तरीके के हथकंडे आजमाते हैं। वो सुधारना नहीं चाहते हैं। वो सिर्फ मुंह बंद कर देते हैं तत्काल में। तो वही चीज हाथियों के संरक्षण के साथ भी हो रही है। यह हाथी टास्क फोर्स भी कुछ नहीं कर पा रही है और जंगल बेतहाशा उजड़ते जा रहे हैं। आप जानते हैं बहुत अच्छी तरह से जानते हैं और पर्यावरण का तो ये एकमात्र सूत्र है कि कोई भी प्रजाति अगर विलुप्त हो रही है तो देखो कि उसका हैबिटेट सुरक्षित है या नहीं। निश्चित तौर पर नहीं होगा। किसी भी प्रजाति का अगर आवास ही आप नष्ट कर देंगे तो वो नष्ट हो 2:37:01 जाएगी देर सवेेर। और हाथी तो बहुत बड़ा जीव है। उसके आवासों को तो आप जो इंडस्ट्रियल लोग हैं, बिजनेसमैन है उनको बेचते जा रहे हैं, खत्म करते जा रहे हैं। वहां इंडस्ट्रीज लग रही है। वहां पर डेवलपमेंट आप कर रहे हैं। कॉरिडोर बना रहे हैं। वहां पर अर्बन प्रोजेक्ट जो है उनको विकसित कर रहे हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट चल रहा है वाहवाही लूटने के लिए। तो हाथी कहां जाएंगे? ठीक है? तो ये हाथी टास्क फ़ोर्स गठित करने से नहीं होगा। हमें इनके हैबिटेट को बचाना होगा यानी जंगल को बचाना होगा। इसके बाद आप देखेंगे यहां हाथी मेरे साथी नाम का अभियान शुरू किया गया। हाथी मस्कट भी है इंडियन रेलवे का लालटेन ले खड़ा रहता है बेचारा। तो हाथियों के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया। दिल्ली में एलीिफेंट एट मंत्री स्तरीय बैठक जो है इस उसमें इस पहल की घोषणा की गई। जो पर्यावरण और वन मंत्रालय और भारतीय वन्यजीव ट्रस्ट यानी डब्ल्यूटीआई का संयुक्त प्रयास था। तराई हाथी रिजर्व यह उत्तर प्रदेश में दूसरा और भारत में 33वां हाथी रिजर्व। दुधवा टाइगर रिजर्व, पीलीभीत टाइगर रिजर्व, किशनपुर, कतरनिया घाट, वन्य जीव 2:38:02 अभयारण्य इसके जो पूरे क्षेत्र हैं वो कवर होते हैं। समझ रहे हैं? टाइगर रिजर्व और हाथी रिजर्व दोनों आपस में मर्ज कर सकते हैं और करते भी हैं। तो आपने देखा कि तराई हाथी रिजर्व जो है ये उत्तर प्रदेश का दूसरा और भारत का 33वां है। ठीक है? है अगस्त्या मलाई हाथी रिजर्व ये आपका 32वां है। एलीिफेंट रिजर्व के तौर पर 32वें नंबर का है। और वैसे अगर तमिलनाडु राज्य का देखें तो पांचवें नंबर का है। ठीक है? भारत का सबसे पहला जो हाथी अभयारण्य है ये झारखंड का सिंहभूम है और हाथी भारत का सबसे बड़ा स्थलीय स्तनपाई प्राणी है और इसे वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 की अनुसूची एक में रखा गया है। यानी सबसे ज्यादा संरक्षित जो अनुसूची है उसमें रखा गया है। राष्ट्रीय विरासत पशु भी घोषित किया गया इसे वर्ष 2010 में। अब यहां पर भारत की जो पहली डीएनए आधारित हाथी गणना है जो कि अक्टूबर 2025 में जारी की गई थी उसको देखेंगे। 2021 से लेकर 2025 के बीच का डाटा है। रिपोर्ट का आधिकारिक नाम क्या था? अखिल भारतीय समकालिक हाथी अनुमान। ठीक है? अखिल 2:39:03 भारतीय समकालिक हाथी अनुमान। यह आप देख रहे हैं पूरा नाम इसका दिया हुआ है। वैसे अगर देखा जाए तो यह है क्या? सेंक्रोनियस ऑल इंडिया एलीिफेंट एस्टिमेशन। ठीक है? ये इसका पूरा नाम है। तो कुल मिलाकर यह डीएनए आधारित जंगली हाथियों की मतलब जो खुले हुए प्राकृतिक तौर पर रहने वाले एशियन एलीफेंट है उनकी गणना का तरीका है। तो यह जनगणना पर्यावरण मंत्रालय प्रोजेक्ट एिफेंट और वाइल्ड लाइफफ़ इंस्टट्यूट ऑफ इंडिया इनके द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित की गई। वर्तमान संख्या हाथियों की कुल है 22446 और संख्या देखकर खुश होने की आवश्यकता नहीं है। यह बाघों जितनी पहुंच जाए जरूरी थोड़ी है। बात ये है कि इसमें गिरावट आ रही है। ये सबसे ज्यादा चिंता का विषय है। संख्या कितनी है उससे ज्यादा ये इंपॉर्टेंट है कि ये स्टेबल है या नहीं या लगातार इसमें गिरावट आ रही है। तो गिरावट देखी गई है और गिरावट कैसी है? 25% किसी भी प्रजाति के लिए बहुत भारी कमी है। 2017 से लेकर 2025 के बीच में 25% की जो है भारी गिरावट दर्ज की गई है। 2017 में इनकी 2:40:04 संख्या थी 29,964 अब घटकर सिर्फ 22,000 बची है। ठीक है? गिरावट का कारण क्या है? आवास का नष्ट होना। और आवास का नष्ट होना जो कारण होता है, यही बाकी समस्याओं की जड़ बनता है। जिससे कि मनुष्य और हाथी आपस में टकराने लगते हैं। क्यों? क्यों हाथी को शौक थोड़ी लगा है कि वो खुले खेतों में आकर गन्ना खाए आपका या आपके खेतों की फसलों को चबा जाए। वो तो जंगल में वैसे भी पीपल के पत्ते और जो जंगली वृक्ष हैं उनको खाकर संतुष्ट रहता है। जंगल बचेंगे ही नहीं तो क्या होगा? तब वो जंगल की सीमा का अतिक्रमण करके जो जंगल काट के खेत बनाए गए हैं वहां आएगा। वहां पर अपना पेट भरेगा। पेट भरने के लिए तो कुछ करना ही पड़ेगा। है ना? पेट भरने के लिए तो आदमी आदमी को खा सके। ऐसी स्थिति बन जाती है जान बचाने के लिए। तो वो भी तो जानवर है। तो ऐसी स्थिति में संघर्ष तभी होता है जब हैबिटेट नष्ट होता है। हैबिटेट नष्ट होने का मतलब ये नहीं कि सिर छिपाने की जगह गई। सिर छिपाने की जगह गई साथ-साथ खाने-पीने का ठिकाना नष्ट हो गया। मतलब वह हैबिटेट जो है वह सिर्फ रहने की जगह नहीं होती है। वह खाने पीने का जरिया, सिर छुपाने का जरिया और हर प्रकार का प्रोटेक्शन होता है। गणना 2:41:07 की जो नई तकनीक है उसमें डीएनए मार्क रिककैप्चर टेक्नोलॉजी को इस्तेमाल किया जाता है जो कि विशिष्ट अनुवांशिक मार्करों के माध्यम से की जाती है। ठीक है? पहले क्या होता था कि पहले देखकर कि ये हाथी जा रहा है। अच्छा इसको गिनो। या उसके जो मल होते थे मतलब उसकी जो शौच होती थी उसके आधार पर भी गिना जाता था। ये एक अनोखा तरीका था। लेकिन यह उतना सटीक नहीं होता था। ठीक वैसे ही जैसे बाघ के पंजे पहले गिनते थे। तो पंजे के आधार पर गिनना थोड़ा ट्रिकी हो जाता था। तो अभी डीएनए के आधार पर साइंटिफिकली काम कर रहा है। सटीक अनुमान के लिए यहां आप देखेंगे कि ये जो एक्सप्लसिट कैप्चर रिकैप्चर मॉडल है इसका इस्तेमाल किया जाता है। डाटा संग्रह के लिए कुल 21,000 के आसपास नमूने इकट्ठे किए गए। 465 व्यक्तिगत हाथियों की जो डीएनए प्रोफाइल है उसको भी तैयार किया गया। तो हाथियों की तादाद के मामले में जो टॉप स्टेट्स हैं उसमें पहले नंबर पर है कर्नाटक। 613 हाथी यहां गिने गए। असम में 4159। जबकि असम एक समय था कि हाथियों का पूरा इलाका हुआ करता था। और यहां से आप महाभारत 2:42:08 के युद्ध का वर्णन सुनते हैं ना। शोितपुर का राजा था भगदत्त और भगदत्त जो है वो हाथियों की सेना लेकर आया था। और हाथियों की सेना जो है वह पूरा पांडवों की सेना में खलबली मचा देती है। इतने ज्यादा मोटे-मोटे और बड़े-बड़े हाथी रहते हैं। और उतना ही नहीं वो जाने दीजिए महाभारत पर आप विश्वास ना करें कहें कि काल्पनिक है। तो चंद्रगुप्त मौर्य और सेलुकस निकेटर की संधि तो आपने सुनी ही होगी। ऐसे ही सैकड़ों हाथी उठाकर दे दिए। उसके बाद भी उसके दरबार में और उसके राज्य में हाथियों की कमी नहीं थी। हाथियों की कमी हुई तो उड़ीसा वाला जो क्षेत्र है कलिंग वाला उसको जीत लिया अशोक ने। वहां हाथी बहुत अच्छे पाए जाते थे। है ना? तो मतलब ये है कि हाथी एक समय था कि इस इलाके में कितने ढेर सारे थे और अब सिर्फ गिनती के बचे हैं 4159 तमिलनाडु 3136 केरल में 2785 उत्तराखंड में सिर्फ 10792 पश्चिमी घाट में सबसे ज्यादा हाथी हैं और वही जंगल क्षेत्र अब बचा भी है तो 11934 उसके बाद उत्तर पूर्वी पहाड़ियां नॉर्थ ईस्ट थोड़ा बहुत ब्रह्मपुत्र का क्षेत्र चीन की कृपा से जब तक चीन चाहे नहीं तो ब्रह्मपुत्र सूख गई अगर पानी आना बंद हो 2:43:11 गया उधर से तो ये जंगल भी धीरे-धीरे जाते रहेंगे। सरकार तो लगी ही गई है। तो यहां देखें आप 6559 टोटल गिनती हुई है। लगभग इतने शिवालिक और गंगा के मैदान में ये डाटा जो है ये 2062 के आसपास है जो कि इतना ही है। इससे ज्यादा बदलने वाला नहीं है। मध्य भारत और पूर्वी घाट में भी कुछ 1891 यहां देखिए 33 हाथी अभयारण्य है। उत्तर पश्चिमी परिदृश्य है इसमें उत्तराखंड और यूपी है। शिवालिक है उत्तराखंड का। उत्तर प्रदेश का है उत्तर प्रदेश हाथी रिजर्व और तराई। इसके बाद कामिंग और शोपुर जो कि हाथियों का एक देश ही हुआ करता था। ये लैंडस्केप है। इसमें अरुणाचल और असम आते हैं। अरुणाचल का कामिंग है। शोपुर शोपुर जो है वो असम का है। पूर्वी दक्षिण लैंडस्केप में असम और अरुणाचल ही आते हैं। देहिंग पटकई और दक्षिणी अरु अरुणांचल हाथी रिजर्व है। इसके बाद मध्य वाला जो परिदृश्य है पूर्व मध्य उसमें आप देखेंगे तो यहां कई सारे राज्य आते हैं। जैसे कि पश्चिम बंगाल मयूर झरना यहां का है। झारखंड का सिंभूम है। छत्तीसगढ़ का लेमरू और बादलखोल है। तमोर पिंगला उड़ीसा का 2:44:11 मयूरभंज महानदी और सललपुर। काजीरंगा का कारबी अगलांग और इटांगकी लैंडस्केप जो है इसमें नागालैंड आता है। सबसे पहले इटांग और सिंफोन यहां टाइगर माफ़ कीजिएगा एलीिफेंट रिजर्व है। और असम में काजीरंगा है, कारबी अंगलांग है, धनसरी है और लुडिगिंग है। ठीक है? ये सारे हैं। मेघालय लैंड लैंडस्केप में गारो हिल्स हैं। वैसे ही चिरांग रिपु जो है ये आपका असम का है। उत्तर बंगाल, ग्रेटर मानस वाला। ब्रह्मगिरी, नीलगिरी, पूर्वी घाट लैंडस्केप को आ जाइए देखें तो इसमें कई सारे जैसे कर्नाटक में मैसूर एलीिफेंट रिजर्व है, दांडेली है। आंध्र प्रदेश में रायला है। तमिलनाडु में कोयंबटूर और नीलगिरी दोनों है। केरल में वायनाड और नीलांबुर है। तमिलनाडु में अन्नामलाई और अगस्तामलाई। अन्नामलाई नेलयमपंथी और हाई रेंज लैंडस्केप जो है इसमें केरल ही सिर्फ आता है। अनाइमुडी एलीिफेंट रिजर्व इसमें शामिल है। पेरियार अगस्तामलाई में श्री विल्लीपथुर तमिलनाडु का है और केरल का पेरियार। तो यह देख रहे हैं आप नक्शा और इसमें वही सारे एलीिफेंट रिजर्व हैं जिन्हें आप जस्ट अभी देख कर आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश का उत्तर प्रदेश और तराई 2:45:11 वाला है। उत्तराखंड का शिवालिक है। वैसे ही आप देखेंगे वेस्ट बंगाल का मयूर झरना और पूर्वी द्वार है। सिंहभूम आपका झारखंड का हो गया। गारो हिल्स यहां मेघालय का हो गया। वैसे ही असम में आप देखेंगे तो काजीरंगा है, शोपुर है, धनश्री, दिहांग पटकाई, चिरांग रिपु ये सारे हैं। इतांकी रिजर्व है, सिंफन है। ये सब आप देखेंगे नागालैंड का है। वैसे ही कामिंग है और साउथ अरुणाचल है। ये अरुणाचल का हो गया। ठीक है? लेमरू आप देखें और बादलखोल तमोर पिंगला यह सारे छत्तीसगढ़ के हैं। वैसे ही उड़ीसा का मयूरभंज है महानदी है। सललपुर है। रायला आप देखेंगे आंध्र प्रदेश का है। कर्नाटक का मैसूर है। दांडेली है। है ना? वायनाड, नीलामपुर, पेरियार, अनाईमुटी वाला जो है ये आपका केरल का है। कोयंबटूर, नीलगिरी, अनामलाई, अगस्त्यामलाई, श्रीव्लीपथूर ये तमिलनाडु का है। ऐसे करके आपने देखा। अब आगे चलते हैं। यहां पर मगरमच्छ का संरक्षण भी होता है। तो कैसे होता है, कहां होता है? सबसे पहले नंबर पर तो गुंदी है तमिलनाडु का गुदी राष्ट्रीय उद्यान फिर दूसरा है नंदन कानन उड़ीसा का चंपल में भी होता है 2:46:13 राजस्थान का सतकोसिया सतकोसिया गार्ज जिसको कहा जाता है ये जॉर्ज नहीं गार्ज है ठीक है सतकोशिया गार्ज वन्य जीव अभयारण्य उड़ीसा का है बितरकणिका उड़ीसा का है ओरंग असम का है। कुकरैल घड़ियाल पुनर्वास ये लखनऊ में पड़ता है। लखनऊ का बाहरी इलाका है उत्तर प्रदेश और चंबल अभयारण्य घड़ियाल इको पार्क ये मध्य प्रदेश का है। तो घड़ियाद और मगरमच्छों का संरक्षण जहांजहां होता है वह देखें। कुकरैल उत्तर प्रदेश का चंबल राजस्थान का चंबल ये इको पार्क जो है ये मध्य प्रदेश का भी ओरंग असम का वैसे ही नंदन कानन ओसा का सतकोशिया और वितरकणिका भी गुंदी तमिलनाडु का ये ज्यादा नहीं है याद हो जाएगा। इसके बाद आप चिड़ियाघर में आ जाइए। जहां जानवरों की आमतौर पर दुर्गति ही होती है। भारत का सबसे पुराना जो चिड़ियाघर है वो अरिगनार अन्ना जलॉजिकल पार्क जो कि चेन्नई में 1855 में खोला गया था और केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण ये सारी सारे जितने भी देश भर में फैले हुए जू है यानी चिड़ियाघर हैं उनको कंट्रोल करता है। उनका विनियमन करता है। और यह वर्ल्ड एसोसिएशन 2:47:14 ऑफ़ ज एंड एक्वेरियम का एक सहयोगी सदस्य हैं। तो ये जो जू है यानी चिड़ियाघर है ये एक एक्स सी2 कंजर्वेशन का तरीका है। भले ही यहां जानवरों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं होती है। जानवर भुखमरी के कगार पर और बदहाल होते हैं। तो वह तो है ही है। लेकिन उसके अलावा ये एक्स सी2 कंजर्वेशन का तरीका है और एक्स सी2 कंजर्वेशन में ये विसंगतियां आती हैं। अगर सही तरीके से मैनेजमेंट ना किया जाए तो ये स्थितियां और बिगड़ती है जो कि आमतौर पर ज्यादातर चिड़ियाघरों में आप देखते हैं। शेर आपको बिल्ली जैसा दिखाई देगा। भालू जो है वो बकरी जैसा दिखाई देगा। मतलब उनका जो साइज और उनका जो रुतबा है वही खत्म हो गया है। ठीक है? तो श्री वेंकटेश्वर प्राणी उद्यान जो है यह आंध्र प्रदेश के तिरुपति में शेषांचलम की पहाड़ी की जो तलहटी है उस पर स्थित है और क्षेत्रफल के लिहाज से यह एशिया का सबसे बड़ा प्राणी उद्यान है। अब आइए जरा भारत के चिड़ियाघरों की सूची देख लेते हैं। मार्बल पैलेस डू कोलकाता का है। वेस्ट बंगाल मैसूर चिड़ियाघर कर्नाटक। ठीक है? महाराजा बाग चिड़ियाघर नागपुर महाराष्ट्र। सयाजी वड़ोदरा गुजरात। नंदनवन 2:48:16 रायपुर छत्तीसगढ़। त्रिसूर केरल अलीपुर कोलकाता पश्चिम बंगाल अमीरथी बेलौर तमिलनाडु गोरेवाड़ा नागपुर महाराष्ट्र गोपालपुर हिमाचल प्रदेश गुलाब बाग उदयपुर मतलब राजस्थान डियर पार्क मिनीजू सलपुर का है उड़ीसा का हिसार हरियाणा का हो गया ठीक है इंदिरा गांधी राउरकेला उड़ीसा वैसे ही इंदिरा गांधी प्राणी उद्यान एक इंदिरा गांधी पार्क है जो कि राउरकेला में है और दूसरा इंदिरा गांधी प्राणी उद्यान है जो कि विशाखापटनम में है दोनों दो राज्य में है ध्यान दीजिएगा इंदौर मध्य प्रदेश का जयपुर जयपुर का मतलब ये नाम से ही है तो पहचानना आसान है। जवाहर नेहरू यहां देखें जवाहर जवाहरलाल नेहरू जैविक उद्यान बोकारो स्टील सिटी मतलब झारखंड का है। जीजा माता मुंबई महाराष्ट्र काकती वारंगल तेलंगाना कमला नेहरू प्राणी उद्यान कांकरिया अहमदाबाद गुजरात कुरुक्षेत्र हरियाणा नवाब वाजिद अली शाह लखनऊ उत्तर प्रदेश मद्रास क्रोकोडाइल बैंक ट्रस्ट चेन्नई तमिलनाडु मैत्रीबाग भिलाई नगर छत्तीसगढ़ मांडा जम्मू जम्मू सिटी जम्मू नागालैंड 2:49:20 चुमोकदिमा ये असल में जगह जो है ये नागालैंड की है। नंदन कानन भुवनेश्वर उड़ीसा राष्ट्रीय प्राणी उद्यान दिल्ली का है और हैदराबाद का नेहरू प्राणी उद्यान है तेलंगाना इसके बाद है पद्मजा नायडू हिमालयन जियोलॉजिकल पार्क दार्जिलिंग पश्चिम बंगाल परासिनी परासिनी कादबू स्नेक पार्क ये सांपों का पार्क है कन्नूर में है केरल में मोर और चिंकारा का प्रजनन केंद्र ये रेवाड़ी हरियाणा में है पीलीकुआ पीलीकुला कहा जाता है बेंगलुरु में है कर्नाटक में तीतर प्रजनन केंद्र पंचकूला में है एक मोरनीमी में भी है दोनों पंचकूला में पड़ता है एक बेरवाला में है एक मोरनी में है। ठीक है? दोनों हरियाणा में है। इसके बाद जीवी पंत हाई एल्टीट्यूड चिड़ियाघर ये नैनीताल में हो गया। राजीव गांधी प्राणी उद्यान पुणे का है। महाराष्ट्र का बिरसा जैविक उद्यान रांची का है। झारखंड का बिरसा मुंडा के नाम पर। ठीक वैसे ही रोहतक हरियाणा का है। सक्करबाग आप देखेंगे जूनागढ़ का है यानी गुजरात का। संजय गांधी जैविक पार्क पटना का है। ठीक है? सरथाना सूरत का। प्रद्युम्न राजकोट और सारनाथ वाराणसी का है। इसके बाद सिपाही झोला। सिपाही जाला 2:50:24 असल में सिपाही झोला नहीं त्रिपुरा का है। वेंकटेश्वर प्राणी उद्यान तिरुपति का है। आंध्र प्रदेश का टाटा स्टील जूलॉजिकल पार्क जमशेदपुर का है। तिरुवनंतपुरम त्रिवेंद्रम का है। केरल का गिद्ध संरक्षण प्रजनन केंद्र पिंजौर यानी हरियाणा का है। इटावा सफारी पार्क उत्तर प्रदेश इटावा का है। कानपुर प्राणी उद्यान उत्तर प्रदेश का है। कानपुर पिंडारी माफ़ कीजिएगा। कानन पिंडारी प्राणी उद्यान जो है ये बिलासपुर का है। छत्तीसगढ़ का। सिद्धार्थ उद्यान ये औरंगाबाद का है यानी महाराष्ट्र का ग्वालियर मध्य प्रदेश अरिंगनार अन्ना जलॉजिकल पार्क बंडालूर चेन्नई तमिलनाडु असम चिड़ियाघर आप जानते हैं गुवाहाटी में है यानी असम में है लोकेशन बनरघट्टा बेंगलुरु में है बिरसा हिरण पार्क रांची में है वैसे ही काला हिरणवाला पीपली में है पीपली ये पीपली है असल में पीपली नहीं है पीपली आपका बंगाल में चला जाएगा छतवीर जो है यह महेंद्र चौधरी प्राणी उद्यान भी कहा जाता है जीरकपुर पंजाब में है। चेन्नई स्नेक पार्क आपका तमिलनाडु में है। चिंकारा प्रजनन भिवानी हरियाणा में है। वैसे ही मगरमच्छ प्रजनन के दो केंद्र आप देख रहे हैं। एक कुरुक्षेत्र में है। दूसरा मुंटा में है। कुरुक्षेत्र वाला 2:51:24 हरियाणा में है। मुंटा वाला रांची यानी झारखंड में है। मगरमच्छ पुनर्वास और अनुसंधान केंद्र ये त्रिवेंद्रम में पड़ता है। मतलब एक ही प्रजाति के लिए अलग-अलग जो केंद्र हैं उसमें कंफ्यूज होने की आवश्यकता नहीं है। शहीद अशफाक उल्ला खान प्राणी उद्यान गोरखपुर यानी यूपी में है। यहां देखिए अब वन्य जीवों के संरक्षण से संबंधित कुछ परियोजनाएं हैं। तो हंगुल यानी कश्मीरी स्टक परियोजना जो है यह 1970 की है और इस परियोजना को आईयूसीए और वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड फॉर नेचर इसके लिए शुरू किया गया था। मतलब दोनों के सहयोग से शुरू किया गया था। तो हंगुल जो है यह कश्मीर राज्य का मतलब कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश का राजकीय पशु भी है और यह यूरोपीय जो रेंडियर होता है ना जिस पर सेंथा क्लास चढ़कर गिफ्ट लेकर आते हैं क्रिसमस में तो उसी रेंडियर के परिवार का सदस्य है। ठंडे इलाके में ये पाए जाते हैं और ये कश्मीर पूछना ही नहीं है। तो कश्मीर स्थित दाचीगाम उद्यान में भी ये पाया जाता है। मतलब में ही ये पाया जाता है और कहीं नहीं पाया जाता है। इसको कश्मीरी स्टैक भी कहा जाता है। तो यह जो सा क्लास वाला हिरण है मतलब रेंडियर है असल में यह पूरी तरह से 2:52:26 वो रेंडियर नहीं है लेकिन उसी की फैमिली का है तो यह पाया जाता है आपके कश्मीर में अब प्रोजेक्ट हंगुल को जम्मू कश्मीर की गवर्नमेंट के द्वारा स्टार्ट किया गया था 1970 में एशियाई शेर के संरक्षण के लिए गिर सिंह परियोजना है जो कि 1972 की ये प्राकृतिक आवास है एशियाई शेरों का और केंद्र सरकार के द्वारा इसको शुरू किया गया था। इसके बाद प्रोजेक्ट टाइगर आपने देखा ही था एनटीसीए संचालित कर रहा है इसको 58 टाइगर रिजर्व है। 1 अप्रैल 1973 को जिम कार्बेट से शुरू किया गया था इसको और इंदिरा गांधी के कार्यकाल में ये शुरू हुआ कार्यक्रम कस्तूरी मृग परियोजना यहां देख रहे हैं 1982 की है। केदारनाथ अभयारण्य उत्तराखंड का जो है वहां पर ये डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के सपोर्ट से स्टार्ट की जाती है। और ये जो कस्तूरी मृग यानी मस्क टियर होते हैं ये असल में चंपाघाटी का जो एरिया है वहां से लेकर सिक्किम तक पाए जाते हैं। इनकी नाभि में कस्तूरी नाम का एक रासायनिक पदार्थ होता है जो कि बहुत तेज महक वाला होता है और उसके बहुत सारे गुण होते हैं। औषधीय गुण होते हैं। घड़ियाल प्रजनन परियोजना ये भारत सरकार के संयुक्त मतलब भारत सरकार का अकेला काम 2:53:27 नहीं है। इसमें संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम यानी यूएनडीपी जो है वो सपोर्ट कर रहा है। तो उड़ीसा में इस प्रोजेक्ट को स्टार्ट किया गया था 1975 में और इसी योजना का विस्तार फिर कुकरल में आप देखते हैं यानी लखनऊ में। ना सिर्फ लखनऊ में बल्कि राजस्थान, मध्य प्रदेश, अंडमान, निकोबार, असम, बिहार, नागालैंड में भी इसका विस्तार दिखाई देता है। इसके बाद थामिन मृग परियोजना थामिन को ही संघाई डियर या फिर डांसिंग डियर कहा जाता है जिसके बारे में अभी पीछे चर्चा हुई थी। और यह जो डांसिंग डियर है, यह पाया जाता है कि लमजाओ नेशनल पार्क में। दुनिया का एकमात्र तैरता हुआ यह नेशनल पार्क है और यह मणिपुर का राजकीय पशु है। ऐसा नहीं है कि इन तैरती हुई घास की जो गद्दियां हैं, जमीनें हैं जिनको कि फुंडी कहा जाता है। इन पर सिर्फ हिरण ही रहता है। इस पर लोग भी रहते हैं। मतलब आबादी भी रहा करती है। कुल मिलाकर ये एक झील है बड़ी सी और ये इसी प्रकार की जो फुंडी आइलैंड्स हैं उन्हीं पर आबादियां रहती है और पूरी बिखरी हुई और ये ब्रह्मपुत्र का बेसिकली पानी। तो ये 1977 का है। ठीक है? उसके बाद गैडा परियोजना है। 1987 की है। एक सींग वाला 2:54:28 गैडा ध्यान दीजिएगा इस समय सिर्फ भारत में पाया जाता है। एक समय था कि ये पूरा तराई, नेपाल और चारों तरफ फैला हुआ था। एशिया के अलग-अलग हिस्सों में पाया जाता था। लेकिन अब सिर्फ ये भारत में पाया जाता है। और उसमें भी असम का मानस अभयारण, काजीरंगा और पश्चिम बंगाल का जलदापाड़ा यही मुख्य शरण स्थली है। अगर इसको नष्ट कर दिया जाए तो गैंडे खत्म हो जाएंगे। तो इनके सींग का इस्तेमाल औषधि निर्माण के लिए होता है। विदेशों में तो यहां तक नौबत आ गई है कि गैडों के सींग रेतने पड़ते हैं। उनको शिकार से बचाने के लिए जो दो सींग वाले गैे होते हैं उनकी बात हो रही है। हाथी परियोजना जो है ये प्रोजेक्ट एलीिफेंट के रूप में आपने एक सिक्के पर गौर किया है। ये चवन्नी होती थी। पहले 25 पैसे का सिक्का आता था। तो एक साइड में तो 25 पैसे लिखा होता था। दूसरे साइड में गैंडा बना होता था। एक सींग वाला गैंडा। ऐसे एक सींग होती थी और ये गैंडा होता था। ठीक है? तो यह जागरूकता बढ़ाने के लिए ऐसा किया जाता है कई बार। उस समय यह जो गैंडा परियोजना है यह उसी समय स्टार्ट की गई थी और उसी समय की वो चवन्नी है 25 पैसा उसप तारीख भी 2:55:29 आप देखिएगा लगभग उसी समय की लांच की गई। ठीक बात है। अब तो प्रचलन से भी बाहर हो गई है। लेकिन जिसके पास पुराने सिक्के पड़े होंगे तो आप देखेंगे उठाकर ना तो उस पर गैंडा बना हुआ है। ये गैंडा परियोजना का ही द्योतक। तो ये देखा आपने। इसके बाद हाथी प्रोजेक्ट को अभी जस्ट आप देख ही करा रहे हैं। प्रोजेक्ट एलीिफेंट ये सिंभूम जिले से स्टार्ट किया गया था। 1992 में रेड पांडा प्रोजेक्ट ये वर्ल्ड वाइल्ड लाइफफ़ फंड फॉर नेचर के सहयोग से जो पद्मजा नायडू हिमा हिमालयन जियोलॉजिकल पार्क है दार्जिलिंग का वहां से शुरू किया गया था। सिक्किम का ध्यान दीजिएगा कि ये जो रेड पांडा है ये राजकीय पशु है और ये पाया जाता है पूर्वी हिमालय के पतझड़ी जंगलों में जो पर्णपाती जंगल होते हैं जिनकी पत्तियां झड़ती रहती हैं वहां पर पाया जाता है। गंगा डॉल्फिन गंगेटिक डॉल्फिन के लिए जो कंजर्वेशन प्रोग्राम चल रहा है वो 1997 का है। इसको सू भी कहा जाता है। ये सिर्फ मीठे पानी में यानी फ्रेश वाटर में रहती है और इसको 2009 5 अक्टूबर की जो तारीख है ये बार-बार पूछा गया है। तो 5 अक्टूबर की तारीख में राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया गया। यह जन्म से अंधी होती है मतलब आंख की संरचना तो होती है लेकिन 2:56:29 आंखें विकसित नहीं होती। विक्रमशिला गंगा डॉल्फिन अभयारण्य जो है ये बिहार में है और बिहार की जो गंगा का एरिया है वहां पर डॉल्फिन की संख्या में एक अच्छी खासी वृद्धि भी देखी गई। तो यह भी अनुसूची एक में है। ध्यान दीजिएगा जो वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट है उसके अंतर्गत कछुआ संरक्षण वही ऑलिव रिडले के लिए है। यूएनडीपी के द्वारा यह समर्थित है और 1999 का है। लेकिन उसके बावजूद कछुओं की तादाद में लगातार कमी आ रही है। ना सिर्फ ऑलिव रिडले बल्कि पूरे दुनिया भर के जो कछुए हैं वो संकट में है। माइक कार्यक्रम हाथियों के अवैध तस्करी और उनके अवैध शिकार को रोकने के लिए है। 10 प्रमुख स्थान इसमें चिन्हित किए गए हैं। तो माइक स्थलों को आपको याद रखना चाहिए। वैसे ये 2003 का प्रोजेक्ट है। कौन-कौन से स्थान है? ये पूछा जाता है तो चिरांग रिपु है असम का दिहांग पटकई है असम का ईस्टर्न द्वार है मतलब ईस्टर्न द्वार यानी पूर्वी द्वार है इतना अंग्रेजी बोलने की जरूरत नहीं है पश्चिम बंगाल का मयूर झरना पश्चिम बंगाल का गारो हिल मेघालय का देवमाली मतलब भाई जो हिंदी में है उसको हिंदी में ही बोलो ना देवमाली जो है ये अरुणाचल का है शिवालिक उत्तराखंड का है नीलगिरी है तमिलनाडु का वेयनद है या बमबानद ये केरल 2:57:31 का है और मैसूर जो है ये कर्नाटक का ये माइक एरिया है माइक स्थल है जो कि हाथियों के लिए प्रोटेक्टेड इसके बाद राइनो विज़न जिसको कि आईआरबी कहा जाता है। इंडियन राइनो विज़न 2020 2005 में इसको शुरू किया गया था। 2020 तक का लक्ष्य रखा गया था कि असम के सात जो प्रोटेक्टेड एरिया है संरक्षित क्षेत्र है वहां गैडो की आबादी को 3000 तक पहुंचाना। इसमें डब्ल्यूडब्ल्यूएफ का सपोर्ट था। मतलब डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की जो इंडियन ब्रांच है उसका सहयोग था। बाकी असम सरकार और कई सारी संस्थाएं इसमें मिलकर काम कर रही थी। हालांकि प्रोजेक्ट अपने लक्ष्य को नहीं प्राप्त कर पाया। गिद्ध संरक्षण परियोजना का जो शुरुआती इतिहास है वो काफी दर्दनाक है। गिद्ध एक समय था कि मवेशी मरे नहीं कि पूरा इतनी तादाद में इकट्ठे हो जाते थे कि लोगों को वहां भगाना पड़ता था। या तो शव को हटा दो और नहीं तो गिद्धों को भगाओ उसकी एक ड्यूटी लग जाती थी। मकान की छतें जो है वो गिद्धों से और चीलों से ढक जाती थी। ठीक है? और एक समय ऐसा आया कि इन्हें मतलब खोजना पड़ता था देखने के लिए। ऐसे दिखाई ही नहीं देते थे। कोई मवेशी मरता था या कोई चीज मरती थी तो कौवे इकट्ठे हो 2:58:33 जाए, कुत्ते इकट्ठे हो जाए लेकिन गिद्ध नहीं दिखाई देते थे। तो फिर जब जांच पड़ताल शुरू हुई तो मालूम हुआ कि जो जानवर मर रहे थे उन्हीं से ये भी मरने शुरू हो गए। उन जानवरों को मरते समय अंतिम समय की पीड़ा को घटाने के लिए या इलाज के लिए हमने दर्द की दवाएं दी। दर्द के इंजेक्शन दिए। अब दर्द निवारक दवाएं आमतौर पर या तो डाइक्लोरोफिनेक या फिर एस एस क्लोरोफिनेक इसी तरह की होती है दर्द निवारक जो आप दर्द की सामान्य दवाएं खाते हैं रिलीफ इत्यादि तमाम नाम से आती है तो उसमें डाई क्लोरोफिने आम तौर पर मिला होता है ना तो ये जानलेवा हो गया इन गिद्धों के लिए इनकी किडनी लिवर कुल फेल हो जाता था मतलब इनके जो आंतरिक अंग है वो काम करना बंद कर देते थे और ये इनकी मृत्यु की बहुत तात्कालिक वजह बनती थी ऐसा नहीं होता था कि बहुत समय लग जाए बहुत जल्दी-जल्दी मरने लगे तो इनकी आधी से अधिक आबादी तो साफ हो गई। जब आधी से अधिक आबादी साफ हो गई तो उसके बाद लोगों के कान खड़े हुए तो इनके संरक्षण का उपाय शुरू किया गया। तो फिलहाल यह देखेंगे आप कि पिंजौर हरियाणा का जो है ये देश में पहला गिद्ध संरक्षण और प्रजनन केंद्र बनता है 2006 में। स्नो लेपर्ड वाला प्रोजेक्ट 2009 का है। 2:59:35 उच्च हिमालय राज्य जो है जैसे जम्मू कश्मीर है, लद्दाख है ज्यादा ऊंचाई वाले। हिमाचल, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल वहां पर इसको शुरू किया गया। ग्रेट इंडियन बस्टर्ड राजस्थान सरकार के द्वारा 2013 में स्टार्ट किया गया। इसका जो आवास है ये रेगिस्तान ही है। राजस्थान का रेगिस्तान और ये राजस्थान का राजकीय पक्षी है। इसको वहां पर गोडावड़ कहा जाता है। इसके बाद सिक्योर हिमालयन प्रोजेक्ट ये हिमालय की सुरक्षा के लिए हिमालय के पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा के लिए बेसिकली और साथ ही साथ हिम तेुए के संरक्षण के लिए स्टार्ट किया गया था। असल में ये वैश्विक पर्यावरण सुविधा यानी जो जीएफ है यूएनडीपी का प्रोग्राम और भारत सरकार की मिलीजुली परियोजना थी। तो इसमें हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर जिसमें कि लद्दाख भी शामिल है। समय 2017 का है ना तो इसमें लद्दाख भी शामिल है और सिक्किम राज्य वहां पर इसे संचालित किया गया। प्रोजेक्ट डॉल्फिन आप समझ ही रहे हैं 2020 का है 15 अगस्त। 10 साल की परियोजना नदी और समुद्री दोनों प्रकार की जो डॉल्फिन है उनका संरक्षण करना इसका मूल उद्देश्य। इसके बाद है प्रोजेक्ट लायन। अगस्त 2020 एशियाई शेरों के संरक्षण के 3:00:35 लिए इस पहल में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल और शेरों को गिर के अलावा बर्दा वन्य जीव अभयारण्य जो गुजरात का है वहां बसाने की योजना भी इसमें शामिल है। हालांकि ये काफी चैलेंजिंग है। प्रोजेक्ट चीता क्यों चैलेंजिंग है उसका नमूना आप इधर देख लीजिए। प्रोजेक्ट चीता 17 सितंबर 2022 दुनिया का पहला अंतर महाद्वीपीय चीता स्थानांतरण प्रोजेक्ट है। नामीबिया और साउथ अफ्रीका के अलग-अलग हिस्सों से चीतों को ले आकर कूनो नेशनल पार्क जो मध्य प्रदेश का है वहां बसाया गया और उसमें से लगातार चीतों के मरने की खबरें आती हैं कि अब ये चीता मर गया वो चीता मर गया। मतलब नाम रखा गया यहां पे गामिनी और तमाम बच्चे जो श्रावक पैदा हुए उसमें से भी ज्यादातर सर्वाइव नहीं कर पाए। हालांकि कुछ जिंदा रहे। तो यह होता है जब जगह बदली जाती है ना हैबिटेट बदला जाता है माहौल बदलता है तो जानवर सर्वाइव नहीं कर पाते हैं। प्रोजेक्ट लाइन में बस गनीमत इतनी है कि गुजरात से निकालकर गुजरात में ही बसाने की बात हो रही है। कोई महाद्वीप नहीं बदला जा रहा है। तो ऐसी स्थिति में सर्वाइव करने की संभावना तो है लेकिन जो जगह इनके लिए तय की गई है बर्दा वहां पे चैलेंजेस नहीं होंगे इसकी क्या गारंटी है? है ना? शेर 3:01:38 जहां रहते हैं वहां उनका अपना एक इलाका होता है। अपनी एक टेरिटरी होती है और वो लंबे समय से उसमें सेट हो गए रहते हैं और बाकी लोगों को बाकी प्रजातियों को भी उनकी आदत पड़ गई रहती है। और जहां नए इलाके में उनको छोड़ा जाता है वहां उनकी स्थिति बहुत गड़बड़ हो जाती है। मतलब ये टेरिटरी को पूरी तरह से प्रोटेक्ट करने वाले प्राणी होते हैं। और इसका छोटा नमूना आप अपने गली मोहल्ले के कुत्तों को देखकर कर सकते हैं। ठीक है? जैसे कुत्ते अपने इलाके को लेकर बड़े ससत होते हैं। मतलब उनके इलाके में अगर कोई दूसरा सदस्य बाहर ही घुस गया तो उसको खदेड़ेंगे जब तक नहीं तब तक शांति नहीं होते हैं। तो शेरों के मामले में वो स्थिति और हिंसक होती है। तो आपसी लड़ाई और मनुष्यों के साथ इनके टकराव की संभावनाएं बढ़ जाएंगी। ऐसी स्थिति में थोड़ा सचेत होकर करने की जरूरत है। तो प्रोजेक्ट चीता का आप देख रहे हैं 29 चीते भारत लाए गए बोत्सवाना से। और ये नामीबिया, साउथ अफ्रीका और बोत्सवाना से कुल मिलाकर 29 लाए गए। कहां से कितने लाए गए वो नहीं पूछा जाएगा। टोटल कितने लाए गए वो ध्यान दीजिएगा। इसके बाद प्रोजेक्ट नीलगिरी ताहर को देख रहे हैं। यह देखिए 2023 तमिलनाडु सरकार की यह परियोजना है। नीलगिरी ताहर जो है ये तमिलनाडु का राजकीय 3:02:39 पशु है। पश्चिमी घाट का जो एव्विकुलम नेशनल पार्क है वहां ये पाया जाता है। इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस आईबीसीए 2023 की है और प्रोजेक्ट टाइगर की जो 50वीं वर्षगांठ है उसके मौके पर भारत के नेतृत्व में इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस को स्टार्ट किया गया था। सात बड़ी बिल्लियां जो पूरी दुनिया में पाई जाती हैं। यह सात बड़ी बिल्लियां कौन सी हैं? तो बाघ है इसमें। शेर भी उसी में शामिल है। तेुआ है, हिम तेुआ है, प्यूमा है, जगुआ है और चीता है। जैगुआर भी इसी में शामिल है। ठीक है? बड़ा शक्तिशाली होता है। तो ये सारे जो है ये इनके संरक्षण के लिए काम किया जाएगा। और इन सारी बड़ी बिल्लियों में जो चीता है यह एकमात्र है जो कि म्याऊ म्याऊ करता है। बाकी जितने हैं वह म्याऊ नहीं बोलते हैं। बिल्लियां तो है लेकिन उनके बच्चे म्याऊ बोलते हैं। वो बड़ी बिल्लियां दहाड़ती हैं। तो इनका मुख्यालय है भारत में। इस अलायंस का जो मुख्यालय है ये भारत में है। दुनिया के लगभग 97 ऐसे देश जहां की इन सात बड़ी बिल्लियों में से कोई ना कोई प्रजाति प्राकृतिक रूप से पाई जाती है। वह सब इसमें सदस्य बन सकते है। ठीक है? आगे चलते है। प्रोजेक्ट टाइगर और प्रोजेक्ट एलीफेंट 3:03:40 का आपस में विलय कर दिया गया। यह काम देखें क्योंकि आप देखते हैं कि जहां भी बाघ पाए जाते हैं उसके आसपास हाथी भी पाए जाते हैं। आपने बहुत बार देखा होगा कि जो बाघ सफारी होती है मतलब टाइगर प्रोटेक्टेड एरिया होते हैं वहां जब टूरिस्ट टाइगर देखने जाते हैं तो हाथी पर चढ़कर जाते हैं। है ना? तो वो हाथी जो है वो आसपास ही पाए जाते हैं और इनका सह अस्तित्व होता है। दोनों में आपस में टकराव कभी नहीं होता है। तो इसीलिए पर्यावरण मंत्रालय ने हालांकि इसकी कुछ खामियां भी है। सब अच्छाइयां ही नहीं है। लेकिन फिर भी प्रशासनिक दक्षता बनाने के लिए और फंड को बेहतर तरीके से इस्तेमाल करने के लिए 2023 के जून महीने में दोनों परियोजनाओं का विलय कर दिया और बना दिया प्रोजेक्ट टाइगर एंड एलीिफेंट। एक नया प्रभाग तैयार हो गया। सारे खर्चे हो रहे हैं। बहुत जगह दुरुपयोग और अपव्यय हो रहा है और उसके बाद यहां पर आकर पैसे का पैसे की किल्लत हो जा रही है और फंड को बेहतर बनाने की जरूरत पड़ जा रही है। खैर छोड़िए। तो यहां देखिए आप प्रोजेक्ट टाइगर और प्रोजेक्ट एलीिफेंट जो है एक नया प्रभाग बना दिया गया। अब दोनों प्रोजेक्ट एक साथ मिलकर काम करेंगे। यह तो सही है कि दोनों का अपना एक मतलब 3:04:41 साझा एरिया होता है। हैबिटेट में दोनों दिखाई दे सकते हैं और देते भी हैं। राष्ट्रीय समुद्री कछुआ कार्य योजना को आप देखेंगे तो जो भारत की तट रेखा है उसके साथ समुद्री कछुओं और उनके प्राकृतिक आवासों के संरक्षण के लिए एक समन्वित ढांचा प्रदान करना है। 2021 में इसको स्टार्ट किया गया था। 2021 का ये प्रोजेक्ट है। अब आ जाइए जैव विविधता हॉटस्पॉट की ओर। बायोडायवर्सिटी हॉटस्पॉट जो है यह प्रकृति के ऐसे अनूठे क्षेत्र हैं जहां प्रजातियों की अत्याधिक विविधता और जो लोकल प्रजातियां हैं वह वहां पर पाई जाती हैं। मतलब लोकल प्रजातियों से तात्पर्य ऐसी प्रजातियां प्रजातियों से है जो सिर्फ वहीं पाई जाती हैं जो सिर्फ वहीं पाई जाती है और कहीं नहीं पाई जाती है। और सिर्फ वहीं पाई जाती है तो निश्चित तौर पर उनकी संख्या सीमित होगी। जहां भी पाई जाएंगी गट्ठे वहीं मौजूद है और मनुष्य की गतिविधियां कुछ ऐसी हुई है कि अब उनके ऊपर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। तो ऐसी प्रजातियां जो हैं ये उस क्षेत्र को एक संवेदनशील क्षेत्र बना देती है और ऐसा क्षेत्र जहां की इस तरह की संकटग्रस्त प्रजातियों की तादाद पाई जाती है उन्हीं 3:05:42 को हॉटस्पॉट के तौर पर घोषित किया जाता है। लेकिन हां ये एक बात है कि बायोडायवर्सिटी हॉटस्पॉट घोषित करने के जो नियम है वो बड़े कड़े हैं। नियम कुछ इस प्रकार से हैं। जैसे आप देखें कि किसी क्षेत्र को हॉटस्पॉट घोषित करने के लिए उस क्षेत्र में कम से कम 1500 स्थानिक इंडेमिक संवहनी पौधे होने चाहिए। मतलब संवहनी पौधों की स्थानिक प्रजातियां होनी चाहिए। और उस क्षेत्र ने अपनी मूल प्राकृतिक वनस्पति का कम से कम 70% हिस्सा खो दिया हो। दूसरे शब्दों में इसी को समझे तो मतलब सिर्फ 30% हिस्सा उस वनस्पति प्रजाति का बचा हुआ जो कि वहां पर इंडेंजर्ड है और वर्तमान में इसी वजह से क्योंकि सख्त यहां पर कायदे हैं मानदंड है तो इस वजह से 36 क्षेत्र ही हॉटस्पॉट के रूप में पहचाने गए हैं और उसमें से भी आप देखिए चार हॉटस्पॉट क्षेत्र जो है वो भारत में है। तो दुनिया भर में 36 क्षेत्र हॉटस्पॉट पृथ्वी भूमि की सतह का मात्र सिर्फ 2.5% कवर करते हैं। लेकिन ये दुनिया की आधी से ज्यादा पौधे की प्रजातियां ऐसी प्रजातियां जो कि कहीं और नहीं पाई जाती हैं और लगभग 43% पक्षी स्तनधारी सरिसप और 3:06:43 उभयचरों की प्रजातियों का समर्थन करते हैं। पूर्वी हिमालय भारत के संदर्भ में बात कर रहे हैं। पूर्वी हिमालय जो कि मूल रूप से भारत बर्मा जैव विविधता हॉट हॉटस्पॉट का हिस्सा था। इसमें भूटान उत्तर पूर्वी भारत दक्षिणी और मध्य पूर्वी नेपाल भी शामिल। 2004 में एक हॉटस्पॉट पुन मूल्यांकन होता है और दो हॉटस्पॉट हिस्से के रूप में इसका वर्गीकरण होता है। एक तो इंडोवर्मा और दूसरा नव प्रतिष्ठित हिमालय। दूसरा नव प्रतिष्ठित हिमालय। ठीक है? जैव विविधता शब्द का सबसे पहली बार प्रयोग ऑर्थर हरिस के द्वारा किया गया था। 1916 में। ये अमेरिकी बॉटनी के एक्सपर्ट थे। इसके बाद बायोडायवर्सिटी शब्द को सबसे पहले वाल्टर जी रोजन के द्वारा गढ़ा गया था। जैविक विविधता शब्द का इस्तेमाल असल में ऑर्थर हरिस ने किया था। और जैव विविधता शब्द यानी बायोडायवर्सिटी प्रॉपर नाम देने वाले जो व्यक्ति हैं वह वाल्टर जी रोजे हैं। तो कंफ्यूज मत होइएगा दोनों में। और प्रसिद्ध अमेरिकी जीव वैज्ञानिक थे इनका नाम है एडवर्ड ओसबोर्न। ओसबोर्न विल्सन इनको कहा जाता है। तो ये दुनिया के स्तर पर जैव 3:07:43 विविधता के जनक माने जाते हैं। और जैव विविधता को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बांटा गया है। अनुवांशिक, प्रजाति और पारिस्थितिकी तंत्र की विविधता। जैविक विविधता हॉटस्पॉट की अवधारणा 1988 में नॉर्मन मायर्स के द्वारा विकसित की गई थी। नॉर्मन मायर्स के द्वारा विकसित की गई थी। तो यहां पर आप देख रहे हैं कि भारत में चार जैव विविधता हॉटस्पॉट हैं टोटल। अभी पीछे हमने उनकी चर्चा की है। तो यहां देख लेंगे कि उनका विस्तार कहां पर है। कौन से जीव और कौन सी वनस्पतियां पाई जाती है। मतलब कोरा और पौना। तो हिमालय में संपूर्ण हिमालय क्षेत्र आता है। संपूर्ण जो भारतीय हिमालय क्षेत्र है वो पूरा हॉटस्पॉट है। जम्मू कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल मतलब पूरा का पूरा हिमालय और जो जीव पाए जाते हैं उसमें रेड पांडा, हिमते, कस्तूरी मृग, हिमालय ताहर नीलगिरी ताहर ही सिर्फ नहीं होता है। हिमालय में भी ताहर पाया जाता है। तो ये सब जो है ये जीव-जंतु हैं। इसके अलावा रोडो डेंड्रॉन, जूनपर, ब्लू पाइन, ओक यह सारे वृक्ष हैं। पश्चिमी घाट और श्रीलंका वाला सह्याद्री 3:08:44 पर्वत श्रृंखला महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल इसमें कवर होते हैं। इसमें सिंह पुच्छी मकाक है, लायन टेल्ड मकाक, नीलगिरी ताहर है, नीलगिरी लंगूर है, मालाबार लार्ज स्पॉटेड सीवेट है। ठीक है? ये सब जीव पाए जाते हैं। वनस्पतियों में नीलगिरी, स्ट्रॉबिलेंथस है। ये कुंजी फूल कहा जाता है। सागोन है, शीशम है, विभिन्न प्रकार के आर्किड हैं। ये सब यहां पाए जाते हैं। इंडोबर्मा वाला रीजन देख लेते हैं। अंडमान द्वीप समूह इसमें आएगा और पूर्वोत्तर भारत आएगा। ब्रह्मपुत्र के दक्षिण वाला इलाका। एशियन एलीिफेंट, गिबन, लीफ डियर और कई प्रकार के दुर्लभ कछुए। यह सब यहां के जीव हैं और बड़े-बड़े बांस के पौधे जो कि सिर्फ वही पाए जाते हैं। बांस के पौधे तो वैसे भारत भर में मिलते हैं लेकिन यहां के अलग हैं और उष्णकटिबंधीय सदाबहार वृक्ष जो कि यहीं पर पाए जाते हैं। मतलब वृक्षों की जो उष्णकटिबंधीय सदाबहार प्रजाति है ये वाली वो सिर्फ यहीं मिलती है और कहीं नहीं। उष्णकटिबंधीय वन तो कई जगहों पर मिलते हैं। सुंडालैंड आप देखेंगे तो निकोबार समूह को कवर करता है। दक्षिण पूर्व एशिया का एक बड़ा हिस्सा। यहां साल्ट वाटर, क्रोकोडाइल, डगोंग, समुद्री गाय, समुद्री 3:09:45 कछुए और मेगापोड नाम का एक पक्षी होता है जो कि निकोबार आइलैंड में पाया जाता है। वो यहां मौजूद है। नारियल के बड़े-बड़े वृक्ष मैंग्रोव की प्रजातियां समुद्री घास ये सब यहां के लिए खास। तो जैव विविधता हॉटस्पॉट की जो अवधारणा है इसको एक समुद्र विज्ञानी ने विकसित किया था। इनका नाम है सिलविया अर्ल। सिलविया अर्ल। ठीक है? ये ऐसे क्षेत्र हैं जो कि महासागरों के स्वास्थ्य और उनकी सुरक्षा समुद्र के क्षेत्र में अगर देखा जाए ये होप स्पॉट है। हॉटस्पॉट नहीं है। थोड़ा सा शुरुआत में जब हेडिंग पढ़ी गई ना तो बोलने में मिस्टेक हुआ क्योंकि हॉटस्पॉट पढ़ते चले आ रहे थे। हॉटस्पॉट तो है ही है। वो अलग चीज है। यहां पर ये है होप स्पॉट। यानी आशा के केंद्र जिनसे कि पर्यावरण की उम्मीदें जुड़ी हुई हैं। तो सिलविया अर् के द्वारा इस अवधारणा को विकसित किया गया। यह कासेप्ट है समुद्र के ऐसे इलाके जो कि महासागरों के स्वास्थ्य और सुरक्षा को मेंटेन करके रखते हैं और उसके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है बल्कि अनिवार्य हैं। उनको हम कहते हैं होप स्पॉट। तो मिशन ब्लू इसके लिए चलाया गया दुनिया भर के स्तर पर और 3:10:46 170 से भी ज्यादा होप स्पॉट घोषित किए जा चुके हैं। भारत के पास दो हैं। एक तो है अंडमान निकोबार और दूसरा है लक्षद्वीप। मतलब पूरा हिंद महासागर का एरिया जिसमें कि अंडमान निकोबार द्वीप समूह की जो कोरल रीफ है ये सब सबसे सबसे जो समृद्ध समुद्री प्रजातियां और क्षेत्र हैं उसके तौर पर देखी जाती है और डगांग नाम की जो समुद्री गाय पाई जाती है समुद्री कछुए पाए जाते हैं विशालकाय क्लैंप पाए जाते हैं ये सब यहां के खास लक्षद्वीप समूह की भी जो एटाल प्रकार की प्रवाल भित्ति है कोरल रीफ है जो कि पूरे द्वीप को ऐसे घेर कर गोल आकार में पूरी फैली होती है मतलब घोड़े की नाल के आकार में और ग्लोबल वार्मिंग और समुद्र के बढ़ते तापमान की वजह से यहां की जो कोरल रिप है वो पूरी तरह से ब्लीचिंग के खतरे में शामिल हो गई है। रंग उड़ता जा रहा है। प्रवाल विरंजन यहां पर हो रहा है। है ना? कोरल ब्लीचिंग हो रही है। तो ये खतरे में है। तो ये सब जो है ये होप स्पॉट है। भारत के संदर्भ में। दुनिया भर का देखने की जरूरत नहीं है। अब घास के मैदानों को देखते हैं। तो कहां पर घास के मैदान को क्या कहते हैं? ये ज्योग्राफी का भी टॉपिक है। यहां साझा हो गया है। चारागाह पारिस्थितिकी तंत्र जो आपने पीछे 3:11:46 पढ़ा था। इसमें घास प्रधान जमीन होती है और संक्रमण कालीन भू दृश्य भी इसको कहा जाता है। मतलब जंगल कटते हैं तो घासे उगती हैं। जहां पेड़ नहीं है वहां घासे जमेंग है ना? और इन घासों में बहुत तरह की जड़ी बूटियां होती है। बहुत सारी तरह की चीजें होती है। घास निरुद्देश्य नहीं होती है। हर वनस्पति का अपना महत्व होता है। पानी जहां कम बरसता है, पानी जहां कम मिलता है और जमीन खुली होती है, सूर्य के सीधे प्रकाश के संपर्क में आती है, वहां घासे तेजी से बढ़ती हैं। ठीक? पर्याप्त वर्षा होगी तब तो वहां पर वर्षावन पैदा हो जाएंगे। है ना? तो वो स्थिति नहीं होती है। अब यहां देखें घास के मैदानों को अलग-अलग हिस्सों में मतलब अलग-अलग देशों और क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से जानते हैं। जैसे दक्षिण अमेरिका का जो ब्राजील है दक्षिण अमेरिका का जो ब्राजील है वहां पर कैंपोस कहते हैं। दक्षिण अमेरिका के वेनेजुला में लानोस कहते हैं। दक्षिण अफ्रीका में वेल्ट्स कहते हैं। उत्तरी अमेरिका में प्रेयरी कहते हैं। ऑस्ट्रेलिया में डाउंस कहते हैं। न्यूजीलैंड में कैंटरबरी कहते हैं। ये चीज आपको रटी होगी। कुछ नया नहीं है इसमें। लेकिन फिर भी देख लीजिए हंगरी में पुष्टाज 3:12:47 कहते हैं। यूरोप और नॉर्थ एशिया में स्टेपीज कहते हैं। अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया में समाना कहते हैं। दक्षिण दक्षिण अमेरिका में अर्जेंटीना और उग्वे विशेष तौर पर वहां पंपास कहा जाता है। तो दुनिया भर के जो प्रमुख घास के मैदान है वो यहां नक्शे पर दिए हुए हैं। दुनिया का नक्शा बना हुआ है। ये रहा आपका उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, इधर यूरोप और इधर एशिया, इधर आपका ऑस्ट्रेलिया। ठीक है? तो आ जाइए। यहां देखें अफ्रीका आपने देखा। ठीक है? उत्तर अमेरिका में प्रयरी दक्षिण अमेरिका में ब्राजील में कंपास हो गया मतलब कैंपोस दक्षिण अमेरिका के वेनेजुला में लानोस हो गया और दक्षिण अमेरिका का ही जो अर्जेंटीना और उग्वे वाला हिस्सा है वहां भी पंपास ही कहते हैं। वैसे ही हंगरी में पुष्टाच कहा जाता है। यूरोप और उत्तरी एशिया में स्टेपीज कहते हैं। वैसे ही अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया सवाना वाला जो क्षेत्र है माफ़ कीजिएगा। अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया वाला जो इलाका है खासतौर पर अफ्रीका वहां सवाना कहते हैं। दक्षिण अफ्रीका में वेल्ड्स कहते हैं और ऑस्ट्रेलिया में डाउंस कहा जाता है। न्यूजीलैंड में कैंटरबरी कहते हैं। यहां आप देखेंगे कि जो हल्के हरे रंग से दर्शाया गया घास का मैदान है वो टपरेट है। 3:13:49 ठीक है? और जो गाढ़े थोड़ा गाढ़े हरे रंग से दर्शाया गया है धानी कलर है। वो ट्रॉपिकल सवाना है। तो ट्रॉपिकल सवाना आपको कहां-कहां दिख रहा है? ये रहा ट्रॉपिकल सवाना। यहां पे ट्रॉपिकल आपको सवाना टाइप की जो जमीन है। हालांकि उसको स्टेपी कहा जाता है। लेकिन यह ट्रॉपिकल है। इधर भी ट्रॉपिकल है। इधर भी ट्रॉपिकल। ठीक है? और यह देखेंगे आप तो ये वाला जो है ये टेंपरेट है। वैसे ही यहां भी एक पट्टी आपको टेंपरेट दिखाई दे रही है। नीचे भी टेंपरेट है। यहां भी साथ-साथ टेंपरेट आपको कुछ-कुछ दिख रहा है। ठीक है? अब आगे चलते हैं। यहां देखेंगे वानिकी शोध संस्थान। तो आईएफ आईएफआर जो है इसकी यात्रा की 19वीं सदी का जो अंत था मतलब 19 सेंचुरी समाप्त हो रही थी उस समय भारत में वैज्ञानिक वानिकी के आगमन की शुरुआत होती है। कहने का मतलब ये कि एक वन विद्यालय स्थापित होता है और ये अंग्रेजों के जमाने में स्थापित होता है 1878 में। उसके बाद फिर 5 जून 1906 वानिकीय अनुसंधान को आगे बढ़ाने के लिए इंपीरियल वन अनुसंधान संस्थान जो है इंपीरियल फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट इसकी स्थापना इंग्लिश इंग्लिश 3:14:50 गवर्नमेंट यानी अंग्रेज सरकार के द्वारा की जाती है। फिर इसके बाद अब जब देश आजाद होता है उसके बाद 1986 का समय आता है। देश के वाणिकीय अनुसंधान यानी वनों पर जो रिसर्च होनी चाहिए उसको आगे बढ़ाने के लिए उसके मामले में शिक्षा का प्रसार करना रिसर्च और डेवलपमेंट को बढ़ाना इसके लिए फिर एक छात्र संगठन के रूप में भारतीय वानिकीय अनुसंधान और शिक्षा परिषद इसका गठन किया जाता है। तो 1 जून 1991 को आईएफएस आईसीएफआरआई जो है आईसीएफआरआई इसको तत्कालीन पर्यावरण और वन मंत्रालय के तहत एक स्वायत्त परिषद घोषित कर दिया जाता है। ठीक है? ये ऑटोनॉमस काउंसिल घोषित हो जाती है और सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम जो है 1860 वाला उसके तहत एक सोसाइटी घोषित कर दी जाती है। तो परिषद जो है वो देश भर में उपस्थित नौ क्षेत्रीय अनुसंधान संस्थान है। पांच इसमें से केंद्र है जो कि जैव भौगोलिक हैं। है ना? क्षेत्रीय अनुसंधान संस्थान जोधपुर, देहरादून, शिमला, हैदराबाद, कोयंबटू, रांची, बेंगलुरु, जोराहाट जबलपुर में है। अगरतला में आप देखेंगे आइजोल में केंद्र है। इलाहाबाद, छिंदवाड़ा, विशाखापत्त्नम में केंद्र है। 3:15:52 भारत में जो वानिकी शोध संस्थान है उसमें आईसीएफआर का आप देख रहे हैं कौशल विकास केंद्र है। मध्य प्रदेश, छिंदवाड़ा में। फिर उसी प्रकार से वन उत्पादकता संस्थान यह झारखंड में है। रांची में। आईसीएफआरआई का ही काष्ट विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्थान यह कर्नाटक बेंगलुरु में है। भारतीय वन प्रबंधन संस्थान मध्य प्रदेश भोपाल में जीवीपथ हिमालय पर्यावरण और विकास संस्थान उत्तराखंड में है। अल्मोड़ा में उष्णकटिबंधीय वनस्पति अनुसंधान क्षमा कीजिएगा। उष्णकटिबंधीय वनस्पति उद्यान और अनुसंधान संस्थान जो है ये आपका केरल में पड़ता है तिरुवनंतपुरम में। वैसे ही वन अनुसंधान संस्थान ये पीछे भी देखा था आपने देहरादून में काफी पुराना है उत्तराखंड का। नेक्स्ट आप देख रहे हैं एरिड फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टट्यूटकि एरिड जोन का है तो सूखे इलाके में यानी राजस्थान में जोधपुर में प्लाईवुड उद्योग अनुसंधान प्रशिक्षण संस्थान कर्नाटक का है बेंगलुरु का वर्षा वन अनुसंधान संस्थान असम जोरहाट में वन अनुवांशिकी और वृक्ष प्रजनन संस्थान तमिलनाडु कोयंबटूर पहाड़ी पुनस्थापन वन अनुसंधान संस्थान ये 3:16:53 प्रयागराज में है उत्तर प्रदेश के हिमालय वन अनुसंधान संस्थान हिमाचल प्रदेश शिमला वन जैव विविधता संस्थान तेलंगाना हैदराबाद उष्णकटिबंधीय वन अनुसंधान संस्थान मध्य प्रदेश जबलपुर नक्शा बना हुआ है नक्शे में देखिए हिमालय वन अनुसंधान संस्थान वही लोकेशन है कुछ नया नहीं है ये आपका हिमाचल में हो गया आईसीएफआरआई का कौशल विकास केंद्र और भारतीय प्रबंधन वन प्रबंधन संस्थान वन अनुसंधान संस्थान ये सब मध्य प्रदेश में हो गया ठीक है ठीक उसी प्रकार से राजस्थान का एरिड वाला हो गया एरिड फॉरेस्ट फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट जीवी पथ हिमालय पर्यावरण विकास और वन अनुसंधान संस्थान ये उत्तराखंड का हो गया है ना उत्तर प्रदेश में पारी पुनरस्थापन वाला हो गया प्रयागराज का झारखंड में आईएफ आईसीएफआरआई का जो वन उत्पादकता संस्थान है वो मौजूद है वर्षा वन वाला असम में था है ना प्लाईवुड वाला कर्नाटक में था एक सेकंड यहां देखिए भारतीय प्लाईवुड उद्योग वाला अनुसंधान संस्थान और साथ ही साथ काष्ट विज्ञान प्रौद्योगिकी संस्थान ये दोनों कर्नाटक का 3:17:54 हो गया तेलंगाना में वन जैव विविधता संस्थान है वैसे ही आप देखेंगे केरल में वनस्पति उद्यान और अनुसंधान संस्थान ये उष्णकटिबंधीय क्षेत्र का और वन अनुवंशिकी और वृक्ष प्रजनन संस्थान ये तमिलनाडु का है। तो वही संस्थान है उनको हमने चित्र में देख लिया। अब यहां पर पर्यावरणीय संरक्षण आंदोलन जो है उनको देखें। बिश्नोई खेजड़ली आंदोलन कहा जाता है। ये खेजड़ली गांव है। खेजड़ी गांव है। असल में खेजड़ी एक पेड़ का नाम होता है। तो अमृता देवी बिश्नोई के द्वारा इसको शुरू किया गया था। और असल में संत जांभोजी के द्वारा इसको शुरू किया गया। मतलब इसमें एक संत की प्रेरणा थी। आध्यात्मिक पुट था। 1731 में 15वीं शताब्दी का अंत हो रहा था। राजस्थान का खेजड़ली गांव जोधपुर इलाका है। दुनिया का पहला और सबसे बड़ा चिपको आंदोलन इसको कहा जाता है। वृक्ष बचाओ आंदोलन कहा जाता है। राजा थे अजीत सिंह। उन्हीं के आदेश पर वहां पर खेजड़ी के पेड़ों को काटा जा रहा था। और खेजड़ी के पेड़ जो है ये राजस्थान में रेगिस्तान के बादशाह कहे जाते हैं। मल्टीपर्पज होते हैं। मतलब रेगिस्तान के 3:18:54 राजा होते हैं ये। तो इन वृक्षों को पकड़ कर वहां की जो ब्नोई समुदाय के लोग हैं वो चिपक जाते हैं। कहते हैं कि या तो यहां से जाओ तुम लोग और नहीं तो अगर काटना है तो हमारे साथ इन पेड़ों को काट दो। मतलब पहले हमें काटो तब पेड़ों को काटो। अब राजा के आदेश में अंधे जो ठेकेदार रहते हैं, भेजे गए मजदूर रहते हैं वो लोगों को भी काट डालते। आज का समय रहता तो हाहाकार मच जाता। उस समय राजा थे अपना उनकी रजवाही चल रही थी। ठीक है? तो कुल 363 लोगों ने अपना बलिदान दिया। समझ रहे हैं? 363 लोगों ने बलिदान दिया। मतलब सैकड़ों की संख्या में खेजड़ी के पेड़ काटे गए होंगे और उतने ही लोग मरे। इसके बाद आगे चलते हैं। ऐसे ही आंदोलन की आज के समय में भी आवश्यकता है। इसके बाद चिपको आंदोलन चलता है 1973 का। शांतिपूर्ण अहिंसक आंदोलन था क्योंकि अब समय बहुत बहुत बदल चुका है। कहां 15वीं शताब्दी और कहां 1973 में। इस समय अगर ऐसा 300 400 लोगों को काट डाला जाएगा तो वो नरसंहार बर्दाश्त के काबिल नहीं रहेगा। वो भी आजाद भारत में संभव नहीं है। तो यह अहिंसक आंदोलन था। सुंदरलाल बहुगुणा, गौरा देवी, चंडी प्रसाद 3:19:56 भट्ट यह सब इसमें लीडर थे। इसके बाद साइलेंट वैली आंदोलन है केरल के पलक्कड़ में केरल शास्त्र साहित्य परिषद सुगाथा कुमारी के द्वारा और आप देख रहे हैं कि 1973 का है। तो जो सैरंध्री घाटी यानी साइलेंट वैली है, शांत घाटी है उसके सदाबहार उष्णकटिबंधीय वनों को कुंती पूजा नदी पर प्रस्तावित पन बिजली परियोजना के डूब क्षेत्र में आने से बचाने का यहां काम किया गया था। जब इस तरह के रिवर वैली प्रोजेक्ट बनते हैं या मल्टीपर्पज डैम प्रोजेक्ट बनते हैं तो उसमें यह बहुत बड़ा खतरा होता है कि वहां की जो पारिस्थितिकी है वह नष्ट हो जाएगी और होती है। खतरा क्या होता है? वो सच में होती है। ठीक है? मतलब कोई भी इस तरह का डैम या कोई मल्टीपर्पस जो रिवर प्रोजेक्ट होता है, नदी घाटी परियोजना होती है, ये ऐसे अर्बन एरिया में तो बनती नहीं है कि अगल-बगल गाड़ी मोटर चल रहा है, नीचे सड़क चल रही है, ट्रैफिक चल रहा है, बहु मंजिला इमारतें बनी हुई है। उसी में नदी बह रही है। ऐसा तो नहीं होता है। नदी घाटियां और उनका जो विस्तारित तेज प्रवाह वाला क्षेत्र है, वो ऐसे इलाके में होता है जो कि या तो जंगली ही होता है। नहीं तो फिर वो किसी न किसी लिहाज से पारिस्थितिकी के दृष्टिकोण से काफी इंपॉर्टेंट होता है। और 3:20:57 जब उस पर डैम बनाया जाता है, वहां रिजवायर बनाया जाता है और तमाम तरह के परिवर्तन किए जाते हैं तो उससे वहां पर जो जीव जातियां हैं, वनस्पति प्रजातियां हैं, वह सब तबाह होती हैं और हर जगह जहां-जहां ये डैम प्रोजेक्ट बने हैं, वहां वहां ऐसा हुआ है। ठीक है? और वो तात्कालिक असर है। दीर्घकालिक असर तो फिर कहना ही क्या? आगे आप देखेंगे यहां पर अविभाजित बिहार यानी जब झारखंड उसी में शामिल था सिंहभूम वाला इलाका तो ये जंगल बचाओ आंदोलन चला था 1980 का। वहां के लोकल आदिवासी इसको चलाए थे। साल के वनों को काटकर सागौन के पेड़ लगाने का विरोध किया गया था। साल के वृक्ष वहां पर प्राकृतिक रूप से उगे हुए थे। लेकिन सरकार अपना फायदा कमाना चाहती थी तो सागोन के पेड़ लगाइए। अब सागोन के पेड़ लगाने वाले किसान क्या सोचते हैं वो आप अच्छी तरह जानते हैं। सागोन के पेड़ लगाने वाले जो लोग होते हैं ना आमतौर पर इमारती लकड़ी के उद्देश्य से इसको लगाते हैं। साल के पेड़ लगाने का भी वही उद्देश्य होता है। लेकिन सागोन के मामले में ये जल्दी-जल्दी बढ़ता है तैयार होता है। और 10 साल में इसकी लकड़ी जो है वो अच्छी खासी कीमत दे देती है। तो लगवाएंगे उसके बाद 10 साल बाद काट देंगे। 3:21:58 फिर जहां पेड़ थे वहां कुछ नहीं। जब तक जिंदा है सागुन के पेड़ तब तक तो ठीक है। तब तक कोई दिक्कत नहीं। लेकिन वो कितने समय तक रहेंगे? काटकर आप उसका फर्नीचर बना लीजिएगा। इमारती लकड़ी में इस्तेमाल कर लीजिएगा। तो उसके बाद पेड़ साफ फिर नए सिरे से आप पौधा रोपेंगे। मतलब ये पारिस्थितिकी पारिस्थितिकी का और मिट्टी का दोनों का विनाश मिट्टी का पोषण उतना खींचा उस पेड़ ने और वो किसी काम नहीं आया। है ना? तो ये राजनीतिक लालच का खेल था। आदिवासियों ने इसका विरोध किया। इसके बाद आगे बढ़ते हैं। यहां देखें आप नौदान्य आंदोलन है जो कि वंदना शिवा के द्वारा स्टार्ट किया गया था 1982 में। राष्ट्रीय स्तर का जो इसका मुख्यालय है यह नई दिल्ली में है और उद्देश्य वही है जैव विविधता का संरक्षण और जैविक खेती को बढ़ावा देना। एपिको आंदोलन पांडुरंग हेगड़े के द्वारा 1983 में पश्चिमी घाट क्षेत्र कर्नाटक का। एपिको का मतलब होता है गले लगाना। तो वृक्षों को गले लगाना मतलब वही साउथ इंडिया का ये चिपको मूवमेंट है। मेघा पाटकर, बाबा आमटे और अरुंधति राय के द्वारा नर्मदा बचाओ आंदोलन चलाया गया था। नर्मदा पर जो सरदार सरोवर डैम बन रहा था उसका विरोध करने के लिए वहां विस्थापन और पर्यावरणीय नुकसान बहुत बड़ा हो रहा था। 3:22:59 लेकिन सरकार एक नहीं सुनती है। कुल मिलाकर 1985 का है। वैसे ही बलियापाल आंदोलन है उड़ीसा बालेश्वर का 1985 का। स्थानीय ग्रामीणों के द्वारा विरोध किया गया। मतलब सरकार के द्वारा बंगाल की खाड़ी का जो तटीय क्षेत्र था वहां राष्ट्रीय परीक्षण रेंज मतलब जो मिसाइलें इत्यादि का परीक्षण करने के लिए इलाका है उसको विकसित किया जा रहा था। और इस वजह से वहां की जो उपजाऊ जमीन है वो नष्ट हो रही उस फर्टाइल जमीन पर रॉकेट और मिसाइलें ल्च होंगी। तो उसका विरोध हो रहा था। टिहरी आंदोलन चला लेकिन उसके बावजूद टिहरी डैम दैत्य की तरह बनकर खड़ा हो गया। 1990 का दशक। अब आप कहेंगे कि बिजली कहां से मिलेगी जब आप दैत्य नहीं खड़ा कीजिएगा। भाई बिजली से भी ज्यादा कीमती इस समय पर्यावरण है। ठीक है? तो उत्तराखंड को आप देख रहे हैं। उत्तराखंड का क्षेत्र भागीरथी नदी। अलकनंदा और भागीरथी जब मिलती है तो गंगा अपने असली स्वरूप में आती है। तो अलकनंदा तो बहुत दूर से सतोपथ से निकल कर चली आ रही है। उसमें बहुत सारी नदियां सपोर्ट कर रही है। लेकिन जब भागीरथी का जोश जोशीला वेग अलकनंदा के साथ मिलता है तो रफ्तार बनती है। पानी की मात्रा बढ़ती है और नदी अपने पूरे वेग के साथ आगे बढ़ती है। पानी की 3:24:01 गुणवत्ता बनती है और प्रदूषण अपने आप साफ हो जाता है। नदी के अंदर जो भी मैल कुचल है, जो भी गंदी चीजें हैं, वो अपने आप बहकर साफ हो जाती है। नदी साफ सुथरी रहती है जब उसमें प्रवाह रहता है। नदी अपने प्रवाह से जिंदा है। भागीरथी पर यह डैम बना दिया गया। इसकी आधी धारा तो वहीं रुक गई। मैदान में उल उल उलटते उलटते या फिर आप देखें कि उतरते उतरते नदी अपने अपना स्वरूप ही खो देती है। तो टिहरी बांध का निर्माण किया गया। भूकंपीय खतरे वहां पर थे। लोगों का विस्थापन और सबसे बड़ा तो पारिस्थितिकी खतरा। अभी आप जो सुन रहे हैं ना नेपाल की बाढ़ अभी सुना आपने? अभी जस्ट कुछ दिनों पहले आई। और वैसी स्थिति अगर ईश्वर ना करे उत्तराखंड में बनती है तो टिहरी जैसे जो डैम है वह मतलब सीधा नरक का द्वार दिखाने के लिए पर्याप्त है अकेले और ना सिर्फ उत्तराखंड को दिखाएंगे बल्कि यूपी को भी दिखाएंगे बिहार को भी दिखाएंगे चिल्का बचाओ आंदोलन को देख रहे हैं आप उड़ीसा चिल्का झील को देख लीजिए 1991 स्थानीय जो मछुआरा संघ है हालांकि टिहरी डैम को बनाया ऐसे गया है कि वो इतनी जल्दी ध्वस्त नहीं होगा दबाव झेल सकता है लेकिन किस हद तक इस समय जो हिमालय में हो रहा है 3:25:03 वो कल्पना की सीमा से परे है मतलब छोटी-छोटी नदियां बन रही है और जब बारिश का पानी उनमें इकट्ठा होता है और ग्लेशियर एक झटके में जब टूटता है और उन छोटी-छोटी तटबंधों वाली नदियों में माफ़ कीजिएगा झीलों में इकट्ठा होता है या मान लीजिए कि किसी पहाड़ी नदी का ही रास्ता अवरुद्ध हो गया जैसे नेपाल वाले मामले में हुआ था। एक पहाड़ी नदी का रास्ता ही ग्लेशियर ने रोक दिया। मलवा जो है रास्ता रोक देता है। अब पूरा जो पानी का बहाव है वो जमने लगता है। वहीं इकट्ठा होने लगता है। मतलब एक छोटा-मोटा प्राकृतिक अस्थाई रिजवायर तैयार होने लगता है। और उसके जब तटबंध टूटते हैं तो एक झटके में वो पूरा पानी रिलीज होता है और आगे बढ़ता है और जहां-जहां से गुजरता है वहां वहां विनाश आता है। उत्तराखंड में ऐसे सैकड़ों स्थान बन चुके हैं और देर सवेर वहां भी ऐसी त्रासदी होगी और होती रही है। मतलब अक्सर छिटपुट घटनाएं सुनाई देती हैं और आगे इनकी जो बारंबारता है वो बढ़ेगी। तो ऐसी स्थिति में अगर रुकावट आती है भागीरथी या अलकनंदा के रास्ते में तो टिहरी भी कितना संभाल पाएगा? कितना भी मजबूत कंस्ट्रक्शन क्यों ना हो प्रकृति की शक्ति के आगे नहीं टिक सकता है। तो ये खतरनाक स्थिति है। हिमालय 3:26:04 क्षेत्र में इस तरह के डैम नहीं बनने चाहिए। फिलहाल चिल्का बचाओ आंदोलन को आप देख रहे हैं। जाहिर सी बात है कि उड़ीसा की जो चिल्का झील है वहां पर इसको शुरू किया गया था। मछुआरा संघ और छात्र लोग इसमें शामिल थे। टाटा कंपनी और राज्य सरकार का जॉइंट प्रोजेक्ट था झीगा फार्मिंग का। श्रिंक फार्मिंग का और इससे मछुआरों की आजीविका छिनने का खतरा था और दूसरे दूसरा वहां की जो पारिस्थितिकी है उसके खराब होने का भी खतरा था। इसके बाद मैती मूवमेंट था कल्याण सिंह रावत के नेतृत्व में चमोली जिला उत्तराखंड ये 1994 का है। मैती का मतलब होता है मायका। पहाड़ी भाषा में उत्तराखंडी जो भाषा है उसमें मैती मतलब मायका। तो यहां पर जैसे अपने यहां जीजा साली ठिठोली और जूता चोरी फिर जूता चोरी के एवज में पैसे आठना यह सब रस्म चलती है। वहां क्या होता है कि आपको पौधा लगाना होगा। ये कितनी सुंदर परंपरा है। कहां जूता और कहां नोटों की गड्डियां और कहां चमक दमक और कहां अय्याशी और कहां पर एक पौधा। कितनी सुंदर परंपरा है। आप सोच कर देखिए। तो यह भावनात्मक परंपरा है जिसको कि शुरू किया गया और आज भी इसको वहन किया जाता है और यह 3:27:06 सिर्फ उत्तराखंड नहीं राजस्थान के भी कुछ इलाकों में मानी जाती है। मतलब कुछ इलाकों में बेटी की विदाई के मौके पर या शादी के मौके पर और कुछ इलाकों में बेटी के पैदा होने के अवसर पर भी पौधे लगाए जाते हैं। तो आप भी शुरू करिए अपने जन्मदिन के मौके पर एक पौधा अवश्य लगाइए। और पौधा लगाना बड़ी बात नहीं है। वो काम तो सरकार धड़ल्ले से करती है। करोड़ों पौधे रिकॉर्ड बनाएगी हर साल एक पेड़ मां के नाम। लेकिन पौधे कितने जिंदा रहते हैं यह देखने वाली बात है। तो जिसे लगाइए उसको पालिए पोसिए उसको जिंदा रखिए। ये महत्वपूर्ण है। और अगर लगा नहीं सकते पालपस नहीं सकते तो जो लगे हुए हैं उन्हीं का संरक्षण करिए। पर्यावरण से संबंधित पुरस्कार को देखते हैं। तो पुरस्कार में पहला है गोल्डमैन ग्रीन नोबेल इसको कहा जाता है। गोल्डमैन फाउंडेशन के द्वारा इसको दिया जाता है। यह यूनाइटेड स्टेट का है। 1989 में शुरू किया गया था। दो लाख अमेरिकी डॉलर। ध्यान दीजिएगा यह ₹ लाख नहीं है। दो लाख अमेरिकी डॉलर और जाहिर सी बात है कि यह पर्यावरण संरक्षण की दिशा में सबसे बड़ा सम्मान है। नोबेल का इसको जब श्रेय दिया गया तो इसका मतलब है कि ये उच्च पुरस्कार है। जमीनी 3:28:07 स्तर पर पर्यावरण संरक्षण में योगदान देने वाले उल्लेखनीय लोगों को ये दिया जाता है और छह भौगोलिक क्षेत्रों से इन्हें चुना जाता है। तो भारत से भी बहुत से लोगों ने इन्हें प्राप्त किया है। मतलब इस पुरस्कार को प्राप्त किया है। एक तो है मेघा पाटकर 1992 एमसी मेहता 1996 राशिदा बी और चंपा देवी शुक्ला 2004 रमेश अग्रवाल 2014 प्रफुल्ल सामंतारा 2017 और आलोक शुक्ला 2024 तो ये गोल्डमैन पुरस्कार बहुत सारे भारतीयों को भी मिल चुका है। भारतीय लोगों के ही नाम आपको याद रखने हैं। इसके बाद राइट लिव्लीहुड सोसाइटी जो स्वीडन की है उसके द्वारा एक राइट लिव्लीहुड पुरस्कार दिया जाता है जिसको कि एक वैकल्पिक नोबेल कहा जाता है। 1980 का है। 1 मिलियन स्वीडिश क्रोना दिया जाता है इसमें। यह भी अच्छा खासा है। और एक पर्यावरणीय संरक्षण, मानवाधिकार और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में साहसिक कदम उठाने वाले व्यक्तियों को ये दिया जाने वाला पुरस्कार। तो मेघा पाटकर और बाबा आमटे को ये दिया गया था नर्मदा बचाओ आंदोलन के परिप्रेक्ष में। वंदना शिवा ने इसे प्राप्त किया था 93 में। और लाइफ नाम की एक पर्यावरण संस्था 3:29:07 थी। उसने 2021 में इसको प्राप्त किया था। ग्लोबल 500 आप जानते ही हैं पर्यावरण की रक्षा और सुरक्षा के लिए दिया जाने वाला विलक्षण योगदान मतलब किसी के द्वारा अगर विलक्षण योगदान दिया गया है तो उसके एवज में उसे पुरस्कृत किया जाता है। 1987 में इसको संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम यानी यूनाइटेड नेशन एनवायरमेंटल प्रोग्राम के द्वारा शुरू किया गया था। हालांकि 2005 में इसको बंद कर दिया गया और इसकी जगह पर चैंपियंस ऑफ द अर्थ नाम का पुरस्कार यह इसी की जगह पर शुरू हुआ है। ग्लोबल 500 के स्थान पर चैंपियंस ऑफ द अर्थ भारत से इसे प्राप्त करने वाले जो लोग हैं उसमें चंडी प्रसाद भट्ट हैं, अनिल अग्रवाल हैं, डॉ. एम एस स्वामीनाथन भी इसमें शामिल। नेक्स्ट आप देख रहे हैं वही चैंपियंस ऑफ द अर्थ। ग्लोबल 500 के स्थान पर विज्ञान, व्यवसाय, नागरिक सम्मान और नीति के क्षेत्र में जो उत्कृष्ट नेता हैं, पर्यावरण के लीडर हैं, उनको सम्मानित किया जाता है। और यूएनईपी के द्वारा ये शुरू किया गया था। अब यहां पे आप देख रहे हैं कि भारतीय प्राप्तकर्ता में नरेंद्र मोदी को दिया गया, कोचीन इंटरनेशनल एयरपोर्ट को दिया गया। सौर ऊर्जा से संचालित होने के मामले में, अफरोज़ शाह को दिया गया, पूर्णिमा देवी को 3:30:09 दिया गया। ठीक है? हरगिला आर्मी के लिए। आगे चलते हैं। अच्छा ये हरगिला आर्मी आप समझ रहे हैं क्या चीज है? पूर्णिमा देवी का नाम इसके साथ जुड़ा हुआ है। पूर्णिमा देवी ने बहुत उल्लेखनीय काम इसमें किया था। पूर्णिमा देवी वर्मन इनका नाम था। इनको स्टार्क सिस्टर के नाम से भी जाना जाता है। तो 20078 के आसपास ये इस अभियान की नींव रखती हैं। पहले क्या होता था? असम का जो ग्रामीण इलाका होता था। वहां पे ये हरगिला नाम का पक्षी पाया जाता था जो कि सारस के परिवार का है। ठीक है? सारस क्रेन आप देखते हैं ना उत्तर प्रदेश का राजकीय पक्षी है वैसे ही वो सारस के ही फैमिली का होता है लेकिन वो जानवरों के अवशेष खाता है मतलब सड़े गले मांस का सेवन करता है तो इस तरह का अपमार्जक पक्षी है इसके जो घोंसले होते थे पेड़ों पर लगते थे और उन घोंसलों में मांस और हड्डियां रहती थी तो वो बदबू करते थे गंदी महक आती थी सड़ी हुई जैसे लाश की महक आए वैसी महक आती थी तो ये और आकार में बहुत ऊंचा बड़ा होता है तो अच्छा खासा मांस भी इसको चाहिए 5 फीट ऊंचे पक्षी को मांस भी ढेर सारा चाहिए तो वहां के लोग इस पक्षी का जहां घोंसला देखते थे उस पेड़ को ही काट देते थे। धीरे-धीरे 3:31:09 करके ये पक्षी जो है ये खत्म होने के कगार पे आया और असम में महामारियां उस इलाके में फैलने लगी जहां ये जो सड़ा गला मांस होता था उसको खाकर सफाई करता था। तो ये प्राकृतिक सफाई कर्मी है। मतलब नेचुरल स्कवेंजर है। और इसलिए अब ये एक जन आंदोलन बनाया गया। इसमें होता क्या है कि घोंसलों की सुरक्षा की जाती है। जो हरगिला पक्षी है उसका अगर कोई बच्चा घोंसले से गिर गया है तो उसको नेट लगाकर सुरक्षित ऊपर पहुंचाया जाता है और गाने और नुक्कड़ नाटक के जरिए पर्यावरण के प्रति और इस पक्षी के संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक किया जाता है। उसके अलावा जो असमिया कपड़े होते हैं जैसे कि गस गमछा होता है, साड़ी होती है उस पर भी हरगिला का चित्र उकेरा गया और उसे बेचा गया जिससे कि इसको अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली। तो ये बहुत बड़ा मतलब लुप्त लुप्त प्राय प्रजाति ये बन चुकी थी और इसके संरक्षण के लिए पूर्णिमा देवी के द्वारा बहुत बड़े स्तर पर काम किया गया। आगे चलते हैं। तो यहां देख रहे हैं आप गोल्डन पांडा पुरस्कार है। अगला वन्य जीवों की प्रकृति आधारित जो सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री फिल्में हैं उसके लिए इसको ग्रीन आस्कर कहा जाता है। ये ग्रीन ऑस्कर कहा जाता है। भारत की ओर से प्राप्त होने 3:32:10 वाली जो प्राप्तकर्ता जो व्यक्ति हैं वो है माइक पांडे और इनकी फिल्म थी सोर्स ऑफ साइलेंस। चाइना फेडरेशन ऑफ लिटरेरी एंड आर्ट सर्कल ऑफ सिचुआ यह प्रांत यहां देखेंगे आप एक सेकंड रुक जाइए देखिए चाइना फेडरेशन ऑफ लिटरेरी एंड आर्ट आर्ट सर्कल्स और सिचुआ प्रांत की पीपल्स गवर्नमेंट पीपल्स गवर्नमेंट जो है ये दोनों मिलकर इसको देते हैं। दो इसमें संस्थाएं हैं। 2023 में इसको शुरू किया गया था। एसन पुरस्कार को आप देख रहे हैं। ये यूके का है। इसमें 400 यूरो ब्रिटिश पाउंड जो है ये दिया जाता है। इसको हरित ऊर्जा का आस्कर ही कहा जाता है। और भारत की ओर से इसमें प्राप्त करने वाले जो व्यक्ति हैं वो हरीश हांडे हैं। सेलको इंडिया के। निपान फाउंडेशन के सहयोग से यूएनईपी के द्वारा दिया जाता है। 1984 से शुरू किया गया सासाकावा पुरस्कार। सासाकावा का अवार्ड आप देख रहे हैं कितना बड़ा है। कुल मिलाकर यह सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान करने वाले व्यक्ति को मिलता है। एमएस स्वामीनाथन को अब तक मिल चुका है। ठीक है? यहां तक हमने देखा। अगला पुरस्कार है आईएमओ। ठीक है? ये 3:33:11 डब्ल्यूएमओ यानी जो वर्ल्ड मेटोलॉजिकल ऑर्गेनाइजेशन है यानी विश्व मौसम विज्ञान संगठन है उसके द्वारा दिया जाता है। 1955 से इसको शुरू किया गया। एक स्वर्ण पदक होता है इसमें। एक चर्म पत्र होता है, स्क्रॉल होता है और एक मौद्रिक अनुदान मतलब मुद्रा राशि दी जाती है, धनराशि दी जाती है। कुल मिलाकर विश्व मौसम विज्ञान संगठन का यह जो पुरस्कार है, यह मौसम विज्ञान और जल विज्ञान के क्षेत्र में उत्कृष्ट वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए दिया जाता है। और इस क्षेत्र का यह सर्वोच्च सम्मान है। तो पहला पुरस्कार नॉर्वे के डॉ. हसलबर्ग को दिया गया था 1956 में। यानी पुरस्कार शुरू होने के अगले वर्ष। भारत में किसने प्राप्त किया है? तो भारत में के आर रामनाथन के द्वारा प्राप्त किया गया 61 में और दूसरा पी आर पिशारोती के द्वारा प्राप्त किया गया 1989 में। इसके बाद अगला पुरस्कार विटली। विटली फंड फॉर नेचर है। डब्ल्यूएफ कहा जाता है। यूके का है यूनाइटेड किंगडम यानी ब्रिटेन का। और ब्रिटिश पाउंड में यहां पर 500 ब्रिटिश 3:34:11 पाउंड मिलते हैं। टोटल धनराशि के तौर पर पुरस्कार की राशि है। दिया क्यों जाता है? तो वन्य जीव संरक्षण के क्षेत्र में यह मिलता है। वन्य जीव संरक्षण के क्षेत्र में अगर आप व्यापक तरीके से काम करते हैं और आपका कार्य उल्लेखनीय रहता है मतलब उससे सुधार सच में आता है तो ऐसी परिस्थिति में ये आपको मिलेगा और इसे इसीलिए ग्रीन ऑस्कर भी कहा जाता है। तो भारत में अगर इसके प्राप्तकर्ताओं को आप देखेंगे तो बरखा सुब्बा है। ये 2026 में प्राप्त की है। इसमें हम लोग लेटेस्ट से शुरू करके पीछे गए हैं। तो बरखा सुब्बा को एकदम नवीनतम मिला हुआ है। उसके अलावा पूर्णिमा बर्मन को मिला था 204 में और 2017 में नुकम को मिला था 2021 में। अपराजिता दत्ता को मिला था 2013 में। चारुदत्त मित्र मिश्रा को मिला था हिम तेुआ संरक्षण के लिए 2022 में। तो ये पीछे वाले पुरस्कार हैं और ये वाला नवीनतम। आगे बढ़े और ये देखें कुछ और पुरस्कार हैं। लेकिन अभी तक हमने विदेशी पुरस्कारों को देखा है। अब सिर्फ हम अपने देश के घोषित पुरस्कारों को देखेंगे यानी पूरी तरह से भारतीय। 3:35:12 तो पहला पुरस्कार है इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार 87 में शुरू किया गया था। ₹5 लाख की धनराशि और मतलब संगठन अगर है तो ₹5 लाख की धनराशि कोई ऑर्गेनाइजेशन है और अगर कोई व्यक्तिगत है तो उस स्थिति में पांच तीन और ₹ लाख की जो श्रेणियां बनी हुई है इसमें उसके हिसाब से धन दिया जाता है। तो पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उत्कृष्ट और स्थाई योगदान देने वाले जो संगठन हैं उनको ये प्रदान किया जाता है। ध्यान दीजिएगा सिर्फ एक बार योगदान दिया फिर ठंडे पड़ गए दूसरा काम करने लगे ऐसा नहीं। निरंतर उनका उस क्षेत्र में मतलब पर्यावरण के संरक्षण के क्षेत्र में अभिन्न योगदान रहे। निरंतर निरंतरता आवश्यक है। पहले प्राप्तकर्ता इसमें कौन है? बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी। यह एक संगठन है। तो ₹5 लाख इसको दिए गए थे। पैसा मैटर नहीं करता है। ऐसे पुरस्कारों में यह सम्मान मिलना बड़ी बात होती है। ₹1 लाख का नगद पुरस्कार दिया जाता है। राजीव गांधी वन्य जीव संरक्षण पुरस्कार के धनराशि के तौर पर 1998 में इसे शुरू किया गया था। पहली प्राप्तकर्ता इसमें एक संस्था है और यह डब्ल्यूडब्ल्यूएफ यानी 3:36:13 वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड फॉर नेचर का भारतीय संस्करण और स्वर्गीय एस देवराय को ये प्राप्त हुआ था। मतलब ये व्यक्तिगत स्तर पर और संस्थागत स्तर पर दोनों में दिया जाता है। ठीक वैसे ही जैसे इंदिरा गांधी पुरस्कार दिया क्यों जाता है? तो बात वही है वन्य जीव संरक्षण के क्षेत्र में ये मिलता है। यह वन्य जीव अधिकारियों को मिल सकता है। शोधकर्ताओं को मिल सकता है। इस क्षेत्र में समर्पित जो संगठन है उनको भी मिल सकता है। आवश्यक नहीं है कि अधिकारी और शोधकर्ता है तो ही मिले। वन्य जीव संरक्षण के क्षेत्र में अगर आप कुछ भी उल्लेखनीय योगदान देते हैं जो कि सच में उल्लेखनीय हो तो यह आपको मिलेगा। इसके बाद है इंदिरा प्रियदर्शनी वृक्ष मित्र पुरस्कार। 1986 ढाई लाख नगद की धनराशि वनीकरण और बंजर भूमि के विकास में अभिनव काम जो करता है चाहे वह व्यक्ति हो अथवा संस्था उसे दिया जाता है। वर्तमान में चार श्रेणियां सरकारी कर्मचारी संयुक्त वन प्रबंधन समिति सरकारी संस्थान और गैर सरकारी संगठन को यह दिया जाता है। तो पहली प्राप्तकर्ता इसकी थी गौरा देवी। अगला है मेदिनी पुरस्कार। मेदिनी मतलब 3:37:14 क्या होता है? धरती। मेदिनी मतलब होता है धरती। तो यह एक तरह का अर्थ अवार्ड है। अब इसमें आप देखें ₹1 लाख का प्रथम पुरस्कार है। ₹75000 का दूसरा पुरस्कार है और इसमें तृतीय पुरस्कार का प्रावधान नहीं है। हालांकि पहला दूसरा है तो तीसरा भी होना चाहिए। फिलहाल इसमें नवीनतम वृद्धि की गई है धनराशि में इसलिए यह अवार्ड का यहां पर दिया हुआ है। 2018 से इसका जो दाम है मतलब इसकी जो राशि है वो बढ़ा दी गई है। 1987 से इसको शुरू किया गया था। क्यों दिया जाता है? तो ये पुस्तक लेखन के क्षेत्र में दिया जाता है। लेकिन कैसी पुस्तकें? तो पर्यावरण, वन और वन्य जीव संरक्षण जैसे जो गंभीर मुद्दे हैं और संवेदनशील भी हैं। उसमें हिंदी भाषा में उत्कृष्ट मौलिक पुस्तकें लिखने वाले जो लेखक हैं उनको प्रोत्साहित करने के लिए दिया जाता है। और पहली प्राप्तकर्ता इसके जुगनू इसकी इस अवार्ड की जो पहली प्राप्तकर्ता थी वो जुगनू शारदे थी और उनकी किताब थी मोहन प्यारे का सफेद दस्तावेज। ठीक है? तो यह मेदिनी पुरस्कार है। यह लेखन के क्षेत्र में मिलता है। लेकिन पर्यावरण के संदर्भ में किया गया लेखन। ₹5 3:38:14 लाख घनश्याम दास बिरला अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार हेतु दिए जाते हैं। ठीक है? ₹5 लाख 1991 से इसको शुरू किया गया था। तो भारतीय संस्कृति का संरक्षण, ग्रामीण क्षेत्रों में पर्यावरण संरक्षण, चिकित्सकीय देखभाल के लिए उत्कृष्ट काम करने वाले जितने भी लोग हैं उनमें से किसी उत्कृष्ट व्यक्ति को यह दिया जाता है। इसके बाद अगला जो अवार्ड है यह आप देखें। ₹ लाख और ट्रॉफी मिलती है। पदक पदक मिलता है। शील्ड मिलती है जो आप कहें 1992 का समय स्वच्छ प्रौद्योगिकी के लिए मिलता है यह राजीव गांधी पर्यावरण पुरस्कार। मतलब ये कुछ इंडस्ट्रियल यूनिट्स जो हैं उनको दिया जाता है जो कि प्रदूषण कम करने की दिशा में काम कर रहे हैं। नेक्स्ट आप यहां पर देखेंगे प्रदूषण निवारण के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार। तो ₹1 लाख और ट्रॉफी इसमें भी दी जाती है और प्रदूषण निवारण और पर्यावरण सुधार की दिशा में काम करने वाली जो इकाइयां हैं 18 बड़ी और पांच लघु औद्योगिक इकाइयां जो होती हैं उनको ये सालाना दिया जाता है हर साल 1992 से इसको शुरू किया गया था। बाकी 2027 की तैयारी अगर आप कर रहे हैं तो 3:39:17 उसके लिए आप हमारे बैचेस ज्वाइन कर सकते हैं। जुड़ने का संपर्क का साधन वही है। प्री और मेंस दोनों की कंबाइंड स्टडी भी कर सकते हैं। अलग-अलग भी आप कोर्स लेकर तैयारी कर सकते हैं। समीक्षा अधिकारी और बीईओ के लिए भी हमारे बैचेस लगातार चल रहे हैं। वैकेंसी भी आएगी ही आएगी। इसमें कोई संदेह नहीं है। तो आप चाहे तो इनसे जुड़ सकते हैं। चलिए आगे चलते हैं। ये देखिए कुछ और व्यक्ति हैं यहां पर। अभी तक हमने पुरस्कार देखे। अब यहां व्यक्तियों के नाम है और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भारत में भारत के संदर्भ में इनका क्या महत्वपूर्ण योगदान है? असल में अगर हम पूरी दुनिया के ऐसे लोगों को इकट्ठा करेंगे तो इनकी तादाद बहुत ज्यादा हो जाएगी और उनसे प्रश्न बनने की संभावना लगभग शून्य होती है कुछ गिने चुने लोगों को छोड़कर। लेकिन भारत के संदर्भ में जितने हैं वो आपको मालूम होने चाहिए। जैसे आप ज्यादा उपाय को देख रहे हैं। इन्हें भारत का वन पुरुष कहा जाता है। ठीक है? है। इनको भारत का वन पुरुष कहा जाता है और यह असम राज्य से संबंधित है। मिशिंग जनजाति के एक पर्यावरण कार्यकर्ता हैं। इन्होंने ब्रह्मपुत्र नदी का जो रेत युक्त क्षेत्र है उसमें 1360 एकड़ का वन क्षेत्र 3:40:18 तैयार कर दिया। रेतीली जमीन थी। दूर-दूर तक कुछ भी नहीं उगा हुआ था। वहां पर इन्होंने वृक्ष उगा डाले 1360 एकड़ में। और अब इस वन क्षेत्र को मोलाई वन के नाम से जाना जाता है। पद्मश्री से इन्हें सम्मानित किया गया 2015 में। ठीक है? ऐसे व्यक्ति के लिए पद्मश्री सम्मान छोटा ही है। इन्हें भारत रत्न जैसे सम्मान से सम्मानित किया जाना चाहिए। इसके बाद है सलीम अली बर्ड मैन ऑफ इंडिया इन्हें कहा जाता है। और इनकी आत्मकथा है फॉल ऑफ अ स्पेरो। बुक ऑफ बुक ऑफ इंडियन बर्ड्स नाम की एक किताब भारत के पक्षी इन्होंने लिखी है। मतलब यह वैसे तो मूल रूप से अंग्रेजी भाषा में है लेकिन इसे हिंदी में भी आप पढ़ सकते हैं। नेशनल बुक ट्रस्ट इसका हिंदी अनुदित संस्करण भी भेजता है। अच्छी किताब है। चिड़ियों के चित्र भी बने हुए हैं। इलस्ट्रेशन किया गया है और बकायदा उनके बारे में हर उनकी जो प्रवृत्ति है, लक्षण है वो दिए गए हैं। सलीम अली पहले व्यक्ति थे जिन्होंने कि पहली बार पक्षियों का व्यवस्थित सर्वे करवाया था और 1947 के बाद भारत में बने संगठन बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के प्रमुख व्यक्तियों 3:41:19 में से यह एक थे। इनके व्यक्तिगत प्रयास का ही परिणाम था कि जो केवलादेव नेशनल पार्क है उसका निर्माण हुआ और साइलेंट वैली जो केरल की है जो कि बहुत सघन और अपनी उत्तम जैव विविधता के लिए जानी जाती है। मतलब बायोडायवर्सिटी वहां सर्वोच्च दिखाई देती है। है ना? तो वहां पर जो बड़ा विनाश हो रहा था है तो जैव विविधता सर्वोच्च ही लेकिन विनाश भी उतनी ही तेजी से हो रहा था तो उसको रोकने का काम इनके माध्यम से किया गया जो कि उल्लेखनीय है और पद्म विभूषण से इन्हें सम्मानित किया गया 1976 में। इसके बाद राजेंद्र राजेंद्र सिंह हैं। ये भारत के जल पुरुष कहे जाते हैं। कुशल जल प्रबंधन और संचयन के लक्ष्य की दिशा में व्यापक काम इन्होंने किया। इन्हें मैग्सेसिया अवार्ड भी मिल चुका है। स्टॉकहोम वाटर प्राइज भी मिल चुका है। जिस जो कि नोबेल वाटर प्राइज कहा जाता है। इस तरह के बड़े-बड़े पुरस्कार भी यह प्राप्त कर चुके हैं। किंकरी देवी हैं। ये भी पर्यावरण विद है कार्यकर्ता हैं। हिमाचल प्रदेश में अवैध खनन हो रहा था और उत्खनन के खिलाफ इन्होंने आवाज उठाई। स्त्री शक्ति पुरस्कार इन्होंने जीता था 1999 में 3:42:20 और बीजिंग में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मेलन में हिस्सा भी लिया था। ठीक है? इसके बाद आगे बढ़ते हैं। यहां देखें आप महेश चंद्र मेहता हैं। इन्होंने औद्योगिक प्रदूषण को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। गंगा को प्रदूषित करने वाले जो प्रदूषक हैं, ताजमहल के क्षरण का जो कारण बन रहे हैं, मतलब ताजमहल जो संगमरमर का बना हुआ है, तो भले ही मकराना मार्बल है, चमचमाता हुआ सफेद लेकिन उस पर पर्यावरणीय प्रदूषण का बहुत गहरा असर पड़ता है। संग संगमरमर एक बहुत ही संवेदनशील चट्टान होती है। अगर ग्रेनाइट इत्यादि होते तो इतनी जल्दी प्रभावित नहीं होते। लेकिन संगमरमर जो कि रूपांतरित शैल होता है वो प्रदूषण या इस तरह की गतिविधियां जो बाहरी होती हैं उनसे बहुत तेज रिएक्ट करता है। ठीक है? तो ऐसी स्थिति में ताजमहल का विनाश हो ही रहा है। वो अपनी रंगत खो रहा है। उसके ऊपर एक परत सी जमती जा रही है। अम्ल वर्षा भी उसको नुकसान पहुंचाती है। कुल मिलाकर 1984 में जब जब इन्होंने एक जनहित याचिका यानी जो पीआईएल है उसको दायर किया तब से इन्हें ग्रीन एडवोकेट कहा जाता है। और इसी के साथ स्नातक स्तर पर पर्यावरण अध्ययन के 3:43:21 विषय की भी शुरुआत होती है। इसके बाद एम एस स्वामीनाथन भारत की हरित क्रांति के जनक के रूप में यह जाने जाते हैं। इतना तो आप भी जानते हैं। इसमें नया क्या है? इन्होंने गेहूं की फसलों के एक उच्च प्रौद्योगिकी आविष्कार का उत्पादन किया जिससे कि भारत में हरित क्रांति का मार्ग प्रशस्त होता है। हालांकि इनके जो प्रयास थे उसका एक दुष्परिणाम भी सामने आया। हरित क्रांति गेहूं क्रांति बन गई। मतलब अन्य फसलों के उत्पादन को कहीं पीछे छोड़ दिया गया। बाद में जब हम देखते हैं तो इंद्रधनुषी क्रांति, मिश्रित क्रांति मतलब हरित क्रांति का जब दूसरा चरण शुरू होता है तो उसमें अन्य फसलों पर भी जोर दिया जाता है। दूसरी बात कि सरकारी जो सरकारी इंतजाम किए गए थे और जो वैज्ञानिक प्रयास थे उनका परिणाम रंग तो लाया लेकिन इससे उत्पादन बढ़ा। किसानों की दशा में सुधार नहीं आया। ये एक चीज है। हरित क्रांति का मतलब क्या है? हम अन्न अधिक उपजाएं। हरियाली से क्रांति लाएं। और हरियाली किस चीज की है? फसलों की हरियाली। यही इसका उद्देश्य है और फसल उगाने वाला कौन? तो अन्नदाता यानी किसान। किसानों की दशा अपने 3:44:21 देश में अब देखिए क्या सुधर गई है। दो-दो हरित क्रांतियां आई और चली गई और ना जाने कितनी योजनाएं हर घंटे बनती हैं। है ना? लेकिन किसान जस की तस बल्कि और बदतर स्थिति में है। तो अगर हरित क्रांति इतनी ही सफल रही अगर इसको देखा जाए तो किसानों को तो मालामाल हो जाना चाहिए। मालामाल हुए सिर्फ कुछ हिस्सों के किसान वो भी गिनेजुने जो पहले से ही संपन्न थे जो जागरूक थे। जो बिचौलिए और निम्न वर्गीय किसान थे उनकी दशा में कोई सुधार नहीं आया। ठीक है? तो ठीक है इन्होंने अपना काम किया। इन्होंने शोध का काम किया। आविष्कार का काम किया। वो चीज आप देख रहे हैं। इसके बाद रविंद्र कुमार सिन्हा असल में किसानों की दुर्दशा के पीछे सरकारी नीति की विफलता है। हरित क्रांति को भी एक सही समायोजित तरीके से चलाने की आवश्यकता थी और उसके बाद भी जो नीतियां है वो जमीनी स्तर पर नहीं चलती है। कागज में ज्यादा दिखाई देती। रविंद्र कुमार सिन्हा एक पद्मश्री से सम्मानित भारतीय पर्यावरण विध हैं। अग्रणी शोधकर्ता और संरक्षणवादी हैं। गंगा डॉल्फिन के संरक्षण के लिए इनके अभिनव प्रयास हैं। इसीलिए इन्हें भारत का डॉल्फिन मैन कहा जाता है। इसके बाद है रामदेव मिश्रा नेशनल इंस्टट्यूट ऑफ 3:45:23 इकोलॉजी के संस्थापक और भारत में पारिस्थितिकी के जनक माने जाते हैं। नॉर्मन बोरलार्ग कृषि वैज्ञानिक थे और यह कृषि विज्ञानी हैं अमेरिका के। दुनिया भर में उन पहनों की यह शुरुआत करते हैं जिससे कि कृषि उत्पादन में बढ़ोतरी हो। तो बोरलार्क को अक्सर हरित क्रांति का जनक माना जाता है। अच्छा हरित क्रांति का एक दुष्परिणाम भारत में और क्या दिखाई दिया? तो मिट्टी की गुणवत्ता में तेजी से गिरावट आई। जो उर्वररा मिट्टी थी मैदानी इलाकों की मिट्टी कैसी? जलोढ़ मिट्टी। मैदानों में नदियों के द्वारा जो बाढ़ के पानी से मिट्टी आती है उसी से परतें बनती है। तो ये मिट्टी जो है ये अत्यंत उपजाऊ। एक समय रहता था कि इसमें बीज ऐसे डाल दिया और जम जाता था अपने से और फसल भी पैदा हो जाती थी। बहुत कुछ करना नहीं पड़ता था। और हमें अब है कि इसमें आप खोज खोज कर फर्टिलाइजर डालते हैं। कीटनाशक का इस्तेमाल करते हैं। उसके बाद भी फसल बर्बाद हो जाती है। तमाम तरह के उपाय जतन करने पड़ते हैं और भविष्य में और करने पड़ेंगे। तो मिट्टी की उत्पादकता को एकदम से निचोड़ लिया इस हरित क्रांति ने। जो अनाज और जो पैदावार और जो मिट्टी से हमें काम लेना था 10 साल में उसको हमने 2 साल 3:46:24 के अंदर मिट्टी से लिया। तो जो चीज आपको 10 साल में धीरे-धीरे ड्रेन करनी थी उसको 2 साल में अगर आप निचोड़ लेंगे तो जिस चीज से निचोड़ेंगे वह एकदम से बेजान हो जाएगी। तो मिट्टी के साथ भी वही हुआ। तो हरित क्रांति के बहुत सारे काले पक्ष हैं। अब आगे चलते हैं। यहां देखें कैलाश सा श्रंखला को देख लीजिए। कैलाश सा श्रंखला एक भारतीय जीव विज्ञानी और संरक्षणवादी थे। तो श्रंखला का जो समय है ये 1973 का है। मतलब भारत में जो प्रोजेक्ट टाइगर चलाया गया था। अभी पीछे आप देख कर आ रहे हैं उसके ये पहले निदेशक थे। ठीक है? पहले डायरेक्टर थे। द टाइगर मैन ऑफ़ इंडिया इन्हें कहा जाता है। 1992 में पद्मश्री और 2013 में इन्हें राजस्थान रत्न दिया गया था। इसके बाद है इंदिरा गांधी पूर्व प्रधानमंत्री। इन्होंने पर्यावरण के क्षेत्र में वैधानिक रूप से जंतुओं और पर्यावरण को संर संरक्षित करने के लिए काफी सारे प्रयास किए थे। इन्होंने 1972 का जो वन्य जीव संरक्षण अधिनियम है उसको पारित कराकर वन्य जीवों के संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण को कानूनी रूप दिया। यह भारतीय वन्य जीव बोर्ड की चेयर पर्सन भी रही। तो एक प्रधानमंत्री के तौर पर ये एक 3:47:26 उल्लेखनीय योगदान है। नहीं तो प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठते ही लोगों के दिमाग में सिर्फ अपना फायदा और सत्ता लोलुपता आ जाती है। ठीक है? हर व्यक्ति के अपने कुछ काले पक्ष होते हैं। कुछ उजले पक्ष होते हैं। हर व्यक्ति के व्यक्तित्व में कुछ खामियां होती है। कुछ अच्छाइयां होती है। तो अच्छाई यहां पर दिखाई गई। इसके बाद आगे देखें। मेघा पाटकर और अरुंधति राय को आप देख रहे हैं। नर्मदा बचाओ आंदोलन के लिए जाना जाता है इनको और मेघा पाटकर ने नर्मदा बचाओ आंदोलन की शुरुआत की थी। जो निर्माणाधीन बांध परियोजनाएं नर्मदा पर थी उनका विरोध किया गया जिससे कि पर्यावरण की क्षति हो सकती थी और होती भी है। आदिवासी जनजातियों के अधिकारों के संरक्षण पर काम किया गया। मेनका गांधी पीपल फॉर एनिमल नाम की जो संस्था है उसको बना चुकी हैं और उसके अलावा यह पूर्व पर्यावरण और वन मंत्री भी रह चुकी हैं। वर्ष का पर्यावरण विद 1994 में इन्हें वर्ष का पर्यावरण विद और साथ ही साथ शाकाहारी व्यक्ति चुना गया था। मतलब एनवायरमेंटलिस्ट एंड वेजिटेरियन ऑफ द ईयर। ये कब चुना गया था? 1994 में। तो 3:48:26 मेनका गांधी समय-समय पर जानवरों की सुरक्षा के लिए, पशुओं के, वन्य जीवों के संरक्षण के लिए ना सिर्फ वन्य जीव बल्कि प्राणी मात्र के संरक्षण के लिए आवाज उठाती। अभी सुप्रीम कोर्ट का जो डिसीजन कुत्तों के खिलाफ आया था उसमें भी मेनका गांधी ने आवाज उठाई थी। जी डी अग्रवाल को आप देखेंगे तो यह एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक और सिविल इंजीनियर हैं। गंगा बचाओ आंदोलन में यह सक्रिय कार्यकर्ता थे। जी डी अग्रवाल को पर्यावरण इंजीनियर भी कहा जाता है। इन्होंने इन्हें स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद के नाम से जाना जाता है। तो इसमें अगर दूसरे नाम से पूछ लेता है तो आपको भ्रमित नहीं होना है। इसके बाद गाडगिल हैं। माधव गाडगिल हैं और माधव गाडगिल एक भारतीय पारिस्थितिकी विज्ञानी है प्रोफेसर। पश्चिमी घाट का जो पारितंत्र है उस पर इन्होंने काफी सर्वे किया था और उस पैनल के विशेषज्ञ पैनल वहां गठित किया गया था 2010 का। ठीक है? 2010 का तो उसमें ये चेयरमैन भी रहे थे। 2015 में अमेरिकी समुद्री जैविक वैज्ञानिक थे जेम्स लुबेंको तो इनके साथ यह प्रसिद्ध टाइलर अवार्ड साझा करते हैं मतलब दोनों जने को साझा दिया गया था टाइलर टाइलर अवार्ड इसमें 3:49:28 लुबेक्चो जो है ये भी शामिल थे और साथ ही साथ गार्डगिल का नाम शामिल था तो भारत विश्व और मतलब कुल मिलाकर ये दिया क्यों गया तो संयुक्त राष्ट्र अमेरिका भारत और विश्व के अन्य देशों में संरक्षण और सतत विकास की नीतियों के विकास में इन्होंने लीड किया था अभिन्न योगदान दिया था और इन्हें पद्म विभूषण भी मिल चुका है 2006 है। इसके बाद है प्रमोद पाटिल। यह पक्षी वैज्ञानिक हैं और इन्हें ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के संरक्षण के लिए विशेष तौर पर जाना जाता है। रॉयल ज्योग्राफिकल सोसाइटी लंदन जो है यहां देखें आप रॉयल ज्योग्राफिकल सोसाइटी लंदन की जो है उसके द्वारा प्रतिष्ठित अवार्ड दिया जाता है जिसका नाम है विटली। विटली अवार्ड तो उससे इन्हें सम्मानित किया गया। इस अवार्ड को ग्रीन ऑस्कर भी कहा जाता है। इसके बाद है माइक पांडे सोर्स ऑफ साइलेंस। ये पीछे आप देख ही चुके हैं। इन्हें यह अवार्ड दिया गया था। मतलब यह वन्य जीवों पर फिल्म बनाते हैं। करियर की शुरुआत यहीं से करते हैं। तो वेल पर बनी हुई वेल मछली पर बनी हुई यह फिल्म है। और 2009 में टाइम्स मैगजीन के द्वारा मालदीव के राष्ट्रपति 3:50:29 मोहम्मद नशीद कैमरून डियाज़ के साथ माइक पांडे को हीरो ऑफ द एनवायरमेंट घोषित किया गया था। इसके बाद आगे बढ़ते हैं। यहां देखिए आप और भी कुछ है। विटली अवार्ड इन्हें मिला 1994 में और यह एशिया के पहले सिर्फ भारत के नहीं एशिया के पहले निर्माता और निर्देशक हैं। जिन्हें कि वाइल्ड स्क्रीन पांडा अवार्ड भी दिया गया। इसके बाद चेवांग नोरफेल है। यहां देखें आप। लद्दाख में कृत्रिम ग्लेशियर बनाने के लिए इनको आइस मैन के नाम से जाना जाता है। हालांकि कोई मनुष्य कितने ग्लेशियर बनाएगा? यह सिविल इंजीनियर हैं जो कि जम्मू कश्मीर के ग्रामीण विकास विभाग में काम करते हैं। सोनम वांगचुक एक प्रसिद्ध सिविल इंजीनियर मुख्य रूप से शिक्षा और नवाचार से संबंधित सुधारों से इनका योगदान जुड़ा रहता है। 2018 में इन्हें रेमन मैक्स से अवार्ड दिया गया और 2016 में रोलेक्स अवार्ड प्रदान किया गया। झीलों का संरक्षण लेह लद्दाख क्षेत्र में कृत्रिम ग्लेशियर इत्यादि के निर्माण से इन्हें अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली। एजुकेशन एंड कल्चर मूवमेंट माफ़ कीजिएगा। एजुकेशन एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख। ये 3:51:30 सेकमोल जो है इसके इन्हीं के द्वारा स्थापित संगठन है और वर्तमान में ये पर्यावरण संबंधी जो मुद्दे हैं खासतौर पर लद्दाख के उनको लेकर अक्सर भूख हड़ताल पर बैठते हैं। बिलअर्जुन सिंह हैं। ये एक शिकारी थे और उसके बाद आप देखेंगे कि ये जीव-जंतु संरक्षक बन जाते हैं। इनके काम से प्रभावित होकर सरकार ने इन्हें पद्मश्री दिया। 1995 में 2006 में पद्म पद्म भूषण दिया गया और उसके बाद वर्ल्ड वाइल्ड लाइफफ़ फंड के द्वारा इनको गोल्ड मेडल दिया गया 1996 में। चंडी प्रसाद भट्ट गांधी जी की विचारधारा पर चलने वाले पर्यावरण विद और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। गोपेश्वर में दशोली ग्राम स्वराज संघ जो है दशोली यहां देखें दशोली ग्राम स्वराज संघ इसको डीजीएसएस भी कहा जाता है। तो इसकी स्थापना करने वाले यही व्यक्ति हैं। चंडी प्रसाद भट्ट चिपको मूवमेंट उसका यह मातृ संगठन सिद्ध हुआ। उसके ये मुख्य कार्यकर्ता भी थे। उसके बाद कम्युनिटी लीडरशिप के लिए इन्हें रेमन मैक्ससे अवार्ड दिया गया था। भारत सरकार द्वारा 2005 में पद्म भूषण दिया गया। फिर गांधी शांति पुरस्कार दिया गया 2013 में। 3:52:33 सामाजिक पारिस्थितिकी पर काम करने के लिए इनको जाना जाता है और आधुनिक भारत का प्रथम पर्यावरण विद्वान माना जाता है। इसके बाद आप देखेंगे बाबा आमटे को मुरलीधर देवीदास आमटे इनका नाम है। इनको बाबा आमटे कहा जाता था। ये भी निश्चित तौर पर पर्यावरण विद है और समाजसेवी। तो गांधी जी के विचारों का इन पर भी प्रभाव है। चंद्रपुर महाराष्ट्र स्थित आनंद वन इनका प्रमुख स्थान था। कुष्ठ रोगियों के लिए बहुत सारे आश्रमों की इन्होंने और समुदायों की स्थापना की। पर्यावरण संरक्षण के लिए जीवन भर संघर्ष करते रहे। पूरा जीवन वन्य जीव संरक्षण और नर्मदा बचाओ आंदोलन में समर्पित हो गया। 1971 का समय पद्मश्री दिया गया। 1985 में रेमन मैक्ससे और डेमिटन डट्टन माफ़ कीजिएगा डेमियन डट्टन ये अवार्ड है। 1983 में इनको मिला था कुष्ठ रोग के क्षेत्र में काम करने के लिए। और पद्म विभूषण इन्हें प्राप्त हुआ 1986 में और अंततः गांधी पुरस्कार गांधी शांति पुरस्कार इन्हें दिया गया 99 में। विश्व की अनेक संस्थाएं इन्हें पुरस्कृत कर चुकी हैं। इसके बाद है सुंदरलाल बहुगुणा। ये भी गांधीवादी पर्यावरण विद है। इनकी 3:53:34 पत्नी है विमला बहुगुणा और मूल विचार जो चिपको मूवमेंट का है वो इनकी वाइफ का था। इनकी पत्नी का था। लेकिन उसे मूर्त रूप देने का काम साकार रूप देने का काम यह सुंदरलाल बहुगुणा ने किया था। 1980 से लेकर 2004 इस बीच में टिहरी बांध के निर्माण के विरोध में जो आंदोलन चल रहा था उसको यह लीड कर रहे थे और टिहरी बांध का जो बनने का प्रभाव था उसके कारण जो पड़ने वाला प्रभाव था उसके संबंध में लोगों को इन्होंने जागरूक किया। सामाजिक रूप से ये बहुत ज्यादा सक्रिय थे। महिलाओं और गरीबों को उनके अधिकार दिलाने का प्रयास हमेशा करते रहे। दलितों को मंदिर में प्रवेश दिलाने की कोशिश इन्होंने की थी। इन्हें वृक्ष मित्र कहा जाता है चिपको मूवमेंट से जुड़े होने की वजह से और पर्यावरण और सामाजिक क्षेत्रों में कई सारे काम इन्होंने किए। कई सारी संस्थाओं ने इन्हें पुरस्कार दिया। भारत में इन्हें पद्मश्री मिल चुका है और पद्म विभूषण मिल चुका है। इसके बाद अब कुछ बायोम देख लेते हैं। वहां पर व्यक्ति और उससे पहले हमने पुरस्कारों को देखा। अब यहां बायोम है, अवस्थिति है, जलवायु है, मृदा है, पादप और जंतु है। मतलब बायोम कितने प्रकार के होते हैं? नाम 3:54:35 दिया है। कहां पर कौन सा बायोम मिलेगा आपको? किस अक्षांश में, किस देशांतर में जलवायु वहां की कैसी होगी? वहां की मिट्टी कैसी होगी? वहां कौन-कौन से पौधे और कौन-कौन से जानवर पाए जाएंगे? यह आपको पता होना चाहिए। तो वही चीज यहां टैबुलर फॉर्म में है। इसे आप देख रहे हैं। सबसे पहले है उष्णकटिबंधीय बायोम। तो यह जो उष्णकटिबंधीय बायोम है, ये आपको विषुवत रेखा के समीप मिलेगा। यानी इक्वेटर जो बीच का हिस्सा है। माफ़ कीजिएगा ये पृथ्वी जो है ये अच्छी नहीं बनी है। चलिए एक कल्पना से आप बना लीजिए। मतलब ये बीच का जो बीच की जो काल्पनिक लाइन हम लोग खींचते हैं ये इक्वेटर होता है। बीचोंबीच से पृथ्वी को ऐसे आधे-आधे दो कटोरों में बांट देती है। हेमिस्फयर में बांट देती है। तो इधर वाला नॉर्दन नॉर्दन हेमिस्फयर हो जाता है। इधर वाला साउथर्न हेमिस्फयर हो जाता है। इक्वेटर पर जिन देशों की अवस्थिति या जिन जमीन के हिस्सों की मतलब भूभागों की स्थिति पाई जाती है। वहां पर जो जंगल उगते हैं वो उष्णकटिबंधीय प्रकार के होते हैं। इन्हें पानी अच्छा खासा मिल जाता है। बारिश लगभग रोज होती है। तापमान हमेशा पूरे साल भर ऊंचा बना रहता है। है ना? और सूर्य का प्रकाश इन्हें प्रचुर मात्रा में 3:55:36 मैक्सिमम प्राप्त होता है। तो यही चीज यहां दी हुई है। आप देख रहे हैं विषुवत रेखा के पास वाले इलाके इसमें कवर होते हैं। और ऐसा जो बायोम होता है इसमें पूरे साल भर तापमान ऊंचा होता है। 200 सेंटीमीटर से हमेशा ज्यादा ही बारिश होती है। और आप देखते हैं अपने यहां जो मैदानी इलाका है जो चार महीने बरसात के जैसे तैसे होते हैं उसमें भी ठीक से बारिश नहीं होती है। कभी-कभी मूसलाधार नहीं तो सूखा ही पड़ा रहता है। है ना? तो इन चार महीनों में आप देखते हैं कि आपके आसपास चाहे आप कितने भी अर्बनाइज एरिया में रह रहे हो हरियाली की मात्रा बढ़ जाती है। हरीभरी जो वनस्पतियां हैं वो आपको ज्यादा मात्रा में दिखने लगती है। सिर्फ चार महीने में भी छिटपुट वर्षा की वजह से ऐसा होता है। तो अब आप कल्पना करिए कि और गांव गिरावं या फिर खुले मैदान या ऐसे आइसोलेटेड एरिया में अगर आप रह रहे हैं तो आप बरसात को बहुत बढ़िया से एक्सपीरियंस करेंगे। आपको घास ना जाने कितनी बार अपने एरिया की साफ करवानी पड़ती है। अभी मैंने अपने फील्ड की साफ करवाई है। यह घासे जो है घुटने तक पहुंच जाती है। कटवाइए फिर जम जाती है। अगर कच्ची जमीन आपके पास है और बरसात का मौसम है। मतलब वनस्पतियां बहुत तेज-तेज़ बढ़ती हैं। नीम के पत्ती के पत्ते आप 3:56:38 तोड़िए सुबह के समय खाने के लिए और उसके बाद फिर अगले दिन जब आइए तो वहां नए-नए पत्ते फिर तैयार रहते हैं। है ना? मतलब रात में ही वो अंकुर जो है वो बड़े हो गए। तो बहुत तेज ग्रोथ होती है बरसात के मौसम में। अब यही बरसात का मौसम अगर पूरे साल भर बना रहे तब तो साल भर बना रहेगा और वैसे ही तापमान उच्च रहेगा तो ये वनस्पतियों के विकास के लिए एकदम आइडियल कंडीशन होती है। परिणाम यह होता है कि पूरे दैत्याकार ऐसे घने और ऊंचे वृक्ष पैदा होते हैं जो कि सूर्य की रोशनी को भी जमीन छूने नहीं देते हैं। उनकी कैनोपी इतनी सघन और आपस में गुथी हुई होती है और कहा जाता है कि ये सदाबहार है। यानी इनका पतझड़ कभी नहीं आता है। ऐसा नहीं है। पतझड़ किसी पेड़ का ना आए। ये वनस्पति के दृष्टिकोण से वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सही नहीं होता है। पतझड़ होता है लेकिन एक पेड़ का पतझड़ हुआ। उसके बगल वाला जो पड़ोसी है वो हराभरा हो गया है। उसने पहले ही अपने पत्ते झाड़ दिए थे और अब नए पत्ते आ गए। तो पता ही नहीं चलता है कि कौन सा पेड़ ठूठा है और किस में पत्तियां लगी। है ना? मतलब मालूम नहीं होता है। एक का पतझड़ हुआ तो 10 ठे उसके अगल-बगल जो है वो तैयार खड़े हैं। पत्तियां उनके पास ढेर सारी 3:57:40 हैं। तो इस वजह से हमेशा हरियाली बनी रहती है। यहां की जो मिट्टी है पहले एक जमाना था कि बहुत उपजाऊ थी। लेकिन अब जो हरेभरे यहां ऊंचे ऊंचे वृक्ष जमे हुए हैं उष्णकटिबंधीय सदाबहार वनों में या बायोम में तो यह वृक्ष उन मिटियों को पूरी तरह से निचोड़ चुके हैं और ऊपर से जो बारिश का पानी वहां लगातार पहुंचता रहता है उसकी वजह से मिट्टी की ऊपरी परत साफ हो गई। तो यहां लैटराइट प्रकार की मिट्टी पाई जाती है। पोषक तत्व और उर्वरता दोनों ही कम है। ऐसा नहीं था कि शुरुआत में ऐसा था। अगर शुरुआत में इसी प्रकार की स्थिति रही होती तो पौधे इतने सघन नहीं पैदा हुए होते। बारिश चाहे जितनी हो। है ना? लेकिन ये वजह है लंबे समय से वहां पर दोहन हो रहा है मिट्टी का और दोहन पौधे ही कर रहे हैं और कोई दूसरा नहीं कर रहा है। अब अगर जितने भी उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन है अमेजन के जंगल है या जो भी इस तरह के जंगल हैं उनको अगर काट देना रहे जड़ से और वहां नए सिरे से जंगल उगाने रहे तो तमाम तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा और जो वनस्पतियां हैं वो भी वैसी नहीं पैदा होंगी। हो सकता है कोई घास का अच्छा खासा मैदान तैयार हो जाए लेकिन वैसे जंगल दोबारा दोबारा उगा पाना कम से कम अभी तो 3:58:42 संभव नहीं है। तो यहां की जो जैव विविधता है ये सर्वाधिक होती है। आर्किड फर्न, पादप, सरिस्रप, उभयचर जंतु, बंदर और न जाने कितने तरह के छोटे स्तनधारी जंतु मतलब जीव-जंतु, कीड़े-मकोड़ों और पक्षियों की अनगिनत प्रजातियां पाई जाती हैं। तो जितनी वनस्पतियों की प्रजातियां पाई जाती है उतने ही जंतुओं की प्रजातियां पाई जाती हैं। इसके बाद अब मानसूनी वन जो होते हैं उस उनके बायोम को देख लेते हैं। तो मानसूनी वन का वन का जो बायोम होता है ये मध्य अक्षांशों में पाया जाता है। मध्य अक्षांश का मतलब कि इक्वेटर के पास भी नहीं और ध्रुवों के पास भी नहीं बीच वाले। तो ऐसी स्थिति जो होती है मतलब ऐसी अक्षांशीय स्थिति जो होती है उसमें आप देखेंगे कि गर्मी और सर्दी दोनों ऋतुएं स्पष्ट रूप से आती हैं और जो औसत वार्षिक वर्षा है वो उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन या जो उष्णकटिबंधीय बायोम है उसके जैसी नहीं होती है। ट्रॉपिकल बायोम जैसी स्थिति यहां पर नहीं है। ये मानसूनी बायो बायोम है। तो मानसूनी बायोम में 75 से 125 सेंटीमीटर की औसत वार्षिक वर्षा होती है। वो भी बरसात के मौसम में हमेशा नहीं। तो यहां की 3:59:43 मिट्टी वैसी नहीं है। मतलब धुली हुई नहीं है। उसके ऊपर एक उपजाऊ परत बनी रहती है। तो पोषक तत्वों से समृद्ध मिट्टी है। यहां जो जंगल पाए जाते हैं वो कड़ी लकड़ी वाले होते हैं। जैसे कि ओक का पेड़, नीम का पेड़, शीशम का पेड़। हालांकि नीम का पेड़ तो बहुत तरह के बायोम में आपको दिख सकता है। ये मल्टीपर्पज होता है तो उसी के साथ-साथ ये हर जगह पाया भी जाता है। हो सकता है कि जहां पाया जाए वहां की दशाओं के हिसाब से इसकी पत्तियों और इसके रंग रूप में थोड़ा बदलाव देखने के लिए मिल जाए। लेकिन ये लगभग हर तरह की जलवायु में पैदा हो सकता है। एक्सट्रीम जो एकदम कोल्ड डेजर्ट वाला एरिया है उसको छोड़कर रेगिस्तान में भी ये बड़े आराम से पनप लेता है। बस यही बात है कि पत्ती झड़ जाती है। ठूठा एकदम खड़ा रहता है वैसे ही। ठीक है? तो भेड़िया, भालू, उभयचर जंतु और सर्प और पक्षी तमाम तरह के कीड़े मकोड़े ये सब पाए जाते हैं। मानसूनी वन बायोम। इसके बाद जो मरुस्थलीय बायोम होता है ये मध्य अक्षांशों में आमतौर पर मिलता है। लेकिन हर मध्य अक्षांश के क्षेत्र में नहीं जो महाद्वीपों के पश्चिमी किनारे हैं वहां पर पाया जाता है। तो मरुस्थल जहां-जहां पाए 4:00:44 जाते हैं मतलब गर्म मरुस्थल जहां-जहां पाए जाते हैं उनकी बात हो रही है। अत्याधिक गर्म दिन होते हैं और रातें उतनी ही ठंडी होती है। हालांकि रेगिस्तान हमेशा गर्म हो ये आवश्यक नहीं है। ठंडे रेगिस्तान भी पाए जाते हैं। यहां जो गर्म रेगिस्तान है उसकी बात हो रही है। खनिज तत्वों से मिट्टी समृद्ध होती है। लेकिन अपघटक नहीं पाए जाते या बहुत कम पाए जाते हैं। तो रात बहुत ठंडी हो जाती है और दिन उतने ही गर्म होते हैं। बालू जितनी जल्दी गर्म होता है उतनी जल्दी ठंडा होता है। औसत वार्षिक वर्षा निहायत ही कम होती है। 25 से 30 सेंटीमीटर उससे भी कम। कैक्टस पाए जाते हैं। गुच्छेदार घास पाई जाती है। झाड़ियां पाई जाती है। कुछ पेड़ पाए जाते हैं। छिटपुट खेजड़ी वगैरह है ना। छिपकली, ऊंट, सर्प, लोमड़ी इस तरह के जंतु पाए जाते हैं। ऐसे जानवर होते हैं जो कि बिना पानी के भी लंबे समय तक सर्वाइव कर सके। इसके बाद अब घास भूमि जो है उसका अपना बायोम होता है। तो ग्रासलैंड का इकोसिस्टम या ग्रासलैंड का जो बायोम है उसको देख लीजिए। ये मध्य अक्षांशों और महाद्वीपों के आंतरिक हिस्सों में पाया जाता है। अंदरूनी भागों में तटवर्ती हिस्सों में नहीं। इसकी 4:01:44 पोषकता बहुत उच्च होती है। मिट्टी काफी फर्टाइल होती है और शीत और उष्ण दोनों प्रकार के यह हो सकते हैं। मतलब ठंडे इलाके में भी हो सकते हैं। गर्म इलाके में भी हो सकते हैं। वर्षा होती है 25 से 75 के बीच में। ज्यादा नहीं होती है। कम भी नहीं होती। तो शाकीय वनस्पतियां पाई जाती हैं। छोटे पौधे होते हैं। कुछ छिटपुट पेड़ होते हैं। मतलब घास का मैदान ऐसे पूरा फैला हुआ है। तो उसमें कुछ ऐसे डॉटेड एरिया के रूप में पेड़ जगह-जगह बिखरे हुए हैं। लेकिन सघन नहीं होते। तो उत्तर अमेरिका में प्रयरी डॉग्स की प्रजाति की जो गिलहरी है, अफ्रीका में लोमड़ी है, सर्प है, कीट है, हाथी, जेब्रा, शेर, जिराफ बहुत कुछ जानवर इसमें पाए जाते हैं। ये जो बड़े वाले जानवर हैं, ये इसलिए यहां पर मौजूद होते हैं क्योंकि इन्हें शिकार मिलता है। और छोटे वाले जानवर घास के लालच में आते हैं। तो एक पूरी फूड चेन यहां बनती है और एक फूड चेन नहीं अनेकों यानी पूरा एक फूड नेट तैयार हो जाता है। टैगा बायोम को देखेंगे। ये मध्य और उच्च अक्षांशों में पाए जाते हैं। ठंडी बहुत ज्यादा होती है। ठीक है? मतलब अत्यंत शीत ऋतु जो है और कुल मिलाकर बात यह है कि 4:02:46 यहां जो औसत वार्षिक वर्षा है एक साल में वो 50 सेंटीमीटर से कम होती है। यानी बारिश वैसे भी बहुत ज्यादा नहीं हो रही है। जो हो रही है वो बस इतनी ही है। अम्लीय मिट्टी होती है और खनिज तत्वों की उसमें कमी होती है। तो आप समझ सकते हैं आप कि अम्लीय मिट्टी है। एसिडिक सोइल है तो उसमें पौधे उतनी अच्छे ढंग से या एकदम ही नहीं उग पाएंगे। तो वृक्षों में स्प्रूस उग सकता है, फल उग सकता है, पाइन और बर्थ जैसे जो वृक्ष हैं वो पैदा होते हैं। सदाबहार वृक्ष यहां आमतौर पर रेयर ही दिखाई देते हैं। तो इसमें भालू, रोडेंट्स और तमाम तरह के जो अन्य छोटे-छोटे जीव हैं वो पाए जाते हैं। मिंक, रेंडियर और भेड़िए भी पाए जाते हैं। ठीक है? भेड़िया भी पाया जाता है। टुंड्रा बायोम जो है यहां सर्दी बहुत कड़क पड़ती है। एकदम कठोर लंबी होती है। ना सिर्फ तगड़ी होती है बल्कि लंबी होती है। और गर्मी का मौसम बहुत ही छोटा सा होता है। तो 60° से लेकर 90° अक्षांश यानी वही जो ध्रुवीय वृत्त है पृथ्वी का जो पूरा स्ट्रक्चर है इसमें 1 सेकंड। हां। ये जो ऊपर का हिस्सा है नॉर्थ पोल और नीचे का हिस्सा साउथ पोल। ये 4:03:49 जो हिस्सा है इसको पोलर सर्किल के तौर पे आप देखते हैं। तो ये आपका आर्कटिक सर्किल हो गया। ये नीचे अंटार्कटिक सर्किल हो गया। बीच में आपका इक्वेटर बनाना नहीं पड़ा। ये लाइन पहले से थी और यहां पे आपका ट्रॉपिक ऑफ कैंसर। यहां ट्रॉपिक ऑफ़ कैप्रीिकॉर्न। तो ये वाला जो आर्कटिक सर्किल है इसके अंदर आने वाला जो हिस्सा है। ठीक है? 60 से लेकर 90° अक्षांश। 60 से लेकर 90° अक्षांश यहां तक। तो यह वाली जो कंडीशन होती है, यह वाली जो पोजीशन होती है, यहां पर बहुत ज्यादा कड़ी ठंडी पाई जाती है। ध्रुव के पास वाला क्षेत्र है, सूर्य का प्रकाश ऐसे तिरछा इनको प्राप्त होता है। सीधा मिलता ही नहीं। तो साल के आधे समय अंधेरा और आधे समय उजाला। निम्न पोषण स्तर होता है मिट्टी का और जो भी मिट्टी है वो एकदम ऊंची मोटी बर्फ की तह के नीचे दबी हुई होती है। तो कुछ छिटपुट घास यहां उग जाती है। वो भी गर्मी के मौसम में। बांस, लाइगेन और तमाम तरह के छोटे-मोटे पौधे पाए जाते हैं। कैरिबू, आर्कटिक, लोमड़ी, उल्लू, रोडेंट्स और तमाम तरह के जो ध्रुवीय जीव हैं वो यहां पर मौजूद होते हैं। टुंड्रा बायोम को आपने देखा। इसके बाद अब आगे चलते हैं। यहां देखें आप आद्रभूमि और रामसर कन्वेंशन। 4:04:51 तो आद्रभूमि दलदल कीचड़ युक्त पीठ युक्त भूमि होती है। ऐसा पानी का क्षेत्र होता है जो कि प्राकृतिक अथवा कृत्रिम हो सकता है या स्थाई भी हो सकता है और अस्थाई भी हो सकता है। कहीं एक थोड़े समय के लिए पानी इकट्ठा होना शुरू हुआ और वहां पर दलदल जैसी स्थितियां बन गई। भाई किसी भी सूखी पड़ी खाली पड़ी जमीन में लगातार अगर पानी जाकर स्टोर होगा, रुकेगा तो वह मिट्टी धीरे-धीरे मुलायम होती जाएगी और अंत में एकदम धंसने वाली हो जाएगी। अंदर उसके नमी घुस जाएगी। दलदल बन जाएगा। ठीक है? तो दलदल युक्त जमीन वो स्थाई भी हो सकती है, अस्थाई भी हो सकती है। पता लगा किसी जमीन में ऐसे ही नाली का पानी बह रहा है। तो कुछ समय के लिए वो छोटी-मोटी गढ़ बन गई या फिर एक दलदल बन गया। फिर वहां पर उसको मिट्टी पटवाकर किसी ने अपना फ्लैट खड़ा कर लिया। अपनी बिल्डिंग बनवा ली। तो वह दलदल खत्म हो गया। तो मतलब आद्रभूमियां स्थिर भी हो सकती है, अस्थिर भी हो सकती हैं। स्थिर में आप कोई तालाब या कोई झील देख सकते हैं जो कि दलदल युक्त है। बहता हुआ पानी भी हो सकता है, रुका पानी भी हो सकता है। शर्त यही है कि दलदल होनी चाहिए। और हां यह पानी मीठा भी हो सकता है, खारा 4:05:52 भी हो सकता है। तो जैसे समुद्र के किनारे वाले जो दलदली क्षेत्र हैं जैसे कि ए्चुरी है, डेल्टा है तो इसमें 6 मीटर तक की गहराई वाला जो उथला समुद्री क्षेत्र है वो भी कवर हो जाता है। कुल मिलाकर आप जो पूरी दुनिया में अंतरराष्ट्रीय महत्व की आद्रभूमियां है उनको रामसर कन्वेंशन के अंतर्गत रामसर साइट के रूप में मान्यता मिलती है। तो रामसर कन्वेंशन है क्या? पहली चीज तो यह समझे कि आद्रभूमियों की इतनी चर्चा ही क्यों हो रही है? यह जो आद्रभूमियां है यह असल में पृथ्वी के लिए वृक्क का काम करती है। जैसे उष्णकटिबंधीय वर्षावन पृथ्वी के फेफड़े कहे जाते हैं वैसे ही ये पृथ्वी के वृक्क है यानी पृथ्वी की किडनियां हैं। जैसे किडनी हमारे खून को छानकर साफ करती है ना और शरीर में विषैले पदार्थों को इकट्ठा नहीं होने देती। वैसे ही यह पानी का शोधन करती हैं। आद्रभूमियां जो हैं ये पानी के अंदर से हानिकारक तत्वों को रोक लेती हैं और भूमि जल को रिचार्ज करती हैं। ग्राउंड वाटर इससे रिफिल रिचार्ज होता है और उतना ही नहीं ये बहुत सारी जीव-जंतुओं और वनस्पति प्रजातियों का घर होती है। आपने देखा है अपने आसपास कोई ऐसी जल में डूबी हुई जमीन 4:06:56 गढ़ही जैसी या झील उसमें क्या होता है? बहुत तरह के पानी वाले पक्षी बदखे रहते हैं। अपने आसपास आप ऐसे भी देखेंगे कि जैसे अभी जो डेवलप हो रही कॉलोनियां होती हैं। वहां पर कुछ फ्लैट जो है वो बन चुके हैं खूब भव्य और कुछ फ्लैट जो है अभी खाली है। उनको किसी ने बनवाया नहीं है। तो होता ये है कि जो बन चुके हैं वो मकान अब ऊंचे हो गए हैं। वहां मिट्टी डलवाकर पहले ऊंचाई बढ़ाई गई। फिर कुर्सी खूब ऊंची ली गई। फिर ऊंची बिल्डिंग खड़ी की गई। तो उसकी तुलना में जो बगल वाला फ्लैट है जो कि अभी बना नहीं है वो नीचा हो जाता है और उस ऊंची वाली बिल्डिंग उस ऊंचे मकान का जो नया नया बना हुआ है उसका गंदा पानी उसी फ्लैट में होकर बहता है। अब वहां पर पानी धीरे-धीरे करके स्टोर हुआ। वहां एक छोटा-मोटा दलदल एक गढ़ही जैसी तैयार हो गई। उस छोटे से फ्लैट में जो बगल में था। अब उसमें आकर बतखे रहने लगती है। लाल-लाल चोंच वाली बतख और लंबे-लंबे पैर वाले बगुले है ना और बहुत तरह के मेंढक तो वो भी एक छोटी मोटी आदर्द्रभूमि है। कुछ कछुए भी अगर बड़े साइज का है तो कहने का मतलब कि ये आद्रभूमियां कहीं भी हो सकती हैं। किसी भी रूप में हो सकती हैं। और जहां भी होती हैं 4:07:56 ये ग्राउंड वाटर को रिचार्ज करने का काम करती हैं। वो बगल में जो आद्रभूमि तैयार हो रही है वो भी पानी में नमी को बनाकर मतलब पानी की नमी को जमीन में बनाकर रखेगी। लेकिन समस्या यह है कि दुनिया भर में यह बहुत तेज रफ्तार में नष्ट हो रही है। तब इनके संरक्षण की आवश्यकता है। 2 फरवरी 1971 को ईरान का जो कैस्पियन सागर है उसके तट पर रामसर नाम का शहर है। वहां पर ये कन्वेंशन हुआ था। एक सम्मेलन था जिसमें कि एक अंतरराष्ट्रीय संधि होती है और तमाम देश उसमें हस्ताक्षर करते हैं। यह संधि अंतिम में 21 दिसंबर 1975 से जाकर प्रभावी होती है। 71 का ये कन्वेंशन है लेकिन जो संधि का प्रभावी होने का मतलब काम करना करना शुरू करने की तारीख है वो 1975 है। उद्देश्य बिल्कुल सीधा है कि जो आद्रभूमियां है उनका संरक्षण करना और हां उनका बुद्धिमत्ता पूर्ण इस्तेमाल करना। यानी उनके पारिस्थितिकीय गुण को बनाए रखना और उसका इस्तेमाल करना और उसका सतत और संतुलित प्रयोग करना। तो कुल मिलाकर इसमें जो देश शामिल होते हैं वह अपने अपने एरिया में अपने-अपने इलाके में आद्रभूमियों के संरक्षण पर बल 4:08:57 देते हैं। और इसमें जो पार्टीज शामिल है। पार्टी मतलब देशों की ही बात हो रही है। 172 है वर्तमान में। स्विट्जरलैंड का जो ग्लैंड शहर है वहां इसका मुख्यालय है, सचिवालय है और कन्वेंशन की वर्षगांठ हर साल 2 फरवरी को विश्व आद्रभूमि दिवस यानी वर्ल्ड वेटलैंड डे के तौर पर मनाई जाती है। तो ये वही तारीख है जो जिस तारीख पर रामसर कन्वेंशन को ऑर्गेनाइज किया गया था। यही चीजें इसमें है। कुछ नया नहीं है। अच्छा आप यहां कुछ जरूरी फैक्ट देख लीजिए। जैसे कि ऑस्ट्रेलिया में स्थित है कोबोर्ग प्रायद्वीप। गारिक गुनाक बारलू राष्ट्रीय उद्यान इसको कहा जाता है। गारिक गुनाक बारलू नेशनल पार्क 8 मई 1974 को पहला रामसर यही घोषित हुआ था और दुनिया में सबसे ज्यादा जो रामसर साइट है वो यूनाइटेड किंगडम यानी ब्रिटेन में है। कुल मिलाकर 176 सबसे बड़ा जो आद्रभूमि संरक्षित क्षेत्र है यानी रामसर क्षेत्र है वह बोलीविया में है और यह लगभग 14.8 से लगभग 15 मिलियन हेक्टेयर में फैला हुआ है। 15 मिलियन हेक्टेयर इसका क्षेत्रफल है। आप अंदाजा लगा सकते हैं कितना बड़ा है। तो यह 4:09:57 तो दुनियादारी हो गई। अब अपने देश को देखें। 1 फरवरी 1982 हस्ताक्षर किया हमने और भारत भारत में इसके संरक्षण और क्रियान्वयन के लिए केंद्रीय पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ही नोडल है। इसरो और पर्यावरण मंत्रालय के नवीनतम मूल्यांकन के हिसाब से जिसे कि राष्ट्रीय आद्रभूमि सूची और मूल्यांकन कहा जाता है। भारत का जो टोटल ज्योग्राफिकल एरिया है भौगोलिक क्षेत्रफल है उसका लगभग 5.12% 5.12% और वैसे अगर आप आंकड़े में देखेंगे तो 16.89 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र आदर्द्र भूमि के अंतर्गत आता है। वैसे अगर अपने देश का हम आकलन करें तो एशिया में सबसे ज्यादा आद्रभूमियां अपने पास ही हैं। भारत की पहली जो दो रामसर साइट्स है शुरुआती उसमें चिल्का है उड़ीसा की और दूसरा है केवलादेव राजस्थान का। दोनों को भारत में रामसर अभी समय यानी रामसर कन्वेंशन के तहत 1 अक्टूबर 1981 को एक साथ एक साथ अंतरराष्ट्रीय महत्व के स्थल के रूप में रामसर की सूची में शामिल 4:10:58 किया गया था। तमिलनाडु वर्तमान में 20 रामसर स्थलों के साथ शीर्ष स्थान पर है। तो जैसे-जैसे रामसर स्थलों की घोषणा होती है, ये डाटा बदलता रहता है। फिलहाल की यही स्थिति है कि तमिलनाडु टॉप पर है। 20 रामसर स्थल इसके पास एक समय था कि उत्तर प्रदेश सबसे ऊपर था। तो ये ऊपर नीचे होता रहता है। तो समय जब भी आप इस वीडियो को देख रहे हो इस डाटा को अपडेट करते रहिएगा। वर्तमान के लिए ये अपडेटेड है और उसके बाद उत्तर प्रदेश दूसरे नंबर पर आता है। पहले यूपी पहले स्थान पर था अभी दूसरे स्थान पर चला गया है। 13 अपने पास और तमिलनाडु के पास है 20। ठीक है? और उत्तर प्रदेश में खोजा जाए तो सैकड़ों मिलेंगे और हर प्रदेश की वही बात। तमिलनाडु 20 रामसर स्थलों के साथ टॉप पर है। अच्छा अब यहां पर सबसे बड़ा, सबसे छोटा, सबसे दक्षिणी, सबसे उत्तरी ऐसे करके आपको देखना है और यह पूछा भी जाता है। तो सबसे बड़ा जो रामसर स्थल है वो सुंदरवन है। पश्चिम बंगाल का 4230 के आसपास इसका वर्ग कि.मी. में दायरा है। सबसे छोटा है वबनूर वेटलैंड कॉम्प्लेक्स और ये तमिलनाडु में है। 0.1975 स्क्वायर कि.मी. इसके बाद भारत का जो सबसे 4:12:00 उत्तरी रामसर स्थल है वो वूलर है। सबसे दक्षिणी है वबनूर वेटलैंड कॉम्प्लेक्स कन्याकुमारी वाला। अच्छा वूलर वाला आप जानते ही हैं जम्मू कश्मीर में है। सबसे पूर्वी यानी ईस्टर्न मोस्ट जो है वो लोकटक है मणिपुर की। लोकटक झील वही फुंडी आइलैंड वाली। और सबसे पहला जो कृत्रिम रामसर स्थल है वो हरिके बैराज है। हरिके बैराज है। भारत का सबसे पश्चिमी रामसर स्थल ये आपका छरी ढांड है और ये पड़ता है कच्छ में। कच्छ के रण में यानी गुजरात में। और ऐसा राज्य जिसमें कि कोई रामसर नहीं है वो तेलंगाना है, नागालैंड है और मेघालय है। ऐसा संभव नहीं है कि यहां पर आद्रभूमियां नहीं होंगी। लेकिन कायदे से सर्वे नहीं हुआ है या फिर उन्हें महत्व नहीं दिया गया है। तो अब ये बड़ी वाली सूची है। इसमें सारे रामसर स्थलों के नाम राज्यवार दिए हुए हैं। कहां पर कितने हैं और कौन-कौन से? तो हम एक क्रम से चलेंगे। जिसके पास सबसे ज्यादा है उनको सबसे पहले देखेंगे। तो तमिलनाडु पहले नंबर पर है। 20 रामसर स्थलों के साथ कौन-कौन से हैं? आइए देखें। चित्रांगुदी है, मन्नार की खाड़ी है, करंजीकुलम है, करी किली है, कुथनकुलम है, 4:13:01 पल्ली करनई है। मार्श रिजर्व फॉरेस्ट इसको कहा जाता है। पिचवरम मैंग्रोव है। पॉइंट कैलमेरे है। सुचिंद्रम थेरूर वेटलैंड परिसर है। उदय मार्तंडपुरम पक्षी अभयारण्य है। वुहूर पक्षी अभयारण है। वेदांगथंगल पक्षी अभयारण्य है। बेलोड पक्षी अभयारण्य है। बबनूर है। करावेटी है। लांगवुड शोला रिजर्व फॉरेस्ट है। काजूवेली है। नंजरायन है। ठीक है? थेरथंगल है। यह सब पक्षी अभयारण है। बर्ड सेंचुरी है। सक्काई है या शराक कोटई इसको कहा जाता है। अब अपने उत्तर प्रदेश में आ जाइए। पटना पक्षी अभयारण्य है जो कि असल में पटना में नहीं बल्कि एटा में है। बखीरा है। हैदरपुर आद्रभूमि है। नवाबगंज पक्षी अभयारण्य है। पार्वती अरगा है। समन पक्षी अभयारण्य है। समसपुर है, सांडी है, सरसई नवार झील है, सुरसरोवर है जिसको कीथम भी कहते हैं। अपरगंगा रिवर वाला हिस्सा है। ठीक है? उसके अलावा शेखा झील है। जयप्रकाश नारायण पक्षी अभयारण्य यानी सुरहात ताल है बलिया का। कुल मिलाकर ये 13 हैं। बिहार में भी छह हैं। कांवर ले है, नांगी है, नकटी है, गोकुल है और गोगाबील है। साथ में उदयपुर। 4:14:01 उड़ीसा में भी छह हैं। अंसुपा, भदरकणिका, चिल्का, हीराकुंड, सतकोसिया और तंपारा। इसके बाद है पंजाब। पंजाब में भी छह हैं। बिहार में छह, उड़ीसा में छह, पंजाब में छह। तो पंजाब में आप देखें व्यास संरक्षण रिजर्व है। व्यास कंजर्वेशन रिजर्व हरिकेय है कांजली है या ये कृत्रिम है। ध्यान दीजिएगा। इसके अलावा केशवपुर मियानी है कम्युनिटी रिजर्व नांगल है रोपण है। गुजरात में पांच हो गया खिजड़िया नलसरोवर थोल लेखक बध बधावन या बधवाना कहा जाता है और छरधांड है जो कि कच्छ के रंग में है। इसके बाद जम्मू कश्मीर में पांच है हुकेरा हाईगम शैलबुध सुरिंसर मानसर और वूलर लेक। नेक्स्ट राजस्थान में पांच है केवलादेव, सांभर, खींचन यह फलौदी वाला है। मेनार पक्षी अभयारण्य उदयपुर का और सिलीसरा यह अलवर का है। मध्य प्रदेश में भी पांच आद्रभूमियां मतलब रामसर स्थल आपको दिखाई दे रहे हैं। भोज है, सांख्य सागर है, सिरपुर है, यशवंत सागर है, तवा जलाशय है। कर्नाटक में चार हैं। रंगनाथ हिट, 4:15:02 मगाडीगरे, अंक समुद्रम और अग्नाशिनी। अग्नाशिनी नदी का नाम है। उसका जो मुहाना है वो असल में एक ऐश्वरी है। इसके बाद हिमाचल प्रदेश का जो तीन रामसर है उसको देख लेते हैं। एक तो है चंद्रताल, पोंग डैम है और रेणुका है। केरल में भी तीन है अष्टमुदी, षष्क कोटा और वबानद कोल आद्रभूमि। महाराष्ट्र में भी तीन लोनार झील, नंदू मधमेश्वर और ठाणेकरी। इसके बाद हरियाणा को देखते हैं। भिंडावास है और सुल्तानपुर है। सुल्तानपुर राष्ट्रीय उद्यान। लद्दाख में भी दो हैं। एक तो सकर है। दूसरा सरीरी है। ये दोनों झील हैं। इसके बाद पश्चिम बंगाल में आ जाइए। पूर्वी कोलकाता आद्रभूमि है और सुंदरवन जो कि सबसे बड़ा रामसर है। सिर्फ दो ही है लेकिन बड़े आकार के। आंध्र प्रदेश में कोलेरू, असम में भी यहां देखिए सब जितने हैं ना सब में एक-एक है। अब आंध्र में भी एक है। असम में भी गोवा में भी सब में एक। तो आंध्र में कोलेरू, असम में देपोर भील, गोवा में नंदा झील, मणिपुर में लोकटक, मिजोरम में पाला। ठीक है? त्रिपुरा में रुद्रसागर, उत्तराखंड में आसन कंजर्वेशन, सिक्किम में 4:16:03 खेचरोपरी, झारखंड में उधवा, छत्तीसगढ़ में कोपरा जलाशय। ठीक वैसे ही आप देखेंगे अरुणांचल में गुलाब झील है जो कि अरुणाचल का पहला रामसर स्थल है। 5 जून 2026 तक की बात की जा रही है। अब अपने यूपी को देखेंगे। अब हमने क्या किया? पहले पूरी दुनिया को देखा। उसके बाद पूरे देश को देखा। अब प्रदेश को देखेंगे क्योंकि परीक्षा तो हमें प्रदेश की ही देनी है। हां, अगर आप यूपीएससी की तैयारी कर रहे हैं और सहयोग इस वीडियो को देख रहे हैं तो आप इस हिस्से को छोड़ सकते हैं। यूपी वाला छोड़ सकते हैं क्योंकि इस चीज को आपने उसी में देख लिया है। इसे स्पेशली देखने की आवश्यकता नहीं। तो रामसर स्थल का नाम देख रहे हैं। यहां पर अपरगंगा रिवर ब्रज घाट से नरोरा तक यह पहला इसका घोष इसकी घोषणा हुई थी 2005 में। हापुड़, अमरोहा, बुलंदशहर और संभल को यह कवर करता है। यह उत्तर प्रदेश का सबसे पहला और सबसे बड़ा रामसर स्थल है और यह डॉल्फिन के लिए जाना जाता है। दूसरा है आपका नवाबगंज 2019 उन्नाव में है। इसका नया नाम है शहीद चंद्रशेखर आजाद राष्ट्रीय उद्यान। क्षमा कीजिएगा। पक्षी उद्यान या 4:17:04 पक्षी अभयारण्य आप कह सकते हैं अभयारण्य। कहेंगे तो आपको समझने में आसानी होगी। बर्ड सेंचुरी कनेक्ट करना आसान हो जाएगा। इसके बाद आप पार्वती अरगा को देख रहे हैं। गोंडा का है और यह सरयू नदी के द्वारा निर्मित जो धनुषकार झील है पार्वती और अरगा उनके सौजन्य से बना हुआ है। ठीक है? दो झील हैं पार्वती और अरगा दोनों आपस में मिल गई धनुष के आकार में। इसके बाद 2019 का ये गोंडा वाला देख लिया। समन को देख लीजिए भाई। समन पक्षी अभयारण्य मैनपुरी का है। यह एक मौसमी धनुषाकार यानी आसबो लेखक है। धनुषकार कहना बहुत सही नहीं है। ऑक्सबो यानी गोखुर झील जैसी। गोखुर झील का मतलब समझ रहे हैं? नदियां अपने रास्ते में जो पर्वतीय नदियां होती हैं मियंडर्स बनाती हैं। ऐसे विसर्पण करती हैं। सर्प के आकार में ऐसे मुड़ते हुए आड़ा तिरछा आड़ा तिरछा चलती हैं। बहुत से स्थानों पर क्या होता है कि यही जो नदियों का मोड़ है, ऐसे ऐसे ऐसे लहरा लहरा कर चल रही हैं। कहीं-कहीं ये ज्यादा लहराने लगती हैं। जब ज्यादा लहराने लगती है तो आपस में ऐसे जाकर गुथ जाती है। फिर यहां से फिर अपना रास्ता पकड़ के आगे बढ़ जाती हैं। तो ये 4:18:04 बीच में जो लहराकर इन्होंने एक बल खा लिया था यानी मोड़ ले लिया था। तो इनकी शाखाएं दोनों जो धाराएं हैं वो आपस में उलझी और जब प्रवाह धीमा हुआ तो यहां बालू की एक दीवार खड़ी हो गई। अब यहां जो पानी आया था वो लौट के वापस नहीं जा सका। पानी यहीं पर रुक गया और ये छोटा-मोटा मोड़ में ही रहता है। बहुत बड़े साइज का रहता है और इसमें पानी का जमाव हो गया। ये मीठा पानी ही है। अब नदी इसके बगल से होकर गुजरती है और बीच में नदी के और इस गड्ढे के बीच में एक बालू की दीवार है। मोटी दीवार। तो ये बन जाती है झील। और इसी को कहा जाता है गोखुर झील। क्योंकि आमतौर पे अगर देखा जाए तो गाय के खुर के जैसी होती है। गाय के खुर के आकार की होती है। तो ये गोखुर झील है। यहां चर्चा की गई उसकी। इसके बाद आप देख रहे हैं और प्रवासी पक्षी ऐसे स्थानों पर आते ही हैं। समसपुर पक्षी अभयारण्य है रायबरेली का। पक्षियों की 250 से भी ज्यादा प्रजातियां यहां पर पाई जाती हैं। छह झीलों का पूरा एक बड़ा समूह है। 2019 में इसको रामसर में शामिल किया गया। सांडी जिसको कि दहर झील भी कहा जाता है। यह सर्दियों में प्रवासी पक्षियों के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान है। हरदोई जगह 2019 सरसई 4:19:06 नवार इटावा का है। स्थाई दलदली क्षेत्र है। मूल रूप से सारस क्रेन जो उत्तर प्रदेश का राजकीय पक्षी है उसके बड़े-बड़े झुंड यहां पर पाए जाते हैं और दुनिया भर में फेमस। सुरसरोवर आगरा का है। इसको कीथम झील भी कहा जाता है। कृत्रिम मानव निर्मित झील है। लेकिन यह भी पक्षियों का आवास। हैदरपुर आदर्द्रभूमि हस्तिनापुर वन्य जीव अभयारण्य की सीमाओं के भीतर है और यह भी आर्टिफिशियल है। बिजनौर और मुजफ्फरपुर में इसका विस्तार है। 2021 में इसको मान्यता मिली थी। इसके बाद है बखीरा। संत कबीर नगर यानी मगहर में है और ये पूर्वी उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी प्राकृतिक बाढ़ वाले मैदान की आद्रभूमि। 2022 में इसको मान्यता मिली पटना पक्षी अभयारण आपका एटा में है ही है। क्षेत्रफल के आकार क्षेत्रफल और आकार के लिहाज से अगर देखा जाए तो ये सबसे छोटा है। यूपी का सबसे छोटा पक्षी अभयारण्य है। एटा में मौजूद है। 2026 में इसको शामिल किया गया। शेखा झील अलीगढ़ की ताजे पानी की झील है और सबसे छोटा रामसर स्थल है। ध्यान दीजिएगा यहां पे सबसे छोटा रामसर नहीं कहा गया था। पटना पक्षी अभयारण्य जो है यह सबसे छोटे पक्षी 4:20:06 अभयारण्यों में से एक है। लेकिन यहां पर जो बात हो रही है शेखा की तो यह ताजे पानी की झील है और हां यह उत्तर प्रदेश का सबसे छोटा रामसर स्थल है। बलिया का सुरह ताल यानी जयप्रकाश नारायण पक्षी अभयारण्य ये भी एक ऑक्सबो लेखक है और बहुत बड़े साइज की है। 2026 में शामिल हुई। यह बना हुआ है नक्शा यूपी का और इसमें आप उन सभी पक्षी अभयारण्यों और रामसर को देख रहे हैं। जैसे कि देखिए यहां पर हैदरपुर वेटलैंड है बिजनौर का। एक सेकंड हां हैदरपुर वेटलैंड है बिजनौर का। सांडी आप देख रहे हैं हरदोई का ब्रिजघाट नरौरा वाला जो स्ट्रेच है ये बुलंदशहर का हो गया पटना पक्षी अभयारण्य एटा का हो गया सुरसरोवर आगरा का समन मैनपुरी और सरसई नवार इटावा फिर इसके बाद नीचे रायबरेली का समसपुर है ही है गोंडा का पार्वती अरगा हो गया वैसे ही सुरह ताल बलिया का हो गया और भदोही के माफ़ कीजिएगा यहां पर संत कबीर नगर होना चाहिए संत रविदास नगर नहीं तो संत कबीर नगर का बखीरा हो गया ये देखने के बाद अब आगे चलते हैं यहां देखें आप यूनेस्को की जो वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स हैं भारत में उनको देखने की आवश्यकता है। तो विश्व धरोहर स्थल क्या 4:21:09 होते हैं? यह ऐसे स्थान होते हैं जिसे कि संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन यानी यूनेस्को के द्वारा प्रशासित और कानूनी संरक्षण प्राप्त किया जाता है। मतलब यूनेस्को इसको कानूनी संरक्षण देता है। तो दुनिया भर में सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत का क्षेत्र इन्हें माना जाता है और मानवता के लिए इनका उत्कृष्ट मूल्य है। 2026 तक दुनिया भर में 1273 ऐसे स्थान है जिन्हें कि वैश्विक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और प्राकृतिक महत्व के तौर पर देखा जाता है। 61 विश्व धरोहर सूत अह स्थान यहां देखें। 61 यूनेस्को विश्व धरोहर स्थान जो हैं वह इटली के पास है और वह दुनिया में इस मामले में पहले स्थान पर है। दूसरे स्थान पर है चीन। 60 इसके पास वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स। तीसरे स्थान पर है जर्मनी। और भारत की स्थिति क्या है? तो हमारे पास 45 है टोटल। 37 इसमें से कल्चरल हैं। सात नेचुरल है और एक जो है वो मिक्स है। ठीक है? अब यहां पर भारत के जो 45 यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है उनके साथ यह छठवें स्थान पर है और इसके इतिहास, संस्कृति और आध्यात्मिकता के समृद्ध 4:22:10 स्वरूप को हम देख पाते हैं।कि अपने देश में है तो हम पहले से ही उसके इतिहास और उसके महत्व से परिचित हैं। अब ये एक यूनेस्को का अटैक लग गया तो उसे और महत्व प्राप्त हो गया। हालांकि हमारी जो सांस्कृतिक विरासतें हैं वो किसी परिचय या फिर किसी लेबल या तमंगे की मोहताज नहीं है। उनकी पहचान और उनकी कदर हमें होनी चाहिए। अपने से होनी चाहिए। अब यहां देखिए आप सबसे पहली बार जो वर्ल्ड हेरिटेज साइट के तौर पर शामिल होने वाली इमारत थी वो थी आगरा का किला 1983 में शामिल हुआ। ठीक है? तो यहां पर जो 45 यूनेस्को साइट्स हैं उनका दिया हुआ है। नाम दिया है, वर्ष दिया है, कब शामिल हुए, राज्य दिया है और उसके बारे में थोड़ा सा डाटा जो कि आपको जानना चाहिए। तो आगरा का किला 1983 उत्तर प्रदेश ऐतिहासिक किला है और मुगल सम्राटों का मुख्य निवास स्थान यह 1638 तक रहा। जब बाद में राजधानी को आगरा से दिल्ली स्थानांतरित किया गया तो इसके बाद फिर चीजें बदल गई। तो आगरा किला जो है यह यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट में पहले नंबर पर मतलब पहली बार शामिल हुआ था। इसके बाद अजंता की गुफाएं हैं। तो अजंता की 4:23:11 गुफाओं को भी 83 में ही महाराष्ट्र की है और इन्हें शामिल किया गया था। ये बौद्ध प्रेरणा पर आधारित है। बौद्ध कला है। रॉक कट गुफाएं हैं। चट्टानों को तराश कर इनको बनाया गया है। सिंगरिया पेंटिंग जैसी कलाकृतियां और भित्ति चित्र से भव्य रूप से इनको चमकाया गया। मतलब ना सिर्फ इसमें आकृतियां उकेरी गई है बल्कि दीवारों पर तमाम चित्र आपको दिखाई देते हैं और वही इसकी खासियत है और चित्र भी काफी चटकमटक है। इसके बाद आप एलोरा की गुफाओं को देख रहे हैं। ये हिंदू मंदिरों और जैन, बौद्ध मठों का घर है। यहां हिंदू, जैन और बौद्ध तीनों प्रकार की शैलियां और तीनों प्रकार के जो ऐतिहासिक चित्र हैं वो आपको दिख जाएंगे। ये भी रॉक कट है। महाराष्ट्र की है 1983। ताजमहल 1983 में शामिल हुआ यूपी का। शाहजहां के आदेश पर 1631 से 48 के बीच में बना। यह मकराना मार्बल से बना हुआ है। उत्कृष्ट संगमरमर और बहुत सारे कारीगर और बहुत सारा पैसा उतनी ही मेहनत इसमें खर्च हुई। शाहजहां ने अपना खजाना ही खाली कर दिया। इसके बाद महाबलीपुरम के जो स्मारक स्मारक हैं उनको देख लेते हैं। पल्लव राजवंश के द्वारा पल्लव डायनेस्टी के द्वारा इनको बनाया गया है। छवीं शताब्दी 4:24:12 से लेकर नौवीं शताब्दी ईवी के बीच में इन शासकों ने शासन किया था और यहां के स्मारकों के समूह में चट्टानों को काटकर बनाए गए जो गुफा मंदिर हैं, अखंड मंदिर है, आधार रहित मूर्तियां हैं, संरचनात्मक मंदिर है। उसके साथ-साथ मंदिरों के खुदाई के अवशेष भी सम्मिलित है। 1984 कोणार्क का सूर्य मंदिर ये भी 84 का है। उड़ीसा ये भारत के पूर्वी तट पर है। पूरी राज्य मतलब उड़ीसा राज्य के पूरी में स्थित है और उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर से 65 कि.मी. की दूरी पर गोवा के चर्च और कान्वेंट जो है ये ओरिएंट के रोम और जो मैनरस्ट बारो कलारूप है उनका स्वरूप दिखाई देता है। एशिया में पहला मैनुअल और पहला लैटिन रीट मास जो है उसके तौर पर ये जाने जाते हैं। कुल मिलाकर ये भी यूनेस्को की हेरिटेज साइट में शामिल। फतेहपुर सीकरी उत्तर प्रदेश में है। 1986 में शामिल हुआ। 37 कि.मी. ये आगरा से दूर पड़ता है। मूल रूप से लाल बलुआ पत्थर से बना हुआ ये पूरा शहर है। और महान सूफी संत थे शेख सलीम चिश्ती। उनके सम्मान में जलालुदुद्दीन माफ़ 4:25:12 कीजिएगा। जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर के द्वारा इसको बनाया गया। और भव्यता और विशिष्टता के मामले में ये बेजोड़ है। मुगल कला का पूरा नमूना है। हम्पी के स्मारक हैं। वैभवशाली स्थल है हम्पी। और जो विजयनगर साम्राज्य था उसकी राजधानी के अवशेष यहां पर पाए जाते हैं। कर्नाटक में है। 1986 का इसे मान्यता मिली हुई है। तो यहां की जो संपत्ति है उसमें 4187.24 हेक्टेयर का पूरा ये बड़ा सा क्षेत्र कवर होता है। तुंगभद्रा का ये पूरा बेसिन एरिया है। विशिष्टताओं को साथ में जानना इसलिए आवश्यक है क्योंकि प्रश्न अब सीधे-सीधे फैक्ट के तौर पर नहीं पूछे जाते। मैक्सिमम प्रश्न ऐसे होते हैं जिनमें तर्क की आवश्यकता होती है। अंदर तक आपको गहराई तक उतर कर पढ़ने की जरूरत होती है। ठीक है कि यूपीएससी जितनी गहराई नहीं होती है लेकिन फिर भी अब प्रश्न उतने उथले नहीं रह गए। खजुराहो के मंदिर ये मध्य प्रदेश में है और ये छतरपुर जिला पड़ता है मध्य प्रदेश का झांसी से लगभग 175 कि.मी. यानी 109 मील की दूरी पर दक्षिण पूर्व में हिंदू और जैन मंदिर दोनों का समूह है। नागर शैली में ये मंदिर बने हुए हैं। प्रतीकवाद और विशेष रूप से जो कामुक 4:26:13 मूर्तियां हैं, काम वासना से भरपूर मूर्तियां हैं वो इसकी विशेषता है। ठीक है? बहुत से परिवार अपने बच्चों के साथ अपने छोटे जो उत्तराधिकारी हैं उनके साथ जाने में असहज महसूस करते हैं। मूर्तियों की मुद्राएं और जो चाल ढाल है वो कुछ ऐसी है। हालांकि हर स्थान का और हर मूर्तिकला का अपना महत्व होता है। तो उसका भी अपना महत्व है। उसका भी अपना सांस्कृतिक महत्व है। फिलहाल एलिफेंटा की गुफाओं को देखते हैं। 1987 महाराष्ट्र बौद्ध और हिंदू गुफाओं हेतु प्रसिद्ध है। अरब सागर में एक द्वीप स्थित है और मतलब यह द्वीपीय क्षेत्र है। यह कहने का मतलब है। वैसे तो पूरा मुंबई और ठाणे जो आप देखते हैं, वह सालट नाम का द्वीप ही है। लेकिन, यह जो एलीफेंटा गुफाओं का क्षेत्र है, यह असल में एक द्वीपीय इलाका है अरब सागर वाले इलाके में। और इसमें शिव मंदिर और चट्टानी गुफाएं पाई जाती है। तजावुर यहां देखें आप यह 12वें नंबर का। तजापुर, गंगईकुंड, गंगईकुंड, चोलपुरम और दारासुरम में जो महान चोल मंदिर हैं, चोल राजाओं के द्वारा बनवाए गए हैं। तीन मंदिरों का यह समूह है। तमिलनाडु में। नौवीं से लेकर 12वीं 4:27:16 शताब्दी के बीच में दक्षिण भारत पर जो चोल राजवंश के राजा शासन करते हैं, वह इनको बनवाते हैं। तजाबुर में बृहदेश्वर मंदिर जो कि सबसे बड़े आकार का है। गंगाईक चोलपुरम जो कि गंगा घाटी में विजय प्राप्त करने के उपलक्ष में गंगकोंड की उपाधि धारण की गई थी। तो वहां का मंदिर और दारासुरम का एरावतेश्वर मंदिर। ये सारे जो है इसमें शामिल हैं। ठीक है? इसके बाद पदकल के जो स्मारक है उनको भी देख लेते हैं। माल प्रभा के तट पर स्थित है यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट। 1987 में इसको वर्गीकृत किया गया था। सातवीं और आठवीं शताब्दी के दौरान चालुक्य वास्तुकला की समृद्धि का ये प्रमाण देते हैं। तो पडक्कल के ये जो मंदिर हैं ये चालुक्य वास्तु वास्तुकला के लिए जाने जाते हैं। बहुत ही जटिलता से तराशे गए हैं। ठीक है? इसके बाद सांची के बौद्ध स्मारक हैं और उस समय इस स्थल पर सबसे पुराना जो संरक्षित स्मारक था वह अशोक के स्तंभ के साथ जो एगमेड कला से प्रेरित शेरों के प्रक्षेप मतलब कहने का तात्पर्य है कि वो अशोक स्तंभ और शेरों की मूर्तियां उनसे संबंध अब यहां इसमें 4:28:17 अन्य राजवंशों के भी नाम जुड़ते हैं। है तो यह बौद्ध स्मारक यानी एक धर्म एक संप्रदाय एक पंथ से जुड़ा हुआ है। लेकिन इसमें तमाम राजवंशों के नाम आते हैं। जैसे कि संपूर्ण मौर्य साम्राज्य में उसके बाद भारत में शुंगों का जब शासन था सातवाहनों का जब शासन था कुषाणों का जब शासन था यहां तक कि गुप्तों का शासन था तो उस समय की जो संस्कृतियां थी और उनकी जो कलाएं थी उनके प्रसार के लिए मध्यस्थ के रूप में सांची की भूमिका बड़ी रही है। यानी सांची जो है वो इन सभी युगों का सभी जो राजवंश है उनके शासनकाल का साक्षी रहा है और वहां से कुछ ना कुछ इन सभी राजवंशों के विषय में प्राप्त ही हो जाता है। इसके बाद हुमायूं का मकबरा आप देख रहे हैं 1993 का है। यह प्रारंभिक मुगल कला का मुगल स्थापत्य कला का नमूना है। वास्तुकला के विकास में यह मील का पत्थर है। निसंदेह है। 1993 में इसको डिक्लेयर किया गया था यूनेस्को की साइट के तौर पर। इसमें एक बीच में रास्ता है जाने के लिए और किनारे-किनारे नहरे हैं। बगीचे में मकबरे को बीचों-बीच बनाया गया है। चारबाग शैली और बगीचा चारों ओर लगाकर बीच में मकबरा या कब्र को बनाना, ये बड़ी मतलब पहले की एक प्रचलित कला थी। तो 4:29:19 उसका नमूना यहां पर दिखता है। लेकिन ये सबसे पुराना नमूना है उस तरह का। इसके बाद कुतुब मीनार और बाकी इमारतें 102 में कुतुबुद्दीन ऐबक के द्वारा इसको बनवाना शुरू किया गया था। लेकिन इल्तुतमिश ने इसको पूरा करवाया। ठीक है? और बहुत सारे जो अभी के शोधकर्ता और लोग हैं वो ये मानते हैं कि कुतुब मीनार भी कोई हिंदू स्थापत्य रहा होगा जिसको कि ऐबक ने थोड़ा सा मॉडिफाई कर दिया। जो भी रहा हो लेकिन ये इमारत है अच्छी और ऐबक के द्वारा कहा जाता है कि इसको शुरू किया गया था और इल्तुतमिश के द्वारा अंततः इसे पूरा करवाया गया। फिर बाद में इस पर बिजली गिर गई। जब बिजली गिर गई तो इसको फिर से रिपेयर कराने की जरूरत पड़ी और फिर आप देखेंगे कि मोहम्मद बिन तुगलक के द्वारा भी इसकी मरम्मत कराई गई थी। लोग मोहम्मद बिन तुगलक का इसमें नाम नहीं लेते हैं। सीधे सीधे फिरोज शाह पर आ जाते हैं। लेकिन एमबीटी के द्वारा भी इसको रिपेयर करवाया गया था और फिरोज शाह तुगलक के द्वारा भी इसमें मरम्मत का काम करवाया गया था। इसके बाद भीमपेटका की गुफाएं हैं। मध्य प्रदेश की। यह मध्य भारतीय पठार के दक्षिणी किनारे पर विंध्य पर्वत की तलहटी में स्थित है। बड़ी-बड़ी बलुआ पत्थर की चट्टानें और उसके भीतर बनी हुई है ये 4:30:19 गुफा। इसमें तमाम तरह के भित्ति चित्र बने हुए हैं। दीवारों पर तमाम तरह की आकृतियां मतलब पेंटिंग उस समय की बनी हुई है। होता ये था कि यहां पर चरवाहों के बच्चे गाय चराते हुए और अपने मवेशी चराते हुए रुकते थे। और आड़ी तिरछी आकृतियां ये दीवारों पर खुदी हुई और बनी हुई देखकर आकर्षित होते थे। तो उसमें दो चार अपनी ओर से भी बना देते थे। लेकिन बाद में जब ध्यान से जानकारों ने इसे देखा खासतौर पर वाकड़कर महोदय के द्वारा देखा गया तो समझ में आया कि इसका असल महत्व क्या है? यह चित्र कोई साधारण चित्र नहीं है। ये काफी पुराने हैं। ये हमारे पूर्वज हमारे लिए बनाकर छोड़कर गए हैं। तब ये जो गुफाओं का समूह है ये चर्चा में आता है और ये मध्यपाषाण काल की बात है। ठीक है? मेसोलिथिक काल का समय था। उस समय के ये बने हुए हैं। ऐसा माना जाता है। इसके बाद चंपानेर और पावागढ़ यह पुरातत्व उद्यान है। गुजरात का 2004 में यूनेस्को में सम्मिलित हुआ था और यह अपनी प्राचीन हिंदू वास्तुकला मंदिर और विशेष तौर पर जल संरक्षण के लिए जाना जाता है। महमूद बेगड़ा के द्वारा 16वीं शताब्दी में निर्मित जो राजधानी शहर है उससे भी इसका संबंध है। सैन्य कृषि और जो सामाजिक 4:31:22 संरचना है उन सभी का ये केंद्र माना जाता है। जामा मस्जिद जो है उसमें हिंदू और मुस्लिम वास्तुकला दोनों का नमूना आप देखते हैं। इसके बाद लाल किला परिसर है। शाहजहानाबाद के किले के रूप में इसको बनाया गया था। भारत के पांचवें मुगल सम्राट यानी शाहजहां की राजधानी और लाल बलुआ पत्थर से इसकी बड़ी-बड़ी दीवारें बनाई गई है और इसीलिए इसको लाल किला कहा जाता है। तो 2007 में इसको यूनेस्को में शामिल किया गया था। 1546 में इस्लाम शाह सूरी के द्वारा जो बनवाया हुआ पुराना किला है सलीमगढ़ उसी के पास में ये स्थित। तो ये तो आसपास की बात हो गई। मूल रूप से हमें लाल किले को देखना था। तो हमने देखा कब शामिल किया गया और इसमें कब इसे बनवाया गया। कैसे राजस्थान के पहाड़ी किले ये अपने आप में बहुत खास है क्योंकि दुश्मन इनमें घुसने की चेष्टा करते-करते दम तोड़ देता था। और मराठों और राजपूतों दोनों के किले जो है वो अपने-अपने क्षेत्र में प्रसिद्ध थे। तो राजपूत सैन्य रक्षा वास्तुकला का ये उत्कृष्ट नमूना है। कुंभलगढ़ का किला, सवाई माधोपुर का किला, झालवाड़ का किला, जयपुर का किला, जैसलमेर का किला, चित्तौड़गढ़ का किला। कुछ किले तो ऐसे होते थे जो कि दूसरे किलों की 4:32:23 निगरानी के लिए बनाए जाते थे। वह जंगल में छिपे हुए होते थे। आसानी से दिखते नहीं थे और वह मुख्य किले की सुरक्षा और उसकी निगरानी के लिए बनाए जाते थे ताकि दूर से उन पर निगाह रखी जा सके। पाटन में रानी की बावड़ी है। यह पुराना और बेजोड़ भारतीय वास्तुकला का नमूना है। बावड़ी मतलब सीढ़ी वाला कुआं। जमीन को गहराई तक खोदकर जमीन से पानी निकालेंगे। लेकिन वहां तक पहुंचने का भी इंतजाम करेंगे। ये नहीं कि बाल्टी और डोर से खींच रहे हैं। अब राजा रजवाड़े हैं तो भाई वो बाल्टी और डोर से खींच कर तो नहाएंगे नहीं। उन्हें सीधा अंदर ही जाना है। तो अंदर कपड़े बदलने की जगह होती थी, बैठने की जगह होती थी। कई तरह की कमरे जैसी संरचना बनी होती थी। सीढ़ियां होती थी। मतलब सीढ़ी वाला कुआं। नालंदा में और आजकल वो सस्पेंस और थ्रिलर का डेरा बन गया है। इसके बाद नालंदा में नालंदा महाविहार जो नालंदा विश्वविद्यालय था उसी की जड़ पर इसको बाद में स्थापित किया गया। नालंदा विश्वविद्यालय को तो बख्तियार खिलजी ने ध्वस्त कर दिया था। तो कुल मिलाकर 13वीं शताब्दी ईवी का एक मठ संबंधी शिक्षा संस्थान और पुरातत्व अवशेष यहां पर मौजूद है। मतलब तुर्कों के द्वारा इसको ध्वस्त 4:33:24 किया गया, जला दिया गया। तो उसके बाद पूरी तरह से ये तबाह हो गया। यहां सिर्फ एक टीला बचा और टीले का जब बाद में अन्वेषण किया जाता है तो पता लगता है कि यहां तो पूरी एक यूनिवर्सिटी रहा करती थी। ठीक है? भारत की पर्वतीय रेलवे जो दार्जिलिंग की है। दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे उसको भी शामिल किया गया यूनेस्को में। चलती फिरती चीज को भी यूनेस्को में शामिल किया जाता है और 1881 में इसको शुरू किया गया था। बाकी 1999 में इसे यूनेस्को की मान्यता मिलती है। ये वेस्ट बंगाल का है मतलब सुंदर पर्वतीय क्षेत्र के माध्यम से एक प्रभावी रेल कलेक्शन स्थापित करने का और ऐसे पहाड़ी क्षेत्र में किसी भी तरह की संरचना बना पाना मतलब रेलवे पटरी बिछा पाना और रेल जला पाना ये सही में मुश्किल काम है। लेकिन उसके बावजूद 1881 में इसको शुरू किया गया और यह एक साहसिक और आविष्कारशील जो इंजीनियरिंग समाधान है उनका इस्तेमाल करती है। मतलब इंजीनियरिंग का एक उत्कृष्ट नमूना है। कहने का मतलब ये है। इसके बाद छत्रपति शिवाजी टर्मिनल है। विक्टोरिया टर्मिनल इसको पहले कहा जाता था। 19वीं सदी के अंत में रेलवे वास्तुकला का यह उत्कृष्ट उदाहरण है। विक्टोरियन 4:34:25 गौथिक पुनरुद्धार जो शैली है उसकी ये विशेषता मतलब यहां पर दिखाई देती है। महाराष्ट्र में है। 2004 में इसको भी यूनेस्को में शामिल किया गया था। अब यहां देखें मतलब पुर्तगालियों से बंबई शहर अंग्रेजों को उपहार स्वरूप मिलता है। जब पुर्तगाल और इंग्लैंड के बीच में वैवाहिक संबंध स्थापित होते हैं तो जो दहेज में मिला हुआ बॉम्बे था उसको वहां के मतलब ब्रिटेन के राजा कंपनी को दे देते हैं। ईस्ट इंडिया कंपनी को दे देते हैं कि इसमें हमें किराया चाहिए। तुम लोग व्यापार करो। तो सालसेट द्वीप जो है उस पर पूरा व्यापार का काम ये शुरू करते हैं। बंबई वैसे ही औद्योगिक क्षेत्र के तौर पर विकसित होता है। इसकी सामरिक स्थिति भी अच्छी होती है। बोधगया में महाबोधी मंदिर परिसर है बिहार का। यह प्रारंभिक ईंट की इमारतों में से एक और वास्तुकला के विकास का इस पर बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ा है। मतलब स्तंभ स्मारक ये सब बने हुए हैं। कुल मिलाकर नक्काशीदार पत्थर का कटघरा और नक्काशीदार पत्थर की उभरी हुई संरचनाएं ये सब इसकी विशेषता है। तो ये 2002 में शामिल किया गया था। जंतरमंतर 4:35:26 जयपुर का सवाई जय सिंह के द्वारा जय सिंह द्वितीय के द्वारा इसको बनवाया गया था। ये 1734 की बात है। 2010 में इसको मान्यता मिलती है और जंतरमंतर टालमिक स्थित स्थिति खगोल विज्ञान के उत्कृष्ट उदाहरणों में से एक है। कहने का मतलब ये है कि ये खगोलीय संरचना है और जंतरमंतर को आप देखते हैं ये राजस्थान में इसकी अवस्थिति है। लेह काबुरिए का वास्तु शिल्प कार्य है। ये चंडीगढ़ का है। मतलब चंडीगढ़ की पूरी जो वास्तु है संरचना है उसको तैयार करने में ले काबुर्जिए का अभिनय योगदान है। 17 वास्तुशिल्प परियोजनाएं जो हैं कई देशों की वो इसमें शामिल हैं। इसके बाद आप देखेंगे अहमदाबाद के ऐतिहासिक शहर गुजरात साबरमती के पूर्वी तट पर 15वीं शताब्दी में सुल्तान अहमद शाह के द्वारा स्थापित जो चार दीवारी वाले शहर हैं वह काफी अभिन्न विरासत के तौर पर देखे जाते हैं। मतलब अंदर के किले उसके बाद बाहर किले बंद शहर दीवारें, दरवाजे, मस्जिदें, कब्र सब कुछ और बाद के समय में जो हिंदू और जैन मंदिर हैं वो भी बनते हैं। मुंबई का 4:36:27 विक्टोरियन गौथिक आर्ट डेको समूह यह भी शामिल किया गया यूनेस्को में महाराष्ट्र सरकार की ओर से नवगाथिक की इमारतों में जो सार्वजनिक इमारतें हैं उसमें यह अभिन्न योगदान देता है मतलब ये महत्वपूर्ण है और यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट के तौर पर इसको 2018 में मान्यता मिली थी। इसके बाद है जयपुर शहर पूरा का पूरा। 1727 में सवाई जय सिंह द्वितीय के द्वारा एक चारदीवारी वाला बड़ा शहर बसाया गया था जो कि पहाड़ी इलाकों के विपरीत अन्य शहरों के जैसा नहीं था। मतलब अन्य शहरों से इसकी संरचना अलग थी। पर्वतीय क्षेत्र में इसको ना विकसित करके मैदानी इलाके में मतलब अरावली के रेंज में ना विकसित करके जो मैदानी क्षेत्र था वहां विकसित किया गया। और वैदिक वास्तुकला का इसमें बढ़िया नमूना आपको दिखाई देगा। ग्रिड शैली को भी इसमें फॉलो किया गया है। ग्रिड योजना का पालन किया गया है। इसके बाद काजीरंगा नेशनल पार्क एक सींग वाले गैे के लिए जाना जाता है। बाकी यहां एशियन एलीिफेंट और तमाम तरह की प्रजातियां रहती हैं। 1985 में ये शामिल हुआ। असम राज्य का है यह राष्ट्रीय उद्यान। गोलाघाट जिले में है आंशिक रूप से और बाकी नगांव में पड़ता है। तो असम का सबसे 4:37:29 पुराना पार्क है। ब्रह्मपुत्र नदी इसके उत्तर में पड़ती है और कारबी अगला की जो पहाड़ियां हैं वो इसके दक्षिण में है। आप समझ सकते हैं कि एक तरफ नदी और एक तरफ पहाड़ी। तो ये बीच का जो क्षेत्र है ये कितना जीव-जंतुओं और वनस्पतियों के लिए उत्कृष्ट होगा। तो कुल मिलाकर 430 स्क्वायर किलोमीटर के क्षेत्र में यह फैला हुआ है। इसके बाद केवलादेव है राष्ट्रीय उद्यान। यह पहला पहला आर्कटिक जो प्रवासी जल पक्षी हैं उनका एक शीतकालीन प्रवास स्थल है। यहां पर वो माइग्रेट करके आते हैं ठंडी के मौसम में। और गैर प्रवासी जो निवासी हैं वो भी यहां पर बड़े पैमाने पर रहते हैं। तो पक्षियों का ये प्रजनन स्थल है और उनकी आबादी को बनाए रखने के लिए जरूरी है। तो 1985 में इसको यूनेस्को में डाला गया। मानस वन्य जीव अभयारण्य ये एक हॉटस्पॉट भी है। जैव विविधता हॉटस्पॉट 39100 हेक्टेयर के क्षेत्र को ये कवर करता है। मानस नदी तक ये पूरा फैला हुआ है। मतलब भूटान के जंगल और पूरा वहां से लेकर मानस नदी तक इसका विस्तार है। सुंदरवन को आप पीछे से ही देखते आ रहे हैं। 1987 में यूनेस्को में भी शामिल हो गया। यहां दुनिया के सबसे बड़े मैंग्रोव जंगल पाए 4:38:29 जाते हैं। सुंदरी के वृक्ष पाए जाते हैं। इसीलिए इसको सुंदरवन कहा जाता है। सभी प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्रों में सबसे अधिक जैविक रूप से उत्पादक यही है। उत्पादक जंगलों में से एक है। भारत और बांग्लादेश के बीच में जो गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों का मुहाना है उस पर ये स्थित है। जंगल और जलमार्ग कई लुप्त प्राय प्रजातियों सहित विभिन्न प्रकार के जानवरों का घर है। ठीक है? है मैंग्रोव वैसे भी मैंग्रोव और एस्चुरी और इस तरह के जो गरान इत्यादि होते हैं वो क्या बहुत सारी जीव प्रजातियों के निवास स्थान होते हैं। नंदा देवी और वैली ऑफ़ फ्लावर को आप देख रहे हैं उत्तराखंड का है 1988 का ये उच्च तुंगता वाले मतलब ज्यादा ऊंचाई वाले जो हिमालय क्षेत्र हैं उनमें से एक है और इसकी जो जैव विविधता है वो काफी उत्कृष्ट है। पूरे हिमालय क्षेत्र की ही जैव विविधता अपने आप में अनोखी है। इसीलिए उसे हॉटस्पॉट के रेंज में रखा गया है। 7817 मीटर ऊंचे नंदा देवी शिखर से यह सुसज्जित है। और भारत की दूसरी सबसे ऊंची चोटी है नंदा देवी ऋषि गंगा गार्ज के रास्ते से। हालांकि अगर माउंट के टू गॉडविन ऑस्टिन को हम मानते हैं कि वह सबसे ऊंची चोटी है तो फिर उस स्थिति में नंदा देवी दूसरा नहीं। 4:39:30 यहां आप देखेंगे तो दुनिया के सबसे गहरे गार्ज में से एक यहां पर है। यह ऋषि गंगा गार्ज की बात हो रही है जो कि यहां के रास्ते में पड़ता है। रास्ते से होकर पहुंच जाता है। यहां आप समझ रहे हैं? भारत की दूसरी सबसे ऊंची चोटी है नंदा देवी और जहां ऋषि गंगा गार्ज के रास्ते से होकर पहुंचा जाता है। लोग पहुंचते हैं और दुनिया के सबसे गहरे गार्ज में से यह एक है। ठीक है? सबसे गहरे गार्ज में से एक है। सबसे गहरा नहीं है। नदी के द्वारा इसको तैयार किया गया है। पश्चिमी घाट कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र इन राज्यों में फैला हुआ है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह भूवैज्ञानिक, सांस्कृतिक सौंदर्य मूल मूल्य सभी के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण है। ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क हिमालय क्षेत्र है हिमाचल प्रदेश का एरिया और यह पूरा संरक्षित इलाका है और आप जानते ही हैं कि 2014 में इसको यूनेस्को में शामिल किया गया था। इसके बाद है कंचनजंगा सिक्किम का 2016 का और दुनिया के सबसे ऊंचे संरक्षित क्षेत्रों में से एक है। काकतीय रुद्रेश्वर रामप्पा टेंपल जो है रुद्रेश्वर रामप्पा टेंपल इसको कहा जाता 4:40:30 है। यह पालमपेट वारंगल तेलंगाना में है। 25 जुलाई 2021 को इसको यूनेस्को में डाला गया था। तो यह जो रुद्रेश्वर रामप्पा टेंपल है यह हैदराबाद से लगभग 200 किलोमीटर उत्तर पूर्व में पालमपेट नाम का गांव है। वहां पर स्थित है। एक दीवार वाले परिसर के भीतर भगवान शिव का यह मंदिर है। काकतीय काल के मतलब काकतीय वंश जो था उसके राजा थे गणपति देव। उनके सेनापति लेजरला रुद्र के द्वारा इसको बनवाया गया था। इसके बाद गुजरात के कच्छ के रण में हड़प्पा शहर धौलावीरा मतलब हड़प्पा संस्कृति का शहर धौलावीरा। हड़प्पा कहां से गुजरात में आ जाएगा? तो धौलावीरा को आप देखेंगे। दक्षिण एशिया में सबसे उल्लेखनीय 2021 में शामिल हुआ था। सबसे उल्लेखनीय तथा अच्छी तरह से संरक्षित शहरी बस्तियों में से एक जगपति जोशी या जगतपति जोशी कहे जाते हैं। इनके द्वारा इसे खोजा गया था 1968 में। मोहनजोदड़ो गणवेरी वाला हड़प्पा ये सब पाकिस्तान में है। वहीं भारत का हरियाणा का राखीगढ़ सबसे बड़ा और उसके बाद धौलावीरा जो है वो दूसरे नंबर पर सबसे बड़ा महानगर है। जब हड़प्पा, मोहनजोदड़ो इत्यादि भारत का हिस्सा थे तब अलग बात थी। 4:41:32 लेकिन भारत के विभाजन के बाद की यह स्थिति। इसके बाद नंबर [गला साफ़ करने की आवाज़] आता है शांतिनिकेतन का। 2023 में शामिल हुआ यूनेस्को की सूची में 41वां विश्व धरोहर स्थल बन जाता है। 45वीं विश्व धरोहर समिति की बैठक में इसका जो सऊदी अरब में रियाद में आयोजित हुई थी। वहां पर फैसला लिया गया था। तो नोबेल पुरस्कार विजेता है गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर। 1901 में नोबेल मिला था। उन्हीं के द्वारा यह स्थापित किया गया है पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले में। इसके बाद होलसेस मंदिर है। होलसेस राजवंश के द्वारा इसको स्थापित किया गया। 11वीं से लेकर 14वीं शताब्दी के बीच में इसका इस राजवंश का शासन दक्षिण भारत पर था। तो देवी देवताओं, पौराणिक प्राणियों और जो हिंदू पौराणिक कथाएं हैं उनके दृश्य इन मंदिर के जो पत्थर की दीवारें हैं उन पर उकेरे गए हैं। तो इसे बेसर शैली के मंदिरों में गिना जाता है। बेसर शैली होती क्या है? तो उत्तर भारतीय जो स्थापत्य कला शैली है वो और दक्षिण भारतीय स्थापत्य कला शैली ये दोनों जब आपस में मिलने लगती हैं दोनों का संक्रमण होने लगता है तो बनती है एक नई प्रकार की स्टाइल जिसको कि कहा जाता है बेसर उत्तर 4:42:33 भारतीय स्थापत्य शैली नागर शैली है। दक्षिण भारतीय स्थापत्य शैली द्रविड़ शैली है। नागर शैली और द्रविड़ शैली दोनों के कुछ ना कुछ गुण जो है वो आपस में मिल गए लेकिन दोनों में से कोई भी यूनिक नहीं रह गया। कुछ नया बन गया तो वो कहलाती है बेसर शैली। तो बेसर शैली में ये बना हुआ है और सबसे प्रसिद्ध होलसेस मंदिरों में तीन है। ये मंदिरों का पूरा एक समूह है श्रंखला है। तो जो होलसेस मंदिर है उसमें से तीन एक तो बेलूर का है चेन्नकेशव, हेलेबिड का है होलसेस्वर और सोमनाथपुरम का है केशव मंदिर। इनको यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट वाली जो सूची है उसमें 2023 में शामिल किया गया था। इसके बाद चराईदेव मोईदाम है। ये असम में पड़ता है। सांस्कृतिक विरासत ये भी है 46वें नंबर का और इसे असम में शासन करने वाले जो अहो राजवंश के सदस्य हैं उनके मृत अवशेषों को दफनाने की प्रक्रिया के अंतर्गत देखा जाता है। इसके बाद मराठा सैन्य परिदृश्य इसको भी यूनेस्को की जो सूची है उसमें स्थान दिया गया है। तो मराठा सैन्य परिदृश्य में जो तमिलनाडु का एक किला है और महाराष्ट्र के 11 मराठा किले हैं उनको शामिल किया गया 4:43:34 है। मराठों के किले उनकी विजय और उनके साम्राज्य का सबसे मजबूत स्तंभ हुआ करते थे। यह ऐसे दुर्गम इलाके में और ऐसे दुर्गम तौर तरीके से बने हुए किले होते थे कि इसमें सिर्फ मराठा सैनिक ही प्रवेश कर सकते थे। दुश्मन की अंदर घुसने की या इस पर धावा बोलने की हिम्मत नहीं होती थी। इसके बाद सारनाथ के प्रसिद्ध जो बौद्ध स्थल है उनको भी देख रहे हैं आप। उत्तर प्रदेश का सारनाथ यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है और दक्षिण कोरिया के बुसान में आयोजित जो यूनेस्को की विश्व धरोहर समिति का 48वां सत्र आयोजित होता है मतलब 2026 25 जुलाई 2026 उसमें इसकी घोषणा होती है। तो 45 इसने इसमें हम हमने जो यूनेस्को के स्थल हैं उन्हें देखा और यहां चित्र में भी देख रहे हैं। जैसे कि राजस्थान का आप देखें राजस्थान के पहाड़ी किले लिए जंतरमंतर जयपुर केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान फिर ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क हिमाचल का हो गया। हुमायूं का मकबरा कुतुब मीनार लाल किला परिसर ये सब दिल्ली का हो गया। वैसे ही ले कारबुजिय का वास्तु शिल्प कार्य है। ये सब चंडीगढ़ का हो गया। चंपानेर पावागढ़ पाटन में रानी की बावड़ी 4:44:35 अहमदाबाद का ऐतिहासिक शहर धौलावीरा ये सब गुजरात का हो गया। इधर आप देखेंगे तो नंदा देवी वैली ऑफ फ्लावर ये सब उत्तराखंड का नालंदा और महाबोधी टेंपल परिसर जो है ये बिहार का हो गया। आगरा का किला, ताजमहल, फतेहपुर, सीकरी, सारनाथ ये चार जो हैं ये उत्तर प्रदेश के हो गए। याद रखिएगा। इसके बाद खजुराहो के मंदिर हैं। सांची में बौद्ध स्मारक है, भीमबेटका है, कंचनजंगा है। ये सब आप देख रहे हैं। तो इसमें से तीन जो है ये खजुराहो, सांची और भीमबेटका ये तीन जो है ये मध्य प्रदेश के हो गए। और कंचनजंगा को अगर आप देखेंगे तो कंचनजंगा सिक्किम का हो गया। इसके बाद यहां असम में आ जाते हैं। तो असम में काजीरंगा है, मानस है और चराईदेव मोईदाम अभी जस्ट आपने पीछे देखा है। पश्चिम बंगाल में सुंदरवन और शांतिनिकेतन है। वैसे ही उड़ीसा में कोणार्क का सूर्य मंदिर है। दक्षिण में जरा चलते हैं। यहां देखें तो दक्षिण में महाराष्ट्र में ही अगर आप देखेंगे तो अजंता की गुफाएं, एलोरा की गुफाएं, एलिफेंटा की गुफाएं, छत्रपति शिवाजी टर्मिनल, विक्टोरिया, गौथिक आर्ट, डेकोरेट डेको परिधान ये सब जो हैं ये सब इसमें शामिल है। उसी प्रकार से गोवा के चर्च और कॉन्वेंट ये गोवा का हो गया। मराठा सैन्य 4:45:36 परिदृश्य ये भी महाराष्ट्र का ही है। तेलंगाना में काकतीय रुद्रेश्वर रामप्पा टेंपल है। हम्पी के स्मारक पटक्कल के स्मारकों का समूह और होलसाय मंदिर ये सभी कर्नाटक की विशेषता हैं। तमिलनाडु में महाबलीपुरम के स्मारक हैं। तजापुर, गंगेकुंड, चोलपुरम और दारासुरम के जो महान चोल मंदिर हैं वो शामिल है। भारत की जो पर्वतीय रेलवे है दार्जिलिंग, नीलगिरी, काक कालका शिमला और पश्चिमी घाट यह भी जो यूनेस्को साइट है उनका हिस्सा है। तो यहां तक आपने देखा। अब इसके बाद आगे बढ़ते हैं। तो अब हम देखेंगे यूनेस्को को देख चुके हैं। अब आईयूसीएन को देख लेते हैं। तो यहां पर भारत जो है ये 1969 में यानी 1969 में एक राज्य सदस्य के रूप में आईयूसीएन में शामिल हुआ। और भारत की ओर से पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के द्वारा यह मतलब कहने का मतलब यह है कि आईयूसीएन का भारत जो है आईयूसीएन इसका भारत सदस्य है। कब से? 1969 से। 1969 और भारत का जो पर्यावरण मंत्रालय है वह 4:46:36 आईयूसीएन के अंतर्गत नोडल एजेंसी के रूप में काम करता है। इसका कार्यालय 2007 में नई दिल्ली में स्थापित किया गया और सदस्यों के समन्वय हेतु 2001 से एक राष्ट्रीय समिति यहां पर काम कर रही है। बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी और डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया ये भी इसके सक्रिय सदस्य हैं। तो इसकी जो रेड लिस्ट होती है उससे प्रश्न आते हैं। ये श्रेणीवार आप देखेंगे गंभीर रूप से संकटग्रस्त यानी क्रिटिकली इनडेंजर्ड जो प्रजातियां हैं वो सबसे ऊपर दी हुई है जिनको कि सीआर से व्यक्त किया जाता है। सीआर से व्यक्त किया जाता है। तो पहले नंबर पर आता है घड़ियाल गेंगेटिकस गैवियालिस इसको कहा जाता है। इसका ये जंतु नाम है। मतलब बायोलॉजी के हिसाब से इसका वैज्ञानिक नाम है। तो राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में ये मूल रूप से पाया जाता है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश। ग्रेट इंडियन बस्टर्ड आरडी आरओटिस नाइग्रसेप्स ये इसका पक्षी मतलब पक्षीगत वैज्ञानिक नाम है। डेजर्ट नेशनल पार्क राजस्थान और गुजरात में ये पाया जाता है। भारतीय गिद्ध तो भारत में 4:47:38 गिद्धों की नौ प्रजातियां पाई जाती हैं। चार प्रजातियां जो है वो ओरिएंटल वाइट रम्ड यानी सफेद पीठ वाले गिद्ध, लॉन्ग बिल्ट, स्लेंडर बिल्ट, पतली चोंच वाले, रेड हेडेड यानी लाल सिर वाले गिद्धों की हैं। ये सब गंभीर रूप से संकटग्रस्त हैं। चार प्रजातियां जो हैं, वैसे तो पूरे गिद्ध ही संकट में हैं। और अभी भी संकट से बाहर नहीं आए हैं। लेकिन उसमें से भी चार ऐसे हैं जिन्हें देखना ही दुर्लभ है। जिसमें से कि सफ़ेद पीठ पीठ वाला गिद्ध है। अह इसके अलावा लॉन्ग बिल्ड जो भारतीय गिद्ध कहा जाता है। सिलेंडर बिल्ड पतली चोंच वाला और लाल सिर वाले भी गिद्ध होते हैं। तो ये सब गंभीर रूप से संकटग्रस्त हैं। यानी क्रिटिकली इंडेंजर्ड है। हंगुल यानी कश्मीरी स्टैग जिसे कि सर्वस हंगुलू कहा जाता है वैज्ञानिक नाम के तौर पर। यह जम्मू कश्मीर का राजकीय पशु है। दाचीगाम नेशनल पार्क में यह एकमात्र संरक्षित है और यह जो सेंक्लाज का रेंडियर होता है ना उसी का वंशज है। इसके बाद चीनी पेंगुलिन मैनिस पेंडाइला इसको कहा जाता है पेंटाडेडक्टाइला। तो सिक्किम, असम, अरुणाचल इन राज्यों में ये पाया जाता है। मांस के लिए और विशेष रूप से इसका जो 4:48:40 चमड़ा होता है, शल्क होते हैं उसके लिए इसकी तस्करी होती है। इसके बाद है नामदफा की उड़न गिलहरी जिसको कि बिस्वा मोडप्टस बिस्वामी विश्वासी कहा जाता है। यह नामदफा नेशनल पार्क में पाई जाती है। अरुणाचल में साइबेरियन क्रेन ल्यूको गरेनस ल्यूकोगेरनस ल्यूकोगेरिनस ल्यूकोगेरनस ये इसका नाम है। भरतपुर पक्षी अभयारण्य राजस्थान का जो है केवला देव राष्ट्रीय उद्यान वहां पर ये पाया जाता है। बंगाल फ्लोरिकन होबारोप्सिस बेंगासिस ये दुधवा नेशनल पार्क जो उत्तर प्रदेश का है वहां पर और मानस और काजीरंगा असम का है उसमें भी पाया जाता है। हिमालयन बटेर ओसिया सुपरस सुपरसिलियोसा इसको कहा जाता है। यह वेस्टर्न हिमालय उत्तराखंड का जो एरिया है वहां पर पाया जाता है। ठीक है? इसके बाद आप देख रहे हैं यहां पर तो हिमालय पटेर के बाद देखेंगे आप जर्डन कोरसर इसको राइन राइनोप्टिलस बिटोक्वेटस कहा जाता है। ठीक है? राइनोप्टिलस बिटोक्वेटस कहा जाता है। लंका मल्लेश्वर वन्यजीव अभयारण्य जो आंध्र का 4:49:40 है वहां पर ये पाया जाता है। सफेद पेट वाला बंगला ऑडिया इग्निसिस ये नामदफा में ही मिलता है। इसके अलावा ये तो हमने देखा क्रिटिकली इंडेंजर्ड। अब यहां पर इंडेंजर्ड जो है इ एन से उसको व्यक्त किया जाता है। कैपिटल ई और कैपिटल एन ये संकटग्रस्त है। तो ऐसी प्रजातियों में भारतीय हाथी है। एलिफास मैक्सिममस इंडिकस इसको कहते हैं। पेरियार केरल का, बांदीपुर, नागरहोले कर्नाटक का, काजीरंगा असम का और नीलगिरी बायोस्फीयर रिजर्व, तमिलनाडु केरल का उन सभी स्थानों का नाम यहां लिया गया है जहां कि एशियन एलीिफेंट संरक्षित है। बंगाल टाइगर जिसको कि पैंथेरा टाइगरस कहते हैं। सुंदरवन टाइगर रिजर्व में तो है ही है। इसके अलावा बुसा, रणथंबोर, कान्हा, बांधवगढ़, तडोबा अंधेरी ऐसे तमाम टाइगर रिजर्व एशियाई शेर पैंथेरा, लियोप परसिका इसको कहते हैं। गिर राष्ट्रीय उद्यान इसका नेचुरल हैबिटेट है। इसके बाद गंगा डॉल्फिन है। प्ले प्लेटानिस्टा गेंगेटिका इसको कहा जाता है। विक्रमशिला डॉल्फिन अभयारण्य बिहार का और गंगा ब्रह्मपुत्र का जो नदी तंत्र है वहां पर यह पाई जाती है। पिग्मीहग यानी पोरकुला 4:50:40 साल्वेनिया। यह मानस राष्ट्रीय उद्यान में मिलता है। नेक्स्ट आप यहां पर देख रहे हैं नीलगिरी ताहर नीलगिरीटस हलोकियस तो ये अरबीकुलम नेशनल पार्क और नीलगिरी की पहाड़ियों में चारों तरफ पाया जाता है। लालंडा एलुरस फुरगेंस ये कंचनजंगा दार्जिलिंग और नामदफा में मिलता है। संघाई डियर रूस रूसर्वर एलडीएलडी इसको कहा जाता है। तो यह एकमात्र पाया जाता है लोकटक झील की जो घास भूमि है वहां पर मणिपुर में किबुल लमजाओ नेशनल पार्क जो कि लोकटक झील के ऊपर बना हुआ है और इस पे तैरती हुई घास की मोटी-मोटी गद्दियां यानी जमीन पाई जाती है। दलदली क्षेत्र है। ब्रह्मपुत्र के पानी के इकट्ठा होने से बना हुआ है। तो यह जो विशेष प्रकार की घास की गुजगुजी जमीन होती है उसी पर ये पाया जाता है। जंगली भैंस बुवालस अरनी इसको कहा जाता है। ये इंद्रावती और उदंती सीता नदी बाघ अभयारण्य के क्षेत्र में पाई जाती है। कोला मरका और काजीरंगा में भी मिलती है, मानस में भी मिलती है। सिंह पुच्छी मकाक जिसे कि मका साइलेनस कहा जाता है। यह साइलेंट वैली नेशनल पार्क में तो पाया ही 4:51:41 जाता है और वेस्टर्न घाट में भी ये आपको बहुतायत दिख जाएगा। बहुतायत तो नहीं लेकिन हां झिटपुट दिख जाएगा। इसके बाद है ढोल। ढोल यानी एशियाई जंगली कुत्ता। यह भी जो है यह बहुतायत नहीं है। जो आप अपने गली मोहल्लों में घूमते हुए कुत्तों को देखते हैं। ज्यादातर जो शहरी इलाकों में आपको मोटे-मोटे कुत्ते दिखाई देते हैं जिन्हें कि आप आवारा कुत्ते कहते हैं। असल में वो आवारा नहीं है। जो आपने ब्रीड डॉग पाले हुए थे ना उनको उनमें से बहुत से ऐसे पत्थर दिल लोग होते हैं कि अपने ब्रीड डॉग को सड़क पर छोड़ देते हैं। उनकी ब्रीडिंग होती है देसी कुत्तों के साथ। फिर एक मिक्स ब्रीड पैदा होती है जो कि ना तो पूरी तरह से भारतीय होती है ना पूरी तरह से विलायती होती है। ठीक है? तो आपको कहीं-कहीं डाबरमैन की शक्ल वाले देसी कुत्ते दिखेंगे। कहीं लेब्राडोर जैसे मिलती जुलती शक्ल वाले देसी कुत्ते दिखेंगे। कहीं पर आपको जर्मन शेफर्ड का नमूना दिख जाएगा। तो ये सब कैसे दिखता है? ये मिक्स ब्रीडिंग का नतीजा है। क्रॉस ब्रीडिंग का नतीजा है। फिलहाल ये जो ढोल है ये शुद्ध भारतीय कुत्ता है। ऐसे ही डिंगो को आप देखते हैं वो भी भारतीय नस्ल के ही कुत्तों से विकसित मतलब इंडियन जो परिग कहे जाते हैं उन्हीं से विकसित हुआ अफ्रीकी कुत्ता है। अफ्रीकी जंगली कुत्ता है। तो ढोल जो है ये एशियाई जंगली कुत्ते 4:52:43 हैं। कुवन अल्पाइनस इन्हें कहा जाता है और ये काफी शिकारी होते हैं। तो यहां देखें आप पश्चिमी घाट और मध्य भारत के जो टाइगर रिजर्व है वहां ये पाए जाते हैं। शेरों का और बाघों का जो बचा हुआ जूठन होता है उसको यह बड़ी तेज खाते हैं। पश्चिमी हुलॉक गिबन पूर्वोत्तर भारत में ये कई राज्यों में पाया जाता है। जैसे असम अरुणांचल मेघालय और ये एकमात्र भारत में पाया जाने वाला वनमानुष है। सुनहरा लंगूर ट्रैकीपिथेकस गी इसको कहा जाता है। चक्रशिला वन्यजीव अभयारण्य जो असम का है वहां ये पाया जाता है। इसके बाद वी यू से रिप्रेजेंट करते हैं वनरेबल को। तो वलनरेबल यानी संवेदनशील प्रमुख प्रजातियां इसमें हिम तेुआ है, पैंथेरा, अंसिया ये हेमिस में पाया जाता है। किबर और पिन वैली जो हिमाचल के पार्क है वहां पाया जाता है। गंगोत्री में पाया जाता है और कंचनजंगा यानी सिक्किम में पाया जाता है। एक सींग वाला गैंडा रायसोरस यूनिकार्नस इसको कहा जाता है। ये काजीरंगा मानस में तो मिलता ही है। उसके अलावा ओरंग में भी मिलता है। पोबितरा जो नेशनल माफ़ कीजिएगा पार्क है उसमें मिलता है। जलदापाड़ा में मिलता है। गोरुमारा में मिलता है। और हां, यूपी के दुधवा में भी 4:53:45 पाया जाता है। अफ्रीकी चीता एसिनोनिक्स जुबेटस इसको कहा जाता है। कूनों में इसको लाया गया है। यह पाया नहीं जाता है यहां पर। यह बाहर से आयात किया गया है, मंगवाया गया है और नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका के अलग-अलग हिस्सों से इसे इकट्ठा किया गया है। ओलिब्रिडले ये भी यहां की प्रजाति नहीं है। ये अमेरिकी जो समुद्री तट है वहां से चलते हैं समुद्र के एरिया से और यहां प्रजनन के लिए आते हैं। अंडे देकर यहां से रवाना हो जाते हैं। बच्चे उनके पीछे-छे निकलते हैं तो चले जाते हैं। तो ये सामूहिक रूप से यहां प्रजनन करने और अंडे देने आते हैं। ऋषिकुल्या नदी का जो मुहाना है वहां पर गिरमाथा समुद्री अभयारण्य। तो उस एरिया में जो समुद्री तट है वो इनके लिए संरक्षित किया गया है। उसके बावजूद ये शिकार बन रहे हैं। समुद्री गाय यानी डगोंग मन्नार की खाड़ी पल्लक पाक जलडमरू मध्य पी एल के पाक इसीलिए पाल्क लिखा गया है। क्योंकि अगर पाक लिखा जाएगा तो फिर आप कंफ्यूज हो जाएंगे कि ये पाकिस्तान का जलडमरू मध्य है। नहीं ये पाक जो है ये अंग्रेज का नाम था। मतलब एक ब्रिटिश अधिकारी थे उन्हीं के नाम पर ये रखा गया है पाक जलडमरू मध्य। तो ये जो पाक 4:54:46 स्टेट है ये तमिलनाडु वाले हिस्से में यहां पर पाई जाती है समुद्री गाय अंडमान निकोबार द्वीप समूह के आसपास और कच्छ की खाड़ी में भी पाई जाती है। ये समुद्री घास को चरकर अपना जीवन यापन करती है। शाकाहारी होती है और काफी मोटी ताजी होती है। समुद्र में रहने वाले कई शाकाहारी जीव ऐसे हैं जो कि बहुत भारीभरकम होते हैं हट्टे-कट्टे लेकिन शाकाहारी होते हैं। और उसी का नमूना धरती पर भी आपको दिखाई देता है। ये देखें आप बॉस गौरस। गाय को कहा जाता है बॉस इंडिकस और यह जो है यह बॉस गौरस है। मतलब क्या? यह गाय के परिवार का ही भतीजा है। लेकिन यह काफी हट्टाकट्टा होता है और बहुत एथलीट वाली इसकी बॉडी होती है। मतलब एकदम बॉडी बिल्डर जबरदस्त। तो इसे भारतीय बाईसन नहीं कहते हैं। ये असल में गौर है। इसके आगे भारतीय लगाने की भी आवश्यकता नहीं क्योंकि गौर वन एंड ओनली भारत में ही पाया जाता है। ठीक? तो बांदीपुर, नागर होले, पेरियार, मधुमलाई, कान्हा, पेंच यह कई सारे स्थानों पर मिलता है। यह कतई भैंस नहीं है। भैंस की प्रजाति नहीं है। और बाईसन लिखने का मतलब है कि वो भैंस बन जाएगा। ठीक है? इसके बाद नंबर आता है बारसिंघा का। तो 4:55:48 बारसिंघा जो है इसको सर्वस डओसिली कहा जाता है। कान्हा, दुधवा और काजीरंगा में ये पाया जाता है। यानी मध्य प्रदेश, असम और उत्तर प्रदेश में। इसके बाद है सारस क्रेन। एंटीगोन। एंटीगोन इसका नाम है वैज्ञानिक नाम। भारत की जो उत्तर प्रदेश की आद्रभूमियां है वहां पर यह मिलता है। गुजरात और राजस्थान के कुछ हिस्सों में भी पाया जाता है। बाकी ये यूपी का राजकीय पक्षी है ही है। स्लोथ बियर मेलुरस उर्सिनस इसको कहा जाता है। ये दारोजी भालू अभयारण्य जो कर्नाटक का है सतपुड़ा में भी पाया जाता है और जैसोर अभयारण्य जो गुजरात का है वहां भी मिलता है। ग्रेट हार्मबिल इसे बुसेरोस बाईकारिमिस कहा जाता है। पश्चिमी घाट केरल कर्नाटक पूर्वोत्तर भारत अरुणाचल प्रदेश नागालैंड के जो घने जंगल हैं वहां ये पाया जाता है। इसके बाद लुट्रोगेल पर्स पिसिलाटा है। यह तुंगभद्रा उद्बलाव संरक्षण रिजर्व जो है कर्नाटक का वहां मिलता है। काजीरंगा और मानस में मिलता है। सुंदरवन में भी पाया जाता है और भीतरकणिका में भी उपलब्ध होता है। नेक्स्ट आप देख रहे हैं एशियाई ब्लैक बीियर। उरस थिबेटानस इसका वैज्ञानिक नाम है। जंतु वैज्ञानिक नाम है। पक्के टाइगर 4:56:50 रिजर्व अरुणांचल, दाचीगाम नेशनल पार्क जम्मू कश्मीर और सेंचल पश्चिम बंगाल का वहां ये पाया जाता है। लेदर बैग टर्टल यानी लेदर बैग कछुआ चमड़े की चमड़े जैसी पीठ वाला कछुआ इसको डर्मोलिस कोरियासिस कहा जाता है। कोरियासिया भी कहा जाता है। तो ये गलाथिया बे में अंडे देने आता है और ये दुनिया का सबसे बड़ा समुद्री कछुआ है। अंडमान निकोबार द्वीप समूह की जो गैलेथिया बे है वहां ये प्रजनन के उद्देश्य से आता है। अब इसके बाद जो संकट के निकट प्रजातियां हैं निकट संकटग्रस्त हैं। मतलब अभी संकट में है नहीं लेकिन भविष्य में हो सकती हैं। उनकी आबादी इस कदर पहुंच गई। तो इनको कहा जाता है नियर थ्रेटेंड। ये एन टी से डिनोट किया जाता है इनको कैपिटल एन और कैपिटल टी। तो ऐसी प्रजातियों में आप देखेंगे भारतीय जंगली गधा है एक्वस हेमियोनस खुर इसको कहा जाता है। ये कच्छ के रण में पाया जाता है। धारीदार लकड़बग्घा हाईना राजस्थान मध्य प्रदेश और गुजरात के सूखे इलाके निकोबार कबूतर कैलोनस निकोबारिया इसको कहा जाता है निकोबारिका तो ये सब जो है ये संकट के निकट हैं। वैसे ही मालाबार पाइ हर्मबिल 4:57:52 है। ये एंथ्राकोरस से कोरोनेटस कही जाती है। पश्चिमी घाट और मध्य भारत के जंगलों में पाई जाती है। कम चिंताजनक श्रेणी में लीस्ट कंसर्न में आप कुछ ऐसे जानवरों को रखते हैं जो कि है तो सुरक्षित लेकिन भारत मेंकि अनुसूची एक में होने की वजह से उनको सर्वोच्च सुरक्षा दे दी गई है। लेकिन यूनेस्को के द्वारा उतनी ज्यादा उसको माफ़ कीजिएगा आईयूसीएन के द्वारा उन्हें उतनी ज्यादा तवज्जो नहीं दी गई है। मतलब यह है कि अपने यहां इन्हें जो अनुसूची एक है उसमें डालकर संरक्षित किया गया है। विशेष रूप से। लेकिन जो आईयूसीएन की सूची है उसमें उतना महत्व नहीं मिला है। जैसे काला हिरण है, काले खारे पानी का मगरमच्छ है और भारतीय मोर है। तो काला हिरण जिसे कि एंटीलोप सर्वी कापरा कहा जाता है। ये बेलाधार नेशनल पार्क राजस्थान का जो ब्नोई समुदाय द्वारा संरक्षित इलाका है वहां ये पाए जाते हैं। और खारे पानी का मगरमच्छ यानी क्रोकोडाइलस पोरोस ये भीतरकणिका में तो मिलता ही है। सुंदरवन और अंडमान निकोबार के बड़े हिस्से में पाया जाता है। सबसे बड़ा जीवित सरिसप है ये। भारतीय मोर जिसे कि वैज्ञानिक तौर पर पाओ 4:58:54 क्रिस्टेटस कहा जाता है। यह पूरे भारत में पाया जाता है और राष्ट्रीय पक्षी है ही है। तो यहां पर आप देखेंगे कि जो रेड लिस्ट वाली भारतीय प्रजातियां हैं श्रेणीवार दी हुई है। चित्र के साथ दी है। सबसे पहले आप देखेंगे क्रिटिकली इंडेंजर्ड को। तो जो क्रिटिकली इनडेंजर्ड है उसमें अगर आप देखें तो घड़ियाल है, ग्रेट इंडियन बस्टर्ड है, भारतीय गिद्ध है, वाइट रम, स्लेंडर बिल्ड इस तरह की कई सारी कई सारी प्रजातियां हैं। मतलब मूल रूप से चार प्रजातियों को सीआर में रखा गया है। इसके बाद कश्मीरी हिरण है। यानी कश्मीरी स्टैग, लाल हिरण हंगुल इसको कहा जाता है। रेंडियर का परिवार का वंशज। चीनी पेंगोलिन है। इसकी जो चमड़ी आप देख रहे हैं ना ये काफी कीमती होती है। खाल के लिए इसका शिकार होता है। नामदफा की उड़न गिलहरी है। जब कूदती है तो ऐसा लगता है कि उड़ रही है और लंबी छलांग लगाती है। पूछ और अपने जो चमड़े हैं उनका इस्तेमाल पैराशूट के तौर पे करती है। साइबेरियन क्रेन जो है ये भी क्रिटिकली इंडेंजर्ड है। बंगाल फ्लोरिकन जो है वो भी क्रिटिकली इंडेंजर्ड है। ठीक वैसे ही हिमालयन बटेर है। जैन जेडन कोरसर है और सफेद पेट वाला बगुला है। ये सारे 4:59:54 क्रिटिकली इंडेंजर्ड है। अगर आपको ये अपने आसपास दिखते हैं तो उनका संरक्षण करने का प्रयास कीजिएगा। इसके बाद इनडेंजर्ड जो है उनको देख लेते हैं। संकटग्रस्त तो भारतीय हाथी इसमें है। रॉयल बंगाल टाइगर है। एशियाई शेर है। गंगेटिक डॉल्फिन है। पिगमी हॉग है। नीलगिरी ताहर है। लाल पांडा है। ठीक है? लाल पांडा है। संघाई डियर है। जंगली भैंस भी इसी में शामिल है। वैसे ही सिंह पुच्छी मका। ये पूरा शेर ही आपको दिख रहा है लेकिन असल में ये बंदर है और ढोल जो कि एशियाई जंगली कुत्ते होते हैं कुछ ऐसे दिखते हैं हुलाक गिब्बन और सुनहरा लंगूर ये सब के सब जो है ये इनडेंजर्ड है इसके बाद नंबर आता है संवेदनशील यानी वनरेबल तो हिम तेुआ इसमें सबसे पहले है स्नो लेपर्ड एक सींग वाला गैडा चीता क्योंकि भारतीय चीता है ही नहीं अफ्रीकी चीता है ओलिव्रिडले डगोंग भारतीय बाईसन नहीं बल्कि गौर सीधे-सीधे बारसिंघा सारस क्रेन ग्रेट हारबिल स्लोथ बियर और भारतीय उदबिलाव भी है। इसके अलावा 5:00:55 एशियाई ब्लैक बीियर है। बियर के नाम पे सब जगह बियर की ही तस्वीर है। लेकिन स्लोथ जो है उसकी शक्ल थोड़ी अलग होती है। फिलहाल लेदर बैकग टर्टल कुछ ऐसा दिखता है। ये चित्र सही है। आगे बढ़ते हैं। इधर आ जाइए। देखिए अगला है अपना नियर थ्रेटेंड यानी निकट संकटग्रस्त। भविष्य में इन पर खतरा आ सकता है। जंगली गधा है, धारीदार लकड़बग्घा है। है ना? यह ऐसा लग रहा है कि किसी ने पेंट करवा के बकायदा पार्लर में बाल छटवाए हो। इसके बाद आप आगे देखेंगे निकोबार कबूतर है। यह आपका मालाबार पाइड हर्नबिल है। हर्नबिल की जो चोंच है ना वो ऐसी होती है और अपने आसपास भी आप इस हारनबिल पक्षी को देखते हैं। इनकी आवाज बड़ी सुरीली होती है। हालांकि ये बहुत तरह की आवाें निकालते हैं। कभी-कभी ऐसी आवाज निकालते हैं इनसे लगता है चील बोल रही है या फिर बाज की आवाज। लेकिन असल में ये हारबिल की आवाज होती है। और रात में जब ये उड़ते हैं रात के अंधेरे में ये उड़ने में सक्षम होते हैं। रात्र रिचर भी होते हैं। झुंड बनाकर उड़ते हैं तो ऐसी आवाज निकालते हैं जैसे घुंघरू बज रहा है। मतलब सुनसान इलाके में अगर आप भूत प्रेत में विश्वास करते हैं तो आप चुड़ैल समझ लेंगे। लेकिन असल में यह 5:01:57 हर्नबिल की आवाजें होती हैं। हारबिल जो है वो झुंड बनाकर और खासतौर पर जब मौसम बदल रहा होता है मतलब बरसात समाप्त हो रही होती है और सर्दी की शुरुआत हो रही होती है। यानी अक्टूबर नवंबर का सीजन कार्तिक महीना जो कहा जाता है उस समय ये माइग्रेट करते हैं। अपनी जगह बदलते हैं। तो उस समय सुबह के आसमान में इनकी जो चहचहाट है वो ऐसे घुंघरूओं की झनझनाहट के तौर पर सुनाई देती है। ऐसा लगता है घुंघरू बज रहे हैं। ठीक है? ठीक है? तो ये बहुत ऊंचाई पर उड़ते हैं। छोटे-छोटे दिखाई देते हैं। लेकिन नीचे आते हैं तो इनका साइज अच्छा खासा बड़ा होता है। और सिर पर इनके ऐसे एक दोहरी चोंच होती है। एक पहली चोंच होती है। उसके ऊपर एक ऐसी चोंच होती है। ऐसी चिड़िया आपने देखी है अपने आसपास। अपने यहां जो हर्निबिल पाए जाते हैं अपने आसपास दिखेंगे आपको वो भूरे रंग के होंगे। स्लेटी कलर के होंगे। पूरा स्लेटी ऐसे कलरफुल नहीं होंगे। चोंच से लेकर पूंछ तक उनका कलर जो है वो एकदम स्लेटी ग्रे जैसा होगा। डार्क ग्रे। यह मालाबार का है इसलिए ऐसा है। इसके बाद आगे देखें तो अगली जो प्रजाति की श्रेणी है वह है कम चिंताजनक लेकिन भविष्य में चिंता करनी पड़ेगी। हालांकि इसमें जो लीस्ट कंसर्न रखा गया है कुछ ऐसे जीव हैं जो कि अपने यहां अनुसूची एक में वन्य जीव संरक्षण के अंतर्गत शामिल किए गए हैं। तो 5:02:59 प्रायोरिटी अलग-अलग है। काला हिरण इसमें शामिल है। खारे पानी का मगरमच्छ है। साल्ट वाटर क्रोकोडाइल और मोर है। तो ये सारी बातें आपने देख ली है। अब आगे चलते हैं। अगला हम देखने वाले हैं पर्यावरणीय संस्थाएं संगठन स्थापना मुख्यालय के साथ। तो पहली जो संस्था है वो यूएईपी ही है। यहीं से शुरुआत करते हैं। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम 1972 में शामिल स्थापित हुआ था और नैरोबी यानी केन्या में इसका हेड क्वार्टर है। वर्ल्ड वॉच इंस्टट्यूट वाशिंगटन डीसी में हेड क्वार्टर है। 1974 में इसको हिस्सा बनाया गया था। ग्रीन पीस 1971 का है। एमस्टर्डम यानी नीदरलैंड में इसका मुख्यालय है। आईयूसीएन की स्थापना हुई थी 1948 में। अक्टूबर में ग्लैंड स्विट्जरलैंड का जो है वहां इसका मुख्यालय है। वन्य पादप और जंतुओं की संकटापन्न प्रजातियों के लिए व्यापार अंतरराष्ट्रीय अभिसमय यह जो कन्वेंशन है ये 1973 का है। जेनेवा स्विट्जरलैंड में स्थापना मतलब मुख्यालय क्षेत्र है। वेटलैंड इंटरनेशनल इसका जो मुख्यालय है वो वेनेजिंजन ये जगह जो है ये नीदरलैंड में पड़ती है। वहां पर है और 5:03:59 1996 में इसको स्थापित किया गया था। इसके बाद है वन्य जंतुओं के प्रवासी प्रजातियों के लिए संरक्षण पर कन्वेंशन अभी समय 1979 में स्थापित हुआ। बोर्न में इसका जर्मनी में हेड क्वार्टर है। रॉटरडम रॉटरडम में ही है। नीदरलैंड में 1998 बेसल कन्वेंशन बेसल नाम की जगह है। स्विट्जरलैंड में वहीं मुख्यालय है 1989 समय है इसका। विश्व वन्य जीव कोष 1961 ग्लैंड स्विट्जरलैंड में इसका हेड क्वार्टर है। बर्ड लाइफ इंटरनेशनल कैंब्रिज यूके में इसका हेड क्वार्टर है। 1922 में इसको इस्टैब्लिश किया गया था। स्टॉकहोम कन्वेंशन 2001 में इस्टैब्लिश किया गया था। स्टॉकहोम स्वीडन में इसका हेड क्वार्टर है और ट्रैफिक जो कि वन्य जीव व्यापार निगरानी नेटवर्क कहा जाता है। ये कैंब्रिज में इसका हेड क्वार्टर है। 1976 में इस्टैब्लिश किया गया था। अब पर्यावरण संरक्षण से संबंधित जो संस्थाएं हैं उन्हीं के बारे में हम देखने जा रहे हैं। तो भारतीय वन्य जीव बोर्ड है सबसे पहले वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत ये गठित साविधिक संगठन है और ये केंद्र सरकार को इन वन्य जीवों और पर्यावरण से जुड़े हुए मामलों पर सलाह देता है। भारत का प्रधानमंत्री ही इसका 5:05:00 गठन करता है। बोर्ड में 47 सदस्य होते हैं। उपाध्यक्ष होता है पर्यावरण मंत्री। वन्य जीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो यह वन्य जीवों के संबंध में जो संगठित अपराध होते हैं उस पर रोक लगाने के लिए शुरू किया गया है। पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत ये पूरा काम करता है। मुख्यालय नई दिल्ली में है। पांच इसके जोनल ऑफिस होते हैं। कौन-कौन से हैं? दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, चेन्नई और जबलपुर। इसके बाद अगला नंबर आता है भारतीय जीव-जंतु कल्याण बोर्ड का। पशु क्रूरता के खिलाफ इसको स्थापित किया गया है और पशु कल्याण से जुड़े मामलों पर यह काम करता है। तो पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 के अंतर्गत इसको गठित किया गया। 1962 यानी 1962 में। वल्लभगढ़ है हरियाणा का वहां पर इसका हेड क्वार्टर है। 2018 में स्थापित हुआ था। रुक्मणी देवी अरुणल इसकी संस्थापक थी और अपनी मृत्यु से पहले तक इसकी अध्यक्ष भी थी। भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण और भारतीय प्राणी सर्वेक्षण ये सब जो है ये संस्थाएं हैं जो कि पौधे और जंतुओं का सर्वेक्षण करके पहचान करने के उद्देश्य से स्थापित की गई हैं। तो जो वनस्पति सर्वेक्षण है उसकी स्थापना 1890 में होती 5:06:00 है और जंतु सर्वेक्षण की स्थापना होती है 1916 में। दोनों का मुख्यालय कोलकाता में है और दोनों जो है उनके क्षेत्रीय केंद्र भी ढेर सारे। इसके बाद अब यहां पर कुछ महत्वपूर्ण दिवस हैं जो कि पूछे जाते हैं। सभी पूछा ही जाता है। इंपॉर्टेंट ही है सब कुछ यहां पर। तो पहला आपका विश्व आदर्द्रभूमि दिवस है 2 फरवरी वन्य जीव दिवस विश्व वन्य जीव दिवस 3 मार्च वैश्विक पुनर्चक्रण दिवस रिसाइक्लिंग डे 18 मार्च अंतरराष्ट्रीय वन दिवस 21 मार्च विश्व पौधार रोपोपण दिवस 21 मार्च विश्व जल दिवस 22 मार्च विश्व मौसम विज्ञान दिवस 23 मार्च शून्य अपशिष्ट दिवस 30 मार्च विश्व जलीय पशु दिवस 3 अप्रैल अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस 29 जुलाई विश्व शेर दिवस इसी क्रम में अगर आप देखें तो विश्व पौधारो ोपण दिवस मनाया जाता है 21 मार्च को। अंतरराष्ट्रीय वन वन दिवस मनाया जाता है 21 मार्च को। विश्व जल दिवस का मनाने की तारीख है 22 मार्च। विश्व मौसम विज्ञान दिवस 23 मार्च। शून्य अपशिष्ट दिवस अंतरराष्ट्रीय स्तर का 30 मार्च। विश्व जलीय पशु दिवस 3 अप्रैल। ठीक है? 3 5:07:02 अप्रैल। अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस 29 जुलाई। विश्व शेर दिवस 10 अगस्त। विश्व हाथी दिवस 12 अगस्त। विश्व डॉल्फिन दिवस 12 सितंबर ओजोन परत के लिए जो संरक्षण हेतु ओजोन दिवस मनाया जाता है 16 सितंबर शून्य उत्सर्जन दिवस 21 सितंबर विश्व गैंडा दिवस 22 सितंबर विश्व नदी दिवस सितंबर का जो भी चौथा रविवार पड़े जो भी तारीख पड़े उसमें मनाया जाता है। विश्व पर्यावास दिवस अक्टूबर के पहले सोमवार को मनाया जाता है। विश्व पशु दिवस 4 अक्टूबर को मनाया जाता है। ठीक ऐसे ही पृथ्वी दिवस 22 अप्रैल टूना दिवस जो है यह मनाया जाता है 2 मई को विश्व जैव विविधता दिवस 22 मई विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून महासागर दिवस 8 जून वैश्विक पवन दिवस 15 जून विश्व वर्षावन दिवस 22 जून विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस 28 जुलाई पर्यावास दिवस को आपने देख ही लिया पशु दिवस को देख लिया अच्छा ई कचरा या ई अपशिष्ट दिवस जो है ये मनाया जाता है 5:08:02 14 अक्टूबर पारिस्थितिकी दिवस 1 नवंबर विश्व मत मत्स्य दिवस 21 नवंबर वन्य जीव संरक्षण दिवस 4 दिसंबर विश्व मृदा दिवस 5 दिसंबर ठीक है 5 दिसंबर उसके बाद अंतरराष्ट्रीय पर्वत दिवस 11 दिसंबर राष्ट्रीय डॉल्फिन दिवस 5 अक्टूबर आगे बढ़ते हैं अब यहां पर ब्लू फ्लैग वाले जो समुद्री तट है ये कुल मिलाकर 18 अपने पास है 2025 26 के नए आंकड़ों के हिसाब से इनको भी जानना आवश्यक है। तो पहले पांच जो समुद्री तट थे उनको मान्यता दी गई टैग दिया गया बाद में इनकी संख्या बढ़कर 18 हो गई। ब्लू फ्लैग सर्टिफिकेशन होता क्या है? यह डेनमार्क का जो कोपेनहगे है वहां पर एक संस्था है फाउंडेशन फॉर एनवायरमेंटल एजुकेशन उसके द्वारा हर साल दिया जाता है। यह एक तरह का इको लेवल होता है जो कि जो समुद्री तट होते हैं, बीचेस होते हैं या मरीन और पर्यटन नौकाएं होती हैं उनको दिया जाता है। 38 प्रकार के क्षमा कीजिएगा। 33 प्रकार के कठोर अंतरराष्ट्रीय मानदंड होते 5:09:03 हैं जिनको कि पूरा करने के लिए सूची बनाई जाती है और मूल रूप से इन्हें चार भागों में बांटा जाता है। मतलब जो क्राइटेरिया रखा गया है उसको चार भागों में बांटा जाता है। तो आप देखें नहाने के पानी की गुणवत्ता, पर्यावरण संरक्षण और प्रबंधन, सुरक्षा और सेवाएं, लाइफ गार्ड्स की उपलब्धता और पर्यावरण शिक्षा और सूचना। अंतरराष्ट्रीय जरी इसमें होती है। विशेष अंतरराष्ट्रीय जरी होती है। और यूएनईपी और इसके अलावा जो विश्व पर्यटन संगठन है, आईयूसीएन है, एफ डबलई है मतलब ये डेनमार्क की जो संस्था है फाउंडेशन है ना तो ये सारे जो है इसमें सब सब के सब शामिल होते हैं और इनके सदस्य इसमें हिस्सा लेते हैं। ब्लू फ्लैग प्रमाणन के मामले में स्पेन का दुनिया भर में पहला स्थान है। अभी तक जितने भी देश इसमें शामिल हैं और समुद्र तट शामिल हैं उसमें नंबर वन पर है स्पेन। सिर्फ एक साल के लिए वैलिड होता है क्योंकि हर साल सालाना स्थिति में यह पुरस्कार माफ कीजिएगा यह जो मान्यता है यह दी जाती है। हर साल इसके नवीनीकरण की आवश्यकता होती है। तो भारत के जो 18 हैं उनको भी देख लेते हैं। ओसा यहां देखें ओसा 5:10:04 का जो तट है गोल्डन बीच चंद्रभागा। भारत और एशिया के एशिया का पहला भारत का भी पहला और एशिया का भी पहला ये ब्लू फ्लैग बीच था। 2018 में इसको मान्यता मिली थी। दो आपके ओसा के हो गए। गुजरात का है शिवराजपुर बीच द्वारका का। कासरगोड बीच और पदुबद्री बीच कर्नाटक का है। ठीक ऐसे ही यहां देखें केरल का है कपड़ और चाल श्रीवर्धन रायगढ़ का नगांव रायगढ़ का परना का पालघर का गुहागर रत्नगिरी का और लाडघर रत्नगिरी का ये सब जो है ये महाराष्ट्र के हो गए। आंध्र में ऋषिकों है विशाखापत्तनम का। कोवलम बीच है तमिलनाडु का। अंडमान निकोबार का राधा नगर है। लक्षद्वीप का मिनीिकय थुंडी और कदमत है। पुुडुचेरी का ईडन है और दव का घोघला है। नेक्स्ट आप यहां पर उसी को चित्र के माध्यम से देखेंगे। सब दक्षिणी हिस्से में है क्योंकि तट जहां समुद्र का पाया जाएगा वहीं पर ये हो सकता है। तो इन्हें नीले रंग से दिखाया भी गया है। शिवराजपुर है आपका द्वारका वाला। इसके बाद ये घोगला है दीव का। ये परनाका है। यहां पे आप लाडघर को देख रहे हैं। मतलब 5:11:05 लाडघर को देख रहे हैं महाराष्ट्र का। ये दोनों महाराष्ट्र के हैं। यहां पे श्रीवर्धन है। इसी प्रकार से यहां पर आप गुह को देख रहे हैं। ये नगांव है। यहां पे पदुबद्री है। कासरगोड़ है। ये कर्नाटक का हो गया। सारे के सारे वही है जो पीछे आपने पढ़े हैं। उसमें कुछ नया नहीं है। यहां पे ये देखिए गोल्डन बीच है। पूरी ओसा का। ऋषिकों है आंध्र का। यहां पे कोवलम है। यहां राधा नगर है। अंडमान निकोबार आइलैंड का हो गया। ये रहा। इसके बाद यह चाल है। यह कपड़ है। यहां मिनीकाय थुंडी है लक्षद्वीप का। इस प्रकार से ये सारे जो ब्लू फ्लैग प्रमाणन बीज हैं ये दिए हुए हैं। भारत में जल स्रोतों की जो अभी तक की पहली गणना है वो हुई है वाटर बॉडीज को पहली बार गिनने का प्रयास किया गया है देशी स्तर पर। तो मोदी जी के दूरदर्शी नेतृत्व में केंद्रीय जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत के मार्गदर्शन में यह काम किया गया और यह गणना भारत के जल संसाधनों की एक व्यापक सूची देती है जिसमें कि प्राकृतिक और मानव निर्मित दोनों तरह के जो जल स्रोत है उनको शामिल किया गया है। मतलब वो ताल भी हो सकता है, कोई टैंक हो सकता है, कोई झोल हो सकता है, कोई बिल हो सकता है। मतलब बहुत तरह के जल स्रोत होते हैं। तो वो सभी इसमें शामिल 5:12:06 किए गए। एक डेटाबेस तैयार किया गया और छठी लघु सिंचाई गणना के अनुरूप एक केंद्र प्रायोजित सिंचाई गणना की भी शुरुआत की गई। यह सारा काम हुआ। जलाशय कहां पर हैं, कितने हैं, कैसे हैं? उनका उनका अतिक्रमण अगर हो रहा है तो उसकी स्थिति भंडारण की क्षमता उनके अंदर कितनी है? सारे पहलुओं पर जानकारी इकट्ठी की गई। तो जो इंपॉर्टेंट फैक्ट निकल कर आए वह आपके लिए काफी काम के हैं। जैसे कि देश में देखिए 2424540 जल स्रोतों की गणना की गई। 97.1स जो है वह ग्रामीण क्षेत्र में है और सिर्फ 2.9स जो है वह शहरी क्षेत्र में जो टॉप फाइव इस मामले में राज्य हैं उसमें पश्चिम बंगाल पहले स्थान पर है। दूसरे स्थान पर हम लोग हैं यानी उत्तर प्रदेश फिर आंध्र है फिर उड़ीसा है फिर असम है। कुल मिलाकर 63% तो इसी में कवर होता है। शहरी क्षेत्रों में जल जल स्रोतों की संख्या के मामले में शहरी क्षेत्र में जो टॉप राज्य हैं उनको देखने की जरूरत है। तो शहरी इलाकों में पश्चिम बंगाल पहले स्थान पर, तमिलनाडु दूसरे स्थान पर, केरल तीसरे 5:13:07 स्थान पर, उत्तर प्रदेश चौथे और त्रिपुरा पांचवें स्थान पर। ग्रामीण क्षेत्रों में पहले स्थान पर पश्चिम बंगाल है, दूसरे स्थान पर उत्तर प्रदेश है। तीसरे स्थान पर आंध्र, चौथे पर उड़ीसा और पांचवें पर असम। 59.5% जो जल स्रोत है वह तालाब हैं। उसके बाद टैंक हैं 15.7 बाकी रिजवायर हैं 12.1 जल संरक्षण योजनाएं, रिसाऊ टैंक, चेक डैम, झीलें ये सब थोड़े-थोड़े हैं। 9.3 झीलों की मात्रा और कम है। 0.9 बाकी जो है वो 2.5% में आते हैं। उसमें से भी 55.2% जो जल स्रोत हैं, वह निजी संस्थाओं के पास है, मतलब उनके कब्जे में हैं। 44.8 जो है यह सार्वजनिक क्षेत्र के पास है। जो जल स्रोत सार्वजनिक वाले हैं उसमें ज़्यादातर स्वामित्व उनका पंचायतों के अधीन आता है। मतलब पंचायतें उस पर कंट्रोल रखती हैं। और निजी स्वामित्व वाले में ज्यादातर व्यक्तिगत हैं। किसानों के पास है या फिर लोगों के पास है या जो कंपनियां या संस्थाएं हैं उनके पास। निजी स्वामित्व वाले जल स्रोत जो हैं उनके मामले में जो 5:14:07 अग्रणी राज्य हैं टॉप फाइव स्टेट्स हैं उसमें वेस्ट बंगाल यानी पश्चिम बंगाल पहले नंबर पर दूसरे नंबर पर असम तीसरे नंबर पर आंध्र, चौथे नंबर पर उड़ीसा और पांचवें नंबर पर झारखंड आते हैं। उपयोग हो रहे जल स्रोतों में से जो प्रमुख जल स्रोत हैं उनको सिंचाई के बाद जो सबसे ज्यादा यूज़ किया जाता है वो मछली पालने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। पहले नंबर पर इन पानी के स्रोतों का यूज़ किया जाता है इरीगेशन के लिए यानी सिंचाई के लिए। दूसरे नंबर पर इस्तेमाल किया जाता है मछली के पालन के लिए। तो मत्स्य पालन के लिए जहां पर इसका प्रचुरता में इस्तेमाल होता है, ज्यादा इस्तेमाल होता है, उसमें टॉप फाइव है पश्चिम बंगाल, असम, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, फिर आंध्र। और सिंचाई के लिए जहां पर बड़े पैमाने पर यूज़ होता है, उसमें पहले नंबर पर है झारखंड, दूसरे पर आंध्र, तीसरे पर तेलंगाना, चौथे पर वेस्ट बंगाल और गुजरात है पांचवें पर। अपने यहां तो ज्यादातर सिंचाई ग्राउंड वाटर से होती है। मतलब नलकूप सिंचाई होती है। 78% जल स्रोत जो हैं वो मनुष्य द्वारा बनाए हुए हैं। 22% जो है वो प्राकृतिक हैं। और इन सभी जल स्रोतों में से करीब 1.5% या 1.6% 5:15:07 अतिक्रमित हो गए हैं। और ये आंकड़ा सिर्फ थोड़ा सा है। इससे कहीं ज्यादा अतिक्रमण के शिकार हैं। अब इसमें से भी 95.4 ग्रामीण क्षेत्रों में कब्जे कर लिए गए हैं और बाकी शहरी क्षेत्रों में गांव में कब्जा करने की प्रवृत्ति होती है। गढ़ है पटवाकर तुरंत घर बनवाओ। हालांकि यह चीज शहरों में भी है लेकिन गांव में ऐसे खुले आम कब्जा करते हैं। हालांकि अब भूल एक खसरा खतौनी की प्रक्रिया ऑनलाइन होने से चीजें थोड़ी व्यवस्थित हो गई। फिर भी 2937638 जलाशयों के संबंध में पूरी जल विस्तार क्षेत्र की जानकारी है और इसमें से 72.4 ये जो जल विस्तार क्षेत्र है ये 0.5 हेक्टेयर से कम का है और 13.4 का जो जल विस्तार क्षेत्र है वो 0.5 से एक हेक्टेयर के बीच का है। मतलब कहने का तात्पर्य यह है कि इनकी तादाद भले ही ज्यादा हो लेकिन विस्तार उतना नहीं है। क्षेत्रफल से आप इसका अंदाजा बहुत आराम से लगा सकते हैं। ठीक है? मतलब सिर्फ 3.1% ही जल स्रोत ऐसे हैं जिनका कि जल विस्तार यानी पूरा जो फैलाव है पानी के स्रोत का फैलाव है। तालाब हो, पोखरी हो, ताल हो, तलैया हो कुछ 5:16:09 भी तो उसका फैलाव 5 हेक्टेयर से ज्यादा हो। ऐसे सिर्फ 3.1सदी है। बाकी छोटे-छोटे ही ज्यादा है। अब पर्यावरण से जुड़े हुए कुछ मिसलेनियस है। इन्हें देख लीजिए। जैसे कि मैंग्रोव वनस्पति स्थल है। तो मैंग्रोव में आप राज्य देखेंगे वनस्पति कहां-कहां पाई जाती है वो दी हुई है। तो आंध्र में पूर्वी गोदावरी कृष्णा और कोरिंगा तमिलनाडु में मुथुपेट रामानंद पुलीकट काजूबेली पिंजवरम अंडमान निकोबार में उत्तरी अंडमान और निकोबार केरल में कन्नूर और बमबानंद गोवा में गोवा ही पूरा ही मतलब तटीय क्षेत्र महाराष्ट्र में विजयदुर्ग वेलनंदूर बिकौली मुमरा देवी मालवन बसई मनोरी अचला रत्नगिरी देवघर वेलदूर विकौली वैतरणी और मालवन गुजरात में खंभात की खाड़ी और कच्छ की खाड़ी कर्नाटक में साउथ कन्नड़ मुनावर कारवाड़ मंगलोर और कुंडा पुर नेक्स्ट आप देखेंगे वेस्ट बंगाल जो है वहां पर सुंदरवन उड़ीसा में सुवर्ण रेखा धामरा कच्छ वनस्पति अनुवांशिक संसाधन केंद्र चिल्का वितरकणिका महानदी और देवी कड़वा 5:17:10 भारत के जो प्रमुख वनस्पति क्षेत्र हैं इसको आप देखें तो ब्रह्मपुत्र क्षेत्र दिया है विस्तार दिया है विशेषता दी हुई है ब्रह्मपुत्र में ब्रह्मपुत्र और असम क्षेत्र जो है यहां क्षेत्र के नाम के तौर पर असम का इलाका है तो असम के इलाके में ब्रह्मपुत्र और सुरमा घाटी है यहां सदाबहार वन पाए जाते हैं। घने बांसों के झुरमुट और लंबीलंबी घासें पाई जाती हैं। सिंधु का मैदानी क्षेत्र पंजाब, पश्चिमी राजस्थान, उत्तरी गुजरात सूखा और गर्म है। घटीले जंगल और झाड़ियां मिलती हैं। मालाबार का इलाका है, प्रायद्वीपीय तट है। तो यहां पर व्यापारिक फसलें घने जंगल के अलावा पाई जाती हैं। नारियल, सुपारी, काली मिर्च, कॉफी, चाय, रबड़, काजू ये सब मिलते हैं। ठीक बात है। अंडमान निकोबार में आप देखेंगे सदाबहार, अर्ध सदाबहार, कच्छ वनस्पति हर प्रकार के जंगल पाए जाते हैं।कि क्योंकि विषुवत रेखा के ज्यादा नजदीक है अंडमान निकोबार द्वीप समूह। इसीलिए यहां पर पारिस्थितिकी और जो वनस्पतिक विविधता है वो ज्यादा पाई जाती है। इसकी जो जलवायु है अंडमान निकोबार द्वीप समूह की वो समूचे भारत की जलवायु से तनिक अलग है। ये उष्णकटिबंधीय जलवायु के प्रकार का है। काफी हद तक मतलब पूर्ण नहीं 5:18:11 है लेकिन काफी हद तक है। दूरी भी कम है इक्वेटर से। इसके बाद आप देखेंगे वेस्टर्न हिमालयन रीजन को। ये कश्मीर से लेकर कुमायूं तक का है। इसमें शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र चीड़ देवदार शंकुधारी जो वृक्ष हैं कोनफर्स हैं। चौड़ी पत्ती वाले शीतोष्ण पौधे भी पाए जाते हैं। और अल्पाइन रीजन जो है वहां पर सफेद देवदार मिलता है जो शीतोष्ण से ऊपर का इलाका है। ऊंचाई बढ़ती है। सफेद भोज के वृक्ष मिलते हैं। सदाबहार पेड़ भी कहीं-कहीं मिल जाते हैं। सिक्किम से ईस्टर्न दार्जिलिंग तक का जो इलाका है पूर्वी हिमालय का वहां शीतोष्ण इलाके में ओक, जायफल, द्विफल, बड़े फूलों वाले सदाबहार पेड़ और वहां छोटी बेत के जंगल पाए जाते हैं। गंगा का मैदानी इलाका है। कछारी मैदान वहां गेहूं, चावल और गन्ने की खेती होती है। दक्कन के मैदान में पतझड़ वाले जंगल, कई तरह की जंगली झाड़ियां ये सब मिलती है। कुछ पवित्र उपवन भी हैं। उनको भी देख लेते हैं। राज्यवार जानना जरूरी है। जैसे कि पवित्र वन के नाम से आंध्र में, सरना के नाम से बिहार में, गुमपावन के नाम से अरुणाचल में, देवराय और पन्ना के नाम से गोवा में, सरना जहेड़ा के नाम से झारखंड में। देवराय और देवगड़ी महाराष्ट्र में, गमखाप मोहक मणिपुर में, 5:19:12 देवरा काडू देवराबाना भूपन बाना या भुतपन बाना कहा जाता है। नागबाना और देवकन ये कर्नाटक का है। जोहेरा ठाकुरम्मा ये उड़ीसा में हो गया। कोविल काडू पुडुचेरी का स्वामी शोला और कोविल काडू तमिलनाडु का। गरम थान जाहिरा हरी थान सावित्री थान संथालपुरी थान पश्चिम बंगाल ओरान बानी शामलाट दे क्रिस देवबन और जोगमाया राजस्थान का कीलालिंगदो और किला कीलामट्यांग ये मेघालय का हो गया कााउस साराकाबू केरल का सिफिन हिमाचल का अब इसके बाद कुछ यहां पर जो क्लाइंस है उनको देख लेते है क्लाइन जो है ये समुद्र विज्ञान का शब्द है मतलब इसका इस्तेमाल किया जाता है तरल पदार्थ के अंदर एक लंबी परत बनाने के है लेकिन यहां पर हम लंबी परत नहीं बनाते हैं बल्कि एक लंबी रेखा खींचते हैं जिसमें एक समान गुणवत्ता वाली चीज को एक साथ कैटेगराइज किया जाता है। तो ये जो क्लाइन है इनको अलग-अलग रूपों में देखिए सबसे पहले है हेलो। अब हेलो क्या चीज है? तो हेलो्लाइन जो है 5:20:13 ये ऊर्ध्वा ऊर्ध्वधर स्थिरीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका मतलब जल निकाय के अंदर ये लवणता की ढाल होती है। लवणता समान लवणता वाले जो स्थान है। अब इसमें क्या किया गया है इसको आप ऐसे समझे। तो आप समझे कि हेलो का ठीक मतलब क्या होता है? यहां तो जो आपने देखा इसमें ऊर्ध्वाधर लवणता की ढाल जैसा कहा गया है। सीधी बात यह है कि समुद्र की ऐसी परत जहां गहराई के साथ पानी में जो खारापन है यानी लवणता है वो तेजी से बदलती है। मतलब कम खारा पानी आमतौर पर जो ज्यादा खारा पानी होता है उसके ऊपर तैरता है। सीधी बात है कि नमक मिला होगा पानी में ज्यादा मात्रा में नमक होगा। खारापन बढ़ेगा तो यही बात है ना तो वह पानी भारी होगा। वह नीचे रहेगा और जिसमें कम नमक की मात्रा रहेगी वह ऊपर रहेगा। तो जब आप हेलो परत से होकर गुजरते हैं तो पानी का खारापन अचानक बहुत तेजी से बढ़ जाता है या कुछ मामलों में घट भी जाता है। आमतौर पर ये उन स्थानों पर ज्यादा क्लियर दिखाई देता है जहां नदियों का मीठा पानी समुद्र के साथ मिलता है या जहां पर ग्लेशियर से बर्फ पिघल रही होती है और खारे पानी में मिल रही होती है। तो ये तो 5:21:15 हो गया हेलो। इसके बाद आप देखेंगे कैमोक्लाइन को। तो ये कैमोक्लाइन क्या चीज है? समुद्र की वह परत जिसमें कि गहराई के साथ पानी की जो रासायनिक संरचना है केमिकल कंपोजशन है वह अचानक बदल दे बदल बदल जाता है माफ कीजिएगा और बदलाव कैसा होता है बड़ा बदलाव होता है परिवर्तन भी ऐसा वैसा नहीं होता है एक छोटा बदलाव नहीं होता है बड़ा बदलाव होता है मतलब केमोक्लाइन परत के ऊपर पानी में भरपूर ऑक्सीजन और इसके ठीक नीचे आप देखेंगे कि ऑक्सीजन ही नहीं हाइड्रोजन सल्फाइड जैसी गैस आपको जानलेवा गैसें दिखाई देंगी जैसे काला सागर है ये इसका उसका सबसे बढ़िया एग्जांपल है केमोक्लाइन का। उसके बाद आप थर्मोक्लाइन को देख रहे हैं कुछ यहां पर। ठीक है? तो थर्मोक्लाइन क्या चीज है वो भी देख लीजिए। ये ऐसी परत होती है समुद्र में ऐसी लेयर होती है जहां की गहराई के साथ तापमान में अचानक से बहुत तेजी से गिरावट आती है। तापमान तो वैसे भी गहराई में जाने पर घटने लगता है। सूर्य के प्रकाश का प्रभाव कम होने लगता है। लेकिन यहां पर क्या होता है? एकदम से तापमान में गिरावट आती है। तो पानी के तापमान के आधार पर इसको पहचाना 5:22:16 जाता है। सूर्य की किरणें जो पानी की ऊपरी सतह है उसको गर्माती है। नीचे का जो हिस्सा है वो उस संपर्क में आ नहीं पाता। तो यहां अचानक से तापमान गिरने का अनुभव करते हैं। और यह परत जो है ये समुद्र के गर्म ऊपरी पानी को नीचे का जो अत्यधिक ठंडा पानी होता है उससे अलग करती है। तो इसको इसको हम कहते हैं थर्मोक्लाइन। इसके बाद है पिकनोक्कलाइन। ठीक है? पिकनोक लाइन या पाइनुक लाइन कहा जाता है। यहां पानी के घनत्व में बहुत तेज बदलाव आता है। पानी का जो घनत्व है वो बहुत तेजी से परिवर्तित हो जाता है। तो घनत्व का सीधा लेना देना आप बहुत अच्छी तरह से अगर बेसिक साइंस आपने पढ़ा है और आप आपको पढ़ना ही होता है। जनरल स्टडी में उतनी साइंस की जानकारी होनी चाहिए। तो आप जानते हैं कि पानी का पानी के खारेपन का उसके घनत्व से सीधा ताल्लुक। ठीक है? तो तापमान और खारापन दोनों घनत्व को प्रभावित करते हैं। ठंडा और खारा पानी ज्यादा भारी होता है। ज्यादा भारी होता है मतलब ज्यादा डेंसिटी वाला होता है। तो ऐसी स्थिति में पाइनोक्लाइन जो ज़ोन होता है या पिकनोक्कलाइन जो आप कह रहे हैं पाइनोक्लाइन जोन जो होता है जो आप इसको 5:23:18 उच्चारण करिए चाहे पिकनोक्कलाइन कहिए चाहे पाइनोक्लाइन कहिए। इस जोन में पानी का घनत्व गहराई के साथ अचानक बढ़ने लगता है और अचानक बहुत तेज बढ़ने लगता है। तो यह जो महासागरीय जल का ऊर्ध्वाधर मिश्रण होता है यानी वर्टिकल मिक्सिंग होता है उसको रोकने का काम करता है। मतलब ऊपर की परत कुछ अलग व्यवहार करती है महासागर में नीचे की परत कुछ अलग व्यवहार करती है। तो लोग कहते हैं कि समुद्र रहस्यमई। ठीक है? इसके बाद आप इग्नोक्लाइन इको कक्लाइन को देख रहे हैं। इकोलाइन क्या होता है भाई? तो इकोलाइन जो है यह प्रजातियों की संरचना के संदर्भ में एक स्पष्ट सीमा होती है। इकोक्लाइन का प्रवाह जो है यह पर्यावरणीय ढाल के पार होता है। मतलब इसमें ऊंचाई, तापमान, लवणता, गहराई, अजैविक कारकों से संबंधित जो बदलाव होते हैं उन सबको हम शामिल करते हैं। ये सब आपने देखा। इसके अलावा इसमें आप केमोक्लाइन जो शब्द था इसको भी जान चुके हैं। तो कुल मिलाकर ये सारे क्लाइन जो है ये थोड़े पता होने चाहिए। अब यहां जो पशु है और उनकी श्रेणी है उसको भी देख रहे हैं। तो जेरिकोलस एनिमल यह मरुस्थलीय जीव होते हैं। सीमित जल उपलब्धता में अपनी पूरी जिंदगी बिता 5:24:18 लेते हैं और रेगिस्तानी जलवायु और सूखे वातावरण के लिए इनका शरीर इनका व्यवहार और इनकी संरचना सब अनुकूल होते हैं। आरबोरियल एनिमल जो है ये वृक्षय जीव होते हैं। पेड़ों पर रहते हैं। जैसे बंदर और गिलहरी फासोरियल बिलकारी या खनिज जीव होते हैं। ये क्या करते हैं? खुदाई करके जमीन के अंदर घुस जाते हैं। बिल खोदने वाले जितने रोडेंट्स होते हैं, कृंतक होते हैं, कुतुरने वाले प्राणी वो सब इसी कैटेगरी में आते हैं। छछूंदर भी उसी में शामिल और कुछ जो है वो टेरेस्ट्रियल होते हैं। ये जानवर जमीन पर रहते हैं। रेगिस्तानी परिस्थिति के लिए तो अनुकूल नहीं होते हैं लेकिन बाकी जो सामान्य मौसमी दशाएं होती है उसमें ये जमीन पर इत्मीनान से रहते हैं। तो आवास और अनुकूलन के आधार पर दुनिया भर की वनस्पतियों को बांटा गया। अब ये सारे जो फाइट्स हैं उनको आप देख रहे हैं। सबसे पहले है ट्रोपोफाइट। ट्रोपोफाइट ऐसी वनस्पतियां होती हैं जो कि नमी और सूखे के बदलते मौसम के हिसाब से ढली हुई होती हैं। जैसे पर्णपाती जंगल है, समाना है। हाइड्रोफाइट बहुत ज्यादा जहां पानी होता है उसकी सतह पर उगने वाली वनस्पति मतलब जैसे कमल हो गया, कुमुदनी हो गई। हग्रोफाइट मतलब जहां आद्रता बहुत ज्यादा 5:25:20 है, दलदली इलाके हैं, वहां पाई जाती हैं। जेोफाइट्स एकदम सूखे क्षेत्र में पाए जाते हैं। जहां पे पानी बहुत कम होता है। मानसल इनके तने होते हैं और आकार छोटा होता है, कांटेदार होते हैं। जैसे कैक्टस, मेसोफाइट मध्यम तापमान और सामान्य नमी वाले इलाके ज्यादातर जो खेतीहर फसलें होती है, चौड़ी पत्ती वाले जंगल होते हैं। क्रायोफाइट्स मतलब जहां पे क्रायो टेंपरेचर एकदम नीचे का टेंपरेचर जीरो डिग्री से कई डिग्री नीचे माइनस में होता है। वहां पर यह बर्फ में जीवित रहने वाली वनस्पतियां होती हैं। लाइकेन और काई वनस्पतियां कम ये मध्यम प्रजातियां होती हैं। इसके बाद है हेलोफाइट। यह लवणीय जल में पैदा होते हैं। खारे पानी में जैसे मैंग्रोव है। लिथोफाइट जो है यह कठोर चट्टानों पर उग जाती हैं। पायरोफाइट जो है यह मोटी छाल वाली और अग्नि को रोकने वाली वनस्पतियां होती है जो कि घने जंगलों में आमतौर पर पाई जाती हैं। यह जब जंगल में प्राकृतिक तौर पर आग लगती है नेचुरली फॉरेस्ट फायर लगती है तो उसको कंट्रोल करने का काम करती हैं। प्रिटोफाइट जो है ये बहुत ज्यादा गहरी जड़ों वाली वनस्पतियां होती हैं और ये आमतौर पर जो भूमिगत जल होता है, संतृप्ति क्षेत्र होता है वहां से पानी बटोर ले आते 5:26:21 हैं। जैसे खेजड़ी और बबूल। तो ये आमतौर पर जेफाइट्स का ही नमूना है। मतलब जो मरुस्थलीय वनस्पतियां होती हैं वही इस प्रकार की होती हैं। ठीक है? नेक्स्ट आप तापमान की स्थिति के आधार पर वनस्पतियों को देख रहे हैं। तो सबसे पहले इसमें नंबर आएगा मेगाथर्म का। पूरे साल भर इन्हें ऊंचा तापमान और नमी की आवश्यकता अत्यधिक नमी की आवश्यकता होती है। मतलब सीधी बात है। उष्णकटिबंधीय वर्षा वनों की चर्चा हो रही है। ठीक है? उष्णकटिबंधीय वर्षा वन ही इस प्रकार के होते हैं। जिन्हें खूब सारा पानी और खूब सारा टेंपरेचर चाहिए होता है। मेसोथर्म जो है इन्हें गर्मियों में ज्यादा तापमान और सर्दियों में कम तापमान की आवश्यकता होती है। उपोष्ण कटिबंधीय और शीतोष्ण पर्णपाती ऐसे होते हैं। माइक्रोथर्म को पूरे साल भर कम तापमान ही चाहिए होता है। अल्पाइन क्षेत्र के जो जंगल है बोरियल टैगा शंकुधारी है ना हेक्स हेगिस्टोथर्म जो है ये बहुत ज्यादा ठंडे बर्फीले इलाकों में पैदा पैदा होते हैं। जहां गर्मी का मौसम बहुत छोटा या नहीं के बराबर होता है। तो टुंड्रा वनस्पतियां जिसमें कि लाइकेन और काई आते हैं और मिट्टी से कई मीटर नीचे बर्फ के ढकी हुई होती है। वहां पर ये पाए जाते हैं। यूरथर्मल ऐसे पौधे और जीव होते 5:27:24 हैं जो कि वर्ष भर तापमान में एक विस्तृत बदलाव को सहन कर सकते हैं। मतलब टेंपरेचर में बहुत सारा वेरिएशन आता है। स्टेनोथर्मल ऐसे प्राणी मतलब ऐसी जीव जातियां होती हैं। खासतौर पर पौधे होते हैं जो कि तापमान की बहुत छोटी सी लाइन को को ही सहन कर सकते हैं। मतलब तापमान में जरा सा अगर अधिक बदलाव हो गया। बहुत मामूली बदलाव हुआ तब तो चल जाएगा लेकिन अगर ज्यादा थोड़ा सा भी हुआ तो इनके लिए जानलेवा होता है। मतलब निहायत ही संवेदनशील होते हैं। कृषि प्रौद्योगिकी में अगर आप देखेंगे तो हाइड्रोपोनिक्स जो है ये जल संवर्धन की विधि होती है और इसमें खेती मिट्टी के लिए मतलब जो हाइड्रोपोनिक खेती होती है ये मिट्टी की उपस्थिति के बिना पानी के अंदर पोषक पदार्थों को घोल कर की जाती है। यानी पानी में ही न्यूट्रिएंट्स घोल दिए जाते हैं और उसी में पौधों को उगाया जाता है। तो पौधे उग जाते हैं। एक्वापोनिक्स इसमें मछली और पौध उत्पादन दोनों एक साथ किया जाता है। दो प्रजातियां इसमें जल कृषि हाइड्रोपोनिक्स इसमें शामिल होती हैं। एरोपोनिक्स मिट्टी की आवश्यकता के बिना धुंध या हवा के वातावरण में पौधा उगाया जाता है। वातावरण में तैरते हुए ये जो 5:28:24 हाइड्रोपोनिक घोल है उसमें जड़ों मतलब उन्हीं का जड़ों पर छिड़काव किया जाता है। एरोपोनिक टावर ये एग्रोटनॉमी यूरोप का एक वर्टिकल गार्डन है जो कि प्राकृतिक रूप से भोजन उगाने के लिए टावरों का इस्तेमाल करता है। सामान्य जैविक खेती में इस्तेमाल होने वाले 95% पानी को संरक्षित करता है और 35 से 65% अधिक पोषक तत्वों वाली जो सब्जियां और फल बूटियां इत्यादि हैं सब्जियां हैं जड़ी बूटियां हैं उनको प्राप्त करता है। तो यहां पर औषधियां किससे कौन सी प्राप्त होती है? वो भी दिया हुआ है। उसको देखिए। कैफीन ये कहां से मिलता है? चाय और कॉफी से। मन को स्फूर्ति देता है। साइक्लो एक्टिव साइको एक्टिव यह उत्तेजक औषधि है। ज्यादा मात्रा में सेवन करने पर आपका तंत्रिका तंत्र और पूरा शरीर प्रभावित होता है। लेकिन कम मात्रा में सीमित तरीके से सेवन करने पर यह नींद भगाने का काम करता है। टेट्रासाइक्लन बैक्टीरियम से प्राप्त होता है। जीवाणु नाशक है। पेनिसिलिन पेनिसिलियम से प्राप्त होता है जो कि एक कवक है। ध्यान दीजिएगा। यह जीवाणु नाशक होने के साथ-साथ जीवाणु रोधी भी है। पपेन पपीते से प्राप्त होता है। यह बहुत ज्यादा पाचक होता है। मारफीन 5:29:25 पोस्ते से प्राप्त होता है। पीड़ाहारी दर्द निवारक है। मेंथाल मेंथा से प्राप्त होता है। बाहरी त्वचा पे आप लगाते हैं तो दर्द कम हो जाता है। ए्रोपीन बेलाडोना से प्राप्त होता है। दर्द निवारक है। कुनैन सिंकोना से प्राप्त होता है। मलेरिया ज्वर को दूर रखने का काम करता है। कोकेन कोको से प्राप्त होता है। पीड़ाहारी और संवेदनहारी है। हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन सिनकोना के पेड़ की छाल से मिलता है। मलेरिया रोधी है। इसके बाद आप भारतीय उत्सर्जन मानक को देख रहे हैं। तो यहां पर बीएस स्टेज 1 2 3 ऐसे करके जो वाहनों पर आप लिखा देखते हैं ना तो वो चीज पहला मानक है भारत स्टेज वन यूरो वन इसका नाम है। समय था सन 2000 का राष्ट्रीय स्तर पर इसको लागू किया गया। दूसरा है टू यूरो 20034 फिर 20045। राजधानी क्षेत्र और 13 शहरों में पहले स्टेप में और दूसरे स्टेप में आप देखेंगे राष्ट्रीय स्तर पर। भारत स्टेज 3 यूरो 3 20045 में 13 शहर और राजधानी उसके बाद पूरे देश में 2010 में भारत स्टेज फोर को आप देखेंगे 2017 नेशनल लेवल पर फिर यूरो फाइव भारत भारत स्टेज फाइव बीएस5 इसको लिखा जाता है 5:30:27 तो नेशनल लेवल पर 2017 में और अभी चल रहा है BS6 या यूरो सिक्स 1 अप्रैल 2020 से नेशनल लेवल पर अब यहां ग्रीन हाउस गैसेस उनके सोर्सेस और सोर्स और इफेक्ट जो है वो दिए हुए हैं। तो सबसे महत्वपूर्ण और सबसे बड़ी विलयन है ग्रीन हाउस गैस में कार्बन डाइऑक्साइड। ऊर्जा उत्पादन के लिए जो हम फासिल फ्यूल जलाते हैं वहां से कार्बन डाइऑक्साइड मतलब कार्बन मूल रूप से जो संचित होता है वो ऑक्सीजन से क्रिया करके कार्बन डाइऑक्साइड के रूप में विमोचित होता है निकलता है। ठीक है? तो पृथ्वी का तापमान बढ़ा रहा है। ज्यादा मात्रा में रहेगी तो तापमान बढ़ाएगी क्योंकि ये अपने अंदर टेंपरेचर को अब्सॉर्ब करने की क्षमता रखती है। सल्फर डाइऑक्साइड दूसरे नंबर की ग्रीन हाउस गैस है। सल्फर युक्त ईंधन जलेगा तो मिलेगी। इससे अम्ल वर्षा होती है। नाइट्रोजन ऑक्साइड भट्टियों में ईंधन के जलने से ताप वृद्धि तो होती ही है। साथ में सांस के रोग पकड़ लेते हैं। ओजोन ओजोन अगर समताप मंडल में है तो फिर जीवनदाई नहीं है। लेकिन अगर यह क्षोभ मंडल में पहुंच गई यानी ट्रोपोस्फीयर में पहुंच गई और यहां बन गई सेकेंडरी पोलटेंट के तौर पर तो ये जानलेवा हो सकती है। तो हाइड्रोकार्बन और नाइट्रोजन के ऑक्साइडों की उपस्थिति में ये सेकेंडरी पोलटेंट यानी 5:31:28 द्वितीयक प्रदूषक के रूप में बनती है। और हां यहां पर अगर क्षोभ मंडल में यह रहेगी तो यह वैश्विक तापमान बढ़ाएगी और फेफड़ों में क्षति हो सकती है। मतलब फेफड़े क्षतिग्रस्त हो सकते हैं। मिथेन भी ग्रीन हाउस गैस है। प्राकृतिक तो है ही है। जानवर और मनुष्य यहां तक कि इसके स्रोत होते हैं। चावल के खेत भी स्रोत होते हैं। कोयला की कोयले की जो खदानें होती हैं वो स्रोत हैं। अपशिष्ट पदार्थों से ये रिलीज़ होती है। ये भी पृथ्वी का तापमान बढ़ाती है। क्लोरोफ्लोरोकार्बन प्रशीतन उपकरण में इस्तेमाल तो फिर क्लोरोफ्लोरोकार्बन जो है ये प्रशीतन उपकरण के तौर पर इस्तेमाल होता है। प्रशीतन उपकरणों में इस्तेमाल होता है ठंडक रखने के लिए। रेफ्रिजरेटर, एसी ये सब। ठीक है? और ये लंबे समय तक वातावरण में बना रहता है। तो ओजोन क्षरण के लिए तो उत्तरदाई है। ताप भी बढ़ाता है। कई सारे और हाइड्रोकार्बन है जो कि औद्योगिक क्रियाओं में निकलते हैं। तापमान बढ़ाते हैं। आंखों में जलन पैदा करते हैं। फ्लाई ऐश कोयले का जब दहन किया जाता है, कोयला जलाया जाता है तो बहुत बारीक राख के कण निकलते हैं। वह भी इस दिशा में काम करते हैं। अब आगे चलते हैं। संविधान की जो सूचियां हैं संघ सूची, राज्य सूची, 5:32:28 समवर्ती उनमें पर्यावरण से संबंधित कौन-कौन से विषय हैं? तो संघीय सूची में परमाणु ऊर्जा, खनिज स्रोत, प्रतिरक्षा, अंतरराष्ट्रीय मामले, अंतरराष्ट्रीय परिवहन, जहाज, रानी, मुख्य पोत पत्तन ये सारे मामले। राज्य सूची में जन स्वास्थ्य, स्वच्छता, अस्पताल, कृषि, सिंचाई, जल निकासी, श्मशान और कब्रिस्तान ये सारे विषय हैं जिनका संबंध प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से पर्यावरण से। समवर्ती सूची यानी कनकरेंट लिस्ट जो है उसमें वन, वन्य जीव, परिवार कल्याण, खाद्य सुरक्षा और पुरातात्विक स्थल आते हैं। अंटार्कटिका में भारत के जो अनुसंधान केंद्र हैं उन पर भी लगे हाथ निगाह डाल लेते हैं। जैसे कि दक्षिण गंगोत्री 1983-84 का है। यह भारत का पहला अनुसंधान केंद्र था, लेकिन, बर्फ में डूब गया समय के साथ, तो अब काम के लायक बचा नहीं है। इसको बंद करना पड़ा। मैत्री 88 में स्थापित हुआ था। दूसरा है और यह शिमचीर मरुद्यान नाम की जो पहाड़ी है उस पर स्थित है पूर्वी अंटार्कटिका में और भारतीय 2012 का है लेटेस्ट यह लारसे पहाड़ी के पास में जो प्रिट्स वे है उस पर स्थित है और ये अभी वर्तमान में काम कर 5:33:29 रहा है। नेशनल सेंटर फॉर अंटार्कटिक एंड ओशन रिसर्च केंद्र ये गोवा का जो वास्कोडि गामा है वहां पर स्थित है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय भारत सरकार का जो है उसी के अधीन इसको स्थापित किया गया था 25 मई 1998 को। तो ध्रुवीय और दक्षिण महासागरीय जो वैज्ञानिक गतिविधियां है उसको यह संचालित करता है। आगे बढ़ते हैं। चार प्रकार के कार्बन पाए जाते हैं। ठीक है? पर्यावरण में चार प्रकार के कार्बन पाए जाते हैं और इन पर प्रश्न पूछा जाता है। तो सबसे पहले नंबर पर पाया जाता है ब्लू कार्बन। मतलब दुनिया भर के महासागरों और जो तटीय पारिस्थितिकी तंत्र हैं उनके द्वारा सोखा गया कार्बन। अवशोषित कार्बन जो है उसी को कहते हैं ब्लू कार्बन। तीन प्रकार मैंग्रोव, समुद्री घास और ज्वारीय दलदल। यह ब्लू कार्बन का आधे से अधिक हिस्सा संग्रहित करते हैं। तो यह क्षेत्र जंगलों की तुलना में बहुत तेजी गति से कार्बन कार्बन को अवशोषित करते हैं, संग्रहित करते हैं। और हां, लाखों साल तक ऐसा कर सकते हैं। बशर्त कि ये खुद लाखों साल तक बने रहे। तटीय मिट्टी में पाया जाने वाला कार्बन हजारों साल पुराना होता है। प्राय 5:34:30 हजारों साल पुराना होता है क्योंकि इनके सोखने की क्षमता आप देख ही रहे हैं। नेक्स्ट आप देखेंगे, ब्लैक कार्बन। अल्पकालिक प्रदूषक होता है यह और ग्रह को गर्म करने के लिए उत्तरदाई है। ब्लैक कार्बन को ही हम लोग सामान्य भाषा में कहते हैं कालिक। यह पर्टिकुलेट मैटर 2.5 का हिस्सा है। जलवायु परिवर्तन में इसका योगदान आप जानते ही हैं। तो जीवाश्म ईंधन को अगर अधूरे तौर पर जलाया जाए तो यह उत्पन्न होता है। ब्राउन कार्बन जो है ये भूरा धुआं उत्पन्न करता है। ब्लैक कार्बन और ब्राउन कार्बन दोनों वातावरण में छोड़े जाते हैं तो ये आपस में साथ-साथ मिलजुलकर रहते हैं। और यह वातावरण में जो तापमान का पैटर्न है, बादल बनने की प्रक्रिया है, सबको प्रभावित करते हैं। यहां तक कि जो सोलर एनर्जी का पैटर्न है और बादलों की प्रवृत्ति है, उसको भी ये बदल देते हैं। मतलब यह विनाशकारी होते हैं, लाभदायक नहीं होते हैं। इसके बाद नंबर आता है ग्रीन कार्बन का। यह वैश्विक कार्बन चक्र में सबसे इंपॉर्टेंट होता है और यह प्राकृतिक वन में संग्रहित कार्बन होता है जो कि प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से अलग हुआ होता है। कैसे अलग? कार्बन डाइऑक्साइड को पौधों ने खींचा और उसमें से अपने काम के 5:35:31 पदार्थों को निकाला और कार्बन को अपने अंदर संचित कर लिया। ठीक? तो इस प्रकार से ये पृथक हुआ ग्रीन कार्बन जो कि पौधों के अंदर संचित। आगे बढ़ते हैं। तो अगला जो हमारा है वन लाइनर का मामला है। इसमें जितने भी वन लाइनर है वह एक साथ सजोए गए हैं। जैसे कि संसाधनों के उपयोग तथा भविष्य के लिए उनके संरक्षण की आवश्यकता को संतुलित करने की जो प्रक्रिया है उसको कहा जाता है सतत विकास। मतलब हम इस्तेमाल करेंगे अगली जो पीढ़ी है आने वाली जो नस्लें हैं उनके लिए भी सुरक्षित रखें। गैर परंपरागत ऊर्जा के स्रोत और आने वाली नस्लों में सिर्फ अपने जो मनुष्य द्वारा पैदा किए गए बच्चे उत्तराधिकारी हैं वही नहीं अन्य जीव जातियां भी गैर परंपरागत ऊर्जा के वे स्रोत जो कि नवीकरणीय हैं। वैश्विक ऊर्जा वैश्विक सूचना संरचना और राष्ट्रीय सांख्यिकीय व्यवस्थाओं द्वारा सतत क्षेत्रीय आधार पर संकलित सूचना के आधार पर जो संधारणीय विकास लक्ष्य हैं उनकी रिपोर्ट को पेश किया जाता है। मतलब चारों ओर से डाटा इकट्ठा किया जाता है। सीधी बात प्राकृतिक संसाधनों का वर्तमान पीढ़ी द्वारा इस प्रकार से इस्तेमाल किया जाए कि इनका न्यूनतम क्षरण हो और आगे के लिए हम 5:36:33 इन्हें संरक्षित रख पाए। प्रकृति को कम से कम नुकसान पहुंचाए। तो यही है सस्टेनेबल डेवलपमेंट। इन सी2 कंजर्वेशन आप जानते ही हैं जो प्रजाति जहां की है उसको वहीं पर उसकी अनुवांशिक विविधता के साथ संरक्षित करना, उसे सुरक्षा देना, उसका आवास परिवर्तित ना करना, उसके हैबिटेट को ना बदलना। उसके हैबिटेट, उसके नीश को ना बदलना ये कहलाता है इनसी2 कंजर्वेशन। और यह ज्यादा आसान होता है। संभव हो ज्यादातर मामलों में अगर संभव हो और उसका जो नेचुरल हैबिटेट है वह पूरी तरह से तबाह ना हुआ हो तो हर प्रजाति को इन सी2 कंजर्वेशन के अंतर्गत ही बचाया जाना चाहिए। क्योंकि x सी2 कंजर्वेशन में बहुत तरह की दिक्कतें आती हैं और ज्यादा संभावना होती है कि वो प्रजाति सर्वाइव नहीं कर पाएगी। इसके बाद आप देखें यहां पर कि प्राकृतिक वास का विनाश जो है ये सबसे बड़ा उत्तरदाई कारण है किसी भी जैव प्रजाति के विलुप्त कर मतलब विलोपन का। राजीव गांधी जैव प्रौद्योगिकी प्रौद्योगिकी केंद्र जो है वह केरल में है और साथ ही साथ आप यहां पर देख रहे हैं कि केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान ये जोधपुर में प्रकाश संश्लेषण यानी फोटोसिंथेसिस के जरिए पृथ्वी के वायुमंडल 5:37:33 में मौजूद कुल ऑक्सीजन का सबसे बड़ा हिस्सा जो है उत्सर्जित करने का काम ये अमेज़न के जंगल करते हैं। लेकिन ध्यान दीजिएगा कि ये स्थलीय पारिस्थितिकी की बात हो रही है। टेरेस्ट्रियल जो इकोसिस्टम है उसकी बात हो रही है। जो मैरिन इकोसिस्टम या इक्वाटिक इकोसिस्टम है उसमें महासागर के अंदर जो उपस्थित प्रकाश संश्लेषण करने वाले घटक हैं उनकी बात नहीं हो रही है। वो अलग से हैं और उनकी तादाद ज्यादा है। मन्नार की खाड़ी बायोस्फीयर रिजर्व समुद्री जैव विविधता के दृष्टिकोण से दुनिया का सबसे समृद्ध क्षेत्र है। इसमें ऐश्वरी आती है। समुद्र तट आता है। आसपास के जंगल आते हैं। समुद्री घास है। प्रवाल भित्ति है। नमकीन पानी के दलदल है। मैंग्रोव है। इसके साथ-साथ 21 द्वीप इस प्रकार से समृद्ध अवस्था में मौजूद है। मतलब इस क्षेत्र में किसी भी तरह की व्यवसायिक या टूरिस्ट एक्टिविटीज को परमिट नहीं दिया जाना चाहिए। लेकिन अब आप देख रहे हैं कि पूरा क्षेत्र जो है वह कवर किया जा रहा है। कहां अरब अरब सागर और बंगाल की खाड़ी चारों तरफ टूरिज्म और व्यवसायकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके बाद आप आगे देखें किसी स्थान पर अधिकतम तापमान मैदानी इलाकों में 40° सेल्सियस और उससे अधिक पहाड़ी क्षेत्रों 5:38:34 में कम से कम 30° सेल्सियस या उससे अधिक पहुंच जाता है तो हीट वेव मतलब पर्वत में अगर 30° से ऊपर पहुंचा तो हीट वेव है और अपने यहां 40 से ऊपर पहुंच गया तो हीट वेव है। अपने यहां तो पर 12ों महीने हीट वेव ही चलती रहती है। अब आगे देखें मतलब सर्दी के कुछ जो एकदम कड़क महीने हैं उनको छोड़ दिया जाए तो गर्मी का मौसम ही तो आमतौर पर बना रहता है और भविष्य में वैसा ही होगा भी। अधिकतम तापमान विचलन सामान्य से 4.5 डिग्री सेल्सियस अधिक अथवा कम होता है। आमतौर पर अधिक होता है तो उसको हीट वेव कहा जाता है। नोकनी सिंड्रोम ये पूछा जाता है कौन से कौन सी बीमारी किस प्रदूषण से हो रही है? तो नौकनी सिंड्रोम जो है ये फ्लोराइड के प्रदूषण की वजह से होता है। हाइड्रोजन फ्यूल सेल विद्युत उत्पन्न करने के लिए हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को मिश्रित करते हैं। जिससे कि जल और ऊष्मा उत्सर्जित होते हैं। पानी और ऊष्मा उत्सर्जित होते हैं। ध्यान दीजिएगा। अधिकतर रेगिस्तानी पौधे रात के समय अपने फूलों को खिलाते हैं। दिन में खिलेंगे तो जलकर भस्म हो जाएंगे। रेगिस्तानी कीड़े रात के समय ही सक्रिय भी होते हैं और ये फूल भी दिन में सूर्य के तीखे प्रकाश और उतनी गर्मी में सर्वाइव नहीं कर पाएंगे। दोनों चीजें पौधे 5:39:35 नाइट्रोजन को नाइट्रेट के रूप में ग्रहण करते हैं। कोरिंगा मैंग्रोव जो है ये गोदावरी के डेल्टा पर है। ये सब फुटकर बातें हैं लेकिन काम की है। और ये फुटकर बातें आई कहां से है? ये सब पीवाईक्यू ही तो है। जितने आप देख रहे हैं फैक्ट ये सब प्रीवियस ईयर क्वेश्चन से ही उठाए गए हैं। कोरिंगा मैग्रोव जो है ये गोदावरी के डेल्टा पर स्थित है। अर्ध स्थलीय जो पारिस्थितिकी तंत्र है उसमें आप देखेंगे तो पर्वत का पारिस्थितिकी तंत्र आएगा। निम्न स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र आएगा। अर्ध शुष्क जो पारिस्थितिकी तंत्र है वो भी आएगा। सबसे ज्यादा जो राष्ट्रीय उद्यान है वह एमपी में है और वन्य जीव अभयारण्य सबसे ज्यादा अंडमान निकोबार में है। 2001 में पौध किस्मों और किसानों के अधिकारों के संरक्षण का अधिनियम पारित किया गया था। वनस्पति वायु का क्षमा कीजिएगा। वनस्पति जलवायु का उचित मापदंड है। ये कोपेन का कथन था। कोपेन का जलवायु वर्गीकरण आप पढ़ते हैं ना तो उसका कथन था। खैर, वृक्ष उपोष्ण कटिबंधीय वनों में पाए जाते हैं और सभी जीवित जातियां जो हैं वो जीवित रहने के लिए एक दूसरे परस्पर निर्भर रहती हैं। संबंधित रहती हैं। जैवमंडल ऐसे ही काम करता है और ऐसे ही बनता है पूरा पारितंत्र। यूकेलिप्टस एक दिन में 7 आठ 5:40:37 लीटर पानी पी जाता है जमीन से तो ये पर्यावरण के लिए संकट है। डाई क्लोरो मतलब ये उन इलाकों में लगाया गया था जहां दलदल हुआ करते थे। दलदली जमीन हुआ करती थी और इसने कुछ ही महीनों में कुछ वर्षों में दलदलों को सुखा दिया। तो यह पानी बहुत ज्यादा खींचता है जमीन से। डाई क्लोरो डाईफिनाइल ट्राई क्लोरो इथेन यानी डीडीटी ये जैव अजैव अपघटनीय है। मतलब जैविक अपघटन इसका संभव नहीं है। ये लंबे समय तक वातावरण में बना रहेगा। ऐसा प्रदूषक है और अब तो मच्छर भी इसके इसका कहना नहीं मानते हैं। मच्छर भी इसके प्रति अनुकूलित हो चुके हैं। तो ये किसी काम का नहीं है। भारत में सौर ऊर्जा द्वारा संचालित जो पहला हवाई अड्डा है वो कोचीन है। लिमनेटिक क्षेत्र में पादप लवक अधिकता में वृद्धि करते हैं और ये पानी का खुला क्षेत्र होता है। मतलब इतने ज्यादा पादप लवक हो जाते हैं कि पूरा पानी हरा हो जाता है। ऊन एक जैव निम्नीकरण पदार्थ है। बशर्त कि ऊन प्राकृतिक हो। आर्सेनिक प्रदूषित जल में मिलता है कहां पर? प्राकृतिक तौर पर प्रदूषित पानी में आर्सेनिक बांग्लादेश में मिलता है बिना किसी बाहरी अशुद्धि को मिलाए। कोयला, गोबर और लकड़ी बायोमास ऊर्जा के स्रोत हैं और पारिस्थितिकी निकेत 5:41:38 उन श्रेणियों को रिप्रेजेंट करता है, प्रतिनिधित्व करता है जो कि संसाधनों के उपभोग और पारिस्थितिकी तंत्र में उसकी कार्यात्मक भूमिका को सहन करते हैं। मतलब सीधी बात है कि निकेत हर प्रजाति का भिन्न होता है। गंगा एक्शन प्लान को शुरू किया गया 1985 में। और हमारे द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली ऊर्जा का ज्यादातर जो स्रोत है वो संग्रहित सौर ऊर्जा का रिप्रेजेंटेशन है। जैसे कि बायोमास एनर्जी, पवन ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा ये सब सूर्य की ऊर्जा का ही व्युत्पन्न है। वहीं से डिराइव हुआ है। चाहे डायरेक्ट आप उसे महसूस करें या इनडायरेक्टली देखें। केंद्रीय पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 5 अक्टूबर को डॉल्फिन डे मनाने की घोषणा की। और नेकनामपुर झील पर बनाया गया जो फ्लोटिंग ट्रीटमेंट वेटलैंड है, इसका उद्घाटन 2 फरवरी 2018 को किया गया था। 3000 स्क्वायर फीट में ये फैला हुआ है। एफटीडब्ल्यू ध्रुवंश हैदराबाद मेट्रोपॉलिटन डेवलपमेंट अथॉरिटी और रंग रेड्डी जिला प्रशासन जो है उसका ये जॉइंट वेंचर है एक संयुक्त प्रयास इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी दर्ज किया गया है। पारिस्थितिकी शब्द जो है ये जर्मन जीव वैज्ञानिक थे अर्नेनेस्ट हेकेल या 5:42:38 एनेस्ट हेल इन्होंने 1866 में इस्तेमाल किया था। फ्रेडरिक क्लीमेंट्स ने पारिस्थितिकी को समुदाय का विज्ञान माना है। समुदाय पारिस्थितिकी के अध्ययन के लिए जैविक समुदाय अध्ययन की इकाई होती है। और नीश थ्योरी जो है ये पारिस्थितिकी तंत्र ऊर्जा प्रवाह और पदार्थों के पुनर्चक्रण की जो सीमाएं हैं उसको कवर करती है। मतलब सारे रेफरेंसेस को यूज़ करती है। आपको ये ध्यान देना है। नेक्स्ट आप यहां पर देख रहे हैं। दो भिन्न समुदायों के बीच का जो संक्रांति क्षेत्र यानी मिश्रित क्षेत्र होता है उसको हम कहते हैं इकोन। जीव और वातावरण के बीच का जो पारिस्थितिकी संबंध है, पारस्परिक संबंध है, उसको पारिस्थितिकी कहा जाता है। जातियों का उद्भव पारिस्थितिकी तंत्र की गति और जो गतिक प्रवृत्ति है, उसको प्रदर्शित करता है। पारिस्थितिकी तंत्र स्थिर नहीं होता है, गतिमान होता है। चार्ल्स डार्विन ने प्राकृतिक चयन यानी नेचुरल सिलेक्शन की जो संकल्पना है उसको प्रतिपादित किया था। प्राकृतिक चयन की संकल्पना यह कहती है कि जीव संख्या में वंशानुगत विभिन्नताएं जाति अलग-अलग जातियों के उद्भव का आधार होती है। कहने का मतलब यह है कि दो जीव आपस में संयोग करके तीसरे जीव का निर्माण करते 5:43:39 हैं। यह जो तीसरा प्राणी बनता है वो इन दोनों जीवों के लक्षणों को लेकर तो पैदा होता है लेकिन इन दोनों जीवों से भिन्न होता है। यहां तक कि उसकी डीएनए संरचना भी भिन्न होती है। सारा मतलब 100% डीएनए मैचिंग नहीं हो पाती है। तो यह कुछ अलग लक्षण लेकर पैदा होता है। कुछ अपने माता-पिता से, कुछ अपने भिन्न लक्षण। और फिर जब यह किसी और से सहयोग करके फिर अनेक अन्य जीवों को उत्पन्न करता है, तो उनके लक्षण और भी भिन्न होते हैं। ऐसे ही विभिन्न प्रजातियों और जातियों का निर्माण होता है। इसके बाद आप देख रहे हैं यहां पर चरम समुदाय वाले प्रौढ़ पारिस्थितिकी तंत्र की जातियों में विविधता ज्यादा होती है और यह ज्यादा स्थिर होते हैं। जितनी ज्यादा डायवर्सिटी होगी, उतनी ज्यादा जितनी ज्यादा विविधता होगी, जितनी ज्यादा डायवर्सिटी होगी, उतनी ज्यादा स्थिरता होगी। पारिस्थितिकी तंत्र शब्द का सबसे पहली बार इस्तेमाल टसले महोदय ने किया था 1935 में और यह एक गतिमान तंत्र है। बायोम और निवास क्षेत्र या भौतिक पर्यावरण से ये मिलकर बनता है। सौर ऊर्जा सबसे महत्वपूर्ण है और वही मुख्य प्रेरक बल है। उसी से सब कुछ चलता है। ऊर्जा एक दिशा में चलती है और हर ट्रॉपिक लेवल पर इसकी मात्रा कम होती जाती है। इकोक्लाइन एक प्रवणता सूचक 5:44:41 है। पौधों के समुदाय और भौतिक दशाओं में परिवर्तन को दर्शाता है। तो ये क्लाइंस हमने पीछे देखे थे। समस्त स्वपोषित पादप शैवाल जो है यह प्राथमिक उत्पादक की श्रेणी में आते हैं क्योंकि ये प्रकाश संश्लेषण करके भोजन का निर्माण स्वयं करते हैं और दूसरों को भी खिलाते हैं। अपघटन की क्रिया मृतोपजीवी कवक यानी फंगी और जीवाणुओं यानी बैक्टीरिया के द्वारा होती है। क्लोरोफिल युक्त पौधे ही पारिस्थितिकी तंत्र में उत्पादक होते हैं। जैसे काई, घास और पेड़। बाकी प्रकाश संश्लेषण की क्रिया जो है इसमें कार्बन डाइऑक्साइड का रिडक्शन होता है और जल का ऑक्सीडेशन होता है। पौधों का मुख्य काम संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भोजन उत्पादन और ऊर्जा संचयन होता है। प्राइमरी प्रोड्यूसर्स इनको कहा जाता है और अपघटक जो है वो इसके वेंजर्स कहे जाते हैं यानी प्रकृति के सफाई कर्मी कहे जाते हैं। जो नम उष्णकटिबंधीय क्षेत्र हैं वहां पर अपघटन बहुत तेजी से होता है। तापमान ऊंचा रहे और नमी रहे। लिग्निन काइटिन यह पौधों में ज्यादा मात्रा में होने पर अपघटन की दर घट जाती है। ठीक है? अगर यह ज्यादा हुआ तो अपर्द जिसमें कि नाइट्रोजन प्रचुरता 5:45:41 में होती है और लिग्नीन की मात्रा कम होती है। यह बहुत तेजी से विघटित होता है। दुनिया का विशालतम और सबसे स्थिर पारिस्थितिकी तंत्र समुद्र है। जैवमंडल एक भौगोलिक क्षेत्र है जिसमें कि सभी पारिस्थितिकी तत्वों को एक साथ सम्मिलित करके एक बड़ी इकाई बन सकती है। मैग्नीशियम पौधों के जो पत्ते होते हैं उनके क्लोरोप्लास्ट में पाया जाता है। और ऊर्जा प्रवाह खनिज चक्र पारितंत्र का गतिक हृदय कहलाते हैं। प्रकाश संश्लेषण के दौरान क्लोरोफिल प्रकाश संवेदी कारक के रूप में काम करता है। प्रकाश के प्रति संवेदना को जागृत करता है। बैंगनी रंग का जो प्रकाश होता है उसमें सबसे कम और लाल रंग के प्रकाश में सबसे ज्यादा प्रकाश संश्लेषण होता है। कृत्रिम प्रकाश में भी प्रकाश संश्लेषण हो सकता है। इसमें कोई संदेह नहीं। प्रकाश संश्लेषण का केंद्र पर्ण हरित यानी क्लोरोप्लास्ट होता है। क्लोरोफिल प्राय जो पत्तियां होती है उन्हीं में पाया जाता है। शैवाल और हाइड्रला जो कि पानी के अंदर पाए जाते हैं उनकी पूरी काया ही प्रखर संश्लेषण करती है। और प्रकाशिक अभिक्रिया क्लिक कोशिका का जो क्लोरोप्लास्ट होता है उसके अंदर ग्रेना में होती है। अप्रकाश प्रकाशिक अभिक्रिया जो है वो स्ट्रोमा में होती है। 5:46:41 दोनों नाम याद रखिएगा। कम प्रकाश की तीव्रता और उच्च प्रकाश की तीव्रता में फर्क क्या है? जब आप कम से तीव्र की ओर बढ़ेंगे तो प्रकाश संश्लेषण की दर बढ़ जाएगी क्योंकि प्रकाश संश्लेषण की प्रतिक्रियाएं जो है उनको संचालित करने के लिए ज्यादा प्रकाश उपलब्ध होगा। जितना ज्यादा प्रकाश उतनी तेज प्रक्रिया और जैसे ही आप कम तीव्रता वाले प्रकाश की श्रेणी में पहुंचेंगे तो वहां घट जाएगी दर। हां ये है कि बहुत ज्यादा तीव्रता अगर हो गई प्रकाश अति तीव्र हो गया। उसका जो विकिरण है वो उच्च पहुंच गया तो ऐसी स्थिति में पहले तो जानलेवा स्तर पर प्रकाश संश्लेषण की दर बढ़ेगी। उसके बाद पौधे की क्षमता नष्ट होने लगेगी और पौधा मरने की कगार पे पहुंच जाएगा। किसी भी क्षेत्र में बायोमास की वृद्धि दर क्योंकि एक सीमा होती है हर चीज की। ऐसा नहीं है कि आप 10 दिन की सौर ऊर्जा एक ही दिन में उेल देंगे तो पौधा एकदम बढ़कर घना वृक्ष बन जाएगा। ऐसा नहीं हो सकता। तो कम प्रकाश की तीव्रता वाला हमने देखा। अच्छा बायोमास की वृद्धि दर को उत्पादकता कहा जाता है किसी भी क्षेत्र में। तो समय विशेष में किसी सकल बायोमास की जो मात्रा होती है किसी क्षेत्र में उसको उत्पादन कहा जाता है। बायोमास को सूखे भार के रूप में भी चिन्हित किया जाता 5:47:43 है। पूर्ण रेगिस्तानों नंगी चट्टानों और हिमाच्छादित जो भाग है वहां पर न्यूनतम रेट नेट जो प्राथमिक उत्पादकता है वो दर्ज की जाती है। गर्मी के मौसम में सर्दियों की अपेक्षा सकल प्राथमिक उत्पादकता ज्यादा होती है। उष्ण शुष्क मरुस्थलीय भागों में जल सीमाकारी कारक होता है। जबकि ध्रुवीय क्षेत्रों में सूर्य का प्रकाश और तापमान सीमाकारी होते हैं। लिंडमैन के द्वारा जो कि एक जीव वैज्ञानिक थे। इन्होंने 10% का नियम प्रतिपादित किया और यह नियम यह कहता है कि एक ट्रॉपिक लेवल से यानी एक पोषण स्तर से दूसरे पोषण स्तर में जाने पर केवल 10% ऊर्जा ही अगले स्तर में पहुंच पाती है। अगर यहां पर 100 है तो उसका सिर्फ 10% यानी 10 ही अगले लेवल पर पहुंचेगा। जो चराई वाली ग्रेजिंग फूड चेन होती है, अपर्द श्रृंखला होती है उसमें हमेशा वनस्पतियों से शुरुआत होती है। ठीक है? वनस्पतियां हैं उनको चरने वाले फिर जीव आएंगे। उन जीवों को खाने वाले मांसाहारी आएंगे। फिर सब मरेंगे फिर उनका अपघटन होगा। ठीक है? ये चलेगा। आहार श्रंखला में क्रमिक पोषक तत्वों में जातियों की संख्या, सकल बायोमास और ऊर्जा की सुलभता और उपलब्धता में कमी होती जाती है। इसीलिए 5:48:44 जो पारिस्थितिकी पिरामिड या किसी भी पिरामिड को आप देखेंगे तो उसके जो लेवल है ट्रॉपिक लेवल है वो सीमित होते हैं। चार पांच से ऊपर के नहीं होते। पौधे करते क्या है? हैं। ये फोटोसिंथेसिस करके प्रकाश ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में बदल देते हैं। तो ये एक ट्रांसड्यूसर का काम करते हैं। यानी एक कन्व्टर होते हैं, परिवर्तक होते हैं। शाकाहारी जीवों को सर्वाधिक ऊर्जा मिलती है और शीर्ष उपभोक्ताओं को सबसे कम। पारिस्थितिकी तंत्र में तत्वों का जो चक्रण होता है उसको भू रासायनिक चक्र कहा जाता है। पेरोक्सी एसिटिल नाइट्रेट के बीच में और NO2 NO2 मतलब नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और ऑक्सीजन इन सबके बीच सूर्य के प्रकाश की जब उपस्थिति होती है तो जो प्रकाश रासायनिक धूम्र है वो बनती है। ऊर्जा का पिरामिड हमेशा उत्पादकता को दर्शाता है और सभी पिरामिडों से उत्पादकता पता चलती है। फिलहाल ऊर्जा का पिरामिड पौधों द्वारा ऑक्सीजन के बनने और उपयोग की दर प्रकाश संश्लेषण और श्वसन की सापेक्ष दरों पर निर्भर करती है। नतीजा कुल मिलाकर यह निकलता है कि प्रकाश संश्लेषण से श्वसन के लिए जरूरी मात्रा से कहीं ज्यादा ऑक्सीजन बन जाती है। अब यहां देखें घास के मैदान वाला जो इकोसिस्टम है उसकी खाद्य श्रृंखला में उपभोक्ता के तौर 5:49:44 पर सबसे ऊंचे स्तर पर मांसाहारी जीव आते हैं। अगर हम उत्पादकता यानी प्रोडक्टिविटी के डिक्रीजिंग ऑर्डर को अरेंज करें, डिसेंडिंग ऑर्डर को अरेंज करें तो सबसे ज्यादा प्रोडक्टिव होते हैं मैंग्रोव। उससे कम प्रोडक्टिव होते हैं घास के मैदान। उससे भी कम प्रोडक्टिव होती हैं झीलें और महासागर। साइज मत देखिए। उत्पादकता देखिए। हरे पौधे दिन के समय में कार्बन डाइऑक्साइड की बजाय ऑक्सीजन छोड़ते हैं। दिन के समय वह प्रकाश संश्लेषण करते हैं। इसलिए उनकी श्वसन दर प्रकाश संश्लेषण की दर जो है वो श्वसन दर से ज्यादा होती है। घास भूमि के क्षेत्र में परितंत्र की मतलब पारितंत्र की जो खाद्य श्रृंखला है उसमें सर्वोच्च स्तर के उपभोक्ता मांसाहारी होते हैं। ये दूसरी बार रिपीट किया हुआ फैक्ट। जो चौथा ट्रॉपिक लेवल होता है वहां पर सबसे महत्वपूर्ण सदस्य होता है मनुष्य। बायोलॉजिकल सिस्टम माना जाता है जीवमंडल को जो कि सबसे बड़े साइज का है। पृथ्वी कुल मिलाकर एक बंद पारितंत्र है। यहां स्थलमंडल, वायुमंडल, जलमंडल और बायोस्फीयर के बीच में सब कुछ घूमता रहता है। जीवमंडल एक खुले तंत्र का उदाहरण है। ऊर्जा हमेशा बाहर निकल जाती है। क्रस्ट मेंटल और कोर ये सब जो है ये पृथ्वी की संरचना है। तो क्रस्ट और मेंटल 5:50:46 का जो सबसे ऊपरी हिस्सा है। पूरी क्रस्ट और मेंटल का ऊपरी हिस्सा दोनों मिलकर स्थलमंडल यानी लिथोस्फीयर का निर्माण करते हैं। कोर जो है यह सबसे अंदरूनी हिस्सा है और इसे बेरिस्फीयर भी कहा जाता है। पृथ्वी की ओर गहराई में अगर अंदर बढ़ेंगे तो आप देखेंगे कि तापमान बढ़ेगा और कोर तक पहुंचते-पहुंचते आग लग जाती है। तो 32 मीटर की गहराई तय अगर करते हैं आप तो 1 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ता है। आग्नेय चट्टाने जो कि प्राइमरी रॉक्स कही जाती हैं। ये सबसे पहले बनी और इन्हीं से फिर आप देखते हैं कि जो अवसादी चट्टाने हैं या रूपांतरित चट्टाने हैं वो बनती हैं। आग्नेय चट्टाने लावा के ठंडा होने जमने से बनती हैं। में अवशेष नहीं होते। अवशेषों का अभाव होता है। 75% हिस्सा अवसादी चट्टानों से ढका हुआ है धरती पर और बाकी 25% आग्नेय और रूपांतरित। 95% योगदान आग्नेय और रूपांतरित चट्टानों का है क्रस्ट को बनाने में और अवसादी चट्टानों का सिर्फ 5% योगदान है। पृथ्वी का औसत तापमान अगर नापा जाए हालांकि ये परिवर्तित होता रहता है। तो 14 डिग्री सेल्सियस। वायुमंडल में जलवाष्प की मात्रा भूमध्य 5:51:47 रेखा से अगर आप ध्रुवों की ओर जाएंगे तो घटती जाएगी क्योंकि गर्मी भी कम होती जाती है। तो जलवाष्प भी उसी अनुपात में कम होती जाएगी। क्षोभ मंडल यानी ट्रोपोस्फीयर में ऊंचाई के साथ तापमान कम होता है। जमीन के स्तर पर तापमान ज्यादा रहेगा। जैसे-जैसे आप ऊपर जाएंगे तापमान घटता जाएगा। हालांकि आप समताप मंडल में जब पहुंचेंगे ना तो शुरुआती लेवल जो है वहां पर तापमान आपको ज्यादा दिखाई देगा क्योंकि वहां पर ओजोन परत पाई जाती है। मतलब ऑक्सीजन के परमाणु आपस में जुड़ रहे होते हैं और वो यूवी रेडिएशन को अपने अंदर अब्सॉर्ब कर रहे होते हैं। तो सौर विकिरण के वहां ज्यादा मात्रा में स्थिर होने की वजह से तापमान ज्यादा होता है। तभी तो ओजोन बनती है। तो ये चीज है। कुल मिलाकर तापमान आमतौर पर जो वायुमंडल की परतों में गिरता है वो 1 डिग्री सेल्सियस प्रति 165 मीटर की रेंज में गिरता है। स्ट्रेटोस्फीयर जो ओजोन मंडल होता है वहां सघनता ओजोन की 20 से 35 किलोमीटर की ऊंचाई में ज्यादा होती है। इसके बाद जो आयन मंडल है जहां की जो रेडियो तरंगे हैं वहां से परावर्तित होकर धरती पर लौट आती हैं। तो आयन मंडल में भी थोड़ा सा तापमान बढ़ जाता है क्योंकि यहां पर चार्ज पार्टिकल पाए जाते हैं आवेश। इस 5:52:47 वजह से सौर विकिरण लघु तरंगों के रूप में पृथ्वी पर पहुंचता है। समताप रेखा काल्पनिक रेखा है। थर्मल एनिमली जो है यह विसंगति असल में देखें आप कि किसी औसत तापमान और उस अक्षांश में औसत तापमान का जो अंतर है मतलब स्थान का औसत तापमान कुछ और अक्षांश का औसत तापमान कुछ और ये जो विसंगति है इसको कहा जाता है तापमान की विसंगति। जलवाष्प सूर्य से आने वाली सूर्यात तप के कुछ अंश को अवशोषित कर लेती है और पृथ्वी धारा द्वारा विकरित ऊष्मा को सजोए रहता है। कंबल की तरह से काम करती है जलवाष्प और जितनी भी ग्रीन हाउस गैसेस हैं सभी क्षोभ मंडल वायुमंडल की सबसे निचली और सघन परत होती है। 75% पूरा जो वायु का संपूर्ण भार है उसमें यह हिस्सा पाया जाता है। तो ये संवहन मंडल भी कहलाता है। सभी प्रकार की जो जलवा और मौसमी घटनाएं होती हैं। बादलों का निर्माण, तूफान, चक्रवात ये सब क्षोभ मंडल में ही घटित होता है। ठीक है? इन सबका निर्माण क्षोभ मंडल के अंदर ही होता है। पौधे जीवमंडलीय पारिस्थितिकी तंत्र के जैविक और अजैविक संघटकों के बीच में एक इंटरमीडिएट होते हैं। की स्टोन प्रजातियां जो कि किसी समुदाय में प्रचुरता और जैव भार की अल्पता के बावजूद सामुदायिक अभिलक्षणों में अपना पूरा एक 5:53:49 प्रभावशाली अस्तित्व बनाकर रखती है। जैसे कि हाथी की स्टोन प्रजाति। कोर इफेक्ट क्या होता है? इसमें दो पारिस्थितिकी तंत्र या पारितंत्र आपस में मिलते हैं। वनस्पति समुदाय की अंतिम प्रावस्था को सेरे या चरम समुदाय या चरम अनुक्रम या जलवायु चरम या चरम वनस्पति कहा जाता है। तो सेरे परिपक्व पारिस्थितिकी तंत्र का द्योतक है। 15 से 20 गुना सामान्य से 15 से 20 गुना ज्यादा जो कार्बन डाइऑक्साइड की मौजूदगी है ये प्रकाश संश्लेषण की दर को घटा देती है। पौधे एक रेंज तक ही प्रकाश संश्लेषण कर सकते हैं। उसके बाद वो भी जवाब दे देते हैं। दुनिया का सबसे बड़ा जो प्रबल भित्ति क्षेत्र है वह ऑस्ट्रेलिया के उत्तरपूर्वी हिस्से में प्रशांत महासागर में ग्रेट बैरियर रीफ है। बाकी आप एल्बिटो इफेक्ट को देख रहे हैं। ये देर संध्या काल और सुबह जो प्रातः काल का समय होता है उस समय ऊंचा होता है। दुनिया का वह हिस्सा जो कि मानव अधिवास के लिए उपयुक्त है उसको एक्यूमन कहा जाता है। और नॉन एक्यूमन उन्हें कहा जाता है जहां कि मनुष्य के आवास की कोई संभावना नहीं बन सकती। नाइट्रोजन प्रोटीन के निर्माण में और संश्लेषण में सहायक होता है। फास्फोरस 5:54:50 जो है वो कोशिका द्रव्य बनाता है। ठीक है? है ऊर्जा स्थानांतरण और उसके प्रवाह में सहायक होता है। सल्फर जीवों में अमीनो एसिड का निर्माण करता है। प्रोटीन निर्माण में सहायता करता है। और कैल्शियम पेक्टेट जो है वो एक नेचुरल ग्लू कहा जाता है। नेचुरल ग्लू के तौर पे यानी प्राकृतिक गोंद के तौर पर क्योंकि ये प्लांट सीमेंट की भूमिका निभाता है। मजबूत ऊतक बनाता है और पादप कोशिकाओं को आपस में पादप कोशिकाओं को आपस में जोड़ता है। मैग्नीशियम पौधों में क्लोरोफिल के निर्माण और उसके सही संचालन के लिए अनिवार्य है। वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण जो है यह कुछ विशेष प्रकार के जीवाणुओं द्वारा किया जाता है जो कि दलहनी पौधे जो लेगुमिनस प्लांट्स होते हैं उनकी जड़ों में गांठों के अंदर पाया जाता है। राइजोबियम, एजीटोबैक्टर, नील हरित शैवाल, क्लॉस्टीड्रियम ये सब जो जीव है ये नाइट्रोजन स्टेबलाइजेशन का काम स्थिरीकरण का काम करते हैं। जब पौधे और जंतु मर जाते हैं तो अपघटक इनका विघटन करके कैल्शियम को वातावरण में रिलीज़ कर देते हैं। भारतीय वन नीति 1952 सबसे पुरानी वाली। इसके हिसाब से देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 33% हिस्सा जंगल होने ही चाहिए। मैदानी हिस्सों में 20% और पर्वतीय क्षेत्रों में 5:55:52 60% और आज तक हम उस लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाए। भारतीय वन सर्वेक्षण का जो हेड क्वार्टर है वो देहरादून में है। इसका काम देश के वन क्षेत्रों और वन संसाधनों के आंकड़े और सूचना को इकट्ठा करना है। भारत और बांग्लादेश के बीच में स्थित सुंदरवन वनस्पति क्षेत्र दुनिया का सबसे बड़ा कच्छ वनस्पति क्षेत्र है और यहां पर रॉयल बंगाल टाइगर की सबसे ज्यादा आबादी रहा करती है। सुंदरवन मैंग्रोव वनस्पति क्षेत्र जो है ये देश के कुल मैंग्रोव वनस्पति का 50% हिस्सा कवर करता है। अंडमान में सब प्रकार की वनस्पतियां पाई जाती हैं। मतलब सदाबहार, पर्णपाती, मैंग्रोव सब कुछ मिलेगा। कार्बन क्रेडिट की अवधारणा जो क्योटो प्रोटोकॉल है वहां से निकली हुई है। किसी क्षेत्र में जंगल उगाने की अपेक्षित मतलब जंगल उगाने के लिए जंगल छोड़िए पौधे उगाने के लिए पेड़ उगाने के लिए सबसे कम जो तापमान है वो 4 डिग्री सेल्सियस है। अगर 4 डिग्री सेल्सियस से कम तापमान रहेगा तो पौधे आमतौर पर नहीं उगेंगे। हो सकता है कुछ वनस्पतियां उग जाए क्योंकि जीरो से कई डिग्री नीचे तापमान पर भी ऐसा होता है। लेकिन आमतौर पर जो पौधे होते हैं वो नहीं पैदा होंगे। तो जंगल को हरा सोना कहा जाता है और यह गलत नहीं है 5:56:52 और यह सोना नहीं है बल्कि सोने से भी ज्यादा कीमती है। पृथ्वी का 8% हिस्सा उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन से आच्छादित है। लेकिन इन जंगलों में पृथ्वी के आधे से अधिक जंतु और पेड़-पौधे पाए जाते हैं और बाकी इलाके में मनुष्य ने हाथ पैर फैलाया हुआ है। समानापा विषुवतीय और मरुस्थलीय प्रदेश के बीच का संक्रमण स्थल है। प्रकृति ने मनुष्य को बतौर गार्जियन बनाया हुआ है। एक अभिभावक की भूमिका दी हुई है कि तुम्हारे पास बुद्धि ज्यादा है। तो तुम प्रकृति और वन्य जीवों का और जितने अन्य प्राणी है उनका संरक्षण करो। उनकी देखरेख करो। उनका ख्याल रखो। उनके साथ सह अस्तित्व में रहो। उन्हें भी खुश रखो। तुम भी खुश रहो। उनसे लो और उन्हें दो। लेकिन मनुष्य क्या करता है? मनुष्य उनका यूज़ करता है अपने फायदे के लिए। और जहां वह फायदे के फायदे के दायरे में नहीं आते हैं, निकम्मे हो जाते हैं मनुष्य के दृष्टिकोण से तो उन्हें नष्ट कर देना चाहता है और वही वो इस समय कर रहा है। यानी प्रकृति द्वारा जो सौंपी हुई भूमिका है उससे हट चुका है। आगे आप देखिए समाना बायोम में तीन प्रकार की कृषि झूम कृषि, पशुचारण और सतत कृषि की जाती है। और नहीं 5:57:53 तो जो धर्म ग्रंथ बाद में लिखे गए हैं। वेदों की बात नहीं हो रही है। वेद में तो प्रकृति को सर्वोच्च माना गया है। और प्रकृति के ही घटकों की हम पूजा करते हैं। लेकिन जो पौराणिक इतिहास हमारा है जो कि गुप्त काल में सबसे ज्यादा फला फूला तो उसमें कह भी दिया गया कि पृथ्वी तुम्हारी है और इसको वीर भोग गया वसुंधरा। जो वीर है वो वसुंधरा का भोग करेगा। मतलब वीर है आप पुरुषार्थी है तो आप पृथ्वी का भोग करने के लिए आप उसको दूसरे अर्थ में लेते हैं कि बहादुर पुरुष है तो पृथ्वी को जीतेगा और उसका उपभोग करेगा। वही राजा बनेगा। वही शासन करेगा। वही योग्य है। लेकिन मनुष्य जो है वो पृथ्वी का उपभोग करने के लिए पैदा हुआ है। पृथ्वी उसकी भोग वस्तु है। यह बात नहीं है। ये पौराणिक मान्यता है। वैदिक मान्यता जो कि हमारी असली मान्यता है उसमें प्रकृति को एक पूज्य घटक के रूप में माना गया है और उसके हर अवयव की हम पूजा करते हैं। है ना? टुंड्रा बायोम को आप देख रहे हैं 10° समताप रेखा से टैगा वन क्षेत्र से ये अलग हो जाता है। और बड़े-बड़े शिकारों की जमीन मतलब लैंड ऑफ बिग गेम या बिग गेम कंट्री कहा जाता है सवाना प्रदेश को। आगे आप देखेंगे यहां पर उष्णकटिबंधीय जो प्रदेश है इसको सतत दुर्गमताओं का प्रवेश का 5:58:55 प्रदेश कहा जाता है। पश्चिमी घाट जैव विविधता के मामले में सबसे समृद्ध है। जो साइट्रस फ्रूट्स है ये भूमध्यसागरीय प्रदेशों में पाए जाते हैं। जैसे अंगूर है, नींबू है, संतरा है, शहतूत है, नाशपाती है, अनार भी। इसके बाद आप देखेंगे कृषि विकास के लिए जो तीव्र गति से दृष्टिगत घास क्षेत्र बायोम है वह भविष्य के भंडार माने जाते हैं। इनको ब्रेड बास्केट भी कहा जाता है। जैसे मध्य अक्षांश वाले जो घास के मैदान है ये कुदरती ब्रेड बास्केट माने जाते हैं। रोटी की टोकड़ी चिरहरित वन यानी जो सदाबहार वन होते हैं। यहां जैव विविधता सबसे ज्यादा होती है। इकोलॉजिकल फुटप्रिंट यह जमीन का न्यूनतम हिस्सा है जो कि किसी व्यक्ति या आबादी के जीवन को पूरी तरह से बनाए रखने के लिए जरूरी होता है। दक्षिणी अमेरिका में अमेजन बेसिन द्वारा सवाना बायोम को दो भागों में बांटा गया है। एक तो उत्तरी हिस्सा है लानोस और दूसरा जो दक्षिणी हिस्सा है उसको कैमपोस कहा जाता है। बायोम के समस्त पादपों और प्राणियों की सामान्य विशेषताएं एक समान होती हैं। और कुल मिलाकर आप देखेंगे कि जो पारिस्थितिकी तंत्र हैं जिसमें कि जीव-जंतु, पेड़-पौधे सभी आते हैं और ये अलग-अलग क्षेत्रों के अलग-अलग होते हैं। तो इन्हें बायोम कहा जाता है। 5:59:55 ठीक है? घास स्थल का अपना बायोम है, समुद्र का अपना है। 1972 का स्टॉकहोम सम्मेलन स्वीडन में हुआ था और वहां पर यूएईपी का जन्म होता है और 5 जून को पर्यावरण दिवस सेलिब्रेट किया जाता है। ये चीज हमने शुरू में देखी थी। जो पर्टिकुलेट मैटर है प्राथमिक वायु प्रदूषक की भूमिका में उसमें कालिक धुआ धूल एस्बेस्टस कीटनाशक कार्बन मोनोऑक्साइड हाइड्रोकार्बन और सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड जैसी जो गैसें हैं ये सब आते हैं। कहने का मतलब ये कि जो प्राइमरी पॉलटेंट है उसमें कणिकय पदार्थ यानी ये जो पर्टिकुलेट मैटर आपने कोष्क के अंदर देखे ये सारे हैं और ये सारी गैसें भी हैं। जैसे कार्बन मोनोऑक्साइड है, हाइड्रोकार्बन है, सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड। बाकी कार्बन डाइऑक्साइड, ग्रीन हाउस गैस तो है ही है जो कि मीथेन, ओजोन और बाकी जलवाष्प के साथ मिलकर इंफ्रारेड रेडिएशन को सोख लेती है और पृथ्वी के तापमान को बढ़ा देती है। क्लोरोफ्लोरोकार्बन से समतापी ओजोन की मात्रा में कमी आती है। और जो पराग कण और बीजाणु है कुछ पौधों के वो कुछ लोगों को एलर्जी कर देते हैं। सिंदूर में शीशे का ऑक्साइड होता है। मतलब लेड के ऑक्साइड होते हैं और कुमकुम में पारे के ऑक्साइड होते हैं। ठीक है? मतलब जो कुमकुम आप 6:00:58 लगाते हैं उसमें मरकरी का मरकरी का ऑक्साइड होता है और सिंदूर में लेड का ऑक्साइड होता है। मतलब ये नुकसानदेह है। पारे से क्या होता है? आपके अंग शून्य पड़ जाएंगे। निगाह धुंधली पड़ जाएगी। शीशे से भ्रम और पागलपन और अंततः मृत्यु हो सकती है। मतलब दोनों आपके सेंट्रल नर्वस सिस्टम को और जो न्यूरॉन है उनको प्रभावित करते हैं। ये सबसे खतरनाक स्थिति है। क्योंकि न्यूरॉन इतने कीमती है जितना कि कीमती आपके जीवन में कुछ भी नहीं है। वो बन एक बार जो बन के मिल गए उतने ही है। नष्ट हो जाएंगे दोबारा नहीं मिलेंगे। यहां देखिए पारे के विषैलेपन से मिनीमाटा सिंड्रोम होता है और अपंगता और मृत्यु इसका अंतिम उपाय होता है। ताजमहल का संगमरमर पीला पड़ रहा है। क्यों? अम्ल वर्षा का परिणाम है। प्रदूषण का परिणाम है। आगे आप देखेंगे फ्लाई ऐश जलीय वनस्पतियों के प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया में बाधा डालती है। शाहजहां अगर जिंदा होता तो कहता कि अब पता होता तो इतना पैसा ही नहीं बर्बाद करते। अच्छा आगे देखें शैव जैव सीएनजी जो जैविक सीएनजी होती है ये बायोगैस का एक प्योर फॉर्म है मतलब शुद्ध रूप असल में ये होती है बायोगैस ही बायोगैस से बहुत अलग नहीं है 6:01:58 लेकिन उसका एकदम प्यरेस्ट फॉर्मेट और इसमें सारी अशुद्धियों को दूर करने के बाद ही इस्तेमाल किया जाता है। कुल मिलाकर 93% इसमें मीथेन होती है। बायोगैस का जो संगठन होता है अच्छा पुणे में जो जैव सीएनजी का संयंत्र है उसको स्थापित किया गया है। बायोगैस का जो औसत संगठन होता है उसमें मीथेन 55% होती है। कार्बन डाइऑक्साइड 35 होती है। हाइड्रोजन 7 1/2 होती है। नाइट्रोजन 2.4सदी होती है। और आप देख रहे हैं सीएनजी में मीथेन की मात्रा 80 से 90% तक चली जाती है। प्रोपेन और ब्यूटेन गैसें ये लिक्विड पेट्रोलियम गैस के अंदर होती है। एलपीजी जो है उसमें ब्यूटेन की मात्रा भारत के अंदर जो एलपीजी है उसमें ब्यूटेन की मात्रा सबसे ज्यादा होती है। 85% मीथेन नेचुरल गैस में पाई जाती है। 10% इथेन पाई जाती है। और उसी तरीके से आप देखेंगे ब्यूटेन, पेंटेन और एल्केनेंस जो है वो भी पाए जाते हैं। एलपीजी में जो एथिल मरकेप्टन है वो मिलाया जाता है C2H5sh जो कि बहुत गंदी महत्व वाला होता है और इसी वजह से हमें मालूम होता है कि गैस लीक कर रही है। गैसोहॉल गैसोलन मतलब बाकी जो गैस हैं एलपीजी के अंदर मूल रूप से प्रोपेन 6:02:59 प्रोपेन और ब्यूटेन उनकी अपनी कोई गंध नहीं होती है। अगर ना मिलाया जाए एथिल मेक मर माफ़ कीजिएगा। एथिल मरकेप्टन तो पता ही नहीं चलेगा कि गैस लीक कर रही है। यहां आप देखिएगा गैसोहॉल जो है वह गैसोलिन और इथेनॉल का मिश्रण है। ज्वारीय ऊर्जा के संभावित क्षेत्र गुजरात में कच्छ की खाड़ी, खंभात की खाड़ी और पश्चिम बंगाल में दुर्गाधवानी और सुंदरवन है। नदियों के जल की गुणवत्ता का निर्धारण जैविक ऑक्सीजन मांग यानी जो बीओडी होती है बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड उसके आधार पर किया जाता है। रासायनिक ऑक्सीजन मांग से भी पूरा किया जाता है। मतलब पता किया जाता है। जो डाइल्यूट ऑक्सीजन है उससे भी मालूम होता है और पीएच पता करके भी एक सामान्य तौर पर हम जान सकते हैं। जिस जल में जैविक अपशिष्टों का प्रदूषण होता है, वहां पर ई कोलाई और कोलिफ़ार्म जैसे जो बैक्टीरिया है, वह ज्यादा मात्रा में पाए जाते हैं। सूक्ष्म जीवों की अपघटन के लिए आवश्यक सूक्ष्म जीवों द्वारा अगर अपघटन आपको करवाना है तो ऑक्सीजन की मात्रा जो है उसको जितनी वहां पर आवश्यक होती है। क्योंकि सूक्ष्म जीव भी जो है वो सड़े गले पदार्थों को खा पीकर सफाई करते हैं। ठीक है? लेकिन उसके लिए उन्हें चाहिए 6:04:01 होती है ढेर सारी ऑक्सीजन और जितनी ऑक्सीजन उनको चाहिए होती है आमतौर पर अगर पानी के अंदर की बात है तो वो पानी में घुली हुई ऑक्सीजन को यूज करते हैं। तो इनकी जो ऑक्सीजन की मात्रा मतलब डिमांड इनकी इनके द्वारा झुकी की हुई है उसी को कहा जाता है जैविक ऑक्सीजन डिमांड या बीओडी। भारत की सर्वाधिक प्रदूषित नदी है अमलाखेड़ी और ये गुजरात की है। भूमिगत जल के जो सबसे प्रदूषित तत्व होते हैं मतलब जमीन का जो पानी है प्रदूषित होता है तो उसमें आर्सेनिक और फ्लोराइड जो है ये सबसे बड़े प्रदूषक होते। मध्य प्रदेश को बाघ राज्य कहा जाता है। सबसे अधिक जो रॉयल बंगाल टाइगर है वो मतलब ये सुंदरवन का जो मैंग्रोव क्षेत्र है वो इसके लिए प्रसिद्ध है। सबसे बड़ा बाघ आरक्षित क्षेत्र नागार्जुन सागर श्रीसैलम है जो कि आंध्र प्रदेश का है। ठीक है? और सफेद बाघों के लिए उड़ीसा का नंदन कानन जाना जाता है। बाघ संरक्षण का पहला अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन 2010 में रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में और दूसरा जो है वो 2012 में थिमपू में तीसरा नई दिल्ली में 2016 में। उभयचर पर्यावरणीय परिवर्तन के लिए ज्यादा संवेदनशील होते हैं। एफीबियन जो है सबसे पहले प्रतिक्रिया देते हैं पर्यावरण में बदलाव का। बायोटेक्नोलॉजी पार्क लखनऊ में 6:05:03 है और पृथ्वी का औसत वार्षिक तापमान 14 डिग्री सेल्सियस है। नगरीकरण के कारण जो सतह का एल्बिडो है वो कम हो जाता है। प्रदूषण की वजह से कम हो जाता है असल में। और आप देखेंगे तो नगरीकरण के कारण नगरों के मध्य ऊष्मा द्वीप यानी हीट आइलैंड जो है निचले वायुमंडल में प्रदूषण गुंबद का निर्माण करते हैं। ब्लैक कार्बन एक गैस नहीं है बल्कि ठोस कण या एरोसॉल होता है जो कि सामान्य रूप से कालिक के नाम से जाना जाता है। भूरा कार्बन एरोसॉल है जो कि प्रकाश अवशोषित करने वाला एक कार्बनिक पदार्थ होता है। ऊंचाई के साथ तापमान वृद्धि ऋणात्मक होती है। मतलब तापमान में कमी आती है तो इसे तापमान का प्रतिलोमन कहा जाता है। कार्बन डाइऑक्साइड तथा आयोडीन से बादल बनाकर कृत्रिम वर्षा कराई जाती है और इसको मेघ पीजन यानी क्लाउड सीडिंग कहा जाता है। जो प्रकाश संश्लेषण की क्रिया है इसके द्वारा वातावरण के कार्बन डाइऑक्साइड से जो कि कार्बन से निकलकर माफ़ कीजिएगा जो कार्बन निकलकर पौधे और मिट्टी में संग्रहित होता है उसको ग्रीन कार्बन कहते हैं। और नगरीय धूम्र कोहरे के कारण दृश्य दृश्यता घट जाती है और सौरिक विकिरण जो है वो कम मात्रा में प्राप्त होता है। कार्बन 6:06:04 सिंक आप देखते हैं जो कि कार्बन डाइऑक्साइड को प्राकृतिक तौर पर अवशोषित करते हैं। समुद्र और जंगल दोनों कार्बन सिंह के बेहतरीन उदाहरण। अगला हम लोग देख रहे हैं प्रवाल भित्तियों को महासागरों और उष्णकटिबंधीय वर्षावनों के तौर पर यहां देखेंगे। प्रवाल भित्तियों को महासागरों का उष्णकटिबंधीय वर्षावन कहा जाता है। जैसे धरती पर उष्णकटिबंधीय वर्षावन ऑक्सीजन उत्पत्ति का काम करते हैं और प्रकृति को बहुत कुछ देते हैं। ठीक वैसे ही प्रशांत महासागर का सोलमन आइलैंड जल स्तर में वृद्धि की वजह से डूबने के कगार पे है। सुपरसोनिक जेट विमानों के उड़ने से ओजोन परत को नुकसान पहुंचता है और ओजोन का सबसे पहला छेद हमने देखा था अंटार्कटिका पर। एजेंडा 21 सतत विकास से जुड़ा हुआ है। ब्राउन एयर शब्द का इस्तेमाल प्रकाश रासायनिक धुएं के लिए किया जाता है। आइस कोर को जलवायु परिवर्तन का क्रायोजेनिक संकेतक माना जाता है। और क्योटो प्रोटोकॉल जो आप देख रहे हैं ये ग्रीन हाउस गैस की मात्रा को कम करने से संबंधित है। ओजोन गैस ऑक्सीजन का एक अपरूप है जिसके प्रत्येक कण में प्रत्येक अणु में तीन परमाणु होते हैं। मतलब O3 तो सतही ओजोन जो 6:07:05 है ये द्वितीयक पॉलटेंट होती है। ये फायदेमंद नहीं होती है। नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, परऑक्सी, एसिटल, नाइट्रेट यानी पेन, सल्फ्यूरिक एसिड, नाइट्रिक एसिड ये सब जो है ये सेकेंडरी पोलटेंट है। सारे के सारे स्मोग यानी धुआं। यह आवश्यक रूप से प्रकाश वायुमंडल में नाइट्रोजन और सल्फर के ऑक्साइड की उपस्थिति की वजह से होता है। मतलब इसमें फागग और स्मोक दोनों मिले हुए होते हैं। ओजोन का सर्वाधिक सांद्रण समताप मंडल के बीच में पाया जाता है। ओजोन परत को पृथ्वी का छाता यानी अंब्रेला ऑफ़ अर्थ भी कहा जाता है। मतलब ये अल्ट्रावायलेट रेडिएशन को अब्सॉर्ब करने का काम करता है। ओजोन मिश्रण का अनुपात 35 कि.मी. की ऊंचाई पर सबसे ज्यादा होता है। लेकिन इसका जो अधिकतम घनत्व आप देखते हैं, वो 20 से 25 कि.मी. के बीच में पाया जाता है। ओजोन का सर्वाधिक सांद्रण उच्च अक्षांशों पर अर्थात दोनों गोलार्धों में 50° ध्रुवों के मध्य तथा मतलब 50° ध्रुवों से ध्रुवों के मध्य तथा जो न्यूनतम सांद्रण है, वो भूमध्य रेखा के ऊपर पाया जाता है। यानी 50° से लेकर ध्रुवों तक 90° तक ज्यादा होता है और इधर जो विषुवत रेखा है इधर कम 6:08:05 होता है। ओजोन के मुख्य दोषी कारक जो है वो हैलोजन गैस हैं जो कि इसे नष्ट करने का काम करती है। क्लोरीन डायमर कहा जाता है स्वीट C12O2 को। दक्षिणी ध्रुव के ऊपर समताप समतापीय जो ओजोन परत है ये समताप मंडलीय जो ओजोन परत है ये पतली हो जाती है। जिस कारण ओजोन छिद्र का निर्माण होता है। और आप देख रहे हैं कि ओजोन क्षरण की प्रक्रिया को रोकने का सबसे पहले प्रयास वियना कन्वेंशन में किया गया था ऑस्ट्रिया में 1985 में। अंतरराष्ट्रीय समझौता मॉन्ट्रियल में हुआ था कनाडा में 87 में और 16 सितंबर को ओजोन दिवस मनाया जाता है। मॉन्ट्रियल कन्वेंशन की डेट है। डोबसन में नापी जाती है ओजोन की कंसंट्रेशन और जो हरित गृह गैस हैं यानी ग्रीन हाउस गैस हैं उन्हें प्रकृति का कंबल कहा जाता है। पृथ्वी का ब्लैंकेट कहा जाता है। अगर ये ना होती तो पृथ्वी का तापमान शून्य से भी कई डिग्री नीचे चला जाता। प्रमुख जो ग्रीन हाउस गैस हैं उसमें कार्बन डाइऑक्साइड, मीथे, नाइट्रस ऑक्साइड, ओजोन, हाइड्रोफ्लोरोकार्बन, जलवाष्प ये सारे आते हैं। तो ग्रीन हाउस इफेक्ट की खोज 1824 में जोसेफ हूरियर के द्वारा की गई थी जो कि एक फिजिक्स के वैज्ञानिक थे, भौतिक 6:09:05 शास्त्री थे। हानिकारक पराग्नी किरणों से रक्षा करने का काम ओज़ोन परत करती है और इसको नष्ट करने का काम सीएफसी करता है। कार्बन व्यापार के द्वारा हरित द्रव गैसों के उत्सर्जन में कटौती की जाती है। रियो डीजेनरियो में जो सम्मेलन हुआ था उसमें कार्बन टैक्स पर विचार विमर्श हुआ था। 1992 में कार्बन क्रेडिट की कीमतें गतिशील होती हैं। यह बाजार की शक्तियों के हिसाब से निर्धारित और परिवर्तित होती है। कार्बन कर क्या है? तो कार्बन कर जो है ये कार्बन का मूल्य है जो कि कोयला, पेट्रोलियम प्राकृतिक गैस जैसे जो ईंधन है उनको जलाने से उत्सर्जित होता है। ये एक तरह का एनवायरमेंट टैक्स। संयुक्त राष्ट्र की पर्यावरण संरक्षण एजेंसी ने 1970 के दशक में सबसे पहले कार्बन ट्रेडिंग थ्योरी को पेश किया था। जिसका उद्देश्य था CO2 गैस के उत्सर्जन में कटौती करना। एक वैश्विक विचार मंडल जिसे कि क्लब ऑफ रोम कहा जाता है। इसने धारणीय विकास का विचार सबसे पहली बार 1972 में पेश किया था और जैव सुरक्षा यानी बायोसेफ्टी का जो कार्टाजेना प्रोटोकॉल है ये पर्यावरण और वन मंत्रालय के द्वारा कार्वित होता है। इसके बाद आप देख रहे हैं यहां पर एक पेड़ मां के नाम अभियान है। लेकिन उससे पहले कुछ पॉइंट्स और हैं। जैसे एक जल चक्र 6:10:05 हाइड्रोलॉजिकल साइकिल वनों की महत्वपूर्ण भूमिका इसमें होती है। वन वर्षा के जल को रोकने, संग्रहित करने और धीरे-धीरे वायुमंडल में वाष्पोत्सर्जन के माध्यम से वापस भेजने का काम करते हैं। 10% का नियम वही है रेमंड लिंडमैन वाला। मतलब 10% ऊर्जा ही अगले ट्रॉपिक लेवल में पहुंच पाती है और बाकी जो 90% है वो बर्बाद हो जाती है। रासायनिक ऊर्जा में खपत हो जाती है। जै माफ़ कीजिएगा ऊष्मीय ऊर्जा में खपत हो जाती है। जैव उर्वरक जीवित सूक्ष्म जीवों की एक प्रकार की कृषि है जो कि मिट्टी में डाले जाने पर पौधों की वृद्धि को बढ़ावा देते हैं। और ये सूक्ष्म जीव मिट्टी में पोषक तत्वों की उपलब्धता को बढ़ाते हैं और पौधों को स्वस्थ और ज्यादा उपजाऊ माहौल बनाकर देते हैं। एक पेड़ मां के नाम अभियान यह शुरू किया गया था प्लांट फॉर मदर इस नाम से और नरेंद्र मोदी जी के द्वारा शुरू किया गया वर्ल्ड एनवायरमेंट डे के मौके पर बुद्ध जयंती पार्क नई दिल्ली का वहां से अपनी माता जी की स्मृति में इन्होंने एक पीपल का पेड़ लगाया था मुख्य उद्देश्य है सीधी बात है निर्नीकरण को रोकना पर्यावरण का संरक्षण करना और धरती माता के प्रति अपने सम्मान को व्यक्त करना नोडल मंत्रालय वही पर्यावरण मंत्रालय 6:11:07 फिर इसके बाद इसका 2.0 यानी 2025 में दूसरा फेज चला मिशन लाइफ वेब पोर्टल और इको क्लब जैसी चीजें इसमें शामिल हुई और माइक्रोसाइट्स के तौर पे इसमें इसको मतलब मॉड्यूल इसका जो है इन्वॉल्व किया गया। तो दूसरा फज़ इसका 2.0 के नाम से जाना गया। ये सब करंट अफेयर में था। आपने पढ़ा था। डिजिटल मॉनिटरिंग इसकी हुई थी। मतलब पेड़ों की निगरानी और डेटा संकलन के लिए डिजिटल टेक्नोलॉजी का यूज़ किया गया था। और सारे मंत्रालय इसमें कहीं ना कहीं शामिल थे। सब बड़े पैमाने पर अपनी-अपनी तरीके से हिस्सा ले रहे थे। इसके बाद हरित क्रेडिट कार्यक्रम था जो कि जीसीपी कहा जाता है। ग्रीन क्रेडिट को शुरू किया गया। मतलब इस नियम को शुरू किया गया 2023 में। मतलब लोगों, समुदायों, कंपनियों को स्वेच्छा से, पर्यावरण सुधारने के लिए काम करने के लिए प्रेरित करना इसका उद्देश्य था। क्योंकि पर्यावरण संरक्षण सिर्फ सरकार का कर्तव्य नहीं है। ये हर नागरिक की ड्यूटी है और हर नागरिक जब इसमें इन्वॉल्व होगा तभी ये सफल हो पाएगा। तो कुल मिलाकर आप देखेंगे कि मार्च 2026 तक 12 राज्यों में करीब 4391 हेक्टेयर खराब हो चुकी जो जमीन है जंगली जमीन है उसको फिर से हराभरा करने के लिए चुना गया है और जो जंगल है उनको 6:12:07 तेजी से काटा जा रहा है। वन सन वन वर्ल्ड वन ग्रिड ये जो पहल है इसको 2018 में प्रस्तावित किया गया था। नवीकरणीय ऊर्जा के लिए अन्य देशों के साथ आदान प्रदान के लिए ढांचा तैयार करना इसका उद्देश्य था। तो भारत और यूनाइटेड किंगडम ने संयुक्त रूप से इसको इस इनिशिएटिव को स्टार्ट किया था। अंतरराष्ट्रीय जलवायु साझेदारियों को आकार देना इसका उद्देश्य था। सौर ऊर्जा के इस्तेमाल पर ही आधारित है। सीधी बात। फिर G20 न्यू दिल्ली लीडर्स डिक्लेरेशन 2023 ग्रीन डेवलपमेंट पैक्ट भी इसको कहा जाता है। इसको अपनाया गया 9 सितंबर 2023 को हरित विकास और समावेशी विकास जो है उसको मजबूत बनाना तेज बनाना इसका उद्देश्य था। और इसमें एक आम सहमति बनाने वाले देश के रूप में भारत को स्थापित करके अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने का पर्पस था। डॉल्फिन अनुमान रिपोर्ट को आप देख रहे हैं। 3 मार्च 2025 को इसको जारी किया गया। कुल 6327 नदी डॉल्फिन पाई जाती हैं। 28 नदियों में इसका अध्ययन करके बताया गया है और करीब 3150 कार्य दिनों में 8500 कि.मी. की दूरी को तय किया गया। सिंधु नदी डॉल्फिन जो है ये वर्तमान में 6:13:08 सिर्फ व्यास नदी में देखी गई जो कि चिंता की बात है। तो ये इनकी कुल संख्या है। गंगा डॉल्फिन है 6324। सिंधु डॉल्फिन सिर्फ तीन है। अध्ययन की जानकारी प्राप्त हुई। आठ अलग-अलग जो राज्य हैं, राष्ट्रों के हिस्से हैं और नदियां हैं कुल मिलाकर 28। डॉल्फिनों की संख्या सबसे ज्यादा यूपी में है। उसके बाद दूसरे नंबर पर बिहार में है। फिर तीसरे नंबर पर वेस्ट बंगाल में है। चौथे नंबर पर असम, फिर झारखंड, फिर राजस्थान, फिर एमपी, फिर पंजाब। ठीक है? ये रिपोर्ट आपने देखी। और यहीं पर हमारी जो यात्रा है वह समाप्त होती है। बाकी अगर आप हमारे पेड कोर्सेस से जुड़ना चाहते हैं और हमारा जो मटेरियल है कंटेंट है उसे प्राप्त करना चाहते हैं तो अब तो ऑफलाइन हमारा जो सेंटर है कानपुर में वहां से आप इसकी जो हार्ड कॉपी है उसको भी प्राप्त कर सकते हैं। सिर्फ आप पीडीएफ पर आप निर्भर नहीं रह सकते। अगर आपको किताबें और कागज पर मटेरियल पढ़ने का शौक है तो आप वहां से बुकलेट प्राप्त कर सकते हैं और नहीं तो ऑनलाइन परचेस कर सकते हैं। तो इसमें इतना ही बहुत सारी शुभकामनाएं आगामी परीक्षा के लिए।